अशोक गहलोत 99 के फेर में, 10 – 15 विधायक पायलट के

“अशोक गहलोत गुट के 10 से 15 विधायक हमारे सीधे संपर्क में हैं। वे कह रहे हैं कि जैसे ही उन्हें छोड़ा जाएगा वे हमारे साथ आ जाएँगे। अगर गहलोत प्रतिबंध हटाते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि कितने विधायक उनके पक्ष में हैं” पायलट गुट का दावा। राजस्थान में 200 सदस्यीय विधानसभा में 101 विधायकों के समर्थन की जरूरत है। अशोक गहलोत को बहुमत साबित करने के लिए सीपीएम के विधायक बलवान पूनिया ने कुछ वक्‍त पहले साथ देने का भरोसा दिलाया था, लेकिन वे न जयपुर में बाडेबंदी में थे न ही जैसलमेर गए थे।

जयपुर(राजस्थान ब्यूरो):

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उनका कैंप दावा कर रहा है कि उनके पास 109 विधायक है लेकिन डेमोक्रेटिकफ्रंट॰कॉम के पास गहलोत समर्थक विधायकों की पुरी सूची है. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कैंप के पास 99 विधायक ही हैं। इन 99 में से 92 विधायक ही जयपुर से आज जैसलमेर पहुंचे। चार मंत्री समेत 7 विधायक जयपुर में ही हैं। इसमें से कुछ विधायक शनिवार को जैसलमेर जा सकते हैं।

राजस्थान में 200 सदस्यीय विधानसभा में 101 विधायकों के समर्थन की जरूरत है। अशोक गहलोत को बहुमत साबित करने के लिए सीपीएम के विधायक बलवान पूनिया ने कुछ वक्‍त पहले साथ देने का भरोसा दिलाया था, लेकिन वे न जयपुर में बाडेबंदी में थे न ही जैसलमेर गए थे। पूनिया ने अगर पार्टी व्हिप का पालन किया और कांग्रेस के पक्ष में मत नहीं दिया तो गहलोत सरकार के पास विधायक 99 ही रहेंगे. यानी गहलोत सरकार के गिरने का खतरा।

एक मंत्री मास्टर भंवरलाल इतने बीमार हैं कि मतदान नहीं कर सकते हैं। फिलहाल उनका मत किसी कैंप में नहीं है। स्पीकर सीपी जोशी सिर्फ पक्ष-विपक्ष की समान मत संख्या पर ही मतदान करा सकते हैं। अगर गहलोत के पास 99 मत ही रहते हैं तो सीपी जोशी मतदान नही कर पाएंगे यानी सरकार नहीं बचा सकते। जोशी सरकार को तभी बचा सकते हैं जब गहलोत 100 विधायक जुटा लें ऐसा तभी संभव है जब सीपीएम के दो में से कम से एक गहलोत के पक्ष में मत करे।

आज ही गहलोत ने अपने एक ताजे बयान में कहा है कि जो लोग सरकार गिराने की साजिश में लगे थे अगर वह आलाकमान के पास जाते हैं और आलाकमान उन्हें माफ कर देता है तो मैं उन्हें गले लगा लूंगा. मुझे पार्टी ने बहुत कुछ दिया है तीन बार मुख्यमंत्री था प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष रहा मैं जो भी कर रहा हूं पार्टी और जनता की सेवा के लिए कर रहा हूं मेरा इसमें अपना कुछ भी नहीं है

राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार पर मंडरा रहा खतरा टलता नहीं दिख रहा। सचिन पायलट गुट के एक विधायक के दावे ने पार्टी की मुसीबत और बढ़ा दी है। विधायक हेमाराम चौधरी का दावा है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के गुट के 10 से 15 विधायक उनके संपर्क में हैं।

हेमाराम ने यह बात ऐसे वक्त में कही है जब गहलोत विधानसभा में विश्वास प्रस्ताव लेकर आने की बात कह रहे हैं।हेमाराम चौधरी ने कहा, “अशोक गहलोत गुट के 10 से 15 विधायक हमारे सीधे संपर्क में हैं। वे कह रहे हैं कि जैसे ही उन्हें छोड़ा जाएगा वे हमारे साथ आ जाएँगे। अगर गहलोत प्रतिबंध हटाते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि कितने विधायक उनके पक्ष में हैं।”

अमर नहीं रहे

पूर्व समाजवादी पार्टी नेता, राज्‍यसभा सांसद अमर सिंह का निधन हो गया है. वो पिछले काफी दिनों से बीमार चल रहे थे उनका दुबई कए एक अस्पताल में इलाज चल रहा था. कुछ दिनों पहले ही उनका किडनी ट्रांसप्लांट किया गया था. शनिवार दोपहर उनका निधन हो गया।

राज्‍यसभा सांसद अमर सिंह का निधन हो गया है. वह लगभग 6 महीने से बीमार चल रहे थे. सिंगापुर में इलाज के दौरान अमर सिंह शनिवार दोपहर जिंदगी की जंग हार गए. उनके सियासी सफर में ऊपर चढ़ने और नीचे गिरने की कहानी दो दशकों के दौरान लिखी गई. एक दौर में वो समाजवादी पार्टी के सबसे असरदार नेता थे, उनकी तूती बोलती थी लेकिन हाशिए पर भी डाले जाते रहे. समाजवादी पार्टी की कमान अखिलेश के हाथों में जाने के बाद उन्हें सपा से किनारा करना पड़ा.

अमर सिंह विभिन्न वजहों से कई बार विवादों में भी रहे। एक बार उन्होंने एक वाकया सुनाया था कि कैसे उन्होंने 1999 में कॉन्ग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर की पिटाई की थी। मणिशंकर अय्यर ने उन्हें अवसरवादी कहा था और शराब के नशे में कुछ भी बकने का आरोप लगाया था। जब अय्यर ने उन्हें माँ की गाली दी और मुलायम को भी गाली दी तो उन्होंने वहीं पटक कर अय्यर की पिटाई कर दी।

64 वर्षीय राज्यसभा सांसद अमर सिंह का निधन सिंगापुर के एक अस्पताल में इलाज के दौरान हुआ। सोशल मीडिया के माध्यम से उन्होंने ईद की शुभकामनाएँ भी दी थीं और साथ ही बाल गंगाधर तिलक की 100वीं पुण्यतिथि पर उन्हें याद किया था। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के निधन पर दुःख जताते हुए कहा कि स्वभाव से विनोदी अमर सिंह की सार्वजनिक जीवन के दौरान सभी दलों में मित्रता थी।

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बसपा विधायकों के कॉंग्रेस में विलय के खिलाफ याचिका, स्पीकर को नोटिस

राजस्थान में सियासी संग्राम जारी है. बहुजन समाज पार्टी विधायकों के कांग्रेस में विलय के खिलाफ भारतीय जनता पार्टी के विधायक मदन दिलावर ने राजस्थान हाई कोर्ट में याचिका लगाई है. इस मामले में बुधवार को कोर्ट में सुनवाई हुई. याचिकाकर्ता के वकील हरीश साल्वे ने कहा बीएसपी विधायकों का विलय पूरी तरह अमान्य है. ये नियम के खिलाफ है. बीएसपी एक राष्ट्रीय पार्टी है, उसका राज्य स्तर पर विलय कैसे मंजूर? वहीं, कोर्ट ने साल्वे से पूछा कि आपकी याचिका तकनीकी आधार पर 28 जुलाई को खारिज हुई है. केस में अभी कोई मेरिट नहीं है.

जयपुर(ब्यूरो) – 30 जुलाई :

राजस्‍थान में मचे सियासी कोहराम में रोजाना एक नया रंग दिख रहा है. गहलोत सरकार को संकट से उबारने के लिए बीएसपी के विधायकों ने मोर्चा संभाला और कांग्रेस में विलय की घोषणा कर दी. 6 विधायकों की इस घोषणा के बाद, सबसे बड़ी चोट भले ही बीएसपी को लगी हो, लेकिन दर्द बीजेपी को भी हुआ. हाईकोर्ट ने सभी बीएसपी विधायकों और स्‍पीकर को अपना जवाब दाखिल करने के लिए 11 अगस्‍त तक का समय दिया है.

यही वजह है कि बीजेपी के वरिष्‍ठ नेता और विधायक मदन दिलावर ने इस मामले में राजस्‍थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. वहीं, राजस्‍थान हाईकोर्ट ने विधायक मदन द‍िलावर की याचिका को स्‍वीकार करते हुए कांग्रेस में विलय करने वाले बीएसपी के 6 विधायक और विधानसभा अध्‍यक्ष (Speaker) को नोटिस जारी किया है. उल्‍लेखनीय है कि बीजेपी विधायक मदन दिलावर ने राजस्‍थान हाईकोर्ट में दो याचिकाएं दाखिल की थीं.

बीजेपी विधायक मदन दिलावर ने अपनी याचिका में बीएसपी विधायकों के कांग्रेस में विलय को असंवैधानिक बताते हुए स्पीकर के आदेश को रद्द करने की मांग की थी. भाजपा विधायक की याचिका पर बुधवार को जस्टिस महेंद्र गोयल की पीठ में सुनवाई हुई. जिसमें बाद, कोर्ट ने कांग्रेस में विलय करने वाले बीएसपी सभी छह विधायकों और राजस्‍थान विधानसभा के अघ्‍यक्ष को नोटिस जारी किया है.

एक बार कोर्ट से रद्द हो चुकी है बीजेपी विधायक की याचिका

बीजेपी विधायक मदन दिलावर ने बीएसपी विधायकों के कांग्रेस में विलय को लेकर यह दूसरी याचिका हाईकोर्ट में दाखिल की है. इससे पहले, जस्टिस महेंद्र गोयल की अदालत ने सोमवार को विधायक मदन दिलावर की एक याचिका को खारिज कर दिया था. उसके बाद, उन्होंने अधिवक्ता आशीष शर्मा के जरिए दो नई याचिका नए सिरे से दाखिल की थीं. इन याचिकाओं में बीएसपी विधायकों के कांग्रेस में विलय और 22 जुलाई के स्पीकर सीपी जोशी के आदेश को चुनौती दी गयी है.

क्या दीपिका पादुकोण ने जेएनयू आने के लिए आईएसआई एजेंट से 5 करोड़ लिए

हिंदी सिनेमा की नंबर वन हीरोइन कहलाने वाली दीपिका पादुकोण पर आरोप लगा है कि उन्होंने अपनी फिल्म छपाक के प्रमोशन के दौरान दिल्ली की जवाहर लाल यूनीवर्सिटी में चल रहे धरना प्रदर्शन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए पांच करोड़ रुपये लिए हैं। सोशल मीडिया पर इस तरह के आरोप बुधवार को दिन भर ट्रेंड होते रहे। दीपिका की तरफ से अभी तक इस बारे में कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

नयी दिल्ली(ब्यूरो) – 29 जुलाई:

‘छपाक’ फिल्म के प्रमोशन के दौरान JNU प्रोटेस्ट में नजर आने वाली दीपिका पादुकोण एक बार फिर से सुर्खियों में हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने जेएनयू में प्रदर्शनकारियों के बीच जाकर सिर्फ़ खड़े होने के लिए पाकिस्तानी एजेंट अनिल मुसर्रत से करीब 5 करोड़ रुपए लिए थे। मामला उजागर होने के बाद ईडी अब इसकी जाँच कर रही है।

दीपिका पर ऐसे गंभीर आरोपों का खुलासा करने वाला कोई आम नागरिक नहीं बल्कि भारतीय खूफिया एजेंसी रॉ के पूर्व अधिकारी एनके सूद हैं। एनके सूद का कहना है कि अनील मुसर्रत ने दीपिका को फोन करके जेएनयू जाने के लिए कहा था।

पिछले दिनों सुशांत सिंह की मौत के बाद बॉलीवुड की काली सच्चाई और इंडस्ट्री से जुड़े लोगों के पाकिस्तानी एजेंटों के बीच संबंधों का खुलासा होने से ये पूरा मामला गरमाया हुआ है। इसी बीच एनके सूद ने अपनी एक वीडियो में दीपिका के जेएनयू जाने के पीछे छिपे सच से पर्दा उठाया है। इससे पहले खबर थी कि ये उनका कोई पीआर स्टंट है।

एनके सूद ने अपनी वीडियो में अनील मुसर्रत के पेशे के बारे में बताया और साथ ही ये भी जानकारी दी कि कैसे अनील मुसर्रत पाकिस्तान प्रधानमंत्री इमरान खान का करीबी है। जिसके कारण उसने इमरान खान की पार्टी पीडीआई को भी बहुत समर्थन दिया हुआ है। इसके अलावा अनील के करीबी संबंध पाकिस्तानी आर्मी व पाकिस्तान की खूफिया एजेंसी ISI से भी हैं।

बावजूद इन सब बातों के कई बॉलीवुड हस्तियाँ है, जो अनील से लगातार जुड़ी हुई हैं। इसमें करण जौहर, अनिल कपूर जैसे कई जाने-माने चेहरे प्रमुख नाम हैं। अनील की बेटी की शादी में भी कई बॉलीवुड कलाकारों ने शिरकत की थी और जब अनिल कपूर की बेटी यानी सोनम कपूर की शादी हुई तो भी पाक एजेंट अनील उसमें नजर आए थे।

एनके सूद के अनुसार, अनील मुसर्रत भारत विरोधी कई सारे गतिविधियों को अपना समर्थन देते हैं और जब लंदन में सीएए विरोधी प्रदर्शन हुए थे तब भी उसने ही उस प्रोटेस्ट को फंडिंग की थी। इसके अतिरिक्त वे फिल्में, जिनमें हिंदू देवी-देवताओं को अभद्रता के साथ दिखाया जाता है, उन्हें भी अनील मुसर्रत फाइनेंस करने को तैयार हो जाते हैं। अनील मुसर्रत से ब्रिटिश प्रशासन ने काफी बार मनी लॉन्ड्रिंग और टेटर फंडिंग जैसे मामलों पर पूछताछ की है।

24 जुलाई को Indian Security Research Group नाम के यूट्यूब चैनल पर डाली गई वीडियो के 3:35 के स्लॉट पर आप सुन सकते हैं कि एनके सूद दीपिका पादुकोण के जनवरी में जेएनयू जाने की बात का जिक्र कर रहे हैं।

वे कहते हैं कि दीपिका साल 2020 के जनवरी महीने में जेएनयू गई। वहाँ टुकड़े-टुकड़े गैंग का प्रदर्शन चल रहा था। वह वहाँ उनका समर्थन करने और अपने फिल्म का प्रमोशन करने गई थी। लेकिन उन्होंने ये सब अनील मुसर्रत के कहने पर किया था।

वे बताते हैं कि अनील मुसर्रत उस वक्त दुबई में थे और उन्होंने वहाँ से दीपिका को कॉल किया। जिसके बाद दीपिका इस प्रदर्शन में शामिल हुईं। वे पूछते हैं कि क्या दीपिका अनील से ऐसा ही कुछ पाकिस्तान में करने को कहतीं तो वो करते? नहीं, क्योंकि वो बिके हुए हैं। उस समय पाकिस्तान के आर्मी प्रवक्ता ने भी दीपिका को सपोर्ट किया था।

अपने एक अन्य वीडियो में उन्होंने बताया है कि अब ईडी ने बॉलीवुड कलाकारों पर अपना शिकंजा कस लिया है। वह ऐसे हस्तियों की जाँच कर रही है, जिनके विदेशों में बैंक अकाउंट है या फिर प्रॉपर्टी है। इसके अतिरिक्त दीपिका पर तो पहले से ही जाँच होनी शुरू हो गई है क्योंकि उन पर ये आरोप था कि उन्हें पाँच करोड़ रुपए जेएनयू में जाने के लिए पाक एजेंट से मिले।

बता दें कि साल 2020 की शुरुआत में जेएनयू में हुए प्रदर्शन में जाकर दीपिका ने अन्य प्रदर्शनकारियों के साथ उसमें भाग नहीं लिया। लेकिन वहाँ जाकर खड़ी जरूर हुई थीं। जिसके बाद दीपिका पर कई तरह के सवाल उठे थे।

कॉंग्रेस की मौजूदा स्थिति ‘औरों को नसीहत खुद मियां फजीहत’

‘नेहरू खुद इंदिरा को कांग्रेस के नेतृत्व की कतार में खड़ा करने, बनाए रखने और जिम्मेदारी सौंपने का प्रयास करते रहे. जब नेहरू की तबीयत थोड़ी कमजोर हुई तो उन्होंने इंदिरा को कांग्रेस की कार्यसमिति में रखा.’ यह भी कहा जाता है कि अध्यक्ष पद के लिए पहले दक्षिण भारत से तालुल्क रखने वाले धाकड़ नेता निजलिंगप्पा का नाम प्रस्ताव हुआ था, लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने इस पर चुप्पी ओढ़ ली और फिर जब इंदिरा गांधी के नाम का प्रस्ताव आया तो उन्होंने हामी भर दी. ….. ऐसा पहली बार है जब गांधी परिवार के तीन सदस्य एक साथ कांग्रेस में तीन सबसे प्रभावशाली पदों पर हैं लेकिन फिर भी पार्टी अब तक की सबसे कमजोर हालत में है

चंडीगढ़:

राजस्थान में सत्ताधारी कांग्रेस के भीतर उथल-पुथल जारी है. पार्टी की राज्य इकाई के अध्यक्ष के साथ-साथ उपमुख्यमंत्री पद से भी हटा दिए गए सचिन पायलट बागी रुख अपनाए हुए हैं. हालांकि कांग्रेस इसे भाजपा की साजिश बता रही है. पार्टी नेता अजय माकन ने बीते दिनों कहा कि यदि चुनी गई किसी सरकार को पैसे की ताकत से अपदस्थ किया जाता है, तो यह जनादेश के साथ धोखा और लोकतंत्र की हत्या है. पार्टी के दूसरे नेता भी कमोबेश ऐसी बातें कई बार कह चुके हैं.

इससे पहले विधायकों की बगावत के बाद कांग्रेस, भाजपा के हाथों कर्नाटक और मध्य प्रदेश की सत्ता गंवा चुकी है. तब भी उसने केंद्र में सत्ताधारी पार्टी पर लोकतंत्र की हत्या करने का आरोप लगाया था. कई विश्लेषक भी इस तरह सत्ता परिवर्तन को लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं बताते. हाल में सत्याग्रह पर ही प्रकाशित अपने एक लेख में चर्चित इतिहासकार रामचंद्र गुहा का कहना था, ‘अगर विधायक किसी भी समय खरीदे और बेचे जा सकते हैं तो फिर चुनाव करवाने का मतलब ही क्या है? क्या इससे उन भारतीयों की लोकतांत्रिक इच्छा के कुछ मायने रह जाते हैं जिन्होंने इन राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में वोट दिया था? अगर पैसे की ताकत का इस्तेमाल करके इतने प्रभावी तरीके से निष्पक्ष और स्वतंत्र कहे जाने वाले किसी चुनाव का नतीजा पलटा जा सकता है तो भारत को सिर्फ चुनाव का लोकतंत्र भी कैसे कहा जाए?’

ऐसे में पूछा जा सकता है कि जिस कांग्रेस पार्टी की सरकारें गिराने या ऐसा करने की कोशिशों के लिए भारतीय लोकतंत्र पर भी सवाल उठाया जा रहा है, उस कांग्रेस के भीतर लोकतंत्र का क्या हाल है? क्या भाजपा पर लोकतंत्र की हत्या का आरोप लगा रही कांग्रेस खुद इस लोकतंत्र को कोई बेहतर विकल्प दे सकती है? क्या खेत की मिट्टी से ही उसमें उगने वाली फसल की गुणवत्ता तय नहीं होती है?

2019 के आम चुनाव में भाजपा की दोबारा प्रचंड जीत के बाद तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस्तीफा दे दिया था. इससे एक सदी पहले यानी 1919 में मोतीलाल नेहरू पहली बार कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे. 1919 से 2019 तक 100 साल के इस सफर के दौरान कांग्रेस में जमीन-आसमान का फर्क आया है. तब कांग्रेस आसमान पर थी और उसके मूल्य भी ऊंचे थे. आज साफ है कि वह दोनों मोर्चों पर घिसट भी नहीं पा रही है.

मोतीलाल और जवाहरलाल नेहरू के वक्त की कांग्रेस परंपरावाद से लेकर आधुनिकता तक कई विरोधाभासी धाराओं को साथ लिए चलती थी. नेतृत्व के फैसलों पर खुलकर बहस होती थी और इसमें आलोचना के लिए भी खूब जगह थी. 1958 के मूंदड़ा घोटाले के उदाहरण से इसे समझा जा सकता है. यह आजाद भारत का पहला वित्तीय घोटाला था और इसने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की बड़ी किरकिरी की थी. इसकी एक वजह यह भी थी कि इसे उजागर करने वाला और कोई नहीं बल्कि उनके ही दामाद और कांग्रेस के सांसद फीरोज गांधी थे. इस घोटाले के चलते तत्कालीन वित्तमंत्री टीटी कृष्णमचारी को इस्तीफा देना पड़ा था.

इसी सिलसिले में 1962 का भी एक किस्सा याद किया जा सकता है. चीन के साथ युद्ध को लेकर संसद में बहस गर्म थी. अक्साई चिन, चीन के कब्जे में चले जाने को लेकर विपक्ष ने हंगामा मचाया हुआ था. इसी दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने संसद में यह बयान दिया कि अक्साई चिन में घास का एक तिनका तक नहीं उगता. कहते हैं कि इस पर उनकी ही पार्टी के सांसद महावीर त्यागी ने अपना गंजा सिर उन्हें दिखाया और कहा, ‘यहां भी कुछ नहीं उगता तो क्या मैं इसे कटवा दूं या फिर किसी और को दे दूं.’

अब 2020 पर आते हैं. क्या आज की कांग्रेस में ऐसी किसी स्थिति की कल्पना की जा सकती है? एक ताजा उदाहरण से ही इसे समझते हैं. कांग्रेस प्रवक्ता रहे संजय झा ने कुछ दिन पहले टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार में एक लेख लिखा. इसमें कहा गया था कि दो लोकसभा चुनावों में इतनी बुरी हार के बाद भी ऐसा कुछ नहीं दिख रहा है जिससे लगे कि पार्टी खुद को पुनर्जीवित करने के प्रति गंभीर है. उनका यह भी कहना था कि अगर कोई कंपनी किसी एक तिमाही में भी बुरा प्रदर्शन करती है तो उसका कड़ा विश्लेषण होता है और किसी को नहीं बख्शा जाता, खास कर सीईओ और बोर्ड को. संजय झा का कहना था कि कांग्रेस के भीतर ऐसा कोई मंच तक नहीं है जहां पार्टी की बेहतरी के लिए स्वस्थ संवाद हो सके. इसके बाद उन्हें प्रवक्ता पद से हटा दिया गया. इसके कुछ दिन बाद उन्होंने राजस्थान के सियासी घटनाक्रम पर टिप्पणी की. इसमें संजय झा का कहना था कि जब सचिन पायलट के राज्य इकाई का अध्यक्ष रहते हुए कांग्रेस ने 2018 के विधानसभा चुनाव में शानदार वापसी की तो उन्हें ही मुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिए था. इसके बाद संजय झा को पार्टी से भी निलंबित कर दिया गया. इसका कारण उनका पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होना और अनुशासन तोड़ना बताया गया.

माना जाता है कि कांग्रेस के भीतर कभी मौजूद रही लोकतंत्र की शानदार इमारत के दरकने की शुरुआत इंदिरा गांधी के जमाने में हुई. वे 1959 में पहली बार कांग्रेस की अध्यक्ष बनी थीं. उस समय भी कहा गया था कि जवाहरलाल नेहरू अपनी बेटी को आगे बढ़ाकर गलत परंपरा शुरू कर रहे हैं. इस आलोचना का नेहरू ने जवाब भी दिया था. उनका कहना था कि वे बेटी को अपने उत्तराधिकारी के तौर पर तैयार नहीं कर रहे हैं. प्रथम प्रधानमंत्री के मुताबिक वे कुछ समय तक इस विचार के खिलाफ भी थे कि उनके प्रधानमंत्री रहते हुए उनकी बेटी कांग्रेस की अध्यक्ष बन जाएं.

हालांकि कई ऐसा नहीं मानते. एक साक्षात्कार में वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय कहते हैं, ‘नेहरू खुद इंदिरा को कांग्रेस के नेतृत्व की कतार में खड़ा करने, बनाए रखने और जिम्मेदारी सौंपने का प्रयास करते रहे. जब नेहरू की तबीयत थोड़ी कमजोर हुई तो उन्होंने इंदिरा को कांग्रेस की कार्यसमिति में रखा.’ यह भी कहा जाता है कि अध्यक्ष पद के लिए पहले दक्षिण भारत से तालुल्क रखने वाले धाकड़ नेता निजलिंगप्पा का नाम प्रस्ताव हुआ था, लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने इस पर चुप्पी ओढ़ ली और फिर जब इंदिरा गांधी के नाम का प्रस्ताव आया तो उन्होंने हामी भर दी.

महात्मा गांधी, सरदार वल्लभभाई पटेल और राजेंद्र प्रसाद जैसे कांग्रेसी दिग्गजों ने हमेशा कोशिश की कि उनके बच्चे उनकी राजनीतिक विरासत का फायदा न उठाएं. लेकिन नेहरू – इंदिरा गांधी इससे उलट राह पर गईं. जैसा कि अपने एक लेख में पूर्व नौकरशाह और चर्चित लेखक पवन के वर्मा लिखते हैं, ‘उन्होंने वंशवाद को संस्थागत रूप देने की बड़ी भूल की. अपने छोटे बेटे संजय को वे खुले तौर पर अपना उत्तराधिकारी मानती थीं.’ जब संजय गांधी की एक विमान दुर्घटना में असमय मौत हुई तो इंदिरा अपने बड़े बेटे और पेशे से पायलट उन राजीव गांधी को पार्टी में ले आईं जिनकी राजनीति में दिलचस्पी ही नहीं थी.

सोनिया गांधी की जीवनी ‘सोनिया : अ बायोग्राफी’ में वरिष्ठ पत्रकार राशिद किदवई लिखते हैं, ‘इंदिरा और राजीव गांधी की इस पारिवारिक पकड़ ने पार्टी में नंबर दो का पद भी ढहा दिया था. हमेशा सशंकित रहने वाली इंदिरा गांधी ने राजीव को एक अहम सबक सिखाया – स्थानीय क्षत्रपों पर लगाम रखो और किसी भी ऐसे शख्स को आगे मत बढ़ाओ जो नेहरू-गांधी परिवार का न हो.’

इंदिरा गांधी ने खुद यही किया था. उनके समय में ही कांग्रेस में ‘हाईकमान कल्चर’ का जन्म हुआ और क्षेत्रीय नेता हाशिये पर डाल दिए गए. लंदन के मशहूर किंग्स कॉलेज के निदेशक और चर्चित लेखक सुनील खिलनानी अपने एक लेख में कहते हैं कि ऐसा इंदिरा गांधी ने दो तरीकों से किया – पहले उन्होंने पार्टी का विभाजन किया और फिर ऐसी परिस्थितियां पैदा कर दीं कि पार्टी से वफादारी के बजाय इंदिरा गांधी से वफादारी की अहमियत ज्यादा हो गई.

इंदिरा गांधी ने यह बदलाव पैसे का हिसाब-किताब बदलकर किया. पहले पैसे का मामला पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व से अलग रखा जाता था. जवाहरलाल नेहरू आदर्शवादी नेता थे लेकिन उन्हें यह भी अहसास था कि कांग्रेस जैसी विशाल पार्टी को चलाने के लिए काफी पैसे की जरूरत होती है, तो उन्होंने यह काम स्थानीय क्षत्रपों पर छोड़ रखा था जो अपने-अपने तरीकों से पैसा जुटाते और इसे अपने इलाकों में चुनाव पर खर्च करते. सुनील खिलनानी लिखते हैं, ‘इंदिरा गांधी ने यह व्यवस्था खत्म कर दी. अब स्थानीय नेताओं को दरकिनार करते हुए नकदी सीधे उनके निजी सचिवों के पास पहुंचाई जाने लगी और उम्मीदवारों को चुनावी खर्च के लिए पैसा देने की व्यवस्था पर इंदिरा गांधी के दफ्तर का नियंत्रण हो गया. पैसा पहले ब्रीफकेस में भरकर आता था. बाद में सूटकेस में भरकर आने लगा.’ सुनील खिलनानी के मुताबिक इस सूटकेस संस्कृति के जरिये इंदिरा गांधी ने अपने चहेते वफादारों का एक समूह खड़ा कर लिया जिसे इस वफादारी का इनाम भी मिलता था. इस सबका दुष्परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस वोट पाने से लेकर विधायक दल का नेता चुनने तक हर मामले में नेहरू-गांधी परिवार का मुंह ताकने लगी.

यही वजह थी कि 1984 में जब अपने अंगरक्षकों के हमले में इंदिरा गांधी की असमय मौत हुई तो राजनीति के मामले में नौसिखिये राजीव गांधी को तुरंत ही पार्टी की कमान दे दी गई. उन्होंने अपनी मां से मिले सबक याद रखे. राशिद किदवई ने अपनी किताब में लिखा है कि शरद पवार, नारायण दत्त तिवारी और अर्जुन सिंह जैसे कई मजबूत क्षत्रपों पर लगाम रखने के लिए राजीव गांधी ने भी नेताओं का एक दरबारी समूह बनाया. कोई खास जनाधार न रखने वाले इन नेताओं को ताकतवर पद दिए गए. बूटा सिंह, गुलाम नबी आजाद और जितेंद्र प्रसाद ऐसे नेताओं में गिने गए. यानी इंदिरा गांधी ने कांग्रेस में लोकतंत्र के खात्मे की जो प्रक्रिया शुरू की थी उसे राजीव गांधी ने आगे बढ़ाया.

1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद भी वही हुआ जो 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुआ था. इस घटना के बाद दिल्ली में उनके निवास 10 जनपथ पर कार्यकर्ताओं की भारी भीड़ जमा थी. वरिष्ठ पत्रकार तवलीन सिंह भी वहां मौजूद थीं. इसी दौरान अपने एक सहयोगी से उन्हें खबर मिली कि कांग्रेस कार्यसमिति की एक बैठक हुई है जिसमें सोनिया गांधी को पार्टी की कमान देने का फैसला हुआ है. यह सुनकर वे हैरान रह गईं. अपनी किताब दरबार में वे लिखती हैं, ‘मैंने कहा कि वे तो विदेशी हैं और हिंदी तक नहीं बोलतीं. वे कभी अखबार नहीं पढ़तीं. ये पागलपन है.’ सोनिया गांधी तब कांग्रेस की सदस्य तक नहीं थीं. अपनी किताब में राशिद किदवई लिखते हैं, ‘सोनिया गांधी में नेतृत्व के गुण हैं या नहीं, उन्हें भारतीय राजनीति की पेचीदगियों का अंदाजा है या नहीं, इन बातों पर जरा भी विचार नहीं किया गया.’

हालांकि सोनिया गांधी ने उस समय यह पद ठुकरा दिया. एक बयान जारी करते हुए उन्होंने कहा कि जो विपदा उन पर आई है उसे और अपने बच्चों को देखते हुए उनके लिए कांग्रेस अध्यक्ष का पद स्वीकार करना संभव नहीं है. परिवार के सूत्रों के मुताबिक सोनिया गांधी को कांग्रेस कार्यसमिति का यह फैसला काफी असंवेदनशील भी लगा क्योंकि तब तक राजीव गांधी का अंतिम संस्कार भी नहीं हुआ था. राशिद किदवई के मुताबिक उस समय परिवार के काफी करीबी रहे अमिताभ बच्चन ने कहा कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी को भी इसी तरह पार्टी की कमान थामने को मजबूर किया गया था और कब तक गांधी परिवार के सदस्य इस तरह बलिदान देते रहेंगे.

इसके बाद अगले चार साल तक कांग्रेस की कमान तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के पास रही. 1978 में ब्रह्मानंद रेड्डी के बाद से यह पहली बार था जब पार्टी की अगुवाई गांधी परिवार से बाहर का कोई शख्स कर रहा था. हालांकि तब भी गांधी परिवार कांग्रेस के भीतर एक शक्ति केंद्र था ही. कहा जाता है कि नरसिम्हा राव से असंतुष्ट नेता सोनिया गांधी को अपना दुखड़ा सुनाते थे. राव के बाद दो साल पार्टी सीताराम केसरी की अगुवाई में चली.

तब तक 1996 के आम चुनाव आ चुके थे. इन चुनावों में सत्ताधारी कांग्रेस का प्रदर्शन काफी फीका रहा. पांच साल पहले 244 सीटें लाने वाली पार्टी इस बार 144 के आंकड़े पर सिमट गई. उधर, भाजपा का आंकड़ा 120 से उछलकर 161 पर पहुंच गया. कांग्रेस का एक धड़ा सोनिया गांधी को वापस लाने की कोशिशों में जुटा था. पार्टी की बिगड़ती हालत ने उसकी इन कोशिशों को वजन दे दिया. 1997 में कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में सोनिया गांधी को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता दिलाई गई और इसके तीन महीने के भीतर ही वे अध्यक्ष बन गईं.

कांग्रेस के अब तक हुए अध्यक्षों की सूची देखें तो सोनिया गांंधी राजनीति के लिहाज से सबसे ज्यादा नातजुर्बेकार थीं लेकिन, उन्होंने सबसे ज्यादा समय तक यह कुर्सी संभाली. वे करीब दो दशक तक कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं और अब फिर अंतरिम अध्यक्ष के रूप में पार्टी की कमान संभाले हुए हैं.

इसी तरह राहुल गांधी 2004 में सक्रिय राजनीति में आए. तीन साल के भीतर उन्हें पार्टी महासचिव बना दिया गया. 2013 में यानी राजनीति में आने के 10 साल से भी कम वक्त के भीतर राहुल गांधी कांग्रेस उपाध्यक्ष बन गए. 2017 में वे अध्यक्ष बनाए गए. 2019 में उन्होंने पद छोड़ा तो चुनाव नहीं हुए बल्कि सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष बन गईं. इसी तरह कोई चुनाव न जीतने के बाद भी प्रियंका गांधी कांग्रेस की महासचिव हैं. और परिवार में कथित तौर पर सबसे ज्यादा राजनीतिक परिपक्वता रखने के बाद भी सिर्फ पारिवारिक समीकरणों के चलते ही वे शायद पार्टी में बड़ी मांग होने पर भी उसके लिए खुलकर राजनीति नहीं कर पा रही हैं.

यानी कि अब भी कांग्रेस उसी तरह चल रही है जैसी राजीव और इंदिरा गांधी के समय चलती थी. इसका मतलब यह है कि पार्टी के भीतर लोकतंत्र पहले की तरह अब भी गायब है. अगर इससे थोड़ा आगे बढ़ें तो यह भी कहा जा सकता है कि जब गांधी परिवार के भीतर ही नेतृत्व का निर्णय लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित नहीं है तो इसकी उम्मीद पार्टी के स्तर पर कैसे की जा सकती है! राजीव-इंदिरा की तरह आज सोनिया गांधी के इर्द-गिर्द भी नेताओं की एक मंडली जमी रहती है और बाकियों को इसके जरिये ही उन तक अपनी बात पहुंचानी पड़ती है. राज्यों के चुनाव होते हैं तो विधायक दल का नेता चुनने का अधिकार केंद्रीय नेतृत्व को दे दिया जाता है जो अपनी पसंद का नाम तय कर देता है. संसदीय दल का नेता चुनने के मामले में भी ऐसा ही होता है.

2004 के आम चुनाव में तो मामला इससे भी आगे चला गया था. कांग्रेस सबसे ज्यादा सीटें लाई थीं और उसके नेतृत्व में गठबंधन सरकार बननी थी. लेकिन विदेशी मूल का हवाला देकर भाजपा ने सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने का विरोध शुरू कर दिया. इसके बाद सोनिया गांधी खुद प्रधानमंत्री नहीं बनीं लेकिन उनके एक इशारे पर ही मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना दिया गया. लेकिन बात यहीं नहीं रुकी. प्रधानमंत्री को सलाह देने के लिए एक राष्ट्रीय सलाहकार परिषद भी बन गई जिसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी थीं. इस तरह का काम भारतीय लोकतंत्र में पहली बार हुआ था और इसके चलते सोनिया गांधी को सुपर पीएम कहा जाने लगा था.

वे दिन अब बीत चुके हैं. बीते साल कांग्रेस को लगातार दूसरे आम चुनाव में भयानक हार का सामना करना पड़ा. 2014 में महज 44 लोकसभा सीटें लाने वाली पार्टी 2019 के आम चुनाव में इस आंकड़े में सिर्फ आठ की बढो़तरी कर सकी. इस तरह देखें तो पार्टी के एक परिवार पर निर्भर होने के लिहाज से भी इस समय एक दिलचस्प स्थिति है. ऐसा पहली बार है जब गांधी परिवार के तीन सदस्य कांग्रेस में तीन सबसे प्रभावशाली भूमिकाओं में हैं और ठीक उसी वक्त पार्टी सबसे कमजोर हालत में है. अभी तक कहा जाता था कि गांधी परिवार एक गोंद की तरह कांग्रेस को जोड़े रखता है क्योंकि इसका करिश्मा चुनाव में वोट दिलवाता है. लेकिन साफ है कि वह करिश्मा अब काम नहीं कर रहा. पवन के वर्मा कहते हैं, ‘सच ये है कि पार्टी एक ऐसे परिवार की बंधक बनी हुई है जो दो आम चुनावों में इसका खाता 44 से सिर्फ 52 तक पहुंचा सका.’ उनके मुताबिक कांग्रेस को नेतृत्व से लेकर संगठन तक बुनियादी बदलाव की जरूरत है और तभी वह एक ऐसा विश्वसनीय विपक्ष बन सकती है जिसकी लोकतंत्र को जरूरत होती है.

दबी जुबान में ही सही, कांग्रेस के भीतर से भी इस तरह के सुर सुनाई दे रहे हैं. कुछ समय पहले पार्टी नेता संदीप दीक्षित का कहना था कि ‘महीनों बाद भी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नया अध्यक्ष नियुक्त नहीं कर सके. वजह ये है कि वे डरते हैं कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे.’ पूर्व सांसद ने यह भी कहा कि कांग्रेस के पास नेताओं की कमी नहीं है और अब भी कांग्रेस में कम से कम छह से आठ नेता हैं जो अध्यक्ष बनकर पार्टी का नेतृत्व कर सकते हैं. उनके इस बयान का पार्टी के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने भी खुला समर्थन किया. उन्होंने कहा, ‘संदीप दीक्षित ने जो कहा है वह देश भर में पार्टी के दर्जनों नेता निजी तौर पर कह रहे हैं.’ शशि थरूर का आगे कहना था, ‘मैं कांग्रेस कार्यसमिति से फिर आग्रह करता हूं कि कार्यकर्ताओं में ऊर्जा का संचार करने और मतदाताओं को प्रेरित करने के लिए नेतृत्व का चुनाव कराया जाए.’

लेकिन अध्यक्ष पद के लिए चुनाव एक ऐसी बात है जो कांग्रेस में अपवाद और अनोखी बात रही है. आखिर बार ऐसा 2001 में हुआ था जब सोनिया गांधी के सामने जितेंद्र प्रसाद खड़े हुए थे और महज एक फीसदी वोट हासिल कर सके थे. उससे पहले 1997 में कांग्रेस में अध्यक्ष पद का चुनाव हुआ था जिसमें सीताराम केसरी ने शरद पवार और राजेश पायलट को हराया था. और इससे पहले चुनाव की नौबत 1950 में तब आई थी जब जवाहरलाल नेहरू की नापसंदगी के बाद भी पुरुषोत्तम दास टंडन को ज्यादा वोट मिले थे और वे कांग्रेस के मुखिया बन गए थे. बाकी सभी मौकों पर पार्टी अध्यक्ष का चुनाव बंद कमरों में होता रहा है.

कांग्रेस के कई नेताओं के अलावा कुछ विश्लेषक भी मानते हैं कि किसी नए चेहरे का लोकतांत्रिक रूप से चुनाव ही भारत की सबसे पुरानी पार्टी को नया रूप देने का सबसे सही तरीका हो सकता है. अपने एक लेख में रामचंद्र गुहा कहते हैं कि इससे भी आगे बढ़कर वह प्रक्रिया अपनाई जा सकती है जो अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी अपनाती है और जो कहीं ज्यादा लोकतांत्रिक है. वे लिखते हैं, ‘पार्टी सदस्यों तक सीमित रहने वाले चुनाव से पहले टेलीविजन पर बहसें और टाउन हॉल जैसे आयोजन हो सकते हैं जिनमें उम्मीदवार अपने नजरिये और नेतृत्व की अपनी क्षमता का प्रदर्शन करें. आखिर कांग्रेस इस बारे में क्यों नहीं सोचती?’

रामचंद्र गुहा का मानना है कि कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव उन लोगों के लिए भी खुला होना चाहिए जो कभी कांग्रेस में थे, लेकिन उसे छोड़कर चले गए. उदाहरण के लिए ममता बनर्जी. इस चर्चित इतिहासकार के मुताबिक ऐसे लोगों को भी उम्मीदवारी पेश करने की छूट दी जा सकती है जो कभी कांग्रेस पार्टी के सदस्य नहीं रहे. वे लिखते हैं, ‘मसलन कोई सफल उद्यमी या करिश्माई सामाजिक कार्यकर्ता भी दावेदार हो सकता है जिससे चुनाव कहीं ज्यादा दिलचस्प हो जाएगा.’ उनके मुताबिक उम्मीदवारों को साक्षात्कार-भाषण देने और व्यक्तिगत घोषणा पत्र जारी करने की छूट होनी चाहिए. रामचंद्र गुहा मानते हैं कि अगर कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव इतना लोकतांत्रिक और पारदर्शी हो जाए तो तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और वाईएसआर कांग्रेस जैसी वे पार्टियां उसके साथ आ सकती हैं जिनके नेताओं के बारे में माना जाता है कि वे सिर्फ इसलिए कांग्रेस छोड़कर चले गए कि उन्हें एक हद से आगे नहीं बढ़ने दिया गया.

कई और विश्लेषक भी मानते हैं कि कांग्रेस इस बात को समझ नहीं पा रही कि नेहरू गांधी परिवार को लेकर उसकी जो श्रद्धा है, वही उसके उद्धार की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है. अपने एक लेख में राशिद किदवई कहते हैं, ‘जो नए मतदाता हैं या जिसे हम न्यू इंडिया कहते हैं, वे जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, संजय गांधी, सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से ऊब चुके हैं. वे एक ही परिवार से हटना चाह रहे हैं.’ उनके मुताबिक जिस दिन कांग्रेस को यह समझ में आ जाएगा कि वह नेहरू-गांधी परिवार का इस्तेमाल भले करे, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व किसी और को दे दे, उसी दिन से कांग्रेस में बदलाव शुरू हो जाएगा.’

सवाल उठता है कि क्या ऐसा होगा? अभी तो अध्यक्ष पद छोड़ने के बावजूद कांग्रेस के केंद्र में राहुल गांधी ही दिख रहे हैं. पार्टी से जुड़ी ज्यादातर बड़ी सुर्खियां उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस या ट्वीट पर ही केंद्रित होती हैं. अंदरखाने से आ रही खबरों के मुताबिक कांग्रेस के कई नेता इससे फिक्रमंद हैं. उनकी शिकायत है कि रणनीति तो राहुल गांधी अपने हिसाब से तय कर रहे हैं, लेकिन इस रण को लड़ने वाले संगठन से जुड़ी शिकायतों पर वे यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि वे अब पार्टी के अध्यक्ष नहीं हैं.

यानी फिलहाल तो मामला वही ढाक के तीन पात जैसा है.

साभार: विकास बहुगुणा

परमात्मा राजस्थान के राज्यपाल महामहिम कलराज मिश्र को ‌सदबुद्धि दे : पूर्व उपमुख्यमंत्री चंद्रमोहन

पचकुलां 28 जुलाई :

हरियाणा के पूर्व उपमुख्यमंत्री चंद्रमोहन ने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के इशारों पर राजस्थान के राज्यपाल महामहिम  कलराज मिश्र ने लोकतांत्रिक व्यवस्था और  प्रजातांत्रिक मूल्यों का  हनन करके प्रजातंत्र का गला घोंटने का कुत्सित प्रयास किया है।

        ‌चन्द्र मोहन ने कहा कि भारत के संविधान ने राज्यपाल को  सीमित अधिकार दिए हैं । वह मंत्रीमंडल के फैसले को मानने के लिए बाध्य ‌है। केन्द्रीय नेतृत्व के इशारों पर सभी संवैधानिक परम्पराओं और मान्यताओं को तार – तार करते हुए, अपने पद और गरिमा को मिट्टी में मिलाने का काम किया है। आजाद भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि राज्यपाल ने राजस्थान मंत्रिमंडल के विधानसभा का सत्र बुलाने के प्रस्ताव को मंजूरी दिए बिना ही प्रश्नो के साथ लौटाया ‌हो। तिथि का निर्धारण  करने का अधिकार केवल मात्र मंत्रीमण्डल को है। तिथि पर मतभेद होने के बावजूद मंत्रिमंडल दोबारा प्रस्ताव भेजता है तो  राज्यपाल उसे मानने के लिए बाध्य है।

         उन्होंने याद दिलाया कि वह भी चार बार विधायक रहे हैं, जो भी प्रस्ताव  मंत्रीमंडल ‌द्वारा भेजा गया , उसे स्वीकार कर लिया गया।  राज्यपाल को मंत्रीमंडल के फैसले की सूचना अखबारों के माध्यम से मिलती है। संविधान के अनुसार शाशन मुख्यमंत्री करता है, राज्यपाल केवल अपनी संवैधानिक परम्पराओं‌ से बंधा होता है। उन्होंने याद दिलाया कि राज्यपाल अगर मुख्यमंत्री के खिलाफ भी हो तब भी उसे सरकार द्वारा ‌तैयार किया गया अभिभाषण न चाहते हुए भी सदन में पढ़ना पड़ता है। आपको याद होगा कि पश्चिमी बंगाल में ममता बनर्जी सरकार का अभिभाषण राज्यपाल जगदीप धनखड़ को  न चाहते हुए भी पढ़ने के लिए विवश होना पड़ा। धनखड़ राज्यपाल और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी में 36 का आंकड़ा है।

चन्द्र मोहन ने कहा कि कांग्रेस पार्टी ने कल सारे देश में प्रजातंत्र और संविधान बचाओ कार्यक्रम का आयोजन किया गया ताकि  प्रजातंत्र का गला घोंटने का काम सन् 2014 के पश्चात विभिन्न प्रदेशों के राज्यपालों द्वारा किया गया है, उसे लोकतंत्र पर कंलक के रूप में देखा जा रहा है। राज्यपाल भारतीय जनता पार्टी के दरबारी बन कर काम कर रहे हैं और लोकतंत्र के लिए यही सबसे बड़ा खतरा है। सत्यता के लालच में राज्यपालों ने  गोवा, उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश, कर्नाटक, मेघालय, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और अब राजस्थान में जिस प्रकार से लोकतंत्र की हत्या करने का प्रयास किया गया है उससे भाजपा का असली चेहरा और चरित्र देश के लोगों के सामने आ गया है।

चन्द्र मोहन ने कहा कि कांग्रेस पार्टी भारतीय जनता पार्टी के धनबल और संविधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग का पर्दा फाश करेंगी और जिस प्रकार से ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स विभाग का दबाव बनाने के लिए प्रयोग किया जा रहा है। उसके दबाव में कांग्रेस पार्टी कभी भी नहीं झुकेगी। कांग्रेस पार्टी अंग्रेजों के सामने नहीं झूकी तो भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को भी उम्मीद छोड़ देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस ‌प्रकार भारतीय जनता पार्टी के हाथों से राज्यों की बागडोर खिसक रही है , उससे आने वाले समय में  भाजपा की मुश्किलें और अधिक बढ़ेगी, क्योंकि भाजपा के खिलाफ देशभर में जिस प्रकार से जनाक्रोश फैल रहा है , उससे आने वाले समय में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा की राह आसान नहीं है। उन्होंने कहा कि परमात्मा राजस्थान के राज्यपाल महामहिम कलराज मिश्र को ‌सदबुद्धि  दे, ताकि लोकतंत्र के चीरहरण को बचाया जा सके।        

मेरठ में महिला अधिवक्ताओं की तरफ से अधिवक्ताओं को 5 लाख रुपए तक का लोन देने के लिए राष्ट्रीयकृत बैंकों को निर्देश देने की मांग उठी

अधिवक्ता शुचि शर्मा, मेरठ:

अधिवक्ता शुचि शर्मा

संपूर्ण भारत की महिला अधिवक्ताओं द्वारा कोविड महामारी के कठिन समय में सभी अधिवक्ताओं की आर्थिक स्थिति का संज्ञान लेते हुए सर्व अधिवक्ताओं के हितों और आत्मसम्मान का ध्यान रखते हुए बैंक ॠण हेतु एक याचिका राष्ट्रीय स्तर पर ऑनलाइन माध्यम से सहमति प्रपत्र अभिसमर्थित किया गया। जिसे देशभर की महिला अधिवक्ता शक्ति का विधिक इतिहास में पहली बार संगठित स्वरूप के रूप में देखा गया।

उक्त याचिका केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह के समक्ष महिला प्रतिनिधियो द्वारा हस्ताक्षरित कर प्रस्तुत की गयी, जिसमें अधिवक्ताओ के विधि व्यवसाय के अतिरिक्त अन्य आय स्रोत के निर्बंधनों और बार कौंसिल द्वारा की गयी मदद अपर्याप्त होने से आपदा प्रबंधन अधिनियम 2015 के अंतर्गत अधिवक्ता  5,00,000/- तक के ॠण प्राप्ति की सुविधा हेतु निवेदन याचिका के माध्यम से दिनांक 24.07.2020 को प्रस्तुता किया गया। याचिका में न्यायिक दृष्टांत के माध्यम से भी अधिवक्ताओं की समस्याओं पर प्रकाश डाला गया तथा विकट परिस्थितियों में अधिवक्ताओं को हुई जीवन क्षति से भी अवगत कराया गया।

उक्त राष्ट्र व्यापी मुहिम में मेरठ उत्तर प्रदेश से जिला एवं सत्र न्यायालय, मेरठ की अधिवक्ता शुचि शर्मा के द्वारा विभिन्न जिलों में महिला अधिवक्ताओं को इस विषय के बारे में जानकारी देते हुए सहमति पत्र भरने हेतु आग्रह किया जिससे मेरठ जिले की 20 महिला अधिवक्ताओं ने पत्रक भरकर अपनी सहमति प्रदान की। महिला अधिवक्ताओं के द्वारा सामुहिक रूप से यह प्रथम प्रयास था, जिसमें पूरे भारत से ढाई हजार के लगभग महिला अधिवक्ताओं की सहभागिता रही।

शिवराज सिंह चौहान कोरोना पॉजिटिव, उमा भारती ने स्वास्थ्यलाभ की कामना की

मध्य प्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान कोरोना पॉजिटिव (Shivraj Singh Chouhan Corona Positive) हो गए हैं। शनिवार सुबह यह जानकारी आने के बाद से बोपाल से लेकर लखनऊ तक हड़कंप मचा हुआ है। सीएम भोपाल स्थित मंत्रालय में नियमित बैठकें करने के अलावा पूर्व राज्यपाल लालजी टंडन के अंतिम संस्कार में शामिल होने लखनऊ भी गए थे।

भोपाल – 25 जुलाई :

एमपी के सीएम शिवराज सिंह चौहान कोरोना पॉजिटिव हो गए हैं। शनिवार सुबह उन्होंने ट्वीट कर खुद इसकी पुष्टि की और अपने संपर्क में आए लोगों को टेस्ट कराने की सलाह दी। इसके बाद से राजधानी भोपाल से लेकर यूपी के लखनऊ तक में हड़कंप मचा हुआ है। चौहान पिछले सप्ताह पूर्व राज्यपाल लालजी टंडन के अंतिम संस्कार में शामिल होने लखनऊ भी गए थे। शिवराज सिंह के कोरोना संक्रमित होने पर उमा भारती ने कहा कि शिवराज जी और अनिल भदौरिया, लालजी की अंत्योष्टि में शामिल हुए थे. उसके कुछ दिन बाद ही भदौरिया पजिटिव आए थे, इसके बाद से हम सब उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंतित थे. उन्होंने कहा मैं भगवान से प्रार्थना करती हूं जल्द ही वह ठीक हो और सिर्फ वह ही नहीं इस धरती पर जो भी इस वायरस की चपेट में आए वो जल्द से जल्द ठीक हो. उमा भारती ने कहा कि इस वायरस ने हमारे खिलाफ जैविक युद्ध छेड़ दिया है. 

पिछले दिनों किनसे मिले सीएम

  1. शुक्रवार शाम मंत्रालय में आत्मनिर्भर भारत कार्यक्रम को लेकर अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक की। इसे कई विभागों के शीर्ष अधिकारी शामिल थे।
  2. बुधवार को चौहान ने प्रदेश कैबिनेट की बैठक ली थी। वे दो दिनों तक मंत्रियों से अलग-्अलग भी मिले।
  3. इससे पहले वे लखनऊ में लालजी टंडन के अंतिम संस्कार में शामिल हुए थे। इसमें उनके साथ गए एक मंत्री पहले ही कोरोना पॉजिटिव हो चुके हैं।
  4. चौहान गुरुवार शाम को भोपाल स्थिक प्रदेश बीजेपी मुख्यालय गए थे। यहां उनकी मौजूदगी में कांग्रेस के पूर्व विधायक नारायण पटेल ने कांग्रेस की सदस्यता ली थी।
  5. सीएम रोजाना शाम को कोरोना की समीक्षा बैठक करते हैं। इसमें जिलों के अधिकारी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से शामिल होते हैं, लेकिन मंत्रालय के कुछ वरिष्ठ अफसर उनके साथ होते हैं।

कोरोना पॉजिटिव पाए जाने के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा, ‘मैं कोरोना गाइडलाइन का पूरा पालन कर रहा हूं. डॉक्टर की सलाह के अनुसार स्वयं को क्वारंटाइन करूंगा और इलाज कराऊंगा. मेरी प्रदेश की जनता से अपील है कि सावधानी रखें, जरा सी असावधानी कोरोना को निमंत्रण देती है. मैंने कोरोना से सावधान रहने के हर संभव प्रयास किए लेकिन समस्याओं को लेकर के लोग मिलते ही थे. मेरी उन सब को सलाह है कि जो मुझसे मिले, वह अपना टेस्ट करवा लें.’ 

नाग पंचमी 2020

व्रत – उपवास – त्यौहार, चंडीगढ़ – 25 जुलाई:

नाग पंचमी का त्योहार आज 25 जुलाई को मनाया जा रहा है. आज लोग सांपों/नाग देवताओं की पूजा करेंगे और नाग देवता को दूध पिलाएंगे. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, नाग पंचमी के दिन नागदेव की पूजा करने से कुंडली के राहु और केतु से संबंधित दोष दूर होते हैं. जिन जातकों की कुंडली में सांप का भय और सर्पदंश का योग होता है वो नाग पंचमी के दिन कालसर्प योग की पूजा करेंगे. आज कई महिलाएं सांप को भाई मानकर उनकी पूजा करती हैं और भाई से अपने परिवार की रक्षा का आशीर्वाद मांगती हैं. आइए नाग पंचमी के मौके पर पढ़ते हैं नाग पंचमी कथा …

नाग पंचमी कथा:

नाग पंचमी की पौराणिक कथा के अनुसार, बहुत समय पहले की बात है जब प्राचीन नगर में एक सेठजी के सात पुत्र थे. सातों के विवाह हो चुके थे. सबसे छोटे पुत्र की पत्नी श्रेष्ठ चरित्र की विदूषी और सुशील थी, परंतु उसके भाई नहीं था.

एक दिन बड़ी बहू ने घर लीपने को पीली मिट्टी लाने के लिए सभी बहुओं को साथ चलने को कहा तो सभी धलिया और खुरपी लेकर मिट्टी खोदने लगी. तभी वहां एक सर्प निकला, जिसे बड़ी बहू खुरपी से मारने लगी. यह देखकर छोटी बहू ने उसे रोकते हुए कहा- ‘मत मारो इसे? यह बेचारा निरपराध है.’

यह सुनकर बड़ी बहू ने उसे नहीं मारा तब सर्प एक ओर जा बैठा. तब छोटी बहू ने उससे कहा-‘हम अभी लौट कर आती हैं तुम यहां से जाना मत. यह कहकर वह सबके साथ मिट्टी लेकर घर चली गई और वहां कामकाज में फंसकर सर्प से जो वादा किया था उसे भूल गई.

उसे दूसरे दिन वह बात याद आई तो सब को साथ लेकर वहां पहुंची और सर्प को उस स्थान पर बैठा देखकर बोली- सर्प भैया नमस्कार! सर्प ने कहा- ‘तू भैया कह चुकी है, इसलिए तुझे छोड़ देता हूं, नहीं तो झूठी बात कहने के कारण तुझे अभी डस लेता. वह बोली- भैया मुझसे भूल हो गई, उसकी क्षमा मांगती हूँ, तब सर्प बोला- अच्छा, तू आज से मेरी बहन हुई और मैं तेरा भाई हुआ. तुझे जो मांगना हो, मांग ले. वह बोली- भैया! मेरा कोई नहीं है, अच्छा हुआ जो तू मेरा भाई बन गया.

कुछ दिन व्यतीत होने पर वह सर्प मनुष्य का रूप रखकर उसके घर आया और बोला कि ‘मेरी बहन को भेज दो.’ सबने कहा कि ‘इसके तो कोई भाई नहीं था, तो वह बोला- मैं दूर के रिश्ते में इसका भाई हूं, बचपन में ही बाहर चला गया था. उसके विश्वास दिलाने पर घर के लोगों ने छोटी को उसके साथ भेज दिया. उसने मार्ग में बताया कि ‘मैं वहीं सर्प हूं, इसलिए तू डरना नहीं और जहां चलने में कठिनाई हो वहां मेरी पूंछ पकड़ लेना. उसने कहे अनुसार ही किया और इस प्रकार वह उसके घर पहुंच गई. वहां के धन-ऐश्वर्य को देखकर वह चकित हो गई.

एक दिन सर्प की माता ने उससे कहा- ‘देश परंतु सर्प के समझाने पर शांत हो गई. तब सर्प ने कहा कि बहिन को अब उसके घर भेज देना चाहिए. तब सर्प और उसके पिता ने उसे बहुत सा सोना, चांदी, जवाहरात, वस्त्र-भूषण आदि देकर उसके घर पहुंचा दिया.

इतना ढेर सारा धन देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्या से कहा- भाई तो बड़ा धनवान है, तुझे तो उससे और भी धन लाना चाहिए. सर्प ने यह वचन सुना तो सब वस्तुएं सोने की लाकर दे दीं. यह देखकर बड़ी बहू ने कहा- ‘इन्हें झाड़ने की झाड़ू भी सोने की होनी चाहिए’. तब सर्प ने झाडू भी सोने की लाकर रख दी.

सर्प ने छोटी बहू को हीरा-मणियों का एक अद्भुत हार दिया था. उसकी प्रशंसा उस देश की रानी ने भी सुनी और वह राजा से बोली कि- सेठ की छोटी बहू का हार यहां आना चाहिए.’ राजा ने मंत्री को हुक्म दिया कि उससे वह हार लेकर शीघ्र उपस्थित हो मंत्री ने सेठजी से जाकर कहा कि ‘महारानीजी छोटी बहू का हार पहनेंगी, वह उससे लेकर मुझे दे दो’. सेठजी ने डर के कारण छोटी बहू से हार मंगाकर दे दिया.

छोटी बहू को यह बात बहुत बुरी लगी, उसने अपने सर्प भाई को याद किया और आने पर प्रार्थना की- भैया ! रानी ने हार छीन लिया है, तुम कुछ ऐसा करो कि जब वह हार उसके गले में रहे, तब तक के लिए सर्प बन जाए और जब वह मुझे लौटा दे तब हीरों और मणियों का हो जाए. सर्प ने ठीक वैसा ही किया. जैसे ही रानी ने हार पहना, वैसे ही वह सर्प बन गया. यह देखकर रानी चीख पड़ी और रोने लगी.

यह देख कर राजा ने सेठ के पास खबर भेजी कि छोटी बहू को तुरंत भेजो. सेठजी डर गए कि राजा न जाने क्या करेगा? वे स्वयं छोटी बहू को साथ लेकर उपस्थित हुए. राजा ने छोटी बहू से पूछा- तुने क्या जादू किया है, मैं तुझे दंड दूंगा. छोटी बहू बोली- राजन ! धृष्टता क्षमा कीजिए, यह हार ही ऐसा है कि मेरे गले में हीरों और मणियों का रहता है और दूसरे के गले में सर्प बन जाता है. यह सुनकर राजा ने वह सर्प बना हार उसे देकर कहा- अभी पहनकर दिखाओ. छोटी बहू ने जैसे ही उसे पहना वैसे ही हीरों-मणियों का हो गया.

यह देखकर राजा को उसकी बात का विश्वास हो गया और उसने प्रसन्न होकर उसे बहुत सी मुद्राएं भी पुरस्कार में दीं. छोटी वह अपने हार और इन सहित घर लौट आई. उसके धन को देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्या के कारण उसके पति को सिखाया कि छोटी बहू के पास कहीं से धन आया है. यह सुनकर उसके पति ने अपनी पत्नी को बुलाकर कहा- ठीक-ठीक बता कि यह धन तुझे कौन देता है? तब वह सर्प को याद करने लगी.

तब उसी समय सर्प ने प्रकट होकर कहा- यदि मेरी धर्म बहन के आचरण पर संदेह प्रकट करेगा तो मैं उसे खा लूंगा. यह सुनकर छोटी बहू का पति बहुत प्रसन्न हुआ और उसने सर्प देवता का बड़ा सत्कार किया. उसी दिन से नागपंचमी का त्योहार मनाया जाता है और स्त्रियां सर्प को भाई मानकर उसकी पूजा करती हैं. 

हाइ कोर्ट के बाद गहलोत को अब राजभवन से भी लगा झटका, धरने पर विधायक

  • अदालत के बाद राजभवन से भी सीएम को झटका
  • कोरोना संकट की वजह से विधानसभा सत्र पर संकट

राजस्थान में जारी सियासी संकट के बीच अशोक गहलोत सरकार को फिर झटका लगा है। पहले हाईकोर्ट ने स्पीकर के नोटिस पर स्टे लगा दिया और अब राज्यपाल विधानसभा सत्र ना बुलाने पर अड़े हैं। जो बात सबको आहार रही है वह है गहलोत का उतावलापन, जब आपके स्पीकर ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका लगा रखी है और उस पर आगे की कार्रवाई आगामी सोमवार को होनी है तो इतन घबराहट क्यों?

नयी दिल्ली(ब्यूरो):

राजस्थान के सियासी संकट में अब राज्यपाल बनाम मुख्यमंत्री के बीच जंग छिड़ती नजर आ रही है. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की ओर से कहा गया है कि उन्होंने विधानसभा सत्र बुलाने की अपील की है, लेकिन राज्यपाल की ओर से कोई फैसला नहीं लिया गया है. लेकिन अब खबर है कि राज्यपाल कलराज मिश्र की ओर से अभी कोरोना संकट का हवाला दिया गया है।

सूत्रों का कहना है कि राज्यपाल की ओर से कहा गया है कि अभी भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस के विधायक कोरोना वायरस से पीड़ित हैं. ऐसे में विधानसभा का सत्र बुलाना ठीक नहीं होगा. यानी अशोक गहलोत गुट को पहले हाईकोर्ट से झटका लगा और अब राजभवन से भी कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही है.

ऐसी स्थिति में अशोक गहलोत सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट का रुख किया जा सकता है. जिसमें तत्काल विधानसभा का सत्र बुलाने और बहुमत साबित करने की बात की जा सकती है. हालांकि, अभी राज्यपाल की ओर से विधानसभा सत्र की ओर से कोई अंतिम निर्णय आना भी बाकी है.

साफ है कि अशोक गहलोत के सामने अब लगातार चुनौतियां आ रही हैं. क्योंकि एक तरफ विधायकों की मांग है कि वो जल्द बहुमत साबित करें और होटल से बाहर निकलें. इसके अलावा पायलट गुट को दिए गए नोटिस पर भी स्टे लग गया है, ऐसे में अदालत की कार्यवाही लंबा वक्त ले सकती है.

यह भी राजभवन को घेरने की धमकी के बाद गहलोत का राजभवन को कूच

हमलावर हुए अशोक गहलोत

अशोक गहलोत का कहना है कि उन्होंने राज्यपाल से कहा है कि अगर वो सत्र नहीं बुलाते हैं तो वह सभी विधायकों को लेकर उनके पास आ रहे हैं और सत्र बुलाने की अपील करेंगे. हालांकि, इसपर भी अभी राज्यपाल की ओर से इजाजत नहीं मिली है.

शुक्रवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अशोक गहलोत ने कहा कि राज्यपाल पर केंद्र की ओर से दबाव बनाया जा रहा है, लेकिन उन्होंने संविधान की शपथ ली है और ऐसे में उन्हें किसी के दबाव में नहीं आना चाहिए. सीएम ने कहा कि अगर राज्य की जनता आक्रोशित होकर राजभवन का घेराव कर लेती है, तो फिर उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं होगी.

बता दें कि अशोक गहलोत का दावा है कि उनके पास पूर्ण बहुमत है, ऐसे में सत्र बुलाकर राज्य के संकट के साथ साथ इस संकट पर भी चर्चा हो जाएगी और सबकुछ जनता के सामने आ जाएगा.

इससे पहले हाईकोर्ट की ओर से गहलोत गुट को झटका लगा था. क्योंकि हाईकोर्ट ने विधानसभा स्पीकर के उस नोटिस पर स्टे लगा दिया है, जिसमें सचिन पायलट गुट को अयोग्य करार करने की बात थी. स्टे के मुताबिक, अब अगले फैसले तक स्पीकर बागी विधायकों पर कोई फैसला नहीं ले पाएंगे.