भारत ने चीन के बहानों को किया खारिज

चीनी मामलों के जानकारों  का कहना है कि पीएलए, लद्दाख में भारतीय बुनियादी ढांचे को बढ़ाने पर इसलिए चिंतित है क्योंकि यह पाकिस्तान के लिए अरबों डॉलर के पाकिस्तान आर्थिक गलियारे, या CPEC के लिए एक सैन्य खतरा पैदा कर सकता है, जो कि खुंजेर दर्रा और पाकिस्तान से होकर गुजरता है।

नयी दिल्ली(ब्यूरो):

भारत ने चीन की उस दावे को खारिज कर दिया है कि जिसमें ड्रैगन ने कहा कि 3488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर बुनियादी ढांचों को अपग्रेड करने के कारण दोनों देशों के बीच तनाव की स्थिति बनी हुई है। भारत ने कहा है कि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) पहले से ही वहां मौजूद है और सीमा के उस पार सड़कों और संचार नेटवर्क का निर्माण जारी है।

एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “पहले, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा सोमवार को उद्घाटन किए गए पुल एलएसी से दूर हैं और ये पुल नागरिकों की आवाजादी और सैन्य रसद पहुंचाने में मदद करेंगे। दूसरा, चीन ने कभी भी चल रही सैन्य-कूटनीतिक वार्ता में भारत के इन्फ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड के मुद्दे को नहीं उठाया है। तीसरा, एलएसी के करीब सड़क, पुल, ऑप्टिकल फाइबर, सोलर-हीटेड हट्स और मिसाइल तैनाती के बारे में पीएलए का क्या कहना है?” उन्होंने कहा कि भारत केवल एलएसी के किनारे पर ही कोई निर्माण कर रहा है और इसके लिए हमें चीनी अनुमति की आवश्यकता नहीं है।

सैन्य कमांडरों के अनुसार, PLA ने गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स में सुरक्षित संचार के लिए ऑप्टिकल फाइबर खींचा है, पंगोंग त्सो के उत्तरी तट पर आगे के सैनिकों के लिए सौर गर्म कंटेनरों को पहुंचाने के लिए भारी-लिफ्ट क्रेन का इस्तेमाल किया है और एक अस्पताल भी बनाया है।

हालांकि, चीन पर नजर रखने वालों के अनुसार, पीएलए लद्दाख में भारतीय बुनियादी ढांचे के अपग्रेड करने की खबर से इसलिए चिंतित है, क्योंकि यह पाकिस्तान के लिए अरबों डॉलर के पाकिस्तान आर्थिक गलियारे या CPEC के लिए एक सैन्य खतरा पैदा कर सकता है, जो कि खुंजेर दर्रा और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरता है। यह समझा जाता है कि चीन ने CPEC को लेकर अपने सभी मौसम सहयोगी के पाकिस्तान को अपनी चिंताओं से अवगत कराया है, क्योंकि भारत ने बीजिंग को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र और पीओके का शोषण करने पर बहुत सख्त आपत्ति जताई है।

फारूक का ब्यान एक ‘देशद्रोही कमेंट’ है : संबित पात्रा

भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने पार्टी मुख्यालय में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा, ‘एक तरह से फारूक अब्दुल्ला अपने इंटरव्यू में चीन की विस्तारवादी मानसिकता को न्यायोचित ठहराते हैं, वहीं दूसरी ओर एक देशद्रोही कमेंट करते हैं कि भविष्य में हमें अगर मौका मिला तो हम चीन के साथ मिलकर अनुच्छेद 370 वापस लाएंगे.’ उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के पूर्व में दिए गए बयानों का हवाला देते हुए आरोप लगाया, ‘राहुल गांधी और फारूक अब्दुल्ला में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है. दोनों ही एक ही सिक्के के दो पहलू हैं.’ हैरानी है की राष्ट्रिय मंच से भाजपा के राष्ट्रिय प्रवक्ता बहुत ही नपि तुली भाषा में फ़रूक अब्दुल्लाह के ब्यान मात्र ही को देश द्रोही बताते हैं. सही भी है राजनीति संभावनाओं का खेल है. अब्दुल्लाह एक ही पखवाड़े में 2 बार अपना चीन प्रेम दिखा चुके हैं.

नयी दिल्ली(ब्यूरो):

जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम और नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला के बयान पर राजनीतिक घमासान मच गया है. बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने फारूक अब्दुल्ला के बयान को देश विरोधी ठहराया है. उन्होंने कहा कि फारूक चीन की मानसिकता को सही ठहरा रहे हैं. फारूक अब्दुल्ला ने पहली बार ऐसा नहीं कहा है. उन्होंने पहले भी कई बार इस तरह के बयान दिए हैं.

उन्होंने कहा कि एक तरह से फारूक अब्दुल्ला, अपने इंटरव्यू में चीन की विस्तारवादी मानसिकता को न्यायोचित ठहराते हैं. वहीं दूसरी ओर एक देशद्रोही कमेंट करते हैं कि भविष्य में हमें अगर मौका मिला तो हम चीन के साथ मिलकर अनुच्छेद 370 वापस लाएंगे. 

संबित पात्रा ने आगे कहा कि इन्हीं फारूक अब्दुल्ला ने भारत के लिए कहा था कि PoK क्या तुम्हारे बाप का है, जो तुम PoK ले लोगे, क्या पाकिस्तान ने चूड़ियां पहनी हैं. पाकिस्तान और चीन को लेकर जिस प्रकार की नरमी और भारत को लेकर जिस प्रकार की बेशर्मी इनके मन में है, ये बातें अपने आप में बहुत सारे प्रश्न खड़े करती हैं. 

चीन में हीरो बने फारूक: बीजेपी

पात्रा ने राहुल गांधी पर भी निशाना साधा. उन्होंने कहा कि केवल फारूक अब्दुल्ला ऐसा कहते हैं ऐसा नहीं है, अगर आप इतिहास में जाएंगे और राहुल गांधी के हाल फिलहाल के बयानों को सुनेंगे तो आप पाएंगे कि ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. ये वही राहुल गांधी हैं, जिन्होंने एक हफ्ते पहले कहा था कि प्रधानमंत्री कायर है, प्रधानमंत्री छुपा हुआ है, डरा हुआ है. दूसरे देशों की तारीफ और अपने देश, प्रधानमंत्री और आर्मी के लिए इस प्रकार के वचन कहां तक सही है, ये आप सब समझते हैं.  बीजेपी प्रवक्ता ने कहा कि सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक पर सवाल उठाकर राहुल गांधी पाकिस्तान में हीरो बने थे, आज फारूक अब्दुल्ला चीन में हीरो बने हैं.

पात्रा ने कहा कि 24 सितंबर को फारूक अब्दुल्ला ने कहा था कि आप अगर जम्मू कश्मीर में जाकर लोगों से पूछेंगे कि क्या वह भारतीय हैं, तो लोग कहेंगे कि नहीं हम भारतीय नहीं हैं. उसी स्टेटमेंट में ही उन्होंने ये भी कहा था कि अच्छा होगा अगर हम चीन के साथ मिल जाएं. उन्होंने कहा कि देश की संप्रभुता पर प्रश्न उठाना, देश की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लगाना क्या एक सांसद को शोभा देता है? क्या ये देश विरोधी बातें नहीं हैं?

दरअसल फारूक अब्दुल्ला ने रविवार को आजतक से बातचीत के दौरान कहा था कि एलएसी पर जो भी तनाव के हालात बने हैं, उसके लिए केंद्र सरकार जिम्मेदार है. क्योंकि उन्होंने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को खत्म किया. चीन ने कभी भी अनुच्छेद 370 खत्म करने के फैसले का समर्थन नहीं किया है और हमें उम्मीद है कि इसे (आर्टिकल 370) फिर से चीन की ही मदद से बहाल कराया जा सकेगा.

चीन ने फैसला स्वीकार नहीं किया: फारूक

फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव की जो भी स्थितियां बनी हैं, वह 370 के खत्म होने के कारण बनी हैं. चीन ने कभी इस फैसले को स्वीकार ही नहीं किया. हम ये उम्मीद करते हैं कि चीन की ही मदद से जम्मू-कश्मीर में फिर आर्टिकल 370 को बहाल किया जा सकेगा. 5 अगस्त 2019 को 370 को हटाने का जो फैसला लिया गया, उसे कभी स्वीकार नहीं किया जा सकता. 

वहीं चीन की तरफदारी करने के सवाल पर फारूक अब्दुल्ला ने कहा, मैंने कभी चीनी राष्ट्रपति को भारत नहीं बुलाया. पीएम नरेंद्र मोदी ही उन्हें भारत आमंत्रित करने वाले शख्स थे. उन्होंने चीनी राष्ट्रपति को झूला झुलाया और चेन्नई में उन्हें खाना खिलाने भी ले गए. फारूक ने कहा कि उन्हें सांसद होने के बावजूद संसद सत्र के दौरान जम्मू-कश्मीर की समस्याओं पर बोलने का मौका नहीं दिया गया. 

एससीओ की बैठा में गलत नक्शा दिखाने पर पाक को रूस की फटकार भारत ने भी जताया एतराज

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल ने मंगलवार को शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (एससीओ) की वर्चुअल बैठक से वॉकआउट किया। डोभाल ने यह कदम पाकिस्तानी प्रतिनिधि की ओर से गलत नक्शा दिखाए जाने के बाद उठाया। इस्लामाबाद ने भारतीय इलाकों को पाकिस्तान का हिस्सा दिखाते हुए एक काल्पनिक नक्शा पेश किया था।

नई दिल्ली: 

वैश्विक मंच पर एक बार फिर पाकिस्तान (Pakistan) को मुंह की खानी पड़ी है. दरअसल, पाकिस्तान ने रूस (Russia) में हुए शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की बैठक में भारत के गलत नक्शे का इस्तेमाल किया. जिसके बाद रूस ने पाकिस्तान को चेतावनी दे डाली. पाकिस्तान की इस हरकत पर भारत ने भी कड़ा ऐतराज जताया है. 

बता दें कि SCO की वर्चुअल मीटिंग में पाकिस्तान ने बैकड्रॉप में भारत का बदला हुआ नक्शा लगाया था. जिसपर रूस ने पाकिस्तान को कड़े शब्दों में दोबारा ऐसा न करने की चेतावनी है. गौरतलब है कि रूस इस बैठक की अध्यक्षता कर रहा था. 

इस घटना के बाद रूस की तरफ से भारत को भरोसा दिलाया गया है कि वह पाकिस्तान के इस तरह के कृत्य का समर्थन नहीं करता है. रूस ने कहा कि उसे उम्मीद है कि इससे भारत और रूस के रिश्ते पर कोई असर नहीं पड़ेगा. 

वार्षिक चेकअप या मानसून सत्र के प्रश्नों से घबराए सोनिया राहुल ???

सोमवार यानी 14 सितंबर से संसद का मानसून सत्र शुरू होने जा रहा है। सरकार को घेरने के लिए कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों ने कमर कस ली है। लेकिन संसदीय कार्यवाही के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके बेटे राहुल गांधी पहले चरण में संसद में मौजूद नहीं होंगे। राहुल और सोनिया व्यक्तिगत कारणों से मानसून सत्र के पहले चरण में संसद में नहीं पंहुच सकेंगे। खबरों के अनुसार रविवार को सोनिया गांधी अपने वार्षिक चेकअप के लिए विदेश जा रही है। इस दौरान सोनिया लगभग 2 हफ्ते तक देश से बाहर रहेंगी। राहुल गांधी भी उनके साथ जाएंगे लेकिन यह कहा जा रहा है कि राहुल कुछ दिनों बाद वापस लौट आएंगे जब प्रियंका सोनिया के साथ होंगी। अब प्रश्न यह उठता है कि पिछले 2-3 महीनों से लगातार सांसद के विशेष सत्र की मांग करने वाले राहुल गांधी मानसून सत्र के आरंभ होने से पहले विदेश चले गए। कहीं वह चीन के साथ अपने सम्बन्धों पर जड़े मुद्दों से तो नहीं घबरा गए?…… क्या वाकई?

नयी दिल्ली(ब्यूरो):

भारत-चीन तनाव के बीच सोनिया गाँधी अपने रूटीन मेडिकल चेकअप के लिए विदेश निकल गई हैं और उनके बेटे राहुल गाँधी भी साथ गए हैं। जहाँ सोनिया गाँधी रायबरेली से पाँचवीं बार सांसद बनी हैं, वहीं राहुल गाँधी 3 बार अमेठी का प्रतिनिधित्व करने के बाद अब केरल के वायनाड से सांसद हैं। सोनिया भी अमेठी का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। ऐसे में संसद का मॉनसून सत्र शुरू होने से ठीक पहले दोनों का विदेश जाना एक संयोग नहीं है, ऐसा कई लोगों को लग रहा।

भारत और चीन के बीच जब से तनाव शुरू हुआ है, तब से राहुल गाँधी की भाषा पर गौर किया जाए तो हमें पता चलता है कि उन्होंने आज तक चीन की आलोचना में एक शब्द भी नहीं कहे लेकिन प्रधानमंत्री को बदनाम करने के लिए उनके लिए ‘सरेंडर मोदी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। राहुल गाँधी लगातार कहते रहे कि चीन ने हमारी जमीन हड़प ली है और मोदी सरकार इस मामले में डर कर हाथ पर हाथ धरे बैठी है।

एक और बात गौर करने लायक ये भी है कि राहुल गाँधी ने कभी उन मीडिया रिपोर्ट्स तक पर भी प्रतिक्रिया नहीं दी, जिनमें भारतीय सेना के पराक्रम की बात की गई। गलवान संघर्ष में 40 चीनी फौजियों के मारे जाने की बात सामने आई लेकिन राहुल गाँधी ने सेना की पीठ नहीं थपथपाई। हाल ही में एक अमेरिकी रिपोर्ट में इससे भी ज्यादा का आँकड़ा दिया गया है लेकिन राहुल गाँधी ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और चुप रहे।

इसके अलावा सेना और सरकार द्वारा जारी किए गए किसी भी बयान का राहुल गाँधी ने समर्थन नहीं किया और ‘चीन ने हमारी जमीन हड़प ली’ वाला राग अलापते रहे। कॉन्ग्रेस पार्टी ने कभी भी इस बात की भी चर्चा नहीं की कि आज भारतीय सेना और आईटीबीपी के जवान उन चोटियों पर डेरा डाले हुए हैं, जहाँ 1962 के बाद से ही वो नहीं गए थे। आज चीन की गतिविधियों ऊपर भारतीय सशस्त्र बलों की सीधी नज़र है।

ऐसे में ये सवाल तो उठेगा ही कि क्या सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी चीन के डर से संसद सत्र के पहले हिस्से में भाग नहीं ले रहे हैं क्योंकि इससे उन्हें चीन की आलोचना या निंदा करनी पड़ेगी? क्या सोनिया-राहुल चीन के खिलाफ एक भी शब्द बोलने से डर रहे हैं? भारत-चीन तनाव के बीच ही राहुल ने अपने वीडियो सीरीज शुरू किया और इस तनाव के लिए पीएम मोदी को जिम्मेदार तो ठहराया लेकिन चीन की आलोचना नहीं की

कभी सीमा पर भारतीय सेना के जवानों और अधिकारियों को अलग-अलग भोजन मिलने की बात करते हैं तो कभी चीन विवाद को मोदी की छवि से जोड़ कर देखते हैं। हाल ही में चीन के मुखपत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने भी एक वीडियो जारी कर दिखाया था कि जहाँ वहाँ के फौजी ठण्ड में ड्रोन से आया गर्मागर्म खाना खाएँगे, वहीं भारतीय सेना के जवाब भूखे रहेंगे। राहुल गाँधी और चीन, दोनों एक ही बातें कर रहे हैं। ऐसे में कैसे वो संसद में चीन की करतूतों की निंदा करने का साहस जुटा पाएँगे?

चीनी मुखपत्र ने तो ये भी लिखा कि कॉन्ग्रेस पार्टी मौके की ताक में है और कभी भी मोदी सरकार को हिला सकती है, जिसके लिए वो मुद्दा ढूँढ रही है। ऐसे में ये आरोप लगना स्वाभाविक है कि जब ये सारे सवाल संसद में उठेंगे, तब सत्ताधारी दल की बड़ी संख्या बल के सामने जवाब नहीं जुटे तो क्या होगा? क्या यही वो डर है, जिसने सोनिया-राहुल को विदेश जाने के लिए मजबूर कर दिया है? क्योंकि चीन की इतनी तरफदारी आजकल तो वामपंथी दल भी नहीं करते।

इसी तरह जब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष अधीर रंजन चौधरी भारत-चीन मुद्दे पर बोल रहे थे, तब राहुल गाँधी सोते हुए नज़र आए थे। हाल ही में भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने भी कहा था कि जिस तरह से इश्क और मुश्क छिपाने से भी नहीं छिपते, ठीक वैसे ही कॉन्ग्रेस और चीन के बीच चल रहे प्रेम के बारे में सभी को पता है। उन्होंने दावा किया था कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और भारत की कॉन्ग्रेस पार्टी के बीच समझौते हुए हैं, जिसकी जानकारी अब सार्वजनिक की जानी चाहिए। 

भाजपा का आरोप है कि 2008 में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और कॉन्ग्रेस ने एक MOU पर हस्ताक्षर किए थे, इसीलिए दोनों के बीच का प्रेम किसी से छिपा हुआ नहीं है। आखिर उस MOU में क्या था, इसका विवरण अब तक सामने नहीं आया है? क्या कोई ऐसा करार है, जिसके तहत गाँधी परिवार ने चीन और शी जिनपिंग के खिलाफ न बोलने की शपथ ली हुई है और इसीलिए वो संसद सत्र में सवालों से बचने के लिए भाग गए?

ये भी अजीब विडम्बना है क्योंकि अक्सर देखा जाता है कि जब ऐसे मौके आते हैं, तब सरकारें जवाब देने से बचती रही हैं लेकिन यहाँ तो विपक्ष के प्रथम परिवार के दो लोग ही देश से निकल लिए। कॉन्ग्रेस तो कहती है कि देश में अशांति है और माहौल खराब है, फिर उसे क्या ज़रूरत है भागने की क्योंकि अभी तो मोदी सरकार को घेरने के लिए उसके हिसाब से सबसे मुफीद समय होना चाहिए न? कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष और पूर्व अध्यक्ष देश से बाहर हैं और पार्टी संसद में लड़ेगी… वाह रे देश की सबसे परानी पार्टी!

23 नेताओं ने पत्र लिख कर गाँधी परिवार को घेरा है और पार्टी में लोकतंत्र की माँग की है। संगठन में हुए महत्वपूर्ण बदलावों में उन नेताओं को नज़रअंदाज़ किया गया है और वफादारों की चाँदी हो गई है। पार्टी के लिए भी आंतरिक कलह के कारण ये ठीक समय नहीं है क्योंकि ज्योतिरादित्य सिंधिया के जाने के बाद अभी-अभी सचिन पायलट की बगावत रही है। ऐसे समय में दोनों के विदेश जाने पर अटकलों का बाजार गर्म होना आम है। 

यदि भारतीय सेनाएँ वापिस नहीं गईं तो चीनी सेना सर्दी भर वहीं डटी रहेगी: ग्लोबल टाइम्स

  • चीन के ग्‍लोबल टाइम्‍स के संपादक हू शिजिन भारतीय सेना को ठंड की धमकी देकर बुरी तरह से ट्रोल हो गए
  • हू शिजिन ने कहा कि यदि भारतीय पैंगोंग झील के दक्षिण तट से नहीं हटते हैं तो चीनी सेना मुकाबला करती रहेगी
  • उन्‍होंने यह भी कहा कि भारतीय सैनिकों का संचालन तंत्र बहुत खराब है, कई भारतीय सैनिक तो ठंड से मर जाएंगे

भारत-चीन के बीच जारी सीमा विवाद को लेकर चीन के सरकारी मीडिया ने एक बार फिर गीदड़ भभकी दिखाते हुए भारत को धमकी दी है। ग्लोबल टाइम्स के ताजा लेख में भारत-चीन मुद्दे पर लिखा गया है कि यदि भारत शांति चाहता है तो भारत और चीन को 7 नवंबर 1959 की एलएसी को लागू करना चाहिए यदि भारत युद्ध चाहता है तो फिर चीन इसके लिए भी तैयार है देखते हैं कि कौन सा देश दूसरे देश को मात देता है

चीन के सरकारी प्रोपेगैंडा अखबार ग्‍लोबल टाइम्‍स के संपादक हू शिजिन भारतीय सेना को ठंड की धमकी देकर बुरी तरह से ट्रोल हो गए। दरअसल, हू शिजिन ने कहा कि यदि भारतीय सैनिक पैंगोंग झील के दक्षिण तट से नहीं हटते हैं तो चीनी सेना पूरे ठंड के मौसम तक उनके साथ मुकाबला करती रहेगी। उन्‍होंने यह भी कहा कि भारतीय सैनिकों का संचालन तंत्र बहुत खराब है। कई भारतीय सैनिक या तो ठंड से मर जाएंगे या फिर से कोरोना वायरस से।

ग्‍लोबल टाइम्‍स के एडिटर ने ट्वीट कर कहा कि यदि युद्ध होता है तो भारतीय सेना को तेजी से हराया जा सकेगा। इस धमकी के बाद हू शिजिन ट्विटर पर बुरी तरह से ट्रोल हो गए। मोहसिन शेख ने सियाचिन का उदाहरण चीनी संपादक को करारा जवाब दिया। उन्‍होंने लिखा, ‘भारतीय सैनिक दुनिया के सबसे ठंडे और ऊंचे युद्धक्षेत्र में 24 घंटे और सातों दिन डटे रहते हैं। हमारी भारतीय सेना पहाड़ी क्षेत्रों में युद्ध में महारत रखती है। आप केवल अपने सैनिकों के प्रैक्टिस करने के फर्जी टिकटॉक वीडियो दिखाओ। आपने 40-42 साल पहले अंतिम युद्ध वियतनाम में लड़ा था।’

विशाल गुर्जर ने लिखा, ‘भारतीय सेना स‍ियाचिन में माइनस 50 डिग्री पर 10 हजार से लेकर 18 हजार फुट की ऊंचाई पर 24 घंटे पहरा देती है। भारतीय सेना यह पैंगोंग में भी दोहरा सकती है। और हां यह तुम्‍हारा पबजी नहीं है।’ वहीं एक अन्‍य यूजर शाश्‍वत ने सैटलाइट तस्‍वीरों की मदद से कहा कि चीनी सैनिकों के लिए लद्दाख में टिकना बहुत मुश्किल होने जा रहा है। स्‍पांगुर सो झील तक चीन के आने का एकमात्र रास्‍ता नागरी कुंशा से आता है जो 262 किलोमीटर दूर है। चीनी सप्‍लाइ लाइन को 50 किमी सड़क से सफर करना होगा। चीनी सैनिक दो दिन भी टिक नहीं पाएंगे और उनकी सप्‍लाइ लाइन रेकिंग ला पोस्‍ट की जद में है।’

लद्दाख की ठंड से चीन की हेकड़ी गुम

बता दें कि लद्दाख में तेजी से बढ़ती ठंड से चीनी सेना की हेकड़ी ढीली हो गई है, वहीं भारतीय फौज दुनिया की सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र सियाचिन के अपने अनुभवों से हालात के मुताबिक खुद को ढाल रही है। चीनी सेना ठंड के मौसम में कभी भी इतनी ऊंचाई पर स्थित ऑपरेशनल पोस्ट पर आज के पहले तैनात नहीं रही है। ऐसे में न केवल उसके सैनिकों की स्थिति खराब होने लगी है, बल्कि उसे कब्जाया इलाका खोने का भी डर सताने लगा है। इसीलिए चीनी रणनीतिकार बौखलाए हुए हैं और ग्‍लोबल टाइम्‍स के जरिए धमकी दिलवा रहे हैं।

‘भारत भूल गया कि वो क्या था’

ग्लोबल टाइम्स ने लिखा, ‘‘चीन ने हमेशा से भारत के सम्मान की फिक्र की है। अब भारत की राष्ट्रवादी ताकतें इस सम्मान का फायदा उठाना चाहती हैं। वे भूल गए हैं कि वो (भारत) क्या हैं? आज के माहौल में हर चीज सामने रखने की जरूरत है।’’

‘‘हमारी तिब्बत मिलिट्री कमांड भारत से तनाव को देखते हुए पीएलए के सपोर्ट के लिए ड्रोन की मदद ले रही है। इससे साबित होता है कि पीएलए किसी भी चुनौती के लिए तैयार है।’’

राहुल का मोदी सरकार पर निशाना

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ट्वीट किया, ‘‘चीन ने हमारी जमीन पर कब्जा कर लिया है। भारत सरकार इसे वापस लेने की कोई योजना बना रही है या फिर इसे ‘भगवान की मर्जी’ मानकर छोड़ देंगे?’’

खालिस्‍तानी आतंकवादी भारत ही नहीं बल्कि कनाडा के ल‍िए भी बड़ा खतरा बन गए हैं : रिपोर्ट

कनाडा में वर्ष 2018 के लिए आई पब्लिक रिपोर्ट में देश को खालिस्तानी आतंकवाद से खतरा बताया गया है। कनाडा में जस्टिन ट्रूडो की सरकार ने पहली बार खालिस्तानी आतंकवाद को खतरे के रूप में सूचीबद्ध किया है। यह रिपोर्ट जनसुरक्षा मामलों के मंत्री राल्फ गुडाले ने पेश की है। इस रिपोर्ट में इस्लामी आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट और अल कायदा से भी खतरे की आशंका जताई गई है। अतीत में कनाडा में रहने वाले तमाम सिख चरमपंथियों ने पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के सहयोग से पंजाब को अशांत रखा है। वे एक बार फिर से अपनी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए प्रयासरत हैं।

डेमोक्रेटिकफ्रंट॰कॉम :

ओटावा के एक प्रमुख कनाडाई थिंक टैंक ‘मैकडोनाल्ड-लॉयर इंस्टीट्यूट’ ने खालिस्तानी चरमपंथ के उभरने में पाकिस्तान की भूमिका पर एक अध्ययन जारी किया है। इंस्‍टीट्यूट ने कहा कि खालिस्‍तान पाकिस्‍तान का प्रॉजेक्‍ट है और इसे कनाडा में ठग और राजनीतिक चालबाजों ने जिंदा रखा है। इस थ‍िंक टैंक ने सरकार को आगाह क‍िया है क‍ि खालिस्‍तानी आतंकवादी भारत ही नहीं बल्कि कनाडा के ल‍िए भी बड़ा खतरा बन गए हैं।

वरिष्‍ठ पत्रकार टेरी मिलेवस्की (Terry Milewski), [पीडीएफ], द्वारा लिखित, यह शोध पत्र खालिस्तान आंदोलन को कवर करता है और पाकिस्तान द्वारा विकसित और पोषित एक भू-राजनीतिक परियोजना के रूप में इसकी वास्तविकता को बताता है। यह पेपर कनाडा और भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा पर लगाए गए खालिस्तान आंदोलन के खतरे पर शोध करता है।

कनाडा में खालिस्तानी चरमपंथ का प्रभाव

भारत के पंजाब प्रांत में सक्रिय खालिस्‍तानी आतंकियों को पाकिस्‍तान ने पैदा किया था और ये आतंकी अब न केवल भारत बल्कि कनाडा के राष्‍ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन गए हैं।

वरिष्‍ठ पत्रकार टेरी मिलेवस्की ने अपनी रिपोर्ट ‘खालिस्‍तान: ए प्रॉजेक्‍ट ऑफ पाकिस्‍तान’ में कहा कि खालिस्‍तान आंदोलन कनाडा और भारत दोनों की ही सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन गया है। पिछले कुछ दशकों में, विशेष रूप से 1985 में खालिस्तानी आतंकवादियों द्वारा एयर इंडिया फ्लाइट 182 ‘कनिष्क’ पर बमबारी की भयानक घटना के बाद, कनाडा में खालिस्तानियों का प्रभाव तेज गति से बढ़ रहा है।

खालिस्तानी समर्थक सिख नेता, जो कनाडा में व्यापक राजनीतिक संरक्षण में हैं, गुरुद्वारा कैश फ्लो और सामुदायिक वोटों पर अपने नियंत्रण के लिए, कथित तौर पर ट्रूडो सरकार पर दबाव डालकर खालिस्तान आतंकवाद के खतरों की वार्षिक रिपोर्ट से हटाने का दबाव बनाया था।

एमएल इंस्टीट्यूट के अध्ययन में कहा गया है कि यह नतीजा एक विस्तृत अंतरराष्ट्रीय लॉबिंग अभियान के बाद सामने आया था।

खालिस्तान आंदोलन में पाकिस्तान की भूमिका

टेरी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इस आंदोलन के बाद भी सच्‍चाई यह है कि कनाडा के सिख इस आंदोलन के जरिए अपने गृह राज्‍य पंजाब नहीं जा रहे हैं। उन्‍होंने कहा कि कनाडा के लोगों के लिए पाकिस्‍तान का यह कदम बड़ा राष्‍ट्रीय खतरा बन गया है। चूँकि पंजाब में खालिस्‍तान के कुछ ही समर्थक बचे हैं, इ‍सलिए कनाडा में खालिस्‍तान के समर्थकों को पाकिस्‍तानी मदद बढ़ गई है।

रिपोर्ट में खालिस्तानी आंदोलन के विकास और पोषण में पाकिस्तान की भूमिका की जाँच की गई है, जो खालिस्तान नाम के सिखों के लिए एक अलग देश के विचार का समर्थन करता है।

टेरी मिलेवस्की लिखते हैं कि भारत में सिखों के गृह राज्य पंजाब में खालिस्तान आंदोलन को ज्यादा तूल नहीं मिल रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि खालिस्‍तानी आतंकी नवंबर, 2020 में स्‍वतंत्र खालिस्‍तान के लिए जनमत संग्रह कराना चाहते हैं और जैसे-जैसे यह दिन नजदीक आ रहां है, वैसे-वैसे दुनियाभर में सिख समुदाय में संशय बढ़ता जा रहा है। उन्होंने रिपोर्ट में चेतावनी दी कि जनमत संग्रह चरमपंथी विचारधारा को हवा देगा और युवा कनाडाई लोगों को कट्टरपंथी बनाएगा।

हालाँकि, कनाडा सरकार पहले ही कह चुकी है कि वह खालिस्तान पर नवंबर में होने वाले तथाकथित जनमत संग्रह को ‘सिख फॉर जस्टिस’ जैसे समूहों द्वारा मान्यता नहीं देगी, जिसे 2019 में भारत द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया था।

रिपोर्ट के अनुसार, कनाडा के पूर्व कैबिनेट मंत्री उज्जल दोसांझ और थिंक टैंक के एक प्रोग्राम डायरेक्टर शुवालॉय मजूमदार ने कहा, “खालिस्तान प्रस्ताव का मार्गदर्शन करने में पाकिस्तान के प्रभाव को समझने की इच्छा रखने वाले किसी भी व्यक्ति को मिल्वेस्की की यह रिपोर्ट जरूर पढ़नी चाहिए।”

जस्टिन ट्रूडो सरकार ने 2015-19 के दौरान अपने पहले कार्यकाल में खालिस्तान समर्थक समूहों के प्रति कथित नरमी को भारत-कनाडा संबंधों में गिरावट का एक प्रमुख कारण बताया। कनाडा में लिबरल पार्टी की सरकार ने खालिस्तान समर्थक समूहों की गतिविधियों को अनुमति देने के पीछे अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला दिया था।

रिपोर्ट में बताया गया है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि खालिस्तान का समर्थन भारत में कितना कम है, और यह वास्तव में बहुत कम हो गया है, लेकिन यह पाकिस्तान में अभी भी जीवित है, जहाँ जिहादी समूहों ने अपने साझा दुश्मन, भारत के खिलाफ सिख अलगाववादियों के साथ आम मुद्दा बना दिया है।

कौन हैं टेरी मिलेवस्की

टेरी मिलेवस्की एक अनुभवी पत्रकार हैं। 1967 में एक छात्र के रूप में वह पहली बार भारत आए थे। उस समय उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का साक्षात्कार लिया था। अपने करियर के दौरान कई बार सीबीसी टीवी न्यूज़ के संवाददाता के रूप में मिल्वेस्की ने भारत का दौरा किया। उन्होंने 1986 में एयर इंडिया में बमबारी सहित कई प्रमुख घटनाओं को कवर किया है। वह सीबीसी के लिए वरिष्ठ संवाददाता के रूप में सेवानिवृत्त हुए हैं।

सर्व धर्म पूजा के साथ ‘राफेल’ वायु सेना में शामिल रक्षा मंत्री ने दुश्मन राष्ट्रों को चेताया

महाबली फाइटर जेट रफाल को गुरुवार को औपचारिक रूप से भारतीय वायुसेना में शामिल कर लिया गया. इसके बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह (Rajnath Singh) ने अपने संबोधन में कहा, ‘आज, ‘Rafale’ induction ceremony में, सर्वप्रथम  मैं फ्रांस की रक्षा मंत्री फ्लोरेंस पार्ली (Florence Parley) का, अपनी और देशवासियों की ओर से हार्दिक स्वागत करता हूं. इस मौके पर आपकी मौजूदगी वर्षों से चली आ रही हमारी मजबूत रक्षा सहयोग को दर्शाती है.’ रक्षा मंत्री ने कहा, ‘आज, दुनिया में सुरक्षा के साथ-साथ, इकोनॉमी और जियो-स्ट्रैटजिक के मुद्दे नए-नए रूपों में हमारे सामने आ रहे हैं. इनका लगातार सामना करते हुए, हम दो बड़े लोकतंत्र, एक स्थायी, सक्रिय संबंध बनाने और बढ़ाने में कामयाब रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र में एक्सटेंशन और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भी भारत और फ्रांस साथ रहे. ‘

चंडीगढ़ – 10 सितंबर:

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बृहस्पतिवार (सितम्बर 10, 2020) को औपचारिक रूप से भारतीय वायु सेना (IAF) में 29 जुलाई को भारत आए पाँच राफेल लड़ाकू जेट विमानों को शामिल किया। इससे पहले, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और उनके फ्रांसीसी समकक्ष फ्लोरेंस पार्ली ने अम्बाला वायु सेना स्टेशन में राफेल इंडक्शन समारोह में ‘सर्व धर्म पूजा’ में भाग लिया।

सर्वधर्म यानी, हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई धर्म के अनुसार यह पूजा हुई। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी अंबाला पहुँचे और इस पूजा का हिस्सा बने हैं। जिसके बाद ही पाँचों फाइटर जेट ने फ्लाईपास्ट किया है। सबसे पहले पाँच सुखोई विमानों ने उड़ान भरी।

यह इंडक्शन समारोह अंबाला एयर फोर्स बेस पर हो रहा है, जहाँ IAF के 17 स्क्वाड्रन, जिसे ‘गोल्डन एरो’ भी कहा जाता है, भी है। इसी के साथ भारत के पहले 5 राफेल लड़ाकू विमान (Rafale fighter jets) ’गोल्डन एरो’ (Golden Arrows) स्क्वाड्रन का हिस्सा होंगे।

रक्षा मंत्री के अलावा, उनके फ्रांसीसी समकक्ष फ्लोरेंस पार्ली इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि हैं। भारतीय वायुसेना के प्रमुख आरकेएस भदौरिया, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत, रक्षा सचिव डॉ अजय कुमार भी समारोह का हिस्सा हैं।

सितंबर 2016 में, भारत और फ्रांस ने 36 राफेल लड़ाकू जेट के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। ₹60,000 करोड़ में यह भारत द्वारा हस्ताक्षरित सबसे बड़ा रक्षा सौदा है। दिवंगत भाजपा नेता मनोहर पर्रिकर उस समय रक्षा मंत्री थे।

पिछले साल दशहरे के अवसर पर 8 अक्टूबर को राफेल जेट जब भारत को सौंपे गए थे, तब फ्रांस में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हिंदू रीति रिवाज से शस्त्र पूजा करते हुए राफेल पर ‘ॐ’ बनाकर नारियल चढ़ाया और धागा बाँधा था। इस पूजा पर तब लिबरल गिरोह और विपक्ष ने कई तरह के सवाल खड़े किए थे।

गौरतलब है कि लंबी राजनीतिक बहस और कूटनीतिक प्रक्रिया पूरे होने के बाद आख़िरकार राफेल लड़ाकू विमान भारत पहुँचे हैं। ये अत्याधुनिक तकनीक के साथ भारतीय वायुसेना में शामिल हुए हैं, जो वायुसेना की नई ताकत के रूप में उभरकर सामने आ रहे हैं। राफेल चौथी जेनरेशन का सबसे फुर्तीला जेट है, इससे परमाणु हमला भी किया जा सकता है। साथ ही, ये एक बार में साढ़े 9 हजार किलो सामान वहन करने में भी सक्षम है।

ओह कुड़ी जिहदा नाँ मुहब्बत गुम हो गयी….

अनसूया सिंह, गुरबख्श सिंह प्रीतलारी की सबसे छोटी बेटी अनुसूया सिंह का आज सुबह वेनेजुएला के मेरिडा में निधन हो गया। वह 84 वर्ष की थीं। सुनीत आनंद उनके भतीजे ने उनकी मृत्यु की खबर की पुष्टि की।

कोरल ‘पुरनूर’ चंडीगढ़:

गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी

अनुसूया, गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ि की बेटी थीं। गुरबख्शसिंह जिसने पंजाब के पढ़े-लिखे नौजवानों को गोरों की तर्ज पर प्यार करना सीखने का बिड़ा उठाया, और पंजाबी यवाओं को अंग्रेजी का जीवन और ईसाई तर्कसंगत सोच अपनाने की शिक्षा दी। प्रीतलड़ि का प्रेम पाठ पहली बार घर पर उनकी बेटी अनुसुइया द्वारा सीखा गया था। अनुसूया को शिव कुमार बटालवी से प्यार हो गया। जब गुरबख्श प्रीतलड़ि को इस बारे में पता चला, तो जो व्यक्ति बसंत को दूसरे लोगों के घर में बुलाता था, वह उसे बर्दाश्त नहीं कर पाया था और प्रीत का रक्षक प्रीत का दुश्मन बन गया था। ऐसा कहा जाता है कि प्रगतिशील विचारक गुरबख्श प्रीतलड़ि एक शहरी अमीर व्यक्ति थे, जिन्होंने विदेश में पढ़ाई की थी, जबकि शिव कुमार एक ग्रामीण युवा थे, जो जीविका के liye नौकरी कर रहे थे ने इस तरह अपना प्यार खो दिया।

शिव कुमार बटाल्वी

अनुसूया शादीशुदा थी जो टूटी नहीं। अपने पति की अत्महत्या के कुछ समय बाद प्रीतलड़ि ने उन्हें सोवियत रूस में अध्ययन करने के लिए भेजा। जहां अनुसूया ने वेनेजुएला के एक युवक के साथ रहना शुरू कर दिया। इस बीच, शिव को वही दर्द लील गया। गुरबख्श प्रितलड़ि का यह पाखंड उनके महान व्यक्तित्व के पीछे छिपा रहा। अनुसुइया के जाने के साथ, एक तिहाई सदी पहले की कहानी समाप्त हो गई।

एलएसी पर भारत ने चीनी गोलाबारी का यथेष्ट जवाब दिया

  • 45 साल पहले हुई भारत-चीन के बीच आखिरी फायरिंग
  • 1975 में चीन ने धोखे से अरुणाचल में किया था हमला
  • चीन की फायरिंग में असम राइफल्स के 4 जवान शहीद हुए थे और अब
  • भारत-चीन के बीच सीमा पर फायरिंग
  • पैंगोंग इलाके के पास वॉर्निंग शॉट फायर

जे&के(ब्यूरो):

भारत और चीन की सीमा पर मई से जारी तनाव एक बार फिर अपने चरम पर पहुंच गया है. सोमवार की रात को लद्दाख सीमा पर वो हुआ जो पिछले चार दशक में नहीं हुआ था. LAC पर बीती रात गोलीबारी की घटना हुई, जहां दोनों ओर से फायरिंग की गई. हालांकि, इस फायरिंग में किसी को निशाना नहीं बनाया गया. ऐसे में जहां दोनों देश बातचीत से मसला सुलझाने की बात कर रहे हैं, तब LAC पर हालात बेकाबू होते जा रहे हैं.

क्या हुआ बीती रात को?

लद्दाख सीमा पर लगातार तनाव की स्थिति बनी हुई है. काला टॉप और हेल्मेट टॉप समेत पैंगोंग इलाके के कई हिस्सों में भारतीय सेना का कब्जा है, जो रणनीतिक तौर पर काफी अहम है. यही कारण है कि चीन की सेना बौखला गई है. इसी बौखलाहट में चीनी सेना सोमवार की रात को बॉर्डर पर आगे बढ़ने लगी. इसी दौरान भारतीय सेना की ओर से वार्निंग शॉट (चेतावनी के लिए हवा में फायरिंग) दागे गए, जिसके बाद चीनी सेना के जवान पीछे हट गए.

यहां चीनी सेना की ओर से भी गोलीबारी की गई, जिसका फिर भारतीय सेना ने जवाब दिया. हालांकि, कुछ देर की फायरिंग के बाद हालात काबू में हैं.

हाल ही दिनों में देखें तो इससे पहले 31 अगस्त की रात को भी फायरिंग की बात सामने आई थी. तब चीनी सेना ने पैंगोंग इलाके के पास से भारतीय सेना को हटाने के लिए फायरिंग की थी, हालांकि वो किसी तरह की आक्रामक फायरिंग नहीं थी.

आपको बता दें कि 1975 के बाद ऐसा पहली बार हुआ है, जब चीन और भारत की सीमा पर गोली चली हो. इससे पहले दोनों देशों ने गोली ना चलाने और किसी की जान ना गंवाने को लेकर समझौता किया था. लेकिन बीते 15 जून को भारत के 20 जवान शहीद हुए और अब गोली चल गई.

20 अक्टूबर 1975 को चीन की धोखेबाजी
भारत का कहना है कि 20 अक्टूबर 1975 को चीनी सैनिक घुसपैठ कर दक्षिण तुलुंग ला में भारतीय सीमा में आ गए थे, यहां से उन्होंने असम राइफल्स के जवानों पर घात लगाकर हमला किया. चीनी सैनिकों ने भारतीय जवानों पर गोलियां चलाईं. 

इस बाबत एक भारतीय अधिकारी ने तब द न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया था कि चीन ने घात लगाकर ये हमला भारतीय सीमा में घुसकर किया था. इस इलाके में भारतीय सेना कई सालों से पैट्रोलिंग करती थी. इस घटना पर भारतीय सेना ने चीन के सामने कड़ी प्रतक्रिया जताई थी. चीन ने इस घटना को लेकर पहले तो इनकार किया लेकिन 3 नवंबर 1975 को चीन ने इस घटना को स्वीकार किया लेकिन फ्रांस के अखबार La Monde के मुताबिक चीन ने बड़ी बेशर्मी से इस घटना की जिम्मेदारी भारत पर डाल दी. चीन ने कहा कि उसके सैनिकों ने आत्मरक्षा में गोलियां चलाई थीं. 

चीन की ओर से क्या कहा गया?

बीती रात को हुई इस घटना पर चीन ने एक बार फिर भारत पर ही आरोप लगा दिया है. चीनी सेना की ओर से बयान में कहा गया कि भारतीय सेना ने अवैध तरीके से लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल को पार किया गया. इसी दौरान भारत ने चीनी सैनिकों पर वार्निंग शॉट फायर किया, ऐसे में चीनी सेना को इसका जवाब देना पड़ा.

इससे पहले भी चीनी सेना की ओर से 29-30 अगस्त की रात, 31 और 1 तारीख को घुसपैठ की कोशिश की गई थी. हालांकि, हर बार ये कोशिश सफल नहीं हो पाई, उल्टा भारतीय सेना ने पैंगोंग इलाके के पास अहम जगहों पर अपना कब्जा कर लिया.

नीमा तेंजिन की अंतिम विदाई के दौरान बीजेपी नेता राम माधव का पहुंचे चीन को दिया कड़ा संदेश

नीमा तेंजिन की अंतिम विदाई में भारत और तिब्बत के झंडे साथ-साथ दिखे। इस मौके पर लेह में तिब्बत की आज़ादी का भी नारा गूँजा। भारत ने चीन को ये सन्देश दे दिया है कि तिब्बती भी उसके अपने ही हैं और उनके गौरव और पराक्रम पर भारत को गर्व है। बता दें कि 29-30 अगस्त की रात को लद्दाख (Ladakh) के पैंगोंग लेक के दक्षिणी किनारे पर चीनी (China) सेना की घुसपैठ को नाकाम करने के दौरान नीमा ​तेंजिन (commando nyima tenzin) एक लैंड माइंस की चपेट में आ गए थे, जिसके कारण उनकी मौत हो गई थी।

जम्मू:

लेह में बलिदान हुए तिब्बती कमांडो नीमा तेंजिन का पूरे रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार हुआ, जिसमें भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव भी शामिल हुए। तिब्बत के नीमा तेंजिन को अंतिम विदाई देने के लिए लोगों का बड़ा हुजूम उमड़ पड़ा, जिसमें ‘विकास रेजिमेंट जिंदाबाद’ के नारे भी लगाए गए। नीमा तेंजिन की अंतिम यात्रा में राम माधव जैसे बड़े नेता का शामिल होना चीन के लिए एक कड़ा सन्देश बताया जा रहा है।

भारत ने अब चीन को उसके घर में ही घेरने की तैयारी कर रखी है। साथ ही उसके कब्जाए इलाकों में ही उसे घेरा जा रहा है, जो विस्तारवादी चीन की दुखती रग है। नीमा तेंजिन ‘स्पेशल फ्रंटियर फ़ोर्स’ का हिस्सा थे। भारत-चीन तनाव के बीच लैंड माइंस की चपेट में आने के कारण उनकी मौत हो गई थी। बता दें कि 29-30 अगस्त की रात चीन के सैनिकों ने भारतीय क्षेत्रों में गड़बड़ी की कोशिश की थी, जिसे भारत ने नाकाम कर दिया।

नीमा तेंजिन की अंतिम विदाई में भारत और तिब्बत के झंडे साथ-साथ दिखे। इस मौके पर लेह में तिब्बत की आज़ादी का भी नारा गूँजा। भारत ने चीन को ये सन्देश दे दिया है कि तिब्बती भी उसके अपने ही हैं और उनके गौरव और पराक्रम पर भारत को गर्व है। ‘आजतक’ के अनुसार, लेह के स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि ये पहली बार है जब किसी तिब्बती के योगदान को इस तरह से भारत ने इतना सम्मान दिया है।

पत्रकार दावा डोलमा ने कहा कि ये हमारी जिम्मेदारी है कि हम सभी को ये समझाएँ कि सेना में शामिल होने के लिए उन पर किसी प्रकार का दबाव नहीं है, ऐसा वे अपनी इच्छा से कर रहे हैं। इस दौरान लेह में तिब्बती नागरिकों ने वहाँ के स्थानीय गीत गाए। ‘भारत माता की जय’ के नारे भी लगे। चीन हमेशा से तिब्बत के प्रति संवेदनशील रहा है और दलाई लामा से भारत की नजदीकियों का भी विरोध करता रहा है।

ज्ञात हो कि सब-सेक्टर नॉर्थ से लेकर सब-सेक्टर साउथ तक 5000 ITBP के जवानों को लद्दाख और चीन सीमा से सटे उससे जुड़े इलाकों में तैनात किया गया है। बता दें कि हाल ही में जब चीन ने सीमा पर मौजूदा स्थिति को बिगाड़ने का प्रयास किया था तो उसे नाकाम करने में ITBP के जवान भी शामिल थे। पांगोंग त्सो के दक्षिण में ऊँचाई वाली जगहों पर भारतीय सेना मौजूद है, जिससे चीन के हर इरादे को नाकाम किया जा सकता है।