भारत – पाक बार्डर खुलवाना चाहते हैं सिद्धू

सिद्धू ने कहा कि भारत-पाकिस्तान बॉर्डर को खोल देना चाहिए। उन्होंने कहा कि बॉर्डर खुलने से सबको फायदा होगा। अगर बॉर्डर खुल जाएगा तो इससे व्यापार में मदद मिलेगी। बॉर्डर बंद होने से सबको हो रहा है नुकसान, बॉर्डर खुल जाने से कई देशों के व्यापार के रास्ते खुल जाएंगे। उन्होंने कहा कि भारत-पाक व्यापार 37 बिलियन अमेरिकी डॉलर हैं, इससे 34 देश व्यापार करते हैं। लेकिन बॉर्डर बंद होने से हम केवल 3 बिलियन डॉलर का ही व्यापार कर पा रहे हैं।

नई दिल्ली (ब्यूरो)

कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू अक्सर अपनी बयानबाजी और पाकिस्तान प्रेम के चलते चर्चा में रहते हैं। एक बार फिर उनका पाकिस्तान प्रेम सामने आया है. दरअसल, शनिवार को सिद्धू ने कहा कि भारत-पाकिस्तान बॉर्डर को खोल देना चाहिए। उन्होंने कहा कि बॉर्डर खुलने से सबको फायदा होगा।

अमृतसर मे पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू ने कहा कि पाकिस्तान बॉर्डर बंद होने से सबको नुकसान हो रहा है। अगर बॉर्डर खुल जाएगा तो इससे व्यापार में मदद मिलेगी। बॉर्डर खुल जाने से कई देशों के व्यापार के रास्ते खुल जाएंगे। उन्होंने कहा कि भारत-पाक व्यापार 37 बिलियन अमेरिकी डॉलर हैं, इससे 34 देश व्यापार करते हैं। लेकिन बॉर्डर बंद होने से हम केवल 3 बिलियन डॉलर का ही व्यापार कर पा रहे हैं।

उन्होंने अगली साल होने वाले चुनाव इस चुनाव में रोजगार सबसे बड़ा मुद्दा होने जा रहा है। मैं आपको गारंटी देता हूं कि थोड़े समय के भीतर हम आपको एक विजन देंगे। सबके पास आंखें हैं, किसी के पास विजन नहीं है। सिद्धू ने कहा कि अभी जो व्यापार हो रहा है वो अपनी क्षमता का 5% भी नहीं है। उन्होंने कहा कि पंजाब को पिछले 34 महीनों में 4,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। इस दौरान 15,000 नौकरियां चली गईं। उन्होंने कहा कि मैंने पहले भी अनुरोध किया था, मैं एक बार फिर से अनुरोध कर रहा हूं कि भारत-पाकिस्तान के बीच व्यापार फिर से शुरू हो. इससे सभी को फायदा होगा।

बता दें, सिद्धू पहले भी ऐसे बयान दे चुके हैं। उन्होंने एक बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को अपना भाई कहा था। इसके अलावा उन्होंने कहा था कि भारत-पाकिस्तान के बीच व्यापार भी फिर से शुरू होना चाहिए। पाकिस्तान भाई जैसा देश है। दोनों के बीच दोस्ती और प्यार बराबर बना रहे। दोनों देशों के दरवाजे और खिड़कियां खुलनी चाहिए। सिद्धू के पाकिस्तान प्रेम के लिए कई बार उनकी आलोचना भी हो चुकी है।

राजकोट में 200 महिलाओं ने ‘तलवार रास’ में दिखाया हस्तलाघव

गुजरात के राजकोट में राजपूत महिलाओं ने अपने तलवार बाजी कौशल का शानदार प्रदर्शन कर सबके दिलों को जीत लिया है। दरअसल, राजकोट में पांच दिवसीय तलवार रास कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें राजपूत महिलाओं ने न सिर्फ बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, बल्कि अपने तलवार कौशल का प्रदर्शन भी किया। इसका एक वीडियो सामने आया है, जिसमें एक महिला अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर कुछ महिलाओं की पीठ पर चढ़कर तलवार बाजी करती दिख रही है।

राजकोट में चल रहे पांच दिन के कार्यक्रम में ‘तलवार रास’ का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और तलवार कौशल दिखाया। कार्यक्रम में राजपूती महिलाओं ने आंख में पट्टी बांधकर तलवार से करतबबाजी दिखाई। वीडियो में दिख रहा है कि एक महिला आंख में पट्टी बांधकर कुछ महिलाओं की पीठ पर चढ़कर तलवार से करतब दिखा रही है।

‘तलवार रास’ में राजपूत महिलाएँ पारंपरिक कपड़े पहनती हैं। तलवार के साथ अपने कौशल का प्रदर्शन करते हुए पारंपरिक नृत्य करती हैं। राजकोट के शाही परिवार की राजकुमारी कादंबरी देवी ने कहा, “तलवार रास पिछले बारह वर्षों से आयोजित किया जा रहा है। हर साल एक नया समूह होता है और महिलाएँ पूरे उत्साह के साथ इस कार्यक्रम में भाग लेती हैं।”

कादंबरी देवी ने आगे कहा, “तलवार एक देवी की तरह है और इसलिए हम शस्त्र पूजा करते हैं।” यह आयोजन राजपूत महिला योद्धाओं के इतिहास को जीवित रखने और यह संदेश देने के लिए है कि आज की महिलाएँ उतनी ही शक्तिशाली हैं जितनी वे सालों पहले थीं।

तलवार रास की लिबरलों ने मुहर्रम से तुलना की

‘तलवार रास’ महिला सशक्तिकरण की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले लिबरल को पसंद नहीं आया। उन्होंने इसकी तुलना मुहर्रम से करते हुए इसे ‘संघी आतंकवाद’ तक कह डाला।

विडंबना यह है कि इस कार्यक्रम की आलोचना करने वाले लोगों को विदेशी ‘आत्मरक्षा‘ तकनीकों को बढ़ावा देने में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन पारंपरिक भारतीय कला और संस्कृति को देखकर वे भयभीत हो जाते हैं। बता दें कि गुजरात की लोक परंपराओं के विद्वान डॉ. उत्पल देसाई के अनुसार, तलवार रास राजपूत युद्ध नायकों की याद में बनाया गया था, जो भुचर मोरी (18 जुलाई, 1591) के ऐतिहासिक युद्ध में मारे गए थे।

उत्तराखंड, गुजरात के बाद क्या अब खट्टर का नंबर है

भारतीय जनता पार्टी ने कई राज्यों में गैर-प्रमुख जातियों के नेताओं को मुख्यमंत्री का पद सौंपा लेकिन हाल में हुए बदलावों को देखकर लगता है कि बीजेपी का हृदय परिवर्तन हो गया है। पिछले कुछ वर्षों में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पार्टी द्वारा मुख्यमंत्री को बदला जाना यह बताता है कि पार्टी ने जाति प्रमुख को महत्व देते हुए रणनीति में बदलाव किया है और इसी का कारण है कि विधानसभा चुनाव वाले राज्यों में चुनाव से पहले वहां की प्रमुख जाति के चेहरों को सीएम की कुर्सी पर बैठाया। उत्तराखंड और कर्नाटक के बाद सबसे ताजा उहादरण गुजरात का है, जहां भाजपा ने बहुसंख्यक और प्रभुत्वशाली पाटीदार समाज की मांग के आगे झुकते हुए मुख्यमंत्री विजय रूपाणी को पद से हटा दिया और भूपेंद्र पटेल को नया मुख्यमंत्री बनाया।

चंडीगढ़/नयी दिल्ली:

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को गुरुवार को अचानक दिल्ली बुलाया गया, जहां पर उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की है। मुख्यमंत्री खट्टर पीएम से मिलने उनके आवास पर पहुंचे हैं। दोनों नेताओं के बीच एक घंटे तक बैठक चली है। बताया जा रहा है कि इस दौरान वो गृह मंत्री अमित शाह सहित कई अन्य केंद्रीय मंत्रियों और आरएसएस के कुछ पदाधिकारियों से भी मुलाकात कर सकते हैं। हालांकि और मुलाकातों को लेकर खुद मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने इनकार किया है। कयास ऐसे भी लगाए जा रहे हैं कि क्या बीजेपी संगठन गुजरात के बाद अब हरियाणा में बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के बारे में खट्टर ने जानकारी दी। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री जी को उनके जन्मदिवस की पूर्व संध्या पर बधाई दी है। हरियाणा सरकार के नए इनीशिएटिव्स को लेकर पीएम मोदी जी से बातचीत हुई है। मेरी फसल मेरा ब्यौरा, मेरा पानी मेरी विरासत, सहित राइट टू सर्विस कमिशन, के सॉफ्टवेयर को लेकर और तमाम नए प्रोजेक्ट्स के बारे में प्रधानमंत्री को जानकारी दी है।

अपने दिल्ली दौरे को लेकर बोले सीएम खट्टर ने कहा कि दिल्ली दौरे पर और कुछ मुलाकातें नहीं हैं। गुड़गांव से होते हुए कल चंडीगढ़ के लिए वापसी होगी। करनाल की घटना और किसान आंदोलन को लेकर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से चर्चा हुई है। करनाल की घटना की जानकारी दी है. सुप्रीम कोर्ट ने जो रास्ता छोड़ने की बात की है उसकी कमेटी की जानकारी भी प्रधानमंत्री को दी है।

जानकारों की मानें तो बरोदा उपचुनाव में बीजेपी की हार और इसके अलावा निकाय चुनाव में बीजेपी की सोनीपत और अंबाला में हार हुई. किसान आंदोलन को लेकर हरियाणा बीजेपी बैकफुट पर नजर आई है। इसके अलावा मुख्यमंत्री मनोहर लाल और गृहमंत्री अनिल विज के बीच कई विवाद सामने आए हैं। दोनों के बीच का विवाद हाईकमान तक भी पहुंचा है।

हालांकि इस मुलाकात का एजेंडा सार्वजनिक नहीं हुआ है, चर्चा जोरों पर कि इस बार हरियाणा के मुख्यमंत्री बदल सकते हैं, इसके साथ ही हरियाणा में मंत्रिमंडल विस्तार हो सकता है। बता दें कि केंद्र सरकार 6 महीने के अंदर तीन बीजेपी शासित राज्यों के 4 मुख्यमंत्रियों को बदल चुकी है. इसकी शुरूआत हुई उत्तराखंड से हुई और बयार चलते-चलते गुजरात तक पहुंची। अब कयास लगाए जा रहे हैं कि ये हरियाणा का नंबर भी आ सकता है।

मुख्यमंत्री के रूप में भाजपा गैर-प्रमुख जाति के नेताओं को चुनने के लिए जानी जाती रही है. फिर चाहे बात हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल की हो या फिर महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की. इन दोनों नेताओं को नरेंद्र मोदी-अमित शाह नेतृत्व ने जाट और मराठा समुदायों के बाहर से चुना था. जिसमें से खट्टर अभी भी मुख्यमंत्री पद पर विराजमान हैं, हालांकि सियासी गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि 2024 में होने वाले हरियाणा विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा मुख्यमंत्री बदल सकती है और गुजरात के तर्ज पर यहां भी किसी जाति-समुदाय प्रमुख चेहरे को राज्य का सीएम बना सकती है. हालांकि, ये सिर्फ भी कयास भर है.

एक कथित ‘हिंदू विरोधी’ विज्ञापन के वायरल होने के बाद ट्विटर ने एक बार फिर #BoycottMyntra को ट्रेंड करते देखा।

व्यापार/वाणिज्य डेस्क चंडीगढ़:

@hindutvaoutloud नाम के एक इंस्टाग्राम पेज ने उन सभी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के बारे में एक पोस्ट किया, जिन्होंने ‘हिंदू-विरोधी’ उत्पाद और विज्ञापन डाले हैं। स्लाइड की शुरुआत एक विज्ञापन से होती है जिसमें भगवान कृष्ण को मिंत्रा पर लंबी साड़ी के लिए ऑनलाइन खरीदारी करते देखा जा सकता है क्योंकि पृष्ठभूमि में ‘द्रौपदी चीरहरण’ होता है।

विज्ञापन से नाराज कई लोगों ने ट्विटर पर शॉपिंग वेबसाइट Myntra का बहिष्कार किया।

हालांकि, उन्होंने जो कुछ याद किया वह “www.scrolldroll.com” एक छोटे से फ़ॉन्ट में लिखा गया था।

इस विज्ञापन ने 2016 में विवाद खड़ा कर दिया जब लोगों ने मान लिया कि यह Myntra का एक विज्ञापन है। हालाँकि, यह स्क्रॉलड्रोल की एक पोस्ट थी, जो यह जानना चाहता था कि अगर देवता 21वीं सदी की तकनीक का उपयोग करते तो क्या होता।

उस समय, मिंत्रा ने भी एक ट्वीट कर पुष्टि की थी कि यह विज्ञापन उनके द्वारा प्रकाशित नहीं किया गया था। स्क्रॉलड्रोल ने पहले इस विज्ञापन की जिम्मेदारी ली थी

हालाँकि, विज्ञापन 2021 में एक बार फिर ट्विटर पर वायरल हो गया है, जो हिंदुओं को नाराज कर रहा है जो न केवल Myntra का बहिष्कार कर रहे हैं बल्कि Flipkart को अनइंस्टॉल भी कर रहे हैं।

‘डिजायर’ का निर्माण अब गुजरात में, कॉंग्रेस काट रही बवाल

किसी भी प्रदेश में उद्योग रीढ़ की हड्डी का काम करते हैं। हरयाणा में फ़रीदाबाद मानेसर इस बात का गवाह हैं। मारुति उद्योग ने अपने उपस्थिती यहाँ अच्छे से दर्ज़ करवाई है। बावजूद पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा के शासन काल में हुई मारुति प्लांट हिंसा के जहां एक अधिकारी को ज़िंदा जला दिया गया था। मनेसार प्लांट अच्छे से काम कर रहा है। अभी हालिया रिपोर्ट के अनुसार मारुति सुज़ुकी अपना नया यूनिट गुजरात ले जाने को बाध्य है। कारण हरियाणा सरकार के कुछ नए नियम हैं जिनके अनसार उद्योग में 75% कामगार हरियाणा से ही होंगे, जो मारुति उद्योग को मान्य नहीं है।

व्यापार /उद्योग डेस्क, चंडीगढ़:

मारुति सुज़ुकी की ‘डिजायर’ प्लांट प्रशासनिक और कुछ पुराने कटु अनुभवों के चलते गुजरात ले जाया जा रहा है। कॉंग्रेस इसे खट्टर सरकार की नाकामी बता कर प्रचारित कर रही है। पूरे प्रदेश में कॉंग्रेस नेता आधे सच आ प्रचार कर रहे हैं वहीं यह बताना भूल रहे हाँ की मात्र 18000 करोड़ के निवेश के लिए खट्टर सरकार ने हरियाणा के हितों से कोई सम्झौता नहीं इया, यदि कर लिया होता तो विपक्ष हरियाणा ए यवाओं के हितों पर कुठाराघात की दुहाई देता

देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड (MSIL) भारत में एक लोकेशन पर सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल प्लांट बनाने के लिए 18,000 करोड रुपये का निवेश करने जा रही है। मारुति हरियाणा में नई फैक्ट्री बनाने जा रही है। मारुति की इस नई फैक्ट्री में सालाना 10 लाख से अधिक कार बन सकेगी।

मारुति सुजुकी के चेयरमैन आर सी भार्गव ने यह जानकारी दी है। मारुति सुजुकी के ग्रीन फील्ड लोकेशन में 700 से 1000 एकड़ जगह शामिल हो सकती है। यह वास्तव में मारुति सुजुकी की गुड़गांव की पहली फैक्ट्री के रिप्लेसमेंट की तरह काम कर सकता है।

नई यूनिट में बड़ा निवेश

मारुति सुजुकी हालांकि इस बात से चिंतित है कि हरियाणा सरकार ने एक नियम बनाकर स्थानीय लोगों के लिए 75 फ़ीसदी जॉब आरक्षित कर दिया है। मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड के चेयरमैन आर सी भार्गव ने कहा, “मारुति सुजुकी नए प्लांट के लिए ₹18000 का निवेश करने जा रही है। नई यूनिट से सालाना 10 लाख कारों का उत्पादन हो सकेगा। हम नई यूनिट के रूप में बड़ा निवेश करने जा रहे हैं।”

हरियाणा सरकार के नियम से दिक्कत

मारुति सुजुकी (Maruti Suzuki) की योजना जल्द ही नया यूनिट शुरू करने की है, लेकिन इसमें उसे कुछ दिक्कतें आ रही है। भार्गव ने कहा कि मारुति (Maruti Suzuki) के नए प्लांट की राह में सबसे पहले कोरोना संकट की वजह से आई। पिछले साल संकट की वजह से मारुति (Maruti Suzuki) की योजना ठंडे बस्ते में चली गई, अब इस पर दोबारा विचार किया जा रहा है। मारुति सुजुकी (Maruti Suzuki) के नए प्लांट लगाने की राह में कई बाधाएं है। हरियाणा सरकार के स्थानीय लोगों को जॉब देने के फैसले से नई यूनिट लगाने में समस्या आ सकती है।

गुरुग्राम प्लांट में जगह की कमी

मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड के चेयरमैन आर सी भार्गव ने कहा, “हरियाणा सरकार द्वारा स्थानीय लोगों के लिए नौकरियों में 75 फ़ीसदी आरक्षण के मुद्दे पर कई उद्योग केंद्र सरकार से चर्चा कर चुके हैं। हरियाणा सरकार के इस कदम से राज्य में निवेश या प्रतियोगी क्षमता को बढ़ावा देने में मदद मिलने की उम्मीद नहीं है। पूरा उद्योग जगत यह मानता है और इस बारे में सरकार से बातचीत हो चुकी है।” भार्गव ने कहा कि मारुति सुजुकी गुरुग्राम प्लांट को जगह की दिक्कत की वजह से दूसरी जगह शिफ्ट करना चाहती है। स्थानीय लोगों को मारुति की यूनिट के कामकाज की वजह से काफी समस्याएं आ रही है और कंपनी इससे बचना चाहती है।

मॉडल का निर्माण अलग जगह होगा

देश की सबसे बड़ी कार कंपनी मारुति सुजुकी इंडिया कॉम्पैक्ट सेडान डिजायर के उत्पादन के स्थानांतरण के जरिये न तो निवेश और न ही रोजगार हरियाणा से गुजरात लेकर जा रही है। मारुति सुज़ुकी के चेयरमैन आर सी भार्गव ने इस बारे में स्थिति साफ की। कंपनी ने कहा है कि वह हरियणा के अपने दो संयंत्रों तथा मूल कंपनी सुजुकी के गुजरात कारखाने में अपने उत्पादन की दक्षता को अधिकतम कर रही है। मारुति यह कदम विभिन्न मॉडलों की मांग के मद्देनजर उठा रही है।

हरियाणा के यूनिट चालू रहेंगे

भार्गव ने कहा, ‘‘हरियाणा के मारुति संयंत्र अपनी पूरी क्षमता पर परिचालन करते रहेंगे। रोजगार पूरा रहेगा, इसमें कोई बदलाव नहीं होगा। गुरुग्राम से कोई उत्पादन बंद होने नही जा रहा है। यदि डिजायर यहां से जाती है, तो किसी अन्य मॉडल का यहां उत्पादन होगा। यह कारोबार को सुसंगत बनाने का तरीका है कि कैसे हम सबसे अधिक दक्ष तरीके से मारुति के विभिन्न मॉडल का उत्पादन कर सकते हैं।’’

भाजपा और कांग्रेस चाहे जितनी कोशिशें कर लें अरविंद केजरीवाल को बदनाम नहीं कर सकती: योगेश्वर शर्मा

  • योगेश्वर शर्मा ने कहा: राजनीति छोडक़र तीसरी लहर से निबटने का इंतजाम करना चाहिए
  • भाजपा और कांग्रेस देश को गुमराह करने के लिए माफी मांगे

पंचकूला,26 जून:

आम आदमी पार्टी का कहना है कि  केंद्र की भाजपा सरकार और जगह जगह चारों खाने चित्त हो रही कांग्रेस अरविंद केजरीवाल को बदनाम करने की लाख कोशिशें कर लें,सफल नहीं होंगी। पार्टी का कहना है कि दिल्ली के लोग जानते हैं कि केजरीवाल उनके लिए लड़ता है और उनकी खातिर इन मौका प्रस्त पार्टियों के नेताओं की बातें भी सुनता है। यही वजह है कि दिल्ली की जनता ने तीसरी बार भी उन्हें सत्ता सौंपी तथा भाजपा को विपक्ष में बैठने लायक और कांग्रेस को कहीं का नहीं छोड़ा। आने वाले दिनों में यही हाल इन दोनों दलों का पंजाब मेें भी होने वाला है। इसी के चलते अब दोनों दल आम आदमी पार्टी व इसके मुखिया अरविंद केजरीवाल को निशाना बना रहे हैं।  पार्टी का कहना है कि अब तो इस मामले के लिए बनाई गई कमेटी  के अहम सदस्य एवं एम्स के प्रमुख डॉ. रणदीप गुलेरिया ने कहा है कि अब तक फाइनल रिपोर्ट नहीं आई है। ऐसे यह कहना जल्दबाजी होगी कि दिल्ली ने दूसरी लहर के पीक के वक्त जरूरी ऑक्सीजन की मांग को चार गुना बढक़र बताया। उन्होंने कहा कि मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में है, ऐसे में हमें जजमेंट का इंतजार करना चाहिए। ऐसे में अरविंद केजरीवाल को निशाना बनाने वाले भाजपा एवं कांग्रेस के नेता जनता को गुमराह के करने के लिए देश से माफी मांगे।
 आज यहां जारी एक ब्यान में आप के उत्तरी हरियाणा के सचिव योगेश्वर शर्मा ने कहा कि भाजपा और कांग्रेसी नेताओं को शर्म आनी चाहिए कि वे उस अरविंद केजरीवाल पर आरोप लगा रहे हैं जो अपने लोगों के लिए दिन रात एक करके काम करता है और उसने कोरोनाकाल में भी यही किया था। उन्होंने कहा कि देश की राजधानी दिल्ली में कोविड की दूसरी लहर जब अपने चरम पर थी तो यहां ऑक्सीजन की मांग में भी बेतहाशा वृद्धि हो गई थी। चाहे सोशल मीडिया देखें या टीवी चैनल हर जगह लोग अप्रैल और मई माह में ऑक्सीजन की मांग कर रहे थे। कई अस्पताल और यहां तक कि मरीजों के तीमारदार भी ऑक्सीजन की मांग को लेकर कोर्ट जा पहुंचे थे। उन्होंने कहा है कि अरविंद केजरीवाल ठीक ही तो कह रहे हैं कि उनका गुनाह यह है कि वह दिल्ली के  2 करोड़ लोगों की सांसों के लिए लड़े और वह भी उस समय जब  भाजपा और कांग्रेस के नेता चुनावी रैली कर रहे थे। तब भाजपा के दिल्ली के सांसद अपने घरों में छिपे बैठे थे। उन्होंने कहा कि दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने ठीक ही तो दावा किया है कि जिस रिपोर्ट के आधार पर अरङ्क्षवद केजरीवाल को बदनाम किया जा रहा है, वह है ही नहीं। है तो उसे सार्वजनिक करना चाहिए। उन्होंने कहा कि दरअसल भाजपा का आईटी सैल अरङ्क्षवद केजरीवाल के पंजाब दौरे के बाद से ही बौखलाया हुआ है, क्योंकि पंजाब में उसका आधार खत्म हो चुका है और आप पंजाब के साथ साथ अब गुजरात में भी सफलता के परचम फैला रही है। पंजाब व गुजरात में भाजपा के लोग आप का दामन थाम रहे हैं। ऐसे में उसे व कांग्रेस को आने वाले विधानसभा चुनावों में अगर किसी से खतरा है तो वह अरङ्क्षवद केजरीवाल और उनकी पार्टी आप से है। उन्होंने कहा कि ये पार्टियां और उनके नेता उन लोगों को झूठा बताकर उनका अपमान कर रहे हैं जिन लोगों ने अपनों को खोया है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को देश में अपने पोस्टर लगवाने के बजाये कोविड-19 की तीसरी लहर के खतरे से निपटने की तैयारियों पर ध्यान देना चाहिए।  उन्होंने प्रधानमंत्री को सचेत किया के स्वास्थ्य विशेषज्ञ तीसरी लहर की चेतावनी दे रहे हैं, इसलिए यह आराम का वक्त नहीं है, बल्कि सरकार को अग्रिम प्रबंध करने चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसा न हो कि जिस तरह केंद्र सरकार के दूसरी लहर से पहले के ढीले व्यवहार के कारण हजारों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी, वैसा ही तीसरी लहर के बाद हो। उन्होंने सरकार को वायरस के बदलते स्वरूप की तुरंत वैज्ञानिक खोज कर विशेषज्ञों की राय के अनुसार सभी इंतजाम करने को कहा। उन्होंने कहा कि अपनी नाकामियों का ठीकरा अरविंद केजरीवाल पर फोडऩे से काम नहीं चलेगा। काम करना होगा क्योंकि देश के लोग देख रहे हैं कि कौन काम कर रहा है और कौन ऐसी गंभीर स्थिति में भी सिर्फ राजनीति कर रहा है।

स्वतंत्र भारत के इतिहास का काला अध्याय ‘आपातकाल’

46 साल पहले भारत ने आपातकाल का अनुभव किया भारतीय इतिहास का काला अध्याय राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता से निपटने के बजाय भारत पर इमरजेंसी ठोक देना और लोकतांत्रिक शक्तियों का दमन करना ज्यादा आसान लगा। ऐसा भी नहीं था कि 25 जून की रात अचानक से आपातकाल की घोषणा कर दी गई थी। इसके पीछे एक बड़ी रणनीति थी. देश की जनता पर आपातकाल थोपने का मकसद सत्ता में बने रहना का तो था ही इससे भी अधिक खतरनाक मंशा तत्कालीन हुकुमत की थी। हमें उस पक्ष पर भी  चर्चा करनी चाहिए, जिसके कारण देश के लोकतंत्र को एक परिवार ने बंदी बना लिया। दरअसल लोकतंत्र की हत्या करके ही जो चुनाव जीता हो उसे लोकतंत्र का भान कैसे रह जाएगा ? लोकतंत्र की उच्च मर्यादा की उम्मीद उनसे नहीं की सकती, जो जनमत की बजाय धनमत और शक्ति का दुरुपयोग करके सत्ता पर काबिज होने की चेष्टा करें।

सारिका तिवारी,(inputs by) पुरनूर – चंडीगढ़ 26 जून:

देश में आपातकाल की नींव इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले से पड़ गई थी जिसमें अदालत ने राजनारायण के पक्ष और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ अपना फैसला सुनाया था। अदालत के फैसले से पहले 12 जून 1975 की सुबह इंदिरा गांधी अपने असिस्टेंट से पूछती हैं। आज तो रायबरेली चुनाव को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आना है। इस पर वहां मौजूद इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी कहते हैं, “आप बेफिक्र रहिए।” संजय का तर्क था कि इंदिरा की सांसदी को चुनौती देने वाले संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राजनारायण के वकील भूषण नहीं थे। जबकि इंदिरा के वकील एसी खरे ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि फैसला उनके ही पक्ष में आएगा। कांग्रेसी खेमा पूरी तरह से आश्वस्त था, लेकिन उस दिन जो हुआ वो इतिहास बन गया। जस्टिस जगमोहन सिन्हा ने इंदिरा के खिलाफ अपना फैसला सुना दिया। जज ने इंदिरा गांधी को चुनावों में धांधली करने का दोषी पाया और रायबरेली से सांसद के रूप में चुनाव को अवैध घोषित कर दिया। साथ ही इंदिरा के अगले 6 साल तक चुनाव लड़ने पर भी रोक लगा दी गई। हाईकोर्ट से मिले इंदिरा को झटके के बाद कांग्रेसी खेमा स्तब्ध रह गया तो राज नारायण के समर्थक दोपहर में दिवाली मनाने लगे।

पार्टी की अस्थिरता को दरकिनार कर स्वयं का वर्चस्व की रक्षा हेतु उस समय की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को संविधान की धारा 352 के तहत राष्ट्र आपात काल घोषित करना पड़ा। कहीं नौकरशाही और सरकार के बीच का संघर्ष, कभी विधान पालिका और न्यायपालिका के बीच विवाद, केशवानंद भारती और गोरखनाथ केस इन विवादों के साक्ष्य हैं। इससे पहले के चुनाव देखें तो कांग्रेस लगातार आज ही की तरह अपने ही अंतर कलह की वजह से सीटे गवाती रही। कई हिस्सों में बटी कांग्रेस का कांग्रेस (आर) इंदिरा के हिस्से आया जब इंदिरा गांधी ने कम्युनिस्ट पार्टी से मिलकर सरकार बनाई पार्टी का यह हाल हो गया था कि सिंडिकेट के दिग्गज भी अपनी सीटें ना बचा पाए। इंदिरा गांधी के कट्टर विरोधी मोरारजी देसाई ने पार्टी छोड़ी और इंदिरा को कमजोर करने में जुट गए। दूसरी और नीलम संजीवा रेड्डी, कामराज, निजा लिंगप्पा पूरी तरह से इंदिरा विरोधी थे। निजालिंगप्पा ने इंदिरा को पार्टी तक से निकाल दिया था।

इमरजेंसी के जो बड़े कारण बने वह है महंगाई, इंदिरा की कई मनमानियां, विद्यार्थियों का असंतोष, जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में रेलवे की हड़ताल, जयप्रकाश नारायण का ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा।

सुब्रह्मण्यम स्वामी, ‘जिंदा या मुर्दा’

इमरजेंसी के दौरान इंदिरा ने बहुत मनमानियां की निरंकुश ढंग से अपने विरोधियों को कुचला, जॉर्ज फर्नांडिस तो कई साल जेल में ही रहे। उन्होंने तो चुनाव भी जेल से लड़ा सुब्रह्मण्यम स्वामी के ‘जिंदा या मुर्दा’ के वारंट जारी किए गए अखबारों पर अंकुश लगाया गया कि वह जनता की बात जनता तक ना पहुंचा पाएँ। लेकिन कुछ अखबारों ने पोस्ट खाली छोड़ कर सरकार का विरोध भी किया।

इस सब में संजय गांधी अपने मित्रों के साथ पूरी तरह से सक्रिय होकर उतरे मनमानीयों के लिए। कुछ नवनियुक्त पुलिस अधिकारी जिनमें किरण बेदी, गौतम कौल और बराड़ आदि भी शामिल थे, इन्होंने एक बार इन पर लाठीचार्ज भी किया जिसका खामियाजा इन्हे आपातकाल के हटने के बाद भी कई वर्षों तक भुगतना पड़ा। पड़ा। कई वर्षों तनख्वाह के बिना नौकरी की।

इमरजेंसी की मियाद खत्म होने संविधान में संशोधन किया गया संविधान की प्रस्तावना में सेक्यूलर शब्द शामिल किए गए सबसे बड़ी बात इस संशोधन में यह की गई के न्यायपालिका संसद द्वारा पारित किसि भी कानून को गलत नहीं ठहरा सकती।

आपातकाल की काली रात 19 महीने लंबी थी और इस लंबे वक्त तक देश का लोकतंत्र कोमा में रहा। जनता के अधिकार, लिखने बोलने की आजादी सब आपातकाल की जंजीरों में जकड़ी हुई थी। आपातकाल के दौरान इंदिरा के बेटे संजय गांधी की हनक थी। जबरन नसबंदी जैसे तानाशाही फैसलों ने जनता को परेशान कर दिया था। जनवरी के महीने में आपातकाल हटाने के फैसले के साथ-साथ राजराजनीतिक बंदियों को रिहा करने के आदेश दिए गए और आम चुनाव की घोषणा की गई। इंदिरा को लगने लगा था कि वो प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाएंगी, लेकिन जनता ने कुछ और ही सोच रखा था। 1977 के आम चुनाव में कांग्रेस की बुरी तरह हार हुई। इंदिरा गांधी.. संजय गांधी समेत तमाम नेता हारे और हार गई तानाशाही…
यह थी 1975 की इमरजेंसी और उसके परिणाम

ऑडिट रिपोर्ट को सीसोदिया ने दी चुनौती, केजरीवाल ने झाड़ा पल्ला, 12 राज्यों में हुई हत्याओं का दोषी कौन?

दिल्ली में ऑक्सीजन के मुद्दे पर गठित सुप्रीम कोर्ट के एक पैनल ने जब अपनी रिपोर्ट पेश की तो आम आदमी पार्टी (आआपा) सरकार पूरी तरह उखड़ गई। बीजेपी की तरफ से सवाल हुआ तो डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने रिपोर्ट को ‘तथाकथित’ कहते हुए रिपोर्ट पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया। इस केस में सीएम अरविंद केजरीवाल ने यह कह कर कि वो दो करोड़ लोगों की लड़ाई लड़ रहे थे रिपोर्ट पर जवाबदेई से पल्ला झाड लिया। अब इस पूरे मामले पर सिर्फ और सिर्फ राजनीति होगी। कानून प्रावधान क्या होने चाहिए और क्या होंगे न तो इस पर चर्चा होगी न ही कोई बनती कार्यवाई। 12 राज्यों में प्राण दायिनी ऑक्सिजन की कमी से जो हत्याएँ हुईं उनको कभी भी न्याय नहीं मिलेगा।

कोरोना की दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन संकट को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त किए गए ऑडिट पैनल ने अपनी रिपोर्ट दी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जब पूरा देश मेडिकल ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए संघर्षरत था, तब अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व वाली दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार ने 4 गुणा अधिक ऑक्सीजन की माँग की थी।

इस दौरान राजनैतिक लाभ लेने के उद्देश्य से मुख्यमंत्री केजरीवाल और उनके मंत्रियों ने लगातार यह कहा था कि दिल्ली को उचित मात्रा में ऑक्सीजन नहीं प्राप्त हो रही है, इसके कारण दिल्ली को आवश्यकता से अधिक ऑक्सीजन प्रदान करनी पड़ी। यह सब तब हुआ जब बाकी राज्य लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन के लिए लगातार प्रतीक्षा कर रहे थे।

ऑडिट पैनल की रिपोर्ट में PESO के द्वारा किए गए अध्ययन को शामिल किया गया है। इसमें यह बताया गया है कि राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड और पंजाब जैसे राज्य टैंकर और कंटेनर की कमी से जूझ रहे थे, वहीं दिल्ली के 4 कंटेनर सूरजपुर आईनॉक्स में खड़े थे। ये कंटेनर इसलिए खड़े थे, क्योंकि दिल्ली में आपूर्ति आवश्यकता से ज्यादा थी और लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन को स्टोर करने की कोई जगह नहीं थी। इस रिपोर्ट में यह स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि दिल्ली द्वारा जितनी ऑक्सीजन की माँग की जा रही थी, वास्तविक आवश्यकता उससे कहीं कम थी।

अब चूँकि दिल्ली के अस्पतालों में आवश्यकता से अधिक ऑक्सीजन उपलब्ध थी। इसलिए ऑक्सीजन निस्तारण में अधिक समय लगने लगा। इससे रिलायंस जैसे अपूर्तिकर्ताओं को भी अपने कंटेनर प्राप्त करने और उन्हें रिफिल करके भेजने में औसत से अधिक समय लग गया।

अंतरिम रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दिल्ली न तो ऑक्सीजन के वास्तविक उपयोग का ऑडिट कर रही थी, न ही इसकी वास्तविक माँग का आकलन कर रही थी। इससे केंद्र सरकार उत्तरी भारत के अन्य राज्यों को ऑक्सीजन आवंटित कर सकने में असमर्थ थी, जहाँ अस्पतालों में लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन (LMO) की वास्तविक आवश्यकता थी।

ऑडिट पैनल की रिपोर्ट के अनुसार, 5 मई से 11 मई के बीच पेट्रोलियम एंड ऑक्सीजन सेफ्टी ऑर्गनाइजेशन (PESO) द्वारा किए गए अध्ययन में यह भी पाया गया था कि दिल्ली के लगभग 80% प्रमुख अस्पतालों में 12 घंटे से अधिक समय तक LMO का स्टॉक था। औसत दैनिक खपत 282 मीट्रिक टन से 372 मीट्रिक टन के बीच पाई गई और दिल्ली में उस समय मांग की जा रही 700 मीट्रिक टन LMO के लिए पर्याप्त भंडारण सुविधाएँ नहीं थीं।

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली आआपा सरकार द्वारा LMO की कमी का दावा किया गया था। उसके बाद जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार को दिल्ली को 700 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की आपूर्ति बनाए रखने का निर्देश दिया था। वहीं, केंद्र ने विशेषज्ञों के सुझाव के आधार पर 415 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की आपूर्ति निश्चित करने की बात कही थी।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 9 मई से केजरीवाल की आआपा सरकार पड़ोसी राज्यों में वैकल्पिक भंडारण स्थान प्राप्त करने की कोशिश कर रही थी क्योंकि उनके पास LMO के लिए भंडारण स्थान समाप्त हो गया था। दिल्ली की आआपा सरकार ने भंडारण सुविधाओं की कमी के कारण एयर लिक्विड कंपनी से आवंटित LMO (150 एमटी) की तुलना में कम मात्रा में ऑक्सीजन उठाई थी। केजरीवाल सरकार ने कंपनी से पानीपत और रुड़की में अपने संयंत्रों में उनके लिए LMO स्टोर करने के लिए भी कहा था।

इतना ही नहीं, दिल्ली की आआपा सरकार के कारण ओडिशा में लिंडे और JSW झारसुगुड़ा जैसे संयंत्रों को अपने टैंकर होल्ड करने और अन्य राज्यों को आपूर्ति में देरी करने के लिए मजबूर होना पड़ा था। दरअसल, दिल्ली में आआपा सरकार ने उपलब्ध और आवंटित ऑक्सीजन टैंकरों का उपयोग ही नहीं किया अथवा अस्पतालों में स्टोरेज की अनुपस्थिति के कारण टैंकर वापस कर दिए गए। गोयल गैसेस ने सूचित किया था कि दिल्ली के अस्पतालों के पास आवश्यक ऑक्सीजन उपलब्ध है और उनके पास कोई अतिरिक्त भंडारण सुविधा उपलब्ध नहीं है इसलिए उनके टैंकर लंबे समय तक इंतजार करते रहे जिसके परिणामस्वरूप अन्य राज्यों को ऑक्सीजन आपूर्ति में कमी हो गई।

दिल्ली में केजरीवाल की आआपा सरकार ने केंद्र सरकार पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए बड़े पैमाने पर हंगामा किया और दिल्ली की ऑक्सीजन को रोके रखने के लिए अन्य राज्यों को भी जिम्मेदार ठहराया था। केजरीवाल ने तो प्रोटोकॉल को भी तोड़ा और पीएम मोदी के साथ मुख्यमंत्रियों की गोपनीय बैठक के वीडियो फुटेज को टीवी पर दिखा दिया। मीटिंग में उन्हें यह कहते हुए देखा गया कि दिल्ली को ऑक्सीजन की बहुत अधिक जरूरत है। दिल्ली सरकार का राजनैतिक और मीडिया का ड्रामा इतना अधिक हो गया था कि अंततः सुप्रीम कोर्ट को इसमें दखल देना पड़ा।

अब प्रश्न यह हा कि तब दिल्ली ऑक्सिजन की कमी का स्वत: संगयान लेने वाले न्यायालय अब आआपा की इस रिपोर्ट पर या कार्यवाई कराते हैं या फिर अब शास्त्र मौन हैं

हिंदुत्व का बड़ा चेहरा बने योगी, मोदी और शाह के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं

राजनीतिक जगत में इस बात की भी चर्चा है कि योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाना बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शीर्ष नेताओं को अब ऐसा फ़ैसला समझ में आ रहा है, जिसे अब बदलना और बनाए रखना, दोनों ही स्थितियों में घाटे का सौदा दिख रहा है।  दूसरे, पिछले चार साल के दौरान बतौर मुख्यमंत्री, योगी आदित्यनाथ की जिस तरह की छवि उभर कर सामने आई है, उसके सामने चार साल पहले के उनके कई प्रतिद्वंद्वी काफ़ी पिछड़ चुके हैं।  यहां तक कि पिछले दो हफ़्ते से आरएसएस और बीजेपी के तमाम नेताओं की दिल्ली और लखनऊ में हुई बैठकों के बाद यह माना जा रहा था कि शायद अब यूपी में नेतृत्व परिवर्तन हो जाए लेकिन बैठक के बाद वो नेता भी योगी आदित्यनाथ की तारीफ़ कर गए जिन्होंने कई मंत्रियों और विधायकों के साथ आमने-सामने बैठक की और सरकार के कामकाज का फ़ीडबैक लिया। 

करणीदानसिंह राजपूत, सूरतगढ़:

भाजपा शासित राज्यों में विरोध की दशा दिशा में अभी तो केवल मोदी के नाम के सहारे ही लड़ने और जीतने की संभावना मानते हुए राज्यों के चुनाव में उतरेंगे मगर मोदी-शाह की सबसे बड़ी मुश्किल है कि योगी उनके लिए एक चुनौती बनते जा रहे हैं। योगी फिर से जीते तो मोदी के लिए बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। क्योंकि हिंदू नेता के तौर पर योगी इस समय भाजपा का सबसे लोकप्रिय चेहरा माने जाते हैं। 

यूपी की दशा दिशा सब के सामने आ चुकी है।

सीएम योगी आदित्यनाथ दिल्ली में आकर पीएम और गृह मंत्री से भेंट कर चुके हैं। केंद्र की टीम लखनऊ में डेरा लगाकर  हल निकालने की जुगत में बैठी है लेकिन  बीच का रास्ता नहीं निकल पा रहा है। योगी भारी पड़ रहे हैं और केंद्र की टीम वहां बिना भार का रूई का गोला साबित हो रही है।

बंगाल चुनाव में मिली हार के बाद पीएम मोदी और अमित शाह की जोड़ी को सबसे बड़ी ठेस भी पहुंची है की भाजपा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वापस टीएमसी में शामिल हो गया। चाहे वह टीएमसी से ही आए थे लेकिन भाजपा से गए जब राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का पद था। संगठन में एक पद नीचे यानि दूसरे क्रम पर थे। मोदी शाह से समकक्ष नहीं तो कुछ छोटा।

यह मामूली तो नहीं कहा जा सकता। इसके बाद बंगाल में जो टीएमसी छोड़कर भाजपा में शामिल हुए लोगों का वापस टीएमसी में लौटने का तूफान मचा है। समाचारों में तो यह संख्या बड़ी है। चुनाव के समय रोजाना ममता को झटका लगने का समाचार खूब प्रचारित किये जाते रहे जब टीएमसी छोडकर भाजपा में शामिल होते। इतना करने के बावजूद राज मिलने तक की संख्या तक नहीं पहुंच पाए। ममता को नीचा दिखाने के लिए भाजपा के राष्ट्रीय चेहरे अपने पद और कद से बहुत नीचे उतरे। अब भाजपा को रोजाना झटके लग रहे हैं।

बंगाल में राज नहीं मिलने पर जो कमजोरी आई है उससे राज्यों में चुनौती मिलने लगी है। भाजपा शासित राज्यों  में जो विरोध के स्वर देखने को मिल रहे हैं वो नेताओं की चिंता बढ़ाने के लिए काफी हैं। सबसे मुश्किल ये है कि विरोध केवल हिंदी भाषी राज्यों में नहीं है बल्कि दक्षिण तक पहुंच चुका है। चिंता केवल इतनी ही नहीं है। 

कर्नाटक में भी मुख्यमंत्री येदियुरप्पा केंद्रीय नेतृत्व को आंखें दिखा रहे हैं। वहां एक धड़ा उनके विरोध में सामने आ चुका है। केंद्रीय नेतृत्व चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहा, क्योंकि मुख्यमंत्री लिंगायत समुदाय के बड़े नेता हैं। उन्हें नाराज करने का मतलब होगा इस समुदाय को नाराज करना। कर्नाटक भाजपा के लिए अहम इस वजह से भी है क्योंकि दक्षिण में ये अकेला राज्य है जहां भाजपा अपने दम पर खड़ी है।

प्रधानमंत्री के गृह राज्य गुजरात के हालात भी ठीक नहीं हैं। वहां मुख्यमंत्री विजय रूपाणी और पार्टी अध्यक्ष सीआर पाटिल के बीच सिर फुटौव्वल चल रही है। पाटिल को मोदी का नजदीकी माना जाता है। कोरोना मामले पर मुख्यमंत्री के साथ उनकी तनातनी अब जगजाहिर हो चुकी है। केंद्रीय नेतृत्व के लिए ये बड़ी चिंता का मामला है। दोनों की तनातनी में गुजरात के उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल अपने लिए मौका तलाश रहे हैं। वो मुख्यमंत्री बनने के लिए गुणाभाग कर रहे हैं।

गोवा में भाजपा के नेता और मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत के खिलाफ उनकी ही कैबिनेट ने मोर्चा खोल रखा है। गोवा में भी उत्तर प्रदेश के साथ अगले साल चुनाव होना है। केंद्र ने वहां के हालात सुधारने का जिम्मा बीएल संतोष को दिया है। नतीजा देखना रोचक होगा।

बंगाल में हार के बाद किस तरह की भगदड़ भाजपा में मची है, ये बात जगजाहिर हो चुकी है। भाजपा चाहकर भी अपने लोगों को रोकने में नाकाम साबित हो रही है। त्रिपुरा में भी हालात काबू से बाहर होते जा रहे हैं। मध्य प्रदेश में भी हालात ठीक नहीं हैं। बंगाल से मात खाकर लौटे कैलाश विजय वर्गीय के बारे में कहा जा रहा है कि वो शिवराज को हटाकर खुद मुख्यमंत्री बनने के जुगाड़ में हैं। 

भाजपा की दशा दिशा शोचनीय होने पर भी माना जा रहा है कि असंतोष से कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है राज्यों में चुनाव जीतने के लिए प्रधानमंत्री मोदी का नाम ही काफी रहेगा।

साथियों के जाने का दु:ख है : मिलिंद

मिलिंद देवड़ा ने जितिन प्रसाद के भाजपा में शामिल होने पर ट्वीट कर कांग्रेस के मौजूदा नेतृत्व पर एक तरह से सवाल उठाया। उन्होंने लिखा, मेरा मानना है कि कांग्रेस को अपनी पुरानी स्थिति पाने के लिए प्रयास करना चाहिए। देश की बड़ी पार्टी के तौर पर वह यह कर सकती है और करना ही चाहिए। हमारे पास अब भी ऐसे नेता हैं जिन्हें अगर सशक्त किया जाए और बेहतरीन ढंग से इस्तेमाल किया जाए तो वे नतीजे दे सकते हैं। मैं सिर्फ यह चाहता हूं कि काश ! मेरे कई मित्रों, सम्मानित साथियों और मूल्यवान सहयोगियों ने हमारा साथ नहीं छोड़ा होता।

  • जितिन प्रसाद के बाद मिलिंद देवड़ा ने बढ़ाई कांग्रेस की मुसीबत
  • देवड़ा ने गुजरात सरकार के कामकाज की ट्विटर पर की तारीफ
  • कांग्रेस के कई युवा नेताओं की नाराजगी के अटकलों को मिली हवा

सारिका तिवारी, चंडीगढ़:

कांग्रेस पार्टी में 20 साल गुजारने के बाद आखिरकार पूर्व केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद ने बुधवार को बीजेपी का दामन थाम लिया। हालिया पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के समय कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी रहे प्रसाद को उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के एक युवा ब्राह्मण नेता के तौर पर देखा जाता था। प्रसाद के जाने से एक बार फिर से कांग्रेस में कई युवा नेताओं की नाराजगी और पाला बदलने की अटकलों को हवा मिल गई है। सचिन पायलट और मिलिंद देवड़ा ऐसे नेताओं में शामिल हैं जिनकी नाराजगी की चर्चा इन दिनों हो रही है। इस बीच, मिलिंद देवड़ा ने गुजरात सरकार के कामकाज की तारीफ कर कांग्रेस की चिंता और बढ़ा दी है।

दरअसल, कोरोना महामारी की वजह से पिछले एक साल से गुजरात में होटल इंडस्‍ट्री, रेस्‍टोरेंट, रिजार्ट और वॉटर पार्क बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। आर्थिक नुकसान को देखते हुए मुख्‍यमंत्री विजय रूपाणी ने उनका पिछले एक साल का प्रॉपर्टी टैक्‍स और बिजली बिल माफ करने का फैसला लिया है। कांग्रेस नेता मिलिंद देवड़ा ने अपने ट्विटर अकाउंट पर यह खबर शेयर करते हुए गुजरात सरकार की तारीफ की है। उन्‍होंने लिखा है- ‘दूसरे राज्‍यों के अनुकरण के लिए एक स्वागत योग्य कदम। यदि हम भारत के आतिथ्य क्षेत्र में और नौकरियों के नुकसान को रोकना चाहते हैं तो सभी राज्यों को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए।’

‘काश, हमारे साथियों ने साथ न छोड़ा होता’
दूसरी ओर, मिलिंद देवड़ा ने अपने पूर्व सहयोगी जितिन प्रसाद के बीजेपी में जाने पर भी प्रतिक्रिया जताई है। उन्‍होंने ट्विटर पर लिखा है- ‘मेरा मानना है कि कांग्रेस को अपनी पुरानी स्थिति पाने के लिए प्रयास करना चाहिए। देश की बड़ी पार्टी के तौर पर वह यह कर सकती है और करना ही चाहिए। हमारे पास अब भी ऐसे नेता हैं जिन्हें अगर सशक्त किया जाए और बेहतरीन ढंग से इस्तेमाल किया जाए तो वे नतीजे दे सकते हैं। मैं सिर्फ यह चाहता हूं कि काश मेरे कई मित्रों, सम्मानित साथियों और मूल्यवान सहयोगियों ने हमारा साथ नहीं छोड़ा होता।’

दरक रही है कांग्रेस की युवा ब्रिगेड
गौरतलब है कि मिलिंद देवड़ा, जितिन प्रसाद, ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट कभी कांग्रेस की युवा ब्रिगेड माने जाते थे। उन्होंने केंद्र में पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार में भी काम किया था। सिंधिया और प्रसाद अब बीजेपी में हैं, जबकि पायलट और देवड़ा पार्टी में कुछ मुद्दों पर परेशान दिखते हैं और बार-बार सुधार की मांग करते हैं। जितिन प्रसाद उन 23 नेताओं में शामिल थे, जिन्होंने पिछले साल कांग्रेस में सक्रिय नेतृत्व और संगठनात्मक चुनाव की मांग को लेकर पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखी थी।