2024 आम चुनाव से पहले हो जाएगा राम मंदिर निर्माण, विपक्ष परेशान

राम मंदिर निर्माण पूरा होने की तारीख सामने आने से विपक्ष में घबराहट क्यों है? राम मंदिर आंदोलन के शुरू होने के साथ भाजपा-विरोधी एक सुर में भाजपा के नारे का मजाक उड़ाते हुए कहते थे- ‘मंदिर वहीं बनाएँगे, लेकिन तारीख नहीं बताएँगे’। अब जबकि राम मंदिर निर्माण के पूरा होने की तिथि सामने आ गई है तो उन्हीं भाजपा विरोधियों की साँस अटकने लगी है। विपक्षी दल यह मानकर बैठे हैं कि भाजपा मंदिर निर्माण 2024 के ठीक पहले पूरा करवाकर इसे आगामी लोकसभा चुनाव में मुद्दा बनाएगी।

चंडीगढ़ / नयी दिल्ली:

राम मंदिर के लिए देश भर में श्रीराम जन्मभूमि निधि समर्पण अभियान की शुरुआत 15 जनवरी को हो गई है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राम मंदिर के लिए सबसे पहला चंदा दिया। कोविंद ने 5,00,100 रुपए की धनराशि दान दी। इसी के साथ राम मंदिर निर्माण के पूरा होने की तारीख भी नजदीक आ गई है।

राम मंदिर ट्रस्‍ट के महासचिव चंपत राय ने रायबरेली में हुए कार्यक्रम में 39 महीने के अंदर मंदिर बना देने का ऐलान कर दिया है। चंपत राय के अनुसार, लोकसभा चुनाव 2024 से पहले अयोध्‍या में राम मंदिर बन जाएगा। राम मंदिर निर्माण पूरा होने की तारीख सामने आते ही विपक्षी दलों में घबराहट फैल गई है।

2024 आम चुनाव से पहले हो जाएगा राम मंदिर निर्माण 

कई दशकों पुराने अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद से ही राम मंदिर के लिए तैयारियाँ शुरू हो गई थीं। ट्रस्ट बनने के साथ ही राम मंदिर निर्माण को लेकर अन्य चीजें भी तय हो गई। वहीं, अब राम मंदिर निर्माण पूरा होने की तारीख और निधि समर्पण अभियान की शुरुआत ने सियासी हलकों में भूचाल ला दिया है। 

इसके पीछे कई कारण हैं, लेकिन सबसे बड़ा कारण ‘तारीख’ ही है। कॉन्ग्रेस समेत लगभग सभी विपक्षी दलों ने ‘सुप्रीम फैसला’ आने से पहले तक भाजपा के चुनावी घोषणा पत्र में शामिल राम मंदिर निर्माण के मुद्दे को लेकर हमेशा ही सवाल उठाए हैं। 

भाजपा, आरएसएस और अन्य हिंदूवादी संगठनों के कार्यकर्ताओं के नारे ‘रामलला हम आएँगे, मंदिर वहीं बनाएँगे’ के आगे भाजपा विरोधी पार्टियों ने ‘तारीख नहीं बताएँगे’ का तुकांत जोड़ दिया था। यही ‘तारीख’ अब विपक्ष के गले की फाँस बनती नजर आ रही है।

चेंजमेकर के रूप में स्थापित हुई भाजपा

2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में लगातार दो बार बहुमत से ज्यादा सीटें पाकर भाजपा नीत एनडीए की सरकार बन चुकी है। भाजपा अपने चुनावी घोषणा पत्र के कई बड़े और तथाकथित विवादित मुद्दों का हल निकाल चुकी है। 

लोग मानें या ना मानें, लेकिन वो चाहे तीन तलाक का मामला हो, कश्मीर से धारा 370 और 35A हटाने का मामला हो या शरणार्थियों को नागरिकता देने के कानून का, भाजपा ने खुद को ‘चेंजमेकर’ के रूप में स्थापित कर लिया है। 

सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक के बाद आतंकवाद को लेकर ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति को लेकर शायद ही कुछ कहने की जरूरत पड़े। खैर, ये हुई भाजपा के घोषणा पत्र के वादों की बात, अब चलते हैं दूसरी ओर।

बन सकते हैं कई चुनावी समीकरण 

भाजपा ने दक्षिण और पूर्वी भारत के राज्यों में दस्तक देने के साथ अपनी भौगोलिक पहुँच के विस्तार की शुरुआत भी कर दी है। 2021 में तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल, असम और पुडुचेरी (केंद्र शासित प्रदेश) में विधानसभा चुनाव होने हैं। 

पश्चिम बंगाल में भाजपा सत्ता में आने के लिए हर सियासी समीकरण बनाने और रणनीतियाँ अपनाने में जुटी हुई है। पश्चिम बंगाल में 2011 के विधानसभा चुनाव में केवल 4 फीसदी वोट हासिल करने वाली भाजपा, 2016 के चुनाव में 10 फीसदी वोटों तक पहुँच गई। 

वहीं, 2019 लोकसभा चुनाव में चमत्कारिक प्रदर्शन करते हुए 40 फीसदी वोटरों का समर्थन हासिल कर लिया। ऐसे में इस साल होने वाली विधानसभा चुनाव में भाजपा के प्रदर्शन पर सभी की निगाहें टिकी हैं।

असम में भाजपा और सहयोगी दलों के गठबंधन के सामने विपक्षी दलों के सामने अपनी सत्ता बचाने की चुनौती है। फिलहाल, वहाँ भाजपा नीत एनडीए की सरकार मजबूत स्थिति में नजर आ रही है। 

दक्षिण भारत में कर्नाटक को छोड़ दें तो, भाजपा का तमिलनाडु और केरल में कोई खास जनाधार नजर नहीं आता है। लेकिन, स्थानीय चुनावों में भाजपा ने अपनी स्थिति थोड़ी-बहुत मजबूत कर ली है। 

2016 के ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनाव में महज चार सीटें हासिल करने वाली भाजपा ने बीते साल 48 सीटों पर अपना परचम लहराया है। इसे भाजपा की बड़ी उपलब्धि माना जा सकता है। लेकिन, पार्टी को ऐसा प्रदर्शन आगे भी जारी रखना होगा।

राम मंदिर से बदल सकते हैं कई विधानसभा चुनाव के नतीजे

अब आते हैं सबसे खास बात पर, राम मंदिर निर्माण के लिए चलाए जा रहे निधि समर्पण अभियान में 13 करोड़ परिवारों तक पहुँचने का लक्ष्य रखा गया है। निधि समर्पण अभियान 27 फरवरी तक चलाया जाएगा। 

इसके तहत भाजपा, विहिप और आरएसएस के कार्यकर्ता देश भर में घर-घर जाकर चंदा एकत्रित करेंगे। इस अभियान को 2024 लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा की घर-घर में पहुँच बनाने की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है। 

खासकर हिंदी भाषी राज्यों में इस अभियान का व्यापक असर देखने को मिल सकता है। साथ ही 2024 के आम चुनाव से पहले हर साल होने वाले राज्यों के विधानसभा चुनावों पर भी इसका असर पड़ेगा। 2022 के फरवरी-मार्च में देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश समेत उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव होंगे। 

इनमें उत्तर प्रदेश के अलावा चार राज्यों में भाजपा और कॉन्ग्रेस के बीच सीधा मुकाबला होना है। वहीं, 2022 के नवंबर-दिसंबर में गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव होंगे। यहाँ भी कॉन्ग्रेस और भाजपा के बीच ही मुकाबला होना है। 2023 में पूर्वोत्तर के तीन राज्यों मेघालय, नगालैंड और त्रिपुरा में विधानसभा चुनाव होंगे। ऐसे में राम मंदिर निर्माण की तारीख के ऐलान से विपक्ष की बेचैनी बढ़ना लाजिमी है।

साभार : रचना कुमारी

मंत्रिमंडल विस्तार पर भाजपा चुप, नितीश परेशान

बिहार में गठबंधन सरकार में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। वैसे देखा जाये तो जेडीयू – भाजपा ही में कहीं न कहीं खटास है जिसका लाभ लालू का परिवार झपटने को तैयार बैठा है। भाजपा – जेडीयू अपने हालात से अनभिज्ञ नहीं हैं लेकिन मौन हैं। बिहार में लगातार मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चा है लेकिन इसी के बीच अब एक मुद्दा गहराता दिख रहा है। BJP ने अभी तक मंत्रियों के नाम नहीं सौंपे हैं जिसको लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी अब हैरान हैं।

पटना. 

बिहार में सरकार गठन के बाद से लेकर मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर सस्पेंस बना हुआ है। भाजपा की ओर से मंत्रिमंडल के लिए नामों की सूची सामने नहीं आने पर नीतीश कुमार ने हैरानी की बात कही है। उन्होंने आज पत्रकारों से कहा कि मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर उनकी भाजपा के साथ अभी कोई बातचीत नहीं हुई है।

नीतीश कुमार ने सचिवालय स्थित अपने कक्ष में बैठक से लौटने के बाद पत्रकारों के सवाल पर कहा कि इसके पहले कभी भी कैबिनेट विस्तार में इतनी देरी नहीं होती थी। हम लोग शुरू में ही कैबिनेट विस्तार कर लेते थे।

दरअसल, बिहार में कैबिनेट विस्तार में देरी होने पर वहां की वहां सियासी गर्मी बनी हुई है। भाजपा और जदयू के बीच समन्वय नहीं बन पाने की भी खबरें भी आती रहीं हैं। विधान सभा चुनाव 2020 के बाद एनडीए को बहुमत मिलने के बाद 16 नवंबर को सीएम नीतीश के साथ 15 मंत्रियों ने शपथ ली थी। चर्चा थी कि 14 जनवरी के बाद तुरंत मंत्रिमंडल विस्तार भी कर दिया जाएगा। एक दिन पहले बीजेपी के बड़े नेताओं की मुख्यमंत्री नीतीश के आवास पर मुलाकात के बाद यह माना जा रहा था कि नए मंत्रियों के नाम पर मुहर लगनी तय है, लेकिन अभी तक मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर भाजपा की ओर से पत्ते नहीं खोले गए हैं। इसी को लेकर बिहार की राजनीति में कई तरह के कयास भी लग रहे हैं.नीतिश कुमार ने भी बयान देकर इस पर हैरानी जता दी है।

कॉंग्रेस के 19 में से 11 विधाया एनडीए में शामिल होने को तैयार : भरत सिंह

उत्तराखंड में इन्दिरा हृदयेश के ब्यान ने सियासी खलबली मचा दी थी वहीं अब बिहार से कांग्रेस नेता और पूर्व विधायक भरत सिंह का कहना है कि इस बार कांग्रेस के टिकट से 19 विधायक जीते हैं। लेकिन इनमें 11 विधायक ऐसे हैं जो भले ही कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते हों, लेकिन वो कांग्रेस के नहीं है। उन्होंने दावा किया कि इन लोगों ने पैसे देकर टिकट खरीदे और विधायक बन गए.कांग्रेस नेता ने अपने बयान में कहा कि ये सभी वैसे विधायक हैं जिन्होंने चुनाव के समय कांग्रेस का टिकट हासिल कर लिया था, लेकिन पार्टी से उनका कुछ लेना देना नहीं है। कांग्रेस के पूर्व विधायक भरत सिंह का यह बयान ऐसे समय में आया है जब कांग्रेस खुद को एकजुट होने का दावा कर रही है। उनके इस बयान के बाद बिहार में सियासत गरमा गई है।

पटना/नयी दिल्ली:

कॉन्ग्रेस नेता भरत सिंह के दावे ने बिहार का सियासी पारा बढ़ा दिया है। उन्होंने दावा किया कि कॉन्ग्रेस के 19 में से 11 विधायक पार्टी छोड़ने का मन बना चुके हैं। कॉन्ग्रेस नेता भरत सिंह ने इस बात का भी दावा किया कि यह ज्यादातर विधायक वहीं हैं जिन्होंने पैसे के बल पर टिकट हासिल किया था। इसके बाद यह चुनाव जीत गए। भरत सिंह ने साफ-साफ कहा कि पार्टी के 11 विधायक आने वाले दिनों में एनडीए में जा सकते हैं। भरत सिंह ने तो यह भी दावा कर दिया कि कॉन्ग्रेस विधायक दल के नेता अजीत शर्मा भी ऐसे लोगों में शामिल हैं जो पार्टी को तोड़ना चाहते हैं।

सिंह की मानें तो मदन मोहन झा वही रास्ता अपना रहे हैं जो अशोक चौधरी ने अपनाया था। उन्होंने ये भी खुलासा किया कि कॉन्ग्रेस के 11 विधायकों ने पैसे देकर टिकट लिया और जीते। लेकिन अब ये ही 11 विधायक एनडीए में शामिल होने की तैयारी कर रहे हैं।

भरत सिंह ने तो यह भी कह दिया जो विधायक पार्टी छोड़ने को तैयार हैं उनका मार्गदर्शक प्रदेश के पार्टी अध्यक्ष मदन मोहन झा, राज्यसभा सांसद अखिलेश प्रसाद सिंह और वरिष्ठ कॉन्ग्रेसी नेता सदानंद सिंह है। जेडीयू ने कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता के इस बयान पर प्रतिक्रिया दी है। पार्टी प्रवक्ता राजीव रंजन ने कहा है कि भरत सिंह का यह बयान जाहिर करता है कि कॉन्ग्रेस में भगदड़ की स्थिति बनी हुई है। संभवतः इसी कारण शक्ति सिंह गोहिल ने प्रभारी पद से इस्तीफा भी दिया है।

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बता दें कि एक दिन पहले ही बिहार कॉन्ग्रेस प्रभारी और सांसद शक्ति सिंह गोहिल ने आलाकमान को अपने इस्तीफे की पेशकश की थी। उन्होंने एक ट्वीट के जरिए बताया था कि वह अपने स्वास्थ्य कारणों के कारण बिहार के प्रभार से मुक्त होना चाहते हैं। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने बिहार प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल के पद छोड़ने की इच्छा को सहमति दे दी है। गोहिल को बिहार प्रभारी की जिम्मेदारी से मुक्त करते हुए भक्त चरण दास को यह दायित्व सौंप दिया गया है।

यही नहीं अपने दावे में भरत सिंह ने आरजेडी से कॉन्ग्रेस को अलग होने की सलाह भी दी है। आपको बता दें कि विधानसभा चुनाव 2020 में खराब प्रदर्शन के बाद बिहार कॉन्ग्रेस में विवाद की स्थिति बनी हुई है। पार्टी नेताओं में आपसी मतभेद की चर्चाएँ लगातार बनी हुई हैं।

वहीं भरत सिंह का बयान सामने आने के बाद बीजेपी प्रवक्ता निखिल आनंद ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि तुष्टिकरण की राजनीति छोड़ने वालों का स्वागत है। उन्होंने कहा कि बीजेपी की राजनीति विचारधारा प्रेरित है, सत्ता प्रेरित नहीं है। हम किसी को तोड़ने-फोड़ने में विश्वास नहीं करते हैं। बीजेपी प्रवक्ता ने कहा, “कॉन्ग्रेस पार्टी में टूट की खबर पार्टी के भीतर से ही आ रही है। इससे साबित होता है कि पार्टी में भयंकर असंतोष है और दिल्ली या बिहार के नेतृत्व पर लोगों को अब भरोसा नहीं रह गया है। राहुल गाँधी का मन देश से ज्यादा विदेश में लगता है और कॉन्ग्रेस पार्टी अब एड-हॉक या प्रॉक्सी तरीके से चलाई जा रही है।”

देश के पूर्व गृह मंत्री और वरिष्ठ कॉंग्रेस नेता बूटा सिंह नहीं रहे वह 86 वर्ष के थे

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री सरदार बूटा सिंह का आज सुबह निधन हो गया. 86 साल के बूटा सिंह काफी समय से बीमारी चल रहे थे. पंजाब के जालंधर के मुस्तफापुर गांव में जन्मे बूटा सिंह 8 बार लोकसभा के सांसद रहें. उनकी पहचान पंजाब के बड़े दलित नेता के तौर पर रही. उनके परिवार में पत्नी, दो बेटे और एक बेटी हैं.

  • देश के पूर्व गृहमंत्री बूटा सिंह का हुआ निधन
  • लंबी बीमारी के बाद 87 वर्ष की उम्र में निधन
  • नेहरू-गांधी परिवार के विश्वासपात्र रहे सरदार बूटा सिंह कई वरिष्ठ पदों पर रहे आसीन

जयपुर
नए साल में राजस्थान
और देश की राजनीति को एक बड़ा दुख झेलना पड़ा है। देश की पूर्व गृह मंत्री 87 वर्षीय और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बूटा सिंह का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया है। उनके जाने के साथ ही देश-प्रदेश के राजनीतिक क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई है। राजस्थान से भी बूटा सिंह का खास नाता रहा है। आपको बता दें कि सन 1984 से बूटा सिंह राजस्थान की जालोर सीट से चुनाव लड़ते आ रहे थे। 1999 तक उनका यहां बड़ा लंबा राजनैतिक इतिहास रहा है। लेकिन राजस्थान से उनका नाता कैसे जुड़ा , इसके पीछे एक बड़ी दिलचस्प कहानी है। दरअसल नेहरू-गांधी परिवार के खास और विश्वासपात्र माने जाने वाले सरदार बूटा सिंह का राजस्थान की राजनीति में आना संयोगमात्र ही माना जा सकता है। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि जब राजस्थान से उनका नाता जुड़ा, तो राजनैतिक सफऱ के आखिर चुनाव तक उन्होंने राजस्थान को और राजस्थान ने उनका साथ नहीं छोड़ा ।

ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद राजीव गांधी ने दी सुरक्षित सीट
राजनीति के जानकारों की माने तो ऑपरेशन ब्लू स्टार और इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी चाहते थे कि बूटा सिंह को ऐसी सीट से चुनाव लड़वाया जाए, जहां से उनकी जीत निश्चित हो। लिहाजा बूटा सिंह को कांग्रेस का गढ़ कहे जाने वाली जालोर-सिरोही सीट से दी गई। इससे पहले बूटा सिंह 1966 से पंजाब की रोपड की सीट से चुनाव लड़ रहे थे। वहीं पंजाब के दलित कांग्रेसी नेता बूटा सिंह ने हरियाणा की साधना सीट से अपना पहला चुनाव लड़ा था।

पहली बार में जीते, तो दूसरी बार में हारे
आपको बता दें कि 1984 में हुए चुनाव में बूटा सिंह पहली ही मर्तबा में चुनाव जीत गए। लेकिन 1989 में दोबारा जब उन्होंने चुनाव लड़ा, तो बीजेपी और वरिष्ठ नेता भैरोंसिंह शेखावत को उस दौर के वरिष्ठ नेता कैलाश मेघवाल को उनके सामने उतारा गया। लेकिन इस रोमांचक मुकाबले में जीत मेघवाल की हुई। कैलाश मेघवाल चुनाव जीत गए। बूटा सिंह जैसे दिग्गज नेता को हराने के बाद मेघवाल का कद भी बीजेपी में बढ़ गया। लेकिन खास बात यह रही है कि बूटा सिंह ने अपनी सीट नहीं छोड़ी, दोबारा 1991 में जालोर से ही चुनाव जीता। इसी तरह आगे 1999 में सिरोही से सांसद रहे। हालांकि 2004 में जालोर से चुनाव जीतने के बाद उन्हें बिहार का राज्यपाल बनाया गया।

जेडीयू – भाजपा में सब ठीक नहीं

केसी त्यागी ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश की घटना को लेकर जेडीयू ने क्षोभ व्यक्त किया है. बीजेपी को अटल बिहारी वाजपेयी के अटल धर्म को अपनाना चाहिए. जेडीयू ने इस मसले पर बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से बात की है. जेडीयू के विधायकों को अरुणाचल के मंत्रिमंडल में शामिल करने की बात कही गई थी, लेकिन उन्होंने अपने पार्टी में ही शामिल कर लिया. इससे जदयू आहत है. त्यागी ने कहा कि लव जिहाद के घृणात्मक काम को लेकर समाज को बांटा जा रहा है , इसे ठीक नही माना जा रहा है. दरअसल, यूपी के बाद मध्य प्रदेश में भी लव जिहाद को लेकर कानून बनाया जा रहा है. हरियाणा समेत कई अन्य राज्यों में इसकी तैयारी है.

पटना.

बिहार में जेडीयू और भाजपा के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. यह बात हम नहीं, बल्कि खुद जदयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह का वह बयान कह रहा है जिसमें वह अपने पुराने सहयोगी यानी बीजेपी को सब कुछ ठीक नहीं किये जाने की नसीहत दे रहे हैं. दरअसल, अरुणाचल प्रदेश में जेडीयू के 6 विधायकों का बीजेपी (BJP) में चला जाना पार्टी को बिल्कुल रास नहीं आ रहा है और यही कारण है कि इसकी तल्खी अब दोनों दलों के नेताओं के बयान में भी दिख रही है.

आरजेडी-जेडीयू

मंगलवार को खुद पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने जो कुछ कहा उससे स्पष्ट है कि बिहार में भी अरुणाचल प्रदेश के मामले का असर पूरी तरह से पड़ेगा और सब कुछ फिलहाल ठीक नहीं दिख रहा है. अरुणाचल प्रदेश मामले पर जेडीयू को कितना अंदर तक ज़ख़्म लगा है वो बयानो के ज़रिए सामने आने लगा है. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने एक निजी चैनल से बातचीत में कहा कि ये ज़ख़्म बहुत गहरा है, ऐसा भविष्य में न हो इसे बीजेपी को देखना होगा. उन्होंने कहा कि हम तो समर्थन दे रहे थे, लेकिन बावजूद इसके जो घटना घटी वो ठीक नहीं है.

बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी के नीतीश कुमार के समर्थन में बोलने पर वशिष्ठ ने कहा कि सुशील कुमार मोदी जो देखते हैं वही बोलते हैं, लेकिन जो कुछ हो रहा है वो ठीक नहीं है. वशिष्ठ नारायण सिंह ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की कमान आरसीपी सिंह को सौंपे जाने पर कहा कि आने वाले समय में JDU में एक पद एक व्यक्ति का सिद्धांत लागू हो सकता है, इसमें हर्ज क्या है

ग्रेटर हैदराबाद निगम चुनावों में भाजपा की 4 से 49 पर छलांग, ओवैसी ने अपनी जमीन तो बचा ली लेकिन केसीआर का किला ध्वस्त हो गया

ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनाव में पहली बार इतना जोर-शोर दिखा. बीजेपी ने तो इस चुनाव में अपने राष्ट्रीय नेताओं जैसे गृह मंत्री अमित शाह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक को प्रचार के लिए उतार दिया था. चुनाव प्रचार के दौरान AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी ने भी काफी बयानबाजी की .GHMC Election 2020 में कुल 74,44,260 मतदाता हैं, जबकि कुल 1,122 उम्मीदवार अपनी किस्मत को आजमा रहे थे.

  • ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम के चुनाव में बीजेपी की बंपर जीत
  • बीजेपी को 49 सीटों पर मिली जीत
  • तेलंगाना की जनता का आभार: अमित शाह

नयी दिल्ली/हैदराबाद:

ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनाव के नतीजे घोषित हो गए हैं. देश के सबसे बड़े नगर निगम में से एक ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम के चुनाव में बीजेपी ने जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए 49 सीटों पर सीट हासिल की है. वहीं, केसीआर की पार्टी टीआरएस को 56 और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM को 43 सीटों पर जीत मिली. हालांकि इस बार किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला है 150 वार्डों वाले ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम में बहुमत का आंकड़ा 75 है. 

बीजेपी की जीत पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ट्वीट किया है. उन्होंने कहा कि तेलंगाना की जनता ने पीएम मोदी पर भरोसा जताया. तेलंगाना की जनता का आभार. आपको बता दें इस चुनाव के लिए बीजेपी ने पूरी ताकत लगा दी थी. 

अमित शाह और योगी आदित्यनाथ जैसे बीजेपी के स्टार प्रचारकों ने निगम के चुनाव में पार्टी के लिए प्रचार किया था. दोनों ही नेताओं ने हैदराबाद में रोड शो किया था और असदुद्दीन ओवैसी पर जमकर निशाना साधा था. 

बीजेपी बाजीगर बनकर उभरी

नगर निगम के चुनाव में बीजेपी बाजीगर बनकर उभरी है. इस शानदार जीत के बाद सवाल उठता है कि क्या दक्षिण के दुर्ग का दूसरा दरवाजा बीजेपी के लिए जल्द ही खुलनेवाला है. क्या कर्नाटक के बाद बीजेपी दक्षिण के दूसरे राज्यों में भी सत्ता के शिखर पर पहुंचने में कामयाब हो जाएगी. चुनाव तो वैसे नगर निगम का था लेकिन रोमांच किसी लोकसभा-विधानसभा चुनाव से कम नहीं. बीजेपी ने ताकत झोंकी तो नतीजे भी गवाही देने लगे. दक्षिण के दुर्ग में दूसरा दरवाजा खोलने की बीजेपी की रणनीति काम कर गई.

ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम का सियासी रसूख ही कुछ ऐसा है कि इस दुर्ग में जगह बनाना बीजेपी के लिए जरुरी था. यह नगर निगम 4 जिलों में है, जिनमें हैदराबाद, मेडचल-मलकजगिरी, रंगारेड्डी और संगारेड्डी शामिल हैं. पूरे इलाके में 24 विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं तो तेलंगाना की 5 लोकसभा सीटें आती हैं.

यही वजह है कि ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनाव में केसीआर से लेकर बीजेपी, कांग्रेस और असदुद्दीन ओवैसी तक ने दिन रात एक कर दिया, लेकिन पिछली बार हाशिये पर खड़ी बीजेपी ने इस बार कमाल कर दिया. बीजेपी के शानदार परफॉर्मेंस का असर ये होगा कि दक्षिण में कर्नाटक के बाद तेलंगाना, तमिलनाडु और केरल में पैर पसारने में बीजेपी को राहत रहेगी जहां बीजेपी अबतक कामयाबी के लिए बरसों से जी-तोड़ मेहनत कर रही है.  

केसीआर का किला ध्वस्त 

जश्न भले ही टीआरएस खेमे में है लेकिन झटका भी उसे ही लगा है. ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनाव में केसीआर की पार्टी वैसे तो सबसे बड़े प्लेयर बनकर उभरी है लेकिन चुनाव ओवैसी बनाम बीजेपी हो गया. बीजेपी ने इस चुनाव के जरिए दक्षिण के सियासी समंदर की गहराई नापी. वहां की फिजां में लोगों का मूड भांपा. दक्षिण भारत में लोकतांत्रिक विस्तार का तापमान जाना. 

चुनाव प्रचार में ही ओवैसी और बीजेपी जिस तरह एक दूसरे पर प्रहार कर रहे थे उससे लगने लगा था कि टीआरएस के लिए इस बार बहुमत हासिल करना आसान नहीं होगा. ओवैसी ने अपनी जमीन तो बचा ली लेकिन केसीआर का किला ध्वस्त हो गया.

क्यों अहम है हैदराबाद नगर निगम चुनाव

ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम (GHMC) देश के सबसे बड़े नगर निगमों में से एक है. यह नगर निगम 4 जिलों में है, जिनमें हैदराबाद, मेडचल-मलकजगिरी, रंगारेड्डी और संगारेड्डी शामिल हैं. पूरे इलाके में 24 विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं तो तेलंगाना की 5 लोकससभा सीटें आती हैं. यही वजह है कि ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनाव में केसीआर से लेकर बीजेपी, कांग्रेस और असदुद्दीन ओवैसी तक की साख दांव पर लगी हुई है. 

46 फीसदी से अधिक मतदान

इस बार 46.55% मतदान हुआ. 2009 के हैदराबाद नगर निगम चुनाव में 42.04 फीसदी तो 2016 में हुई नगर निगम चुनाव में 45.29 फीसदी लोगों ने ही वोट डाले थे. हालांकि पिछले 2 चुनाव से ज्यादा इस बार वोटिंग दर्ज की गई.

पिछले चुनाव में टीआरएस को मिला था बहुमत

2016 में हुए ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम चुनाव की बात करें तो टीआरएस ने 150 वार्डों में से 99 वार्ड में जीत हासिल की थी, जबकि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM को 44 वार्ड में जीत मिली थी. जबकि बीजेपी महज तीन नगर निगम वार्ड में जीत दर्ज कर सकी थी और कांग्रेस को महज दो वार्डों में ही जीत मिली थी.

एक राष्ट्र एक चुनाव, पक्ष – विपक्ष

2018 में विधि आयोग की बैठक में भाजपा और कांग्रेस ने इससे दूरी बनाए रखी. कॉंग्रेस का विरोध तो जग जाहिर है लेकिन भाजपा की इस मुद्दे पर चुप्पी समझ से परे है. 2018 में ऐसा क्या था कि प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता वाली भाजपा तटस्थ रही और आज मोदी इसका हर जगह इसका प्रचार प्रसार कर रहे हैं? 1999 में तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान विधि आयोग ने इस मसले पर एक रिपोर्ट सौंपी। आयोग ने अपनी सिफारिशों में कहा कि अगर किसी सरकार के खिलाफ विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव लेकर आता है तो उसी समय उसे दूसरी वैकल्पिक सरकार के पक्ष में विश्वास प्रस्ताव भी देना सुनिश्चित किया जाए। 2018 में विधि आयोग ने इस मसले पर एक सर्वदलीय बैठक भी बुलाई जिसमें कुछ राजनीतिक दलों ने इस प्रणाली का समर्थन किया तो कुछ ने विरोध। कुछ राजनीतिक दलों का इस विषय पर तटस्थ रुख रहा। भारत में चुनाव को ‘लोकतंत्र का उत्सव’ कहा जाता है, तो क्या पांच साल में एक बार ही जनता को उत्सव मनाने का मौका मिले या देश में हर वक्त कहीं न कहीं उत्सव का माहौल बना रहे? जानिए, क्यों यह चर्चा का विषय है.

सारिका तिवारी, चंडीगढ़:

हर कुछ महीनों के बाद देश के किसी न किसी हिस्से में चुनाव हो रहे होते हैं. यह भी चुनावी तथ्य है कि देश में पिछले करीब तीन दशकों में एक साल भी ऐसा नहीं बीता, जब चुनाव आयोग ने किसी न किसी राज्य में कोई चुनाव न करवाया हो. इस तरह के तमाम तथ्यों के हवाले से एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘एक देश एक चुनाव’ की बात छेड़ी है. अव्वल तो यह आइडिया होता क्या है? इस सवाल के बाद बहस यह है कि जो लोग इस आइडिया का समर्थन करते हैं तो क्यों और जो नहीं करते, उनके तर्क क्या हैं.

जानकार तो यहां तक कहते हैं ​कि भारत का लोकतंत्र चुनावी राजनीति बनकर रह गया है. लोकसभा से लेकर विधानसभा और नगरीय निकाय से लेकर पंचायत चुनाव… कोई न कोई भोंपू बजता ही रहता है और रैलियां होती ही रहती हैं. सरकारों का भी ज़्यादातर समय चुनाव के चलते अपनी पार्टी या संगठन के हित में ही खर्च होता है. इन तमाम बातों और पीएम मोदी के बयान के मद्देनज़र इस विषय के कई पहलू टटोलते हुए जानते हैं कि इस पर चर्चा क्यों ज़रूरी है.

क्या है ‘एक देश एक चुनाव’ का आइडिया?

इस नारे या जुमले का वास्तविक अर्थ यह है कि संसद, विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनाव एक साथ, एक ही समय पर हों. और सरल शब्दों में ऐसे समझा जा सकता है कि वोटर यानी लोग एक ही दिन में सरकार या प्रशासन के तीनों स्तरों के लिए वोटिंग करेंगे. अब चूंकि विधानसभा और संसद के चुनाव केंद्रीय चुनाव आयोग संपन्न करवाता है और स्थानीय निकाय चुनाव राज्य चुनाव आयोग, तो इस ‘एक चुनाव’ के आइडिया में समझा जाता है कि तकनीकी रूप से संसद और विधानसभा चुनाव एक साथ संपन्न करवाए जा सकते हैं.

पीएम मोदी की खास रुचि

जनवरी, 2017 में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक देश एक चुनाव के संभाव्यता अध्ययन कराए जाने की बात कही. तीन महीने बाद नीति आयोग के साथ राज्य के मुख्यमंत्रियों की बैठक में भी इसकी आवश्यक्ता को दोहराया. इससे पहले दिसंबर 2015 में राज्यसभा के सदस्य ईएम सुदर्शन नचियप्पन की अध्यक्षता में गठित संसदीय समिति ने भी इस चुनाव प्रणाली को लागू किए जाने पर जोर दिया था. 2018 में विधि आयोग की बैठक में भाजपा और कांग्रेस ने इससे दूरी बनाए रखी. चार दलों (अन्नाद्रमुक, शिअद, सपा, टीआरएस) ने समर्थन किया. नौ राजनीतिक दलों (तृणमूल, आप, द्रमुक, तेदेपा, सीपीआइ, सीपीएम, जेडीएस, गोवा फारवर्ड पार्टी और फारवर्ड ब्लाक) ने विरोध किया. नीति आयोग द्वारा एक देश एक चुनाव विषय पर तैयार किए गए एक नोट में कहा गया है कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को 2021 तक दो चरणों में कराया जा सकता है. अक्टूबर 2017 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने कहा था कि एक साथ चुनाव कराने के लिए आयोग तैयार है, लेकिन  निर्णय राजनीतिक स्तर पर लिया जाना है.

क्या है इस आइडिया पर बहस?

कुछ विद्वान और जानकार इस विचार से सहमत हैं तो कुछ असहमत. दोनों के अपने-अपने तर्क हैं. पहले इन तर्कों के मुताबिक इस तरह की व्यवस्था से जो फायदे मुमकिन दिखते हैं, उनकी चर्चा करते हैं.

कई देशों में है यह प्रणाली

स्वीडन इसका रोल मॉडल रहा है. यहां राष्ट्रीय और प्रांतीय के साथ स्थानीय निकायों के चुनाव तय तिथि पर कराए जाते हैं जो हर चार साल बाद सितंबर के दूसरे रविवार को होते हैं. इंडोनेशिया में इस बार के चुनाव इसी प्रणाली के तहत कराए गए. दक्षिण अफ्रीका में राष्ट्रीय और प्रांतीय चुनाव हर पांच साल पर एक साथ करा  जाते हैं जबकि नगर निकायों के चुनाव दो साल बाद होते हैं.

पक्ष में दलीलें

1. राजकोष को फायदा और बचत : ज़ाहिर है कि बार बार चुनाव नहीं होंगे, तो खर्चा कम होगा और सरकार के कोष में काफी बचत होगी. और यह बचत मामूली नहीं बल्कि बहुत बड़ी होगी. इसके साथ ही, यह लोगों और सरकारी मशीनरी के समय व संसाधनों की बड़ी बचत भी होगी.  एक अध्ययन के मुताबिक 2019 के लोकसभा चुनाव पर करीब साठ हजार करोड़ रुपये खर्च हुए. इसमें पार्टियों और उम्मीदवारों के खर्च भी शामिल हैं. एक साथ एक चुनाव से समय के साथ धन की बचत हो सकती है। सरकारें चुनाव जीतने की जगह प्रशासन पर अपना ध्यान केंद्रित कर पाएंगी.

2. विकास कार्य में तेज़ी : चूंकि हर स्तर के चुनाव के वक्त चुनावी क्षेत्र में आचार संहिता लागू होती है, जिसके तहत विकास कार्य रुक जाते हैं. इस संहिता के हटने के बाद विकास कार्य व्यावहारिक रूप से प्रभावित होते हैं क्योंकि चुनाव के बाद व्यवस्था में काफी बदलाव हो जाते हैं, तो फैसले नए सिरे से होते हैं.

3. काले धन पर लगाम : संसदीय, सीबीआई और चुनाव आयोग की कई रिपोर्ट्स में कहा जा चुका है कि चुनाव के दौरान बेलगाम काले धन को खपाया जाता है. अगर देश में बार बार चुनाव होते हैं, तो एक तरह से समानांतर अर्थव्यवस्था चलती रहती है.

4. सुचारू प्रशासन : एक चुनाव होने से सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल एक ही बार होगा लिहाज़ा कहा जाता है कि स्कूल, कॉलेज और ​अन्य विभागों के सरकारी कर्मचारियों का समय और काम बार बार प्रभावित नहीं होगा, जिससे सारी संस्थाएं बेहतर ढंग से काम कर सकेंगी.

5. सुधार की उम्मीद : चूंकि एक ही बार चुनाव होगा, तो सरकारों को धर्म, जाति जैसे मुद्दों को बार बार नहीं उठाना पड़ेगा, जनता को लुभाने के लिए स्कीमों के हथकंडे नहीं होंगे, बजट में राजनीतिक समीकरणों को ज़्यादा तवज्जो नहीं देना होगी, यानी एक बेहतर नीति के तहत व्यवस्था चल सकती है.

ऐसे और भी तर्क हैं कि एक बार में ही सभी चुनाव होंगे तो वोटर ज़्यादा संख्या में वोट करने के लिए निकलेंगे और लोकतंत्र और मज़बूत होगा. बहरहाल, अब आपको ये बताते हैं कि इस आइडिया के विरोध में क्या प्रमुख तर्क दिए जाते हैं.

1. क्षेत्रीय पार्टियां होंगी खारिज : चूंकि भारत बहुदलीय लोकतंत्र है इसलिए राजनीति में भागीदारी करने की स्वतंत्रता के तहत क्षेत्रीय पार्टियों का अपना महत्व रहा है. चूंकि क्षेत्रीय पार्टियां क्षेत्रीय मुद्दों को तरजीह देती हैं इसलिए ‘एक चुनाव’ के आइडिया से छोटी क्षेत्रीय पार्टियों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो जाएगा क्योंकि इस व्यवस्था में बड़ी पार्टियां धन के बल पर मंच और संसाधन छीन लेंगी.

2. स्थानीय मुद्दे पिछड़ेंगे : चूंकि लोकसभा और विधानसभा चुनाव अलग मुद्दों पर होते हैं इसलिए दोनों एक साथ होंगे तो विविधता और विभिन्न स्थितियों वाले देश में स्थानीय मुद्दे हाशिये पर चले जाएंगे. ‘एक चुनाव’ के आइडिया में तस्वीर दूर से तो अच्छी दिख सकती है, लेकिन पास से देखने पर उसमें कई कमियां दिखेंगी. इन छोटे छोटे डिटेल्स को नज़रअंदाज़ करना मुनासिब नहीं होगा.

3. चुनाव नतीजों में देर : ऐसे समय में जबकि तमाम पार्टियां चुनाव पत्रों के माध्यम से चुनाव करवाए जाने की मांग करती हैं, अगर एक बार में सभी चुनाव करवाए गए तो अच्छा खास समय चुनाव के नतीजे आने में लग जाएगा. इस समस्या से निपटने के लिए क्या विकल्प होंगे इसके लिए अलग से नीतियां बनाना होंगी.

4. संवैधानिक समस्या : देश के लोकतांत्रिक ढांचे के तहत य​ह आइडिया सुनने में भले ही आकर्षक लगे, लेकिन इसमें तकनीकी समस्याएं काफी हैं. मान लीजिए कि देश में केंद्र और राज्य के चुनाव एक साथ हुए, लेकिन यह निश्चित नहीं है कि सभी सरकारें पूर्ण बहुमत से बन जाएं. तो ऐसे में क्या होगा? ऐसे में चुनाव के बाद अनैतिक रूप से गठबंधन बनेंगे और बहुत संभावना है कि इस तरह की सरकारें 5 साल चल ही न पाएं. फिर क्या अलग से चुनाव नहीं होंगे?

यही नहीं, इस विचार को अमल में लाने के लिए संविधान के कम से कम छह अनुच्छेदों और कुछ कानूनों में संशोधन किए जाने की ज़रूरत पेश आएगी.

“पांच टीएमसी सांसद किसी भी वक्त इस्तीफा दे सकते हैं और बीजेपी में शामिल हो सकते हैं.” अर्जुन सिंह

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और सांसद अर्जुन सिंह ने दावा किया है कि तृणमूल कांग्रेस के सांसद और पार्टी के बड़े नेता सौगत रॉय कैमरे के सामने टीएमसी नेता होने का दावा कर रहे हैं. इतना ही नहीं उन्होंने कहा कि टीएमसी एक पांच सांसद किसी भी वक्त पार्टी से इस्तीफा दे सकते हैं. सिंह शनिवार को नॉर्थ 24 परगनास जिले के जगदल घाट पर छठ पूजा में पहुंचे थे. उन्होंने कहा ‘मैं बार-बार कह रहा हूं कि पांच टीएमसी सांसद किसी भी वक्त इस्तीफा दे सकते हैं और बीजेपी (BJP) में शामिल हो सकते हैं.’

कोलकतता/नयी दिल्ली:

जैसे-जैसे पश्चिम बंगाल में चुनाव की घड़ी नजदीक आ रही है वैसे-वैसे राजनीतिक पारा बढ़ता जा रहा है। ममता बनर्जी के सबसे करीबी माने जाने वाले दिग्गज टीएमसी नेता शुभेंदु अधिकारी के बीजेपी में शामिल होने की खबरों के बीच एक और बड़ी जानकारी सामने आई है। अब भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष और बैरकपुर के सांसद अर्जुन सिंह ने दावा किया है कि तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के पाँच सांसद कभी भी इस्तीफा दे देंगे। बता दें कि राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव होना है।

भाजपा सांसद अर्जुन सिंह ने दावा किया है कि तृणमूल कॉन्ग्रेस के सांसद सौगत राय समेत चार अन्य सांसद जल्द ही पार्टी से इस्तीफा देकर बीजेपी में शामिल हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि सौगत रॉय (टीएमसी सांसद) कैमरे के सामने टीएमसी नेता होने का दिखावा करते हैं। 

अर्जुन सिंह ने शनिवार (नवंबर 21, 2020) को दावा किया कि सौगत राय टीएमसी से इस्तीफा देना चाहते हैं। सांसद अर्जुन सिंह ने कहा, “मैं बार-बार कह रहा हूँ कि पाँच टीएमसी सांसद कभी भी इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो जाएँगे।” जब उनसे पूछा गया कि क्या इन 5 नामों में सौगत राय भी शामिल हैं, तो अर्जन सिंह ने कहा, “कैमरे के सामने सौगत राय टीएमसी नेता और ममता बनर्जी का मीडिएटर होने का ढोंग कर रहे हैं। लेकिन एक बार कैमरा घूमेगा, आप इस लिस्ट में उनका नाम भी शामिल कर सकेंगे।”

गौरतलब है कि सौगत राय तृणमूल कॉन्ग्रेस के बड़े नेता हैं। भाजपा सांसद का ये बयान ऐसे समय में आया है जब हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पश्चिम बंगाल का दौरा कर लौटे हैं।

बीजेपी सांसद ने आगे कहा, “शुभेंदु अधिकारी एक बड़े जनाधार वाले नेता हैं। ममता बनर्जी आज बड़ी नेता हैं क्योंकि शुभेंदु अधिकारी और उनके जैसे कई नेताओं ने संघर्ष किया है। पार्टी के लिए अपना खून दिया है, लेकिन अब ममता बनर्जी उन सब का बलिदान भूल कर अपने भतीजे को कुर्सी पर बैठाना चाहती हैं। कोई भी बड़ा नेता यह स्वीकार नहीं कर सकता। जिस तरह से शुभेंदु अधिकारी जैसे नेताओं का अपमान किया गया है, उन्हें टीएमसी छोड़ देनी चाहिए।”

उन्होंने कहा कि शुभेंदु एक बड़े नेता हैं, उनका हमेशा भारतीय जनता पार्टी में स्वागत है। बीजेपी पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने जा रही है। शुभेंदु जैसे ही बीजेपी में शामिल होंगे, ममता सरकार ज्यादा दिनों तक प्रदेश में टिक नहीं पाएगी। यह सरकार खत्म हो जाएगी।

उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों तृणमूल कॉन्ग्रेस के लोकप्रिय नेता और परिवहन मंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बगावती तेवर दिखाते हुए नंदीग्राम दिवस पर टीएमसी से अलग रैली की थी। अधिकारी की रैली में सूबे की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तस्वीर भी नहीं थे। यहीं नहीं उन्होंने अपनी रैली में भारत माता की जय के नारे भी लगाए।

सुशील मोदी ने ट्वीट कर तेजश्वि को उनके जमानत पर बाहर होने की बात याद दिलाई

सुशील मोदी ने गुरुवार को ट्वीट किया कि तेजस्वी यादव को भी इस्तीफा दे देना चाहिये। माइक्रो ब्लॉगिंग साइट पर उन्होंने लिखा कि तेजस्वी यादव भ्रष्टाचार से जुड़े इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कारपोरेशन (IRCTC) घोटाले में आरोपित हैं। सुशील मोदी ने कहा कि तेजस्वी यादव मामले में न केवल चार्जशीटेड हैं बल्कि अभी जमानत पर हैं। कोरोना के कारण भष्ट्राचार के मामले का ट्रायल रुका हुआ है। किसी भी दिन घोटाले की जांच फिर शुरू हो सकती है। आने वाले दिनों में नेता प्रतिपक्ष के पद पर आसीन होने से पहले उन्हे इन आरोपों पर सफाई देनी चाहिए।

पटना:  

बिहार में नई सरकार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में बन गई है, लेकिन विवादों से दामन अब भी नहीं छूट रहा है. नीतीश सरकार में शिक्षा मंत्री बने डॉ. मेवालाल चौधरी ने विरोधी दलों के भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद अपने पद से इस्‍तीफा दे दिया है. जबकि उन्‍होंने तीन पहले ही मंत्री पद की शपथ ली थी. जबकि डॉ. मेवालाल चौधरी के इस्‍तीफे के बाद बिहार के पूर्व उपमुख्‍यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने आरजेडी और तेजस्‍वी यादव पर पलटवार किया है.

सुशील मोदी ने ट्वीट कर साधा निशाना

बिहार के पूर्व उपमुख्‍यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने ट्वीट करते हुए लिखा, ‘तेजस्वी यादव को भी इस्तीफा देना चाहिए क्योंकि वो भ्रष्टाचार से जुड़े आईआरसीटीसी (IRCTC) घोटाले में न केवल चार्जशीटेड बल्कि जमानत पर हैं. कोविड के कारण ट्रायल (trial) रुका हुआ था और यह किसी भी दिन शुरू हो सकता है.

विवादों में घिरे शिक्षा मंत्री ने किया पदभार ग्रहण, फिर दिया इस्‍तीफा

विवादों में घिरे शिक्षा मंत्री डॉ. मेवालाल चौधरी ने आज ही पदभार ग्रहण किया. इस दौरान उन्‍होंने कहा कि जो हमारे खिलाफ बोल रहे हैं और यह कह रहे है कि मेरी पत्नी की मौत के लिए मैं जिम्मेवार हूं, उनके खिलाफ आज ही 50 करोड़ की मानहानि का केस करूंगा और आज ही उनके पास लीगल नोटिस जाएगा, लेकिन शाम होते होते उन्‍होंने इस्‍तीफा देकर सभी को चौंका दिया है. आपको बता दें कि बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) के कुलपति रहते समय मेवालाल चौधरी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे और उन पर एफआईआर भी दर्ज हुई थी. इसके बाद जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) से उन्हें निलंबित कर दिया गया था. यही वजह है कि विपक्ष लगातार नीतीश सरकार को टारगेट पर ले रही है.जबकि आज भी तेजस्‍वी यादव ने ट्वीट कर नीतीश कुमार पर हमला बोला है.  उन्‍होंने कहा, ‘मैंने कहा था ना आप थक चुके है इसलिए आपकी सोचने-समझने की शक्ति क्षीण हो चुकी है.जानबूझकर भ्रष्टाचारी को मंत्री बनाया, थू-थू के बावजूद पदभार ग्रहण कराया और कुछ घंटे बाद इस्तीफ़े का नाटक रचाया. असली गुनाहगार आप हैं. आपने मंत्री क्यों बनाया??आपका दोहरापन और नौटंकी अब चलने नहीं दी जाएगी?

मेवालाल पर हैं ये आरोप

गौरतलब है कि तारापुर के नवनिर्वाचित जेडीयू विधायक डॉ. मेवालाल चौधरी को पहली बार कैबिनेट में शामिल किया गया है. राजनीति में आने से पहले वर्ष 2015 तक वह भागलपुर कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति थे. वर्ष 2015 में सेवानिवृत्ति के बाद राजनीति में आए. इसके बाद जदयू से टिकट लेकर तारापुर से चुनाव लड़े और जीत गए. लेकिन, चुनाव जीतने के बाद डॉ. चौधरी नियुक्ति घोटाले में आरोपित किए गए. कृषि विश्वविद्यालय में नियुक्ति घोटाले का मामला सबौर थाने में वर्ष 2017 में दर्ज किया गया था. इस मामले में विधायक ने कोर्ट से अंतरिम जमानत ले ली थी.

कॉन्ग्रेस पार्टी की जमीन पर संगठन के तौर पर मौजूदगी ही नहीं है : चिदंबरम

चिदंबरम ने पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि पार्टी को बिहार में इतनी ज्यादा सीटों पर चुनाव नहीं लड़ना चाहिए था. कांग्रेस के पास गिरती अर्थव्यवस्था और कोरोनावायरस संकट के मुद्दे थे, लेकिन पार्टी उसपर भी कैंपेनिंग करके अच्छी मौजूदगी नहीं जता पाई, इस पर सवाल पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि ‘मुझे गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक के उपचुनावों की चिंता ज्यादा है. यह नतीजे दिखाते हैं कि या तो पार्टी की जमीन पर संगठन के तौर पर मौजूदगी ही नहीं है, या फिर बहुत ज्यादा कम हुई है।’ उन्होंने कहा, ‘बिहार में, आरजेडी-कांग्रेस के पास जीतने का मौका था। जीत के इतने करीब होने के बावजूद हम क्यों हारे, इस पर बहुत ही गहराई से विचार करने की जरूरत है। याद कीजिए, कांग्रेस को राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड जीते हुए बहुत ज्यादा वक्त नहीं हुआ है।’

चंडीगढ़/नयी दिल्ली :

हाल ही में हुए बिहार विधानसभा चुनावों और कई राज्यों के उपचुनावों में लचर प्रदर्शन के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी को अपने ही दिग्गज नेताओं से तीखी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। इस कड़ी में कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल के बाद अब यूपीए सरकार में वित्त मंत्री रहे पी चिदंबरम ने बयान दिया है। उन्होंने कॉन्ग्रेस के नीतिगत ढाँचे की आलोचना करते हुए कहा कि पार्टी के प्रदर्शन में पिछले कुछ समय से लगातार गिरावट ही आई है। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस को इतना साहसी बनना होगा कि गिरावट के उन कारणों को पहचाने और उन पर काम करे। 

कॉन्ग्रेस नेता पी चिदंबरम की तरफ से यह प्रतिक्रिया बिहार विधानसभा और मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश उपचुनाव में दयनीय प्रदर्शन के बाद सामने आई है। चिदंबरम ने कहा कि कॉन्ग्रेस ने अपनी संगठनात्मक क्षमता से ज़्यादा सीटों पर चुनाव लड़ा। एक दैनिक को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कॉन्ग्रेस के प्रदर्शन पर खुल कर आलोचना की। चिदंबरम ने कहा कि उपचुनाव इस बात प्रमाण हैं कि कॉन्ग्रेस की संगठनात्मक दृष्टिकोण से कोई पकड़ नहीं रह गई है। इतना ही नहीं जिन राज्यों में उपचुनाव हुए हैं उनमें कॉन्ग्रेस कमज़ोर ही हुई है। 

सनद रहे :

महागठबंधन की हार अपना नज़रिया रखते हुए कॉन्ग्रेस नेता ने कहा कि महागठबंधन के जीतने की उम्मीदें थीं फिर भी हम जीतते जीतते हार गए। इन तमाम आलोचनात्मक दलीलों के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी के लिए आशावादी नज़र आते हुए उन्होंने कहा कि कुछ ही समय पहले कॉन्ग्रेस ने हिन्दी बेल्ट 3 राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनावों में जीत हासिल की थी। 

इसके बाद एआईएमआईएम और सीपीआई (एमएल) का उल्लेख करते हुए चिदंबरम ने कहा कि छोटे दल अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं क्योंकि इनकी ज़मीनी स्तर पर पकड़ बेहद मजबूत है। कॉन्ग्रेस, राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन की सबसे कमज़ोर कड़ी साबित हुई है। पार्टी को तमाम तरह के बदलावों की ज़रूरत है और ऐसे बदलाव नहीं होने की सूरत में राजनीतिक नुकसान बढ़ता ही जाएगा। 

पार्टी की तरफ से तीखी प्रतिक्रिया आई:

लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने एक निजी चैनल से बातचीत में वरिष्ठ कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल के हाल के विवादित बयान पर नाराज़गी जताते हुए कहा ”जिन नेताओं को लगता है की कांग्रेस उनके लिए सही पार्टी नहीं है वे नई पार्टी बना सकते हैं. अगर वे चाहें तो किसी दूसरी पार्टी को ज्वाइन कर सकते हैं. कांग्रेस में रहकर इस तरह की लज्जाजनक बयानबाज़ी से पार्टी की विश्वसनीयता कमज़ोर होती है.” अधीर रंजन चौधरी ने आगे कहा “कपिल सिब्बल पार्टी की स्थिति से नाखुश हैं. क्या वे बिहार या उत्तर प्रदेश गए थे चुनाव अभियान में? बिना ज़मीन पर पार्टी के लिए काम किए बगैर इस तरह के बयान देने का कोई मतलब नहीं है.”  

अंत में कॉन्ग्रेस नेता ने कहा कि पार्टी ने अपनी संगठनात्मक क्षमता से ज़्यादा सीटों पर चुनाव लड़ा। यह एक बड़ा कारण था कि कॉन्ग्रेस इतनी कम सीटों पर जीत हासिल हुई जबकि भाजपा और उसके सहयोगी दल पिछले 20 वर्षों से चुनाव जीत रहे हैं। पार्टी को सिर्फ 45 उम्मीदवार उतारने चाहिए थे, शायद तब बेहतर नतीजे हासिल होते। इसके ठीक पहले कॉन्ग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने भी संगठन के शीर्ष नेतृत्व पर कई सवाल खड़े किए थे। 

उनका कहना था कि हार दर हार के बाद पार्टी के नेतृत्व ने इस प्रक्रिया को अपनी नियति मान कर स्वीकार कर लिया। कपिल सिब्बल के इस बयान पर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सलमान खुर्शीद ने आलोचना की थी। इन्होंने यहाँ तक कह दिया था कि पार्टी के भीतर रह कर पार्टी को नुकसान पहुँचाने वाले नेता खुद बाहर चले जाएं। इसके अलावा लोकसभा में कॉन्ग्रेस के नेता प्रतिपक्ष अधीर रंजन ने भी कपिल सिब्बल के बयान पर प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने कहा था कि कपिल सिब्बल को पार्टी छोड़ ही देनी चाहिए।