रॉबर्ट वाड्रा कोरोना संक्रमित, महाराष्ट्र आघाडी सरकार द्वारा लॉक डाउन की कवायद तेज़

देश के जाने माने बिजनेसमैन और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा का कोरोना टेस्ट पॉजिटिव आया है। प्रियंका गांधी ने एक वीडियो शेयर करके इस बात की जानकारी दी है। हालांकि प्रियंका गांधी की कोरोना रिपोर्ट नेगेटिव पाई गई है। प्रियंका गांधी ने कहा है कि रॉबर्ट के पॉजिटिव पाए जाने के बाद मैंने अपना असम का दौरा रद्द कर दिया हैमैं अब आइसोलेशन में रहूंगी।

दिल्ली/पुणे:

देश में कोरोना वायरस का संक्रमण फिर से बढ़ता जा रहा है। पिछले 24 घंटों में देश में 81,000 नए मामले आए हैं। राज्यों की बात करें तो सबसे खराब स्थिति में महाराष्ट्र है, जहाँ शुक्रवार (02, अप्रैल) को लगभग 47,000 नए संक्रमित मिले हैं और 202 मरीजों की मृत्यु हुई है। महाराष्ट्र में अब पुनः लॉकडाउन की स्थिति निर्मित हो रही है।

महाराष्ट्र में बढ़ते संक्रमण के बीच मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का बयान भी सामने आया है। ठाकरे ने कहा है कि यदि महाराष्ट्र में संक्रमण की ऐसी ही स्थिति बनी रही तो वे लॉकडाउन की स्थिति इनकार नहीं करेंगे। इसका मतलब हुआ कि यदि महाराष्ट्र में आने वाले कुछ दिनों में संक्रमण की रफ्तार कम नहीं हुई तो एक बार फिर लॉकडाउन लग सकता है। महाराष्ट्र में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से संबंधित खबरों पर उद्धव ने कहा कि यदि संक्रमण की स्थिति ऐसी ही बनी रही तो अगले 15-20 दिनों में स्वास्थ्य सुविधाओं में कमी आ जाएगी। मुंबई शहर में भी आठ हजार से अधिक नए संक्रमित मिले हैं और 20 मरीजों की मौत हुई है।

महाराष्ट्र के पुणे शहर में कल (3 अप्रैल) से मिनी लॉकडाउन प्रारंभ हो रहा है। अगले सात दिनों तक पुणे में रेस्टोरेंट, सिनेमाघर, मॉल और धार्मिक स्थल पूरी तरह से बंद रहेंगे। साथ ही अगले सात दिनों के लिए पुणे में शाम को 6 बजे से सुबह 6 बजे तक कर्फ्यू लगा रहेगा। पिछले दो दिनों से पुणे में लगभग 8000 नए मरीज सामने आए हैं।

इस बीच कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा भी कोविड-19 से संक्रमित हो गए हैं। प्रियंका ने एक वीडियो संदेश जारी करते हुए बताया कि कोरोना संक्रमण के संपर्क में आने के कारण उन्हें अपना असम का चुनावी दौरा रद्द करना पड़ा। हालाँकि प्रियंका की रिपोर्ट निगेटिव आई है किन्तु उन्हें आइसोलेशन में रहने की सलाह दी गई है। इससे पहले रॉबर्ट वाड्रा ने ट्वीट करके अपने संक्रमित होने की जानकारी दी थी।

शिवराज सिंह ने राहुल के नाम का अर्थ समझाया

असम विधानसभा चुनाव में अब गिनती के दिन बचे हैं। 27 मार्च, एक अप्रैल और छह अप्रैल को मतदान होगा। सभी राजनीतिक दलों ने अपनी पूरी ताकत लगा दी है। बीजेपी ने भी अपने स्‍टारक प्रचारकों को चुनावी मैदान में उतारा है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान यहां प्रचार करने पहुंचे हैं। गुरुवार को शिवराज सिंह ने एक प्रेस कॉन्‍फ्रेंस कर कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर हमला बोला। सीएम शिवराज ने कहा कि राहुल गांधी, मोहम्‍मद अली जिन्ना की राह पर जा रहे हैं। उन्‍होंने प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में RAHUL (अलग-अलग एलफावेट के हिसाब से) का मतलब भी बताया।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने असम में चुनाव प्रचार के दौरान कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी पर जमकर हमला बोला। सीएम ने गुरुवार को कामरुप (रूरल) जिले के पलासबड़ी में एक जनसभा को संबोधित करते हुए राहुल गाँधी का फुल फॉर्म भी बताया।

उन्होंने अंग्रेजी में राहुल (RAHUL) के नाम का मतलब हुए कहा, ”राहुल गाँधी ने कॉन्ग्रेस को कहीं का भी नहीं छोड़ा है। अब तो RAHUL का मतलब हो गया है- R से Rejected, A से Absent Minded, H से Hopeless, U से Useless और L का मतलब Liar है।”

शिवराज सिंह चौहान ने कॉन्ग्रेस नेता को आड़े हाथों लेते हुए आगे कहा कि राहुल गाँधी कॉन्ग्रेस का भला नहीं कर सके, तो असम का भला क्या कर पाएँगे। राहुल गाँधी से बड़ा झूठा आज तक कोई पैदा नहीं हुआ। वे हमेशा ही झूठी घोषणाएं करते हैं। वे असम की पाँच बातों की गारंटी दे रहे हैं। जिन पर कॉन्ग्रेसियों को ही भरोसा नहीं हो रहा है, तो उनकी गारंटी पर कोई कैसे भरोसा करेगा।

इसके साथ ही उन्होंने गुवाहाटी में कहा कि हम प्यार के खिलाफ नहीं हैं, हम ‘जिहाद’ के खिलाफ हैं। किसी को धोखा देकर, नाम बदलने या बेईमान तरीके से प्यार नहीं करना चाहिए। हमने फ्रीडम टू रिलिजन एक्ट 2021 कानून बनाया है। पार्टी ने कहा है कि राज्य में एक समान कानून लागू किया जाएगा।

सद्दाम गद्दाफ़ी की चुनावी प्रक्रिया बता कर अपनी ही पार्टी का सच बता बैठे राहुल

राहुल ने यहां तक कहा कि सद्दाम हुसैन और गद्दाफी जैसे लोग भी चुनाव आयोजित कराते थे और जीत जाते थे. लेकिन तब ऐसा कोई फ्रेमवर्क नहीं था, उन्हें मिले वोट की रक्षा कर सके. राहुल अमेरिका की ब्राउन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर आशुतोष के साथ चर्चा कर रहे थे। इस दौरान राहुल ने कहा कि कि हमें किसी दूसरे देश की संस्था से लोकतंत्र को लेकर सर्टिफिकेट नहीं चाहिए लेकिन उन्होंने जो कहा, वो बिल्कुल सही है। भारत में इस वक्त जितना हमने सोचा है, हालात उससे ज्यादा बदतर हैं। राहुल इस ब्यान को देते समय अपनी ही पार्टी की पोल खोल रहे थे। पार्टी अध्यक्ष के तौर पर जब उन्होने अपनी ही पार्टी के आंतरिक चुनाव लड़े थे तब ऊनके ही एक रिश्तेदार शहजाद पूनावाला ने उनके विरोध में नामांकन भरा था। आज शहजाद पूनावाला अपनी ही पार्टी से निकाल दिये गए। यही वह मॉडल है जिसकी चर्चा राहुल कर रहे थे। लें अपनी ही पार्टी के इस चरित्र को वह नहीं पहचान पाते। हर समय अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अंकुश की बात कराते हैं, लेकिन उतनी ही आज़ादी से नरेंद्र मोदी के खिलाफ बोलते गरियाते पाये जाते हैं, निर्भीकता से। क्या यह दोहरे माप दंड नहीं?

  • सद्दाम-गद्दाफ़ी इन्दिरा के थे अच्छे दोस्त सोशल मीडिया पर ट्रोल हुए राहुल
  • चुनाव मतलब सिर्फ यह नहीं कोई जाए और बटन दबाकर मताधिकार का इस्तेमाल कर दे
  • साल 2016 से 2020 के बीच 170 से अधिक कांग्रेसी विधायकों ने पार्टी छोड़ दी
  • नहीं दिख रहा दम, पांच चुनावी राज्यों में गठबंधन के सहारे चुनावी मैदान में कांग्रेस

सरीका, चंडीगढ़:/नयी दिल्ली:

राहुल गाँधी ने ब्राउन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर को दिए अपने हालिया इंटरव्यू में भारतीय जनता पार्टी पर पर ये कहकर निशाना साधा कि सद्दाम हुसैन और मोहम्मद गद्दाफी ने भी तो चुनाव जीता था। केंद्र सरकार को लेकर कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने कहा कि सद्दाम हुसैन और गद्दाफी को भी वोट की जरूरत नहीं थी, उन्होंने सत्ता पर कब्जा करने के लिए चुनावी प्रक्रिया का इस्तेमाल किया था।

दरअसल, कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने पिछले दिनों वी-डेम इंस्टिट्यूट की रिपोर्ट के हवाले से देश के लोकतांत्रिक न होने को लेकर दावे किए थे। इसी पर ब्राउन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर आशुतोष वार्ष्णेय ने उनकी टिप्पणी पर सवाल किए, जिसके जवाब में राहुल गाँधी ने उक्त बात कही।

हालाँकि, राहुल की बात पर गौर देने से पहले ये जानना दिलचस्प है कि जिस गद्दाफी का उन्होंने उदाहरण दिया, वह सन् 1969 में लीबिया में सैन्य तख्तापलट होने के कारण नेता चुना गया था। उसने शासन पाने के लिए ब्रिटिश समर्थित नेता इदरीस को सत्ता से उखाड़ फेंका था, न कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया से कुर्सी पर अधिकार पाया था।

इसी तरह से सद्दाम हुसैन को साल 2003 में अमेरिकी फोर्स ने पकड़ा था। साल 2006 में वह मानवता के विरुद्ध किए गए अपराधों का दोषी पाया गया था। इसके बाद उसे मौत की सजा सुनाई गई थी।

अब जाहिर है कि ऐसे तानाशाहों का नाम लेकर राहुल गाँधी पूरे मामले में सिर्फ़ और सिर्फ विदेशी चीजों को घुसाकर अपनी बात को दमदार साबित करने की कोशिश कर रहे हैं, इसके अतिरिक्त उनकी बातों का और कोई मतलब नहीं है।

इंटरव्यू के दौरान उन्होंने आरएसएस पर भी निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि आरएसएस और शिशु मंदिर सिर्फ़ भारत को तोड़ने के लिहाज से बने हैं और इनका इस्तेमाल जनता से पैसे लेने के लिए किया जाता है। एक और चौंकाने वाले बयान में उन्होंने दावा किया कि आरएसएस की विचारधारा और रणनीति मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड के समान है।

संसद सत्र में बंद हुए माइक वाली घटनाओं को उदाहरण देते हुए राहुल गाँधी मानते हैं कि भाजपा ने चुनावी प्रक्रिया का इस्तेमाल करके सत्ता हथियाई है। उनके मुताबिक, केंद्र के पास नए आइडिया के लिए कोई भी कोना नहीं है। सबसे हास्यास्पद बात यह है कि 5 लाख आईटी सेल सदस्यों को हायर करने के बाद कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष आरोप लगाते हैं कि भारत में फेसबुक का हेड भाजपाई है। वह गलत ढंग से चुनावी नैरेटिव को कंट्रोल करता है।

इस सब के बाद राहुल गांधी ट्रोल भी हुए:

एक दैनिक समाचार पत्र के अनुसार सोनिया गांधी के बेटे राहुल ने जिस सद्दाम हुसैन का हवाला दिया है, उसका भारत और खासकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से बेहतरीन संबंध था। साल 1975 में इंदिरा गांधी इराक गईं तो सद्दाम हुसैन ने उनका सूटकेस उठा लिया। अखबार के अनुसार इंदिरा गांधी जब रायबरेली से लोकसभा चुनाव वे हार गईं तो सद्दाम ने उन्हें इराक की राजधानी बगदाद में स्थाई आवास की पेशकश कर दी। इतना ही नहीं, सद्दाम के नेतृत्व वाली बाथ सोशलिस्ट पार्टी के प्रतिनिधि कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशनों में शामिल हुआ करते थे। ऐसे में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के इस बयान को लेकर सोशल मीडिया पर यूजर्स लताड़ लगा रहे हैं।

चुनावों की तारीखों पर रार, ममता का आयोग पर वार

ममता बनर्जी ने कहा कि इस बार पश्चिम बंगाल में आठ चरणों में खेल खेला जाएगा. राज्य के मुख्यमंत्री ने कहा कि बीजेपी के कहने पर चुनाव आयोग ने ऐसा किया. उन्होंने कहा कि बंगाल पर बंगाली ही राज करेगा किसी बाहरी को घुसने नहीं दिया जाएगा. ममता बनर्जी ने कहा, ”चुनाव आयोग ने पीएम मोदी और अमित शाह के दौरे के हिसाब से तारीखों का एलान किया है. जो बीजेपी ने कहा चुनाव आयोग ने वही किया है. गृह मंत्री अपनी ताकत का दुरुपयोग कर रहे हैं. हम हर हाल में बीजेपी को हराएंगे. खेल जारी है हम खेलेंगे और जीतेंगे भी.”

नई दिल्ली: 

4 राज्यों और 1 केंद्र शासित प्रदेश में विधान सभा चुनाव की तारीखों का ऐलान हो चुका है. इसके बाद से ही पार्टी नेता के रिएक्शन आने शुरू हो गए हैं. जहां कुछ नेता इसे अच्छा बता रहे हैं तो वहीं कुछ चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहे हैं.

कांग्रेस नेता ने उठाए सवाल

कांग्रेस नेता पृथ्वीराज चौहान ने चुनाव आयोग पर सवाल खड़े करते हुए कहा, ‘अगर केरल की 140 सीटों, तमिलनाडु की 234 सीटों और पुडुचेरी की 30 सीटों (कुल 404 सीट) पर एक ही दिन में वोटिंग पूरी हो सकती है, तो फिर असम की 126 और पश्चिम बंगाल की 294 सीटों (कुल 420 सीट) के चुनाव के लिए 7-8 फेज की क्या जरूरत है? क्या इसके पीछे कोई कुटिल रणनीती है?

ममता बनर्जी ने भी उठाए सवाल

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर चुनाव आयोग पर निशाना साधा. इस दौरान उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग बीजेपी के इशारे पर काम कर रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सत्ता का दुरुपयोग कर रहे हैं. बीजेपी अपने पैसों की ताकत का इस्तेमाल न करे. ममता ने कहा कि बीजेपी हिंदू-मुस्लिम कार्ड खेल रही है. बंगाल में एक ही चरण में चुनाव होना चाहिए था.

BJP ने दिया करारा जवाब

केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रहलाद सिंह पटेल ने चुनाव आयोग के इस फैसले का स्वागत किया है. उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) बंगाल चुनाव में 200 से ज्यादा सीटें पर बहुमत हासिल करेगी. इस दौरान उन्होंने ममता बनर्जी पर निशाना साधते हुए कहा कि वो 8 फेज में चुनाव होने से डर गईं हैं. मैं राजनीति का खेल समझने वालों से कहना चाहता हूं कि उनके दिन लदने वाले हैं.

गुलाम नबी आजाद ने भी कही ये बात

वहीं कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पवन बंसन ने कहा कि इस चुनाव के लिए हम तैयार हैं और बीजेपी कहीं नहीं आएगी. गुलाम नबी आजाद ने कहा कि कांग्रेस पश्चिम बंगाल चुनाव में डट कर मुकाबला करेगी. हम चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करेंगे. चुनाव आयोग शांति के साथ मतदान प्रक्रिया को पूरा कराए. ताकि लोग निर्भीक होकर अपने मत का इस्तेमाल कर सकें.

बंगाल सहित 5 राज्यों में विधान सभा चुनावों ई दुंदुभि, नतीजे 2 मई को

पश्चिम बंगाल और केरल समेत 4 राज्यों और 1 केंद्रशासित प्रदेश में होने वाले विधान सभा चुनाव (Assembly Election 2021) की तारीखों का ऐलान हो गया। पश्चिम बंगाल में 8 चरणों में वोटिंग होगी, जबकि असम में 3 चरणों में चुनाव होंगे. इसके अलावा केरल, तमिलनाडु और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में एक चरण में चुनाव होंगे।

  • पश्चिम बंगाल में चुनाव तारीखों की घोषणा, 27 मार्च को पहले चरण के वोट, 2 मई को होगी वोटों की गिनती।
  • पश्चिम बंगाल में आखिरी यानी आठवें चरण की वोटिंग 29 अप्रैल को होगीः चुनाव आयोग।
  • पश्चिम बंगाल में छठे चरण की वोटिंग 22 अप्रैल को, सातवें चरण की वोटिंग 26 अप्रैल को होगीः चुनाव आयोग।
  • पश्चिम बंगाल में 8 चरणों में वोटिंग होगी। 27 मार्च को पहले चरण,1 अप्रैल को दूसरे चरण का, 6 अप्रैल को तीसरे चरण, 10 अप्रैल को चौथे चरण, 17 अप्रैल को पांचवे चरण की वोटिंग होगीः चुनाव आयोग।
  • तमिलनाडु में 6 अप्रैल को एक ही चरण में सभी सीटों पर होगी वोटिंगः चुनाव आयोग।

नई दिल्ली:

 इलेक्शन कमीशन ने पांच राज्यों में चुनाव तारीख की घोषणा कर दी है। इलेक्शन कमीशन ने चुनावों संबंधी तैयारियों की भी पूरी जानकारी दी है। पांच राज्‍यों में 18 करोड़ मतदाता वोट डालेंगे, केरल और पुडुचेरी में मतदान केंद्र बढ़ाए गए हैं।  मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने कहा कि सभी पोलिंग स्टेशनों पर मास्क, सेनिटाइजेर पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराए जाएंगे. वरिष्ठ नागरिकों के लिए वॉलिटिंयर की तैनाती की जाएगी।

जानें बंगाल में कब-कब चुनाव

राजनीतिक रूप से सबसे गर्म माने जा रहे पश्चिम बंगाल में 8 चरणों में वोटिंग की जाएगी। 294 सीटों वाली विधानसभा के लिए वोटिंग 27 मार्च (30 सीट), 1 अप्रैल (30 सीट),  6 अप्रैल (31 सीट), 10 अप्रैल (44 सीट), 17 अप्रैल (45 सीट),  22 अप्रैल (43 सीट), 26 अप्रैल (36 सीट), 29 अप्रैल (35 सीट) को होगी।पश्चिम बंगाल में भी काउंटिंग 2 मई को की जाएगी।

असम में तीन चरण में चुनाव

उत्तर-पूर्व के सबसे बड़े राज्य असम में तीन चरणों में विधानसभा चुनाव संपन्न कराए जाएंगे। राज्य में 27 मार्च को पहले चरण में 47 सीटों पर वोटिंग होगी। इसके बाद 1 अप्रैल को 39 सीटों पर दूसरे चरण और 6 अप्रैल को तीसरे चरण में 30 सीटों पर वोटिंग होगी। यहां भी काउंटिंग 2 मई को की जाएगी।

तमिलनाडु में 234 सीट पर भी एक फेज में चुनाव

दक्षिण भारत के सबसे बड़े राज्य तमिलनाडु की 234 विधानसभा सीटों पर एक फेज में चुनाव संपन्न कराया जाएगा। राज्य की सभी सीटों पर 6 अप्रैल को वोटिंग होगी। काउंटिंग 2 मई को की जाएगी।

केंद्रशासित पुडुचेरी में भी एक फेज में होगी वोटिंग

इसके अलावा वर्तमान में राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर रहे पुडुचेरी में भी एक फेज में सभी सीटों पर वोटिंग का फैसला किया गया है। राज्य में 6 अप्रैल को वोटिंग करवाई जाएगी। राज्य विधानसभा में 30 सीटें हैं। काउंटिंग 2 मई को संपन्न होगी।

केरल में एक चरण में वोटिंग, 2 मई को नतीजे

कांग्रेस और लेफ्ट के गढ़ कहे जाने वाले केरल में भी एक फेज में वोटिंग का फैसला किया गया है।पड़ोसी राज्य तमिलनाडु की तरफ केरल में भी 6 अप्रैल को सभी सीटों पर वोटिंग की जाएगी। राज्यसभा विधानसभा में 140 सीटें हैं।

चुनावी माहौल की बात करें तो पश्चिम बंगाल में राजनीतिक सरगर्मियां पहले से तेज हैं। राज्य में दो टर्म से लगातार सत्ता में बनी हुई तृणमूल कांग्रेस तीसरी बार भी सरकार बनाने के दावे कर रही है। वहीं केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी 2019 लोकसभा चुनाव के नतीजों को आधार बनाते हुए उत्साह से लबरेज है। बीजेपी की तरफ से लगातार दावा किया जा रहा है कि वो 294 सीटों की विधानसभा में 200 सीटें हासिल करेगी. इस बीत कई कद्दावर टीएमसी नेताओं ने बीजेपी का दामन थामा है।

इनमें शुभेंदू अधिकारी सबसे कद्दावर नेता माने जा रहे हैं. राजनीतिक जानकारों के मुताबिक ममता को इसका नुकसान हो सकता है। हालांकि खुद ममता बनर्जी की तरफ से कहा जा चुका है उन्हें इसका कोई नुकसान नहीं होने जा रहा है। यहां तक कि उन्होंने शुभेंदू अधिकारी के गढ़ कहे जाने वाले नंदीग्राम से चुनाव लड़ने की रणनीतिक घोषणा भी कर दी है।

वहीं पश्चिम बंगाल के पड़ोसी राज्य में सत्तारूढ़ बीजेपी 2016 में मिली ऐतिहासिक सफलता को दोहराने के दावे कर रही है। विपक्षी दल कांग्रेस की तरफ से सीएए के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया जा रहा है। तमिलनाडु में बीजेपी सत्तारूढ़ एआईडीएमके के साथ है. वहीं केरल में पिनराई विजयन एक बार फिर एलडीएफ को सत्ता में वापस लाने की कोशिश करेंगे। पॉन्डिचेरी में राजनीतिक उथल-पुथल के बीच चुनाव रोचक होने की संभावना है।

राहुल का ग्म्छा और पूर्वोत्तर की राजनीति

असम की राजनीति में मंगलदोई का ज़ीर होना इतना ही ज़रूरी है जितना की महाभारत में कुरुक्षेत्र का।977 के चुनावों में असम में कॉन्ग्रेस को 14 में से 10 सीटें मिली। तीन सीटें जनता पार्टी को मिली थीं। इनमें एक सीट मंगलदोई की थी। इस सीट पर जनता पार्टी के हीरा लाल पटवारी (तिवारी) चुनाव जीते थे। मंगलदोई लोकसभा क्षेत्र में 5,60, 297 मतदाता थे। एक साल बाद हीरा लाल की मौत हो गई तो उपचुनाव कराया गया। महज़ एक साल से थोड़े से अधिक समय में जब मतदाता सूची (वोटर लिस्ट) अपडेट की गई तो मतदाताओं की संख्या 80,000 बढ़ गई! यानी रातों-रात 15% की एकाएक वृद्धि! इनमें से लगभग 70,000 मतदाताओं का मजहब इस्लाम था। तमाम नागरिक समूहों ने इसके विरुद्ध शिकायतें दर्ज कराईं। ऐसे मामलों की संख्या भी लगभग 70 हज़ार थी, इनमें से 26 हज़ार ही टिक पाए। यहीं से भारतीय राजनीति में ‘अवैध बांग्लादेशी’ शब्द आता है, जिसका बड़ा हिस्सा बांग्लादेशी मुस्लिमों का है। भारतवासियों से हारी कॉंग्रेस

घुसपैठियों के सहारे जीती। यह सिलसिला पिछले चुनावों तक जारी रहा, आज घुसपैठिया रोहंगिया हों या बंगलादेशी, कॉंग्रेस गांधी की हो या ममता की इनके साथ खड़ी है। इसीलिए वहाँ एनआरसी। सीएए या एनपीआर लागू न अरने की बात कर वह भारतीय वोटेरलिस्ट में शामिल हुए बांग्लादेशी और रोहांगीयान घुसपैथियों को बचाना चाहते हैं योनि अब नई जीत का आधार वही हैं। मुद्दे की बात यह है कि हिन्दूकिसी भी देश में चाहे कितना भी प्रताड़ित क्यों न हो रहा हो कॉंग्रेस उसे छोड़ अवैध घुसपैठियों को न केवल शरण देने में यकीन रखती ही अपितु उन्हें नागरिक साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ती.

असम/नयी दिल्ली :

कॉन्ग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने असम के शिवसागर में हुई रैली में कहा कि सत्ता में आने पर सीएए लागू नहीं करेंगे। अक्सर अपनी बातों से ज़्यादा हरकतों की वजह से चर्चा में रहने वाले राहुल गाँधी ने इस रैली में असम के एक पारंपरिक गमछे का इस्तेमाल किया, जिससे वह राज्य के लोगों और खुद के बीच ‘कनेक्ट’ स्थापित कर पाएँ (जैसा अमूमन उनसे होता नहीं है)। 

गमछा दिखाते हुए राहुल गाँधी ने कहा कि इस पर सीएए (नागरिकता संशोधन क़ानून) लिखा हुआ है और उस पर क्रॉस का निशान बना हुआ है। इसका मतलब यह है कि चाहे जो हो जाए सीएए लागू नहीं होगा। राहुल गाँधी ने कहा, “हमने ये गमछा पहना है इस पर लिखा है सीएए। इस पर हमने क्रॉस लगा रखा है मतलब चाहे जो हो जाए सीएए नहीं होगा! हम दो हमारे दो…।। अच्छी तरह सुन लो, (सीएए) नहीं होगा, कभी नहीं होगा।” 

सीएए 2019 के दौरान संसद के दोनों सदनों से पारित किया गया था। इस पर अभी अमल किया जाना बाकी है। इस कानून की मदद से पड़ोसी देशों के प्रताड़ित अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को नागरिकता दी जाएगी। इसके लागू होने के बाद पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान, बांग्लादेश के हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन और ईसाई लोगों को नागरिकता दी जाएगी।  

लेकिन कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने ताजा बयान से फिर साबित किया है कि उन्हें इस्लामी देशों के प्रताड़ित हिन्दुओं, सिखों, बौद्धों, जैनों, ईसाइयों से कोई मतलब नहीं है। इन देशों में मौजूद अधिकांश लोग दलित समुदाय से आते हैं, जिनके हित की कॉन्ग्रेस हमेशा वकालत करती है। इसका मतलब साफ़ है कि ‘दलितों के अधिकारों’ के लिए लड़ने की बात छलावा मात्र है। दलितों के मुद्दे पर की गई सारी भाषणबाजी सिर्फ राजनीतिक मुनाफ़े के लिए की गई थी। 

असम में सीएए को लेकर पूर्व में काफी विरोध-प्रदर्शन हुए थे। प्रदेश में इस मुद्दे पर लगभग सारे विवाद हल हो चुके हैं। लेकिन आगामी विधानसभा चुनावों में यह बेशक बड़ा मुद्दा होगा।    

इस्लाम या ईसाई धर्म में परिवर्तन लेने के पश्चात दलित नहीं ले सकेंगे जातिगत आरक्षण का लाभ

हिन्दू धर्म में वर्ण व्यवस्था है, हिन्द धर्म 4 वर्णों में बंटा हुआ है, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वेश्या एवं शूद्र। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात पीढ़ियों से वंचित शूद्र समाज को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए संविधान में आरक्षण लाया गया। यह आरक्षण केवल (शूद्रों (दलितों) के लिए था। कालांतर में भारत में धर्म परिवर्तन का खुला खेल आरंभ हुआ। जहां शोषित वर्ग को लालच अथवा दारा धमका कर ईसाई या मुसलिम धर्म में दीक्षित किया गया। यह खेल आज भी जारी है। दलितों ने नाम बदले बिना धर्म परिवर्तन क्यी, जिससे वह स्वयं को समाज में नचा समझने लगे और साथ ही अपने जातिगत आरक्षण का लाभ भी लेते रहे। लंबे समय त यह मंथन होता रहा की जब ईसाई समाज अथवा मुसलिम समाज में जातिगत व्यवस्था नहीं है तो परिवर्तित मुसलमानों अथवा इसाइयों को जातिगत आरक्षण का लाभ कैसे? अब इन तमाम बहसों को विराम लग गया है जब एकेन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद सिंह ने सांसद में स्पष्ट आर दिया कि इस्लाम या ईसाई धर्म स्वीकार करने वाले दलितों के लिए आरक्षण की नीति कैसी रहेगी।

नयी दिल्ली(ब्यूरो):

इस्लाम या ईसाई धर्म में परिवर्तित होने वाले दलितों को चुनावों में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों से चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं होगी। इसके अलावा वह आरक्षण से जुड़े अन्य लाभ भी नहीं ले पाएँगे। गुरुवार (11 फरवरी 2021) को राज्यसभा में एक प्रश्न का जवाब देते हुए क़ानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने यह जानकारी दी। 

हिन्दू, सिख या बौद्ध धर्म स्वीकार करने वाले अनुसूचित जाति के लोग आरक्षित सीट से चुनाव लड़ने के योग्य होंगे। साथ ही साथ, वह अन्य आरक्षण सम्बन्धी लाभ भी ले पाएँगे। भाजपा नेता जीवी एल नरसिम्हा राव के सवाल का जवाब देते हुए रविशंकर प्रसाद ने इस मुद्दे पर जानकारी दी। 

आरक्षित क्षेत्रों से चुनाव लड़ने की पात्रता पर बात करते हुए रविशंकर प्रसाद ने कहा, “स्ट्रक्चर (शेड्यूल कास्ट) ऑर्डर के तीसरे पैराग्राफ के अनुसार, कोई भी व्यक्ति जो हिन्दू, सिख या बौद्ध धर्म से अलग है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा।” इन बातों के आधार पर क़ानून मंत्री ने स्पष्ट कर दिया कि इस्लाम या ईसाई धर्म स्वीकार करने वाले दलितों के लिए आरक्षण की नीति कैसी रहेगी। 

क़ानून मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि संसदीय या लोकसभा चुनाव लड़ने वाले इस्लाम या ईसाई धर्म में परिवर्तित होने वाले अनुसूचित जाति/जनजाति के व्यक्ति को निषेध करने के लिए संशोधन का प्रस्ताव मौजूद नहीं।    

भाजपा ने 8125 कुल सीटों में से 6458 को जीत कर इतिहास रच दिया

अरुणाचल प्रदेश में हुए इस चुनाव की बात करें तो 242 जिला परिषद सीटों और 8,175 ग्राम पंचायत सीटों के लिए 22 दिसंबर को 73 फीसद मतदान हुआ था। इस चुनाव को लेकर अरुणाचल प्रदेश के राज्य निर्वाचन आयुक्त हेग कोजिन ने जानकारी दी कि 98 जिला परिषद और 6,168 ग्राम पंचायत सदस्य बिना किसी मुकाबले के निर्विरोध निर्वाचित हो गए थे। शनिवार को कोविड-19 नियमों का पालन करते हुए इन पंचायत और निगम चुनाव के लिए अरुणाचल प्रदेश में मतगणना चल हुई थी। वहीं अरुणाचल प्रदेश के पासीघाट नगर निगम (पीएमसी) की आठ में से छह सीटें जीत कर भाजपा ने स्थानीय निकाय का शासन कांग्रेस के हाथों से छीन लिया है।

असम/नयी दिल्ली:

भारतीय जनता पार्टी ने (BJP) अरुणाचल प्रदेश में हुए स्थानीय निकाय के चुनावों में कमाल का प्रदर्शन किया है। भाजपा ने न सिर्फ कॉन्ग्रेस, बल्कि उत्तर-पूर्व की स्थानीय राजनीतिक दलों को भी पटखनी देकर इतिहास रच दिया। पंचायत और जिला परिषद स्तर पर भाजपा को मिली बड़ी सफलता 2019 की याद दिला गई। तब राज्य में हुए विधानसभा चुनावों में भी भाजपा ने 60 में से 41 सीटें और 50.86% वोट शेयर पाकर सरकार बनाई थी।

पासीघाट म्युनिसिपल काउंसिल की बात करें तो यहाँ BJP ने 8 में से 6 सीटें जीतीं और कॉन्ग्रेस मात्र 2 पर सिमट कर रह गई। वहीं ईटानगर म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन में भाजपा ने 20 में से 10 सीटें जीत ली और दूसरे नंबर पर 9 सीटों के साथ जदयू रही। कोर्नाड संगमा की NPP को 1 सीट मिली, जो मेघालय में भाजपा की सहयोगी पार्टी है। पासीघाट और ईटानगर में भाजपा की जीत से अरुणाचल के बड़े शहरों में उसकी पैठ का पता चलता है।

वहीं अगर ग्रामीण इलाकों की बात करें तो जिला परिषद की 237 सीटों में से भाजपा ने 187 सीटें जीतीं। भाजपा ने जिला परिषद की 78.9% सीटें जीत लीं। दूसरी पार्टियों का प्रदर्शन इतना बुरा रहा कि 22 सीटों के साथ निर्दलीय ने ये स्थान काबिज किया। जदयू को जिला परिषद में 10 और कॉन्ग्रेस को 9 सीटों पर कामयाबी मिली। वहीं NPP ने भी 6 सीटें जीती। कुल मिला कर भाजपा का यहाँ एकतरफा दबदबा रहा।

जहाँ तक ग्राम पंचायत की बात है, उसमें भाजपा को जिला परिषद से भी बड़ी सफलता मिली। भाजपा ने ग्राम पंचायत सदस्यों की 79.48% सीटों को अपने नाम किया। भाजपा ने 8125 कुल सीटों में से 6458 को जीत कर इतिहास रच दिया। ग्राम पंचायत में भी 974 सीटों के साथ निर्दलीय दूसरे स्थान पर रहे। कॉन्ग्रेस को 328 तो NPP को 238 सीटें प्राप्त हुईं। जदयू ने भी 121 सीटें जीत कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

कुल मिला कर देखें तो पूरे स्थानीय निकाय चुनावों में अरुणाचल प्रदेश में भाजपा ने कुल 8390 सीटों में से 6661 को जीत कर एकतरफा दबदबा कायम किया और राज्य में अपनी स्थिति पूरी तरह मजबूत कर ली। 79.39% सीटों पर जीत को मुख्यमंत्री पेमा खांडू के परफॉरमेंस पर जनता के मुहर के रूप में भी देखा जा रहा है। सीएम खांडू ने इसे मोदी सरकार के कामकाज का नतीजा बताया है और जनता का धन्यवाद किया है।

अब अरुणाचल प्रदेश की विधानसभा में भी जदयू के 6 विधायकों के भाजपा में शामिल होने के बाद पार्टी के विधायकों की संख्या 48 हो गई है। इसके 1 दिन बाद ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद छोड़ दिया और उनकी जगह उनके ही विश्वस्त आरसीपी सिंह को जनता दल यूनाइटेड (जदयू) का नया अध्यक्ष चुना गया। अरुणाचल की राजनीति का असर बिहार में भी देखने को मिल रहा है।

बीटीसी में कॉंग्रेस का इकलौता घोषित पार्षद बधाई से पहले भाजपा में शामिल

विधानसभा चुनाव हो या फिर नगर निगम चुनाव, कांग्रेस हर जगह एक जैसा ही प्रदर्शन कर रही है। मतलब ये कि उसे हर जगह ही मायूसी ही हाथ लग रही है। हैदराबाद नगर निगम, गोवा जिला पंचायत चुनाव में भी कांग्रेस को निराशा हाथ लगी है। वहीं भारतीय जनता पार्टी की हर चुनाव में बल्ले-बल्ले हो रही है। बता दें कि असम के Bodoland Territorial Council (BTC)’ के चुनाव में कांग्रेस ने मात्र 1 सीट जीती थी, लेकिन कुछ देर बाद ही जीता हुआ उम्मीदवार भाजपा का दामन थाम बैठा। इससे कांग्रेस के खाते में अब शून्य सीटें हो गई हैं। बता दें कि सुजल सिंघा के भाजपा में आने से इस तरह से BTC में भाजपा के सीटों की संख्या बढ़ कर 10 हो गई है जोकि पहले 9 थी।  गौरतलब है कि NDA पूर्ण बहुमत के साथ असम के BTC परिषद का गठन करने जा रहा है।

असम/नयी दिल्ली/चंडीगढ़ :

‘सर मुंडाते ही ओले पड़े’ – कॉन्ग्रेस को ये कहावत आज ज़रूर याद आ रही होगी। ऐसा इसीलिए, क्योंकि एक तो उसने ‘Bodoland Territorial Council (BTC)’ के चुनाव में मात्र 1 सीट जीती, ऊपर से वो जीता हुआ उम्मीदवार भी भाजपा में शामिल हो गया। सुजल सिंघा के भाजपा में आने से इस तरह से BTC में भाजपा के सीटों की संख्या बढ़ कर 10 हो गई। NDA पूर्ण बहुमत के साथ असम के BTC परिषद का गठन करने जा रहा है।

कॉन्ग्रेस को इस चुनाव में सुजल सिंघा के रूप में एक ही पार्षद प्राप्त हुआ था। लेकिन, श्रीरामपुर क्षेत्र से जीते सुजल सिंघा ने असम के वित्त मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की उपस्थिति में गुवाहाटी के होटल लिली में सोमवार (दिसंबर 14, 2020) की शाम को आधिकारिक रूप से भाजपा जॉइन कर लिया। BTC में UPPL-BJP गठबंधन पूर्ण बहुमत में है। 40 सदस्यीय BTC में अब इन दोनों के पास 22 सीटें हैं।

भाजपा ने इस बार के चुनाव में ‘एकला चलो’ की रणनीति अपनाई थी। इससे 17 वर्षों से सत्ता में काबिज रही बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (BPF) का राजनीतिक वर्चस्व टूट गया और वो बहुमत से 4 सीटें पीछे ही छूट गई। ये पार्टी भाजपा की पुरानी सहयोगी रही है। भाजपा ने असम विधानसभा चुनाव के सेमीफाइनल में UPPL और गण सुरक्षा पार्टी (जीएसपी) के रूप में नए सहयोगी तलाशे हैं। स्वशासी निकाय बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल के इसी गठबंधन के साथ नए समीकरण बना कर भाजपा अब विधानसभा चुनाव में उतर सकती है।

पूर्वोत्तर के कुछ जनजातीय क्षेत्रों में अधिक से अधिक राजनीतिक स्वायत्तता और विकेन्द्रीकृत शासन की अनुमति देने वाला BTC चुनाव में बोडो जनजाति के रुख का पता चलता है, जो राज्य की आबादी का 6% है। अलग राज्य बोडोलैंड की माँग लेकर कई बार हिंसा भी हो चुकी है। कुल 46 सीटों में से 6 नामांकित होते हैं और 40 पर चुनाव होते हैं। UPPL के सुप्रीमो प्रमोद बोरो अब BTC के CEM (चीफ एग्जीक्यूटिव मेंबर) का पद संभालेंगे।

इस चुनाव में कॉन्ग्रेस ने अजमल से हाथ मिलाया था। अजमल मोदी सरकार के खिलाफ जहर उगलने के लिए जाने जाते हैं। हाल ही में यह बात भी सामने आई है कि एआईडीयूएफ द्वारा संचालित ‘अजमल फाउंडेशन’ को टेरर फंडिंग वाले विदेशी संगठनों से पैसा मिला है। 2015 में हुए चुनाव में भाजपा को केवल 1 सीट ही मिली थी। कॉन्ग्रेस की सहयोगी एआईयूडीएफ इस चुनाव में खाता खोलने में भी नाकाम रही।

बीटीसी चुनावों में भाजपा की बढ़त, बनी किगमेकर

असम के बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद ( Bodoland Territorial Council- BTC) चुनावों में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला है। शनिवार को आए चुनाव परिणाम खंडित जनादेश लेकर आए हैं इन चुनावों को अगले साल होने वाले असम विधान सभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा था। हालाँकि, राज्य की सत्ताधारी पार्टी भाजपा ने 2015 में जीती गई एक सीट की तुलना में इस बार नौ सीटों पर जीत दर्ज कर बड़ी बढ़त बनाई है। पूर्वोत्तर राज्यों में बीजेपी को ऐसा समर्थन मिलने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुशी जाहिर की है। रविवार को प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट किया, एनडीए पूर्वोत्तर के लोगों की सेवा के लिए प्रतिबद्ध है. मैं हमारे सहयोगी यूपीपीएल और भाजपा असम को असम बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल (बीटीसी) चुनाव में बहुमत हासिल करने के लिए बधाई देता हूं।

असम/ नयी दिल्ली:

बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद (BTC) के चुनावों में बीजेपी को बड़ी सफलता मिली है। उसने 12 सीटें जीतने वाली यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (UPPL) के साथ मिलकर बहुमत भी हासिल कर ली है। बदरुद्दीन अजमल की ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) से हाथ मिलाने के बावजूद कॉन्ग्रेस को केवल एक सीट मिली है। वहीं 17 साल से बीटीसी की सत्ता में बनी बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (BPF) को 17 सीटों पर कामयाबी मिली है। हालाँकि सबसे बड़े दल के बावजूद वह सत्ता बचाने में असफल रही है।

बीटीसी के चुनाव असम विधानसभा चुनावों के सेमीफाइनल माने जाते हैं। इसे ध्यान में रखते हुए कॉन्ग्रेस ने अजमल से हाथ मिलाया था। अजमल मोदी सरकार के खिलाफ जहर उगलने के लिए जाने जाते हैं। हाल ही में यह बात भी सामने आई है कि एआईडीयूएफ द्वारा संचालित ‘अजमल फाउंडेशन’ को टेरर फंडिंग वाले विदेशी संगठनों से पैसा मिला है।

BTC चुनावों में बीजेपी ने 40 में से 9 सीटों पर जीत दर्ज की है। 2015 में हुए चुनाव में उसे केवल 1 सीट मिली थी। भाजपा को मिली जीत पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, “एनडीए ने असम बीटीसी चुनाव में बहुमत हासिल किया है। हमारे सहयोगी यूपीपीएल, सीएम सर्बानंद सोनोवाल, हिमंत बिस्वा सरमा, रणजीत कुमार दास और असम भाजपा को बधाई। मैं असम के लोगों को एक विकसित उत्तर-पूर्व के प्रति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संकल्प में उनके निरंतर विश्वास के लिए धन्यवाद देता हूँ।”

कॉन्ग्रेस की सहयोगी एआईयूडीएफ इस चुनाव में खाता खोलने में भी नाकाम रही। गण सुरक्षा पार्टी (GSP) को भी इस चुनाव में महज एक सीट ही मिली।

बता दें कि बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद में कुल 46 सीटें हैं। इनमें से 6 नामांकित होते हैं, जबकि 40 पर चुनाव होता है। इन 40 सीटों पर 7 और 10 दिसंबर को चुनाव हुए थे। इस साल की शुरुआत यानी फरवरी 2020 में बोडो शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद यह पहला चुनाव था।

पिछले 17 साल से बीटीसी पर शासन करने वाली बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट बहुमत के लिए जरूरी 21 सीटें इस बार जीतने में नाकाम रही है। उसे सिर्फ 17 सीटों पर जीत मिली है। 2015 में उसे 20 सीटें मिली थीं, जो इस बार तीन कम हैं।

पिछले चुनाव में बीपीएफ और बीजेपी के बीच गठबंधन था। लेकिन इस चुनाव में दोनों पार्टियाँ अलग-अलग चुनाव लड़ रही थीं और बीजेपी ने बीपीएफ को कड़ी टक्कर भी दी। इससे पहले, असम बीजेपी ने संकेत दिया था कि वह बीपीएफ के साथ 2021 के असम चुनावों में गठबंधन जारी रखना पसंद नहीं करेगी।

बीजेपी और यूपीपीएल ने औपचारिक तौर पर तो गठबंधन की घोषणा नहीं की है लेकिन दोनों ने ही स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने पर चुनाव परिणाम बाद गठबंधन के संकेत दिए थे। यूपीपीएल प्रमुख प्रमोद ब्रह्मा दो सीटों से जीते हैं।

उन्होंने शनिवार (दिसंबर 12, 202) देर रात बीटीसी चुनाव पर भाजपा मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा, भाजपा की राज्य इकाई के अध्यक्ष रंजीत कुमार दास और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और मंगलदोई के सांसद दिलीप सैकिया के साथ विचार-विमर्श किया। परिषद के गठन के संबंध में उनके निर्णय की घोषणा जल्द होने की संभावना है। सरमा ने बताया था कि इस संबंध में मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल के साथ चर्चा के बाद निर्णय की घोषणा होगी।

गौरतलब है कि ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के प्रमुख बदरुद्दीन अजमल द्वारा संचालित ‘अजमल फाउंडेशन’ के खिलाफ असम के दिसपुर पुलिस स्टेशन में शुक्रवार (4 दिसंबर, 2020) को मामला दर्ज किया गया था। गुवाहाटी के सीपी एमएस गुप्ता ने बताया था कि यह मामला सत्य रंजन बोराह द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के बाद दायर किया गया था, जिसने एनजीओ पर विदेशी फंड प्राप्त करने और संदिग्ध गतिविधियों में इसका इस्तेमाल करने का आरोप लगाया था।

इसके अलावा असम सरकार की दो बच्चों की नीति पर बदरुद्दीन अजमल ने करारा हमला बोला था। अजमल का कहना था कि मुस्लिम बच्चे पैदा करते रहेंगे और वे किसी की नहीं सुनेंगे। अजमल ने कहा था, “मैं निजी तौर पर मानता हूँ और हमारा मजहब भी मानता है कि जो लोग दुनिया में आना चाहते हैं, उन्हें आना चाहिए और उन्हें कोई रोक नहीं सकता है।”

पिछले दिनों बदरुद्दीन अजमल पर निशाना साधते हुए हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा था कि ‘अजमल की सेना’ के पुरुष अपनी धार्मिक पहचान छिपाकर सोशल मीडिया पर लड़कियों से दोस्ती कर रहे हैं और फिर उनसे शादी कर रहे हैं। अगर अजमल की सेना हमारी महिलाओं को छूती है, तो उनके लिए एकमात्र सजा मौत की सजा होगी।