राणा को उनकी तथाकथित रचनात्मक स्वतंत्रता के लिए जवाबदेह बनाया जाना चाहिए

मुनव्वर राणा अपने ट्विटर अकाउंट पर शायरी की पंक्तियां ट्वीट करते रहते हैं। इसी तरह उन्होंने रविवार को भी एक ट्वीट किया, जिसपर बवाल मच गया। राणा ने अपने ट्वीट में लिखा, ”इस मुल्क के लोगों को रोटी तो मिलेगी, संसद को गिराकर वहां कुछ खेत बना दो। अब ऐसे ही बदलेगा किसानों का मुकद्दर, सेठों के बनाए हुए गोदाम जला दो। मैं झूठ के दरबार में सच बोल रहा हूं, गर्दन को उड़ाओ, मुझे या जिंदा जला दो।” हालांकि, बाद में मुनव्वर राणा ने ट्वीट को डिलीट कर दिया, लेकिन तब तक लोग स्क्रीनशॉट ले चुके थे और उसे शेयर कर रहे थे।इससे पहले राणा ने अपने बयान के जरिए पेरिस में शिक्षक का गला रेतने वाले आतंकी का बचाव किया था। उन्होंने कहा था कि अगर उस लड़के की जगह वह होते तो भी यही करते। विवादित शायर मुनव्वर राणा के इस बयान को लेकर काफी बवाल हुआ था।

नयी द्ल्लि/लखनऊ:

उर्दू शायर मुनव्वर राणा ने रविवार (जनवरी 10, 2021) को सोशल मीडिया पर अपने कविता के माध्यम से भीड़ को उकसाने का प्रयास किया। उन्होंने ट्वीट करते हुए लोगों से संसद भवन गिराने और गोदामों को जला देने का आह्वान किया। हालाँकि अब उन्होंने यह ट्वीट डिलीट कर दिया है।

मुनव्वर राणा ने ट्वीट करते हुए लिखा था, “इस मुल्क के कुछ लोगों को रोटी तो मिलेगी, संसद को गिरा कर वहाँ कुछ खेत बना दो। अब ऐसे ही बदलेगा किसानों का मुकद्दर, सेठों के बनाए हुए गोदाम जला दो। मैं झूठ के दरबार में सच बोल रहा हूँ, गर्दन को उड़ाओ, मुझे या जिंदा जला दो।”

इससे पहले राणा ने अपने बयान के जरिए पेरिस में शिक्षक का गला रेतने वाले आतंकी का बचाव किया था। उन्होंने कहा था कि अगर उस लड़के की जगह वह होते तो भी यही करते। विवादित शायर मुनव्वर राणा के इस बयान को लेकर काफी बवाल हुआ था। बता दें कि पिछले दिनों पेरिस में शिक्षक सैमुअल पैटी ने अपनी कक्षा में छात्रों के सामने पैगंबर मोहम्मद का विवादित कैरिकेचर दिखा दिया था। इसके बाद एक कट्टरपंथी छात्र ने उन्हें दिनदहाड़े बेरहमी से मार डाला था। 

अब कोई यह तर्क दे सकता है कि एक कवि के रूप में राणा उपमा या अलंकारों की बात कर सकते हैं। उनके कहने का मतलब वाकई में यह नहीं हो सकता कि गोदाम को आग लगा देना चाहिए, संसद को गिरा देना चाहिए। तो अब यह तर्क देने का कोई मतलब नहीं रहता है, क्योंकि उपमाओं के प्रयोग करने की क्रिएटिव लिबर्टी को पहले ही दरकिनार कर दिया गया है। 2013 में एक अन्य कवि और गीतकार जावेद अख्तर ने आजाद मैदान दंगों पर कविता लिखने के लिए एक महिला पुलिस अधिकारी को बर्खास्त करने की माँग की थी।

11 अगस्त 2012 को, रजा अकादमी के नेतृत्व में मुस्लिम संगठनों ने असम और म्यांमार में मुसलमानों पर कथित अत्याचारों के विरोध में आजाद मैदान मैदान में हिंसा की थी। आजाद मैदान में मुस्लिम संगठनों द्वारा रखाइन दंगों और असम दंगों की निंदा करने के लिए विरोध-प्रदर्शन किया गया, जो बाद में दंगे में बदल गया।

असम और राखाइन दंगों की निंदा करने के लिए, रज़ा अकादमी ने विरोध रैली का आयोजन किया था। हालाँकि, एक कुख्यात समूह के पुलिसकर्मियों पर हमला करने के बाद विरोध-प्रदर्शन हिंसक हो गया, जिसमें पुलिस की गोलीबारी में दो लोग मारे गए और 58 पुलिसकर्मियों सहित 63 लोग घायल हो गए।

दंगों के दौरान मौजूद पुलिस अधिकारी सुजाता पाटिल ने इस पर एक कविता लिखी थी। इसमें सुजाता ने उन चीजों का जिक्र किया था, जो उन्होंने वहाँ पर देखा था।

जावेद अख्तर उनकी कविता से बेहद निराश हो गए और उन्होंने उनकी कविता को ‘सांप्रदायिक’ कहा।

इसके बाद सुजाता पाटिल को माफी माँगनी पड़ी, तब जाकर उनकी नौकरी बची। इस तरह सभी के लिए एक ही तरह का व्यवहार होना चाहिए। राणा को भी उनकी तथाकथित रचनात्मक स्वतंत्रता के लिए जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।

अपनी बात रखने का हकः राणा
अपने विवादित ट्वीट पर मीडिया से बातचीत करते हुए मुनव्वर राणा ने कहा कि किसी भी देश को दो संसद की जरूरत नहीं होती है। जब देश में एक नई संसद बन रही है तो पुरानी संसद की क्या जरूरत है ऐसे में इस जगह को किसी और काम में भी लिया जा सकता है। मुझे अपनी बात कहने का पूरा हक है इसलिए मैं अपनी बात जरूर कहूंगा, किसान अपना फैसला खुद करें। साथ ही उन्होंने ये भी बताया कि ये ट्वीट उन्होंने डिलीट भी कर दिया है

भाषाओं को बचाता है अनुवाद : डॉ. चंद्र त्रिखा

Chandigarh January 1, 2021

किसी भी भाषा की गतिशीलता और तरक्की उस भाषा से और उस भाषा में होने वाले अनुवाद पर निर्भर करती है। कोई भाषा कहां तक पहुंचेगी, उसमें अनुवाद की बड़ी भूमिका होती है। अतः हमें अनुवाद की ताकत को पहचानना चाहिए। यह तथ्य पंजाब विश्वविद्यालय के यू.जी.सी. – एच.आर.डी.सी. द्वारा आयोजित दो सप्ताह के भाषा शिक्षकों के लिए पुनश्चर्या पाठ्यक्रम (रिफ्रेशर कोर्स) के दौरान उभरकर सामने आया। पंजाब विश्वविद्यालय की ओर से “अनुवाद की संस्कृति व संस्कृति का अनुवाद” विषय पर आयोजित यह पहला ऑनलाइन रिफ्रेशर कोर्स आज संपन्न हो गया।इसके समापन सत्र में हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला के कुलाधिपति प्रो. हरमहेंद्र सिंह बेदी मुख्य वक्ता के तौर पर शामिल हुए जबकि हरियाणा साहित्य अकादमी व हरियाणा उर्दू अकादमी, पंचकूला के निदेशक डॉ. चंद्र त्रिखा मुख्य अतिथि थे। 

डॉ. चंद्र त्रिखा ने इस अवसर पर कहा कि भाषाएं अनुवाद के माध्यम से केवल बढ़ती ही नहीं है बल्कि बचती भी हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि उर्दू अदब आज यदि युवा पीढ़ी के बीच जिंदा है तो वो अनुवाद के कारण ही है।

प्रो. बेदी ने अनुवाद के महत्त्व को रेखांकित करते हुए गुरुवाणी का उदाहरण देते हुए बताया कि इसमें हिंदी, फ़ारसी, ब्रज, पंजाबी इत्यादि भाषाओं के संतों की वाणी गुरु ग्रंथ साहिब में गुरुमुखी लिपि में संकलित की गई है। वैश्विक वाङ्मय के पीछे अनुवाद की बहुत बड़ी भूमिका है और इसके माध्यम से ही यह ज्ञात हुआ है कि ऋग्वेद सबसे प्राचीन ग्रंथ है जिसमें एशिया की संस्कृति का सूक्ष्म वर्णन मिलता है।

एचआरडीसी के निदेशक प्रो. एसके तोमर ने कहा कि नई शिक्षा नीति में अनुवाद के महत्व को समझते हुए राष्ट्रीय स्तर पर एक श्रेष्ठ अनुवाद संस्थान स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने कहा कि अनुवाद के माध्यम से सभी भारतीय भाषाओं की ज्ञान संपदा पूरी दुनिया तक पहुंच सकती है।

रिफ्रेशर कोर्स के कोर्स समन्वयक व हिंदी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. गुरमीत सिंह ने समापन सत्र में दो सप्ताह के रिफ्रेशर कोर्स की रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए उम्मीद जताई कि कोर्स के दौरान अनुवाद के विविध पक्षों पर हुई सार्थक चर्चा को प्रतिभागी अपने क्षेत्रों और विद्यार्थियों के बीच आगे बढ़ाएंगे और इसके माध्यम से अनुवाद की एक ऐसी  संस्कृति विकसित हो पाएगी जिसमें सभी भारतीय भाषाएं एक साथ आगे बढ़ पाएंगी। कोर्स में शामिल प्रतिभागियों राजेश जानकर, वेदव्रत, पूजा रावल और गुरप्रीत रायकोट ने समापन सत्र में अपने अनुभव साझे करते हुए कहा कि कोर्स में बहुत कुछ नया सीखने को मिला। एचआरडीसी की उप निदेशक डॉ. जयंती दत्ता ने सभी का धन्यवाद किया।

 इस रिफ्रेशर कोर्स में भारत के 10 राज्यों हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, चंडीगढ़, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली एवं राजस्थान से भाषा के शिक्षकों ने हिस्सा लिया। जिसमें अंग्रेजी के 13, हिंदी के 11, पंजाबी के 5, संस्कृत के 7 और मराठी के 1 शिक्षक शामिल हैं। इस कोर्स में अलग – अलग विषयों तथा क्षेत्रों से सम्बन्धित देश – विदेश के लगभग 30 विषय विशषज्ञों ने व्याख्यान दिए। इनमें प्रो. शिव कुमार सिंह (पुर्तगाल), प्रो. आनंदवर्धन शर्मा (बुल्गारिया), प्रो. भीम सिंह दहिया (पूर्व कुलपति, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय), श्री बालेंदु शर्मा दाधीच (निदेशक माइक्रोसॉफ्ट), डॉ. चंद्र त्रिखा (निदेशक हरियाणा उर्दू अकादमी, पंचकूला), प्रो.अनघा भट्ट(पुणे) , डॉ. धनंजय चोपड़ा (इलाहाबाद), प्रो. शशि मुदिराज (हैदराबाद), प्रो. प्रभाकर सिंह (बीएचयू, बनारस), श्री विनोद संदलेश (संयुक्त निदेशक, केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो, दिल्ली), प्रो. शाशिधरन (कोची,केरल), प्रो. दिलीप शाक्य व प्रोफेसर खालिद जावेद (जामिया,नई दिल्ली), प्रो. सुधीर प्रताप सिंह (जेएनयू, नई दिल्ली), प्रो. कुमुद शर्मा (दिल्ली विश्वविद्यालय), प्रो. विजय लक्ष्मी (मणिपुर) एवं प्रो. दिनेश चमोला( हरिद्वार) शामिल हैं।

न्याय पालिका को चुनौती देता महाराष्ट्र विधान मण्डल का प्रस्ताव

न्यायपालिका की शक्तियों की सीमाओं पर सवाल उठाते हुए, महाराष्ट्र राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों ने मंगलवार को यह कहते हुए प्रस्ताव पारित किए कि वे गणतंत्र टीवी संपादक के खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव में उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भेजे गए किसी भी नोटिस का जवाब नहीं देंगे।

मुंबई/नयी दिल्ली :

रिपब्लिक टीवी ग्रुप के एडिटर इन चीफ अर्नब गोस्वामी के खिलाफ लाए गए विशेषाधिकार उल्लंघन प्रस्ताव पर विधायिका और न्यायपालिका आमने-सामने आ गई है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ मंगलवार को विधानसभा और विधान परिषद में एक प्रस्ताव पास हुआ है, जिसमें कहा गया है कि अर्नब मामले में सदन हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के किसी भी नोटिस का न तो संज्ञान लेगा और न ही इसका जवाब देगा।

बता दें कि महाराष्ट्र में दो दिन का शीतकालीन सत्र चल रहा था, इसके आखिरी दिन दोनों सदनों में यह प्रस्ताव बहुमत से पाश हुआ है। हालांकि, भारतीय जनता पार्टी के कुछ नेताओं ने इसका विरोध किया है। विधानसभा स्पीकर नाना पटोले ने इसके एकमत से पास होने का ऐलान करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी किसी नोटिस और समन का स्पीकर और डिप्टी स्पीकर नरहरि जिरवाल कोई जवाब नहीं देंगे।

‘यह संविधान के आधारभूत ढांचे के खिलाफ’
सदन में पेश प्रस्ताव में कहा गया है कि कोर्ट के किसी नोटिस का जवाब देने का मतलब होगा कि न्यायपालिका आगे विधायिका की निगरानी कर सकती है और यह संविधान के आधारभूत ढांचे के खिलाफ होगा। विधानसभा में स्पीकर नाना पटोले ने कहा कि संविधान ने सरकार के तीनों अंग- न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के लिए कुछ सीमाएं निर्धारित की हैं। हर अंग को इन सीमाओं का सम्मान करना चाहिए। किसी को भी एक-दूसरे की सीमाओं में हस्तक्षेप की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

नोटिस का जवाब देने का मतलब-न्यायपालिका को विधायिका पर निगरानी रखने का अधिकार देना
विधान परिषद में अध्यक्ष रामराजे नाइक निंबलकर ने भी प्रस्ताव एकमत से पारित होने का ऐलान किया। इसमें भी कहा गया है कि अगर अर्नब गोस्वामी विशेषाधिकार उल्लंघन की कार्यवाही को न्यायपालिका में चुनौती देते हैं, तो सदन हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी किए गए किसी नोटिस और समन का जवाब नहीं देगा। निंबलकर ने कहा कि सार्वजनिक तौर पर विधायिका, सचिवालय और उसके सचिव और अन्य अफसर अगर कोर्ट नोटिस का जवाब देते हैं, तो इसका मतलब होगा कि वे न्यायपालिका को विधायिका पर निगरानी रखने का अधिकार दे रहे हैं और यह संविधान के आधारभूत ढांचे का ही उल्लंघन है।

अर्नब के खिलाफ इसलिए जारी हुआ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव
विधानसभा अध्यक्ष की अनुमति के बिना सदन की कार्यवाही की प्रति उच्चतम न्यायालय में जमा करने के मामले में महाराष्ट्र विधानसभा सचिवालय ने रिपब्लिक टेलीविजन के प्रधान संपादक अर्नब गोस्वामी को विशेषाधिकार हनन का नोटिस जारी किया है। अर्नब को 13 अक्टूबर को नोटिस जारी किया गया था और इसके बाद उन्हें चार बार अपना स्पष्टीकरण दर्ज करवाने का नोटिस भेजा गया, लेकिन वे एक भी बार उपस्थित नहीं हुए।

इससे पहले 16 सितंबर को दो दिवसीय मानसून सत्र के दौरान अर्नब के खिलाफ शिवसेना विधायक प्रताप सरनाईक द्वारा विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पेश किया गया था। इस पर विधानसभा सचिवालय ने विशेषाधिकार हनन का नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण देने को कहा था।

सरनाईक ने अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत मामले में प्रस्तुत कार्यक्रम में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और अन्य मंत्रियों को संबोधित करने के तरीके पर आपत्ति जताई थी। इस नोटिस पर पांच अक्टूबर की मियाद पूरी होने तक जवाब नहीं आने पर स्मरण-पत्र भेजकर 20 अक्टूबर तक जवाब तलब किया गया है।

नंदीग्राम का नायक शुभेन्दु अधिकारी बागी क्यूँ, देखें क्या रंग लाती है चुनावी बयार?

कभी नंदीग्राम में ममता बनर्जी के लिए सिपाही की भूमिका निभाने वाले शुभेंदु अधिकारी आखिर अब बागी क्यों हो गए हैं? शुभेंदु ने बुधवार को हल्दिया में एक सहकारी समिति की ओर से आयोजित कार्यक्रम में कहा कि ‘मैं कड़ी मेहनत से ऊंचाई तक पहुंचा हूं. मैं निर्वाचित नेता हूं. मैं चयनित या नामित नेता नहीं हूं।’ उनका यह बयान सहकारी समिति में अध्यक्ष निर्वाचित होने के बाद सामने आया। माना जा रहा है कि ऐसा करके शुभेंदु अधिकारी पार्टी के नीति नियंताओं पर निशाना साधा है। उस रैली में शुभेंदु ने कहा था कि पत्रकार और राजनैतिक पर्यवेक्षक मेरे राजनीतिक कार्यक्रम की घोषणा करने के लिए मेरा इंतजार कर रहे हैं। वे मुझे उन बाधाओं के बारे में बात करते हुए सुनना चाहते हैं जो मैं झेल रहा हूं और जो रास्ता मैं लेने जा रहा हूं। मैं इस पवित्र मंच से अपने राजनीतिक कार्यक्रम की घोषणा नहीं करूंगा। 

राजविरेन्द्र वसिष्ठ, चंडीगढ़/हल्दिया (प बंगाल) :

पश्चिम बंगाल में अगले साल विधानसभा चुनाव है, मगर सियासी सरगर्मियां अभी से ही तेज हो गई हैं। एक ओर जहां भारतीय जनता पार्टी ने अपनी तैयारियां तेज कर दी है, दूसरी ओर ममता बनर्जी के सबसे करीबी माने जाने वाले दिग्गज टीएमसी नेता शुभेंदु अधिकारी ने बगावत की आवाज बुलंद कर दी है। चुनाव सिर पर है, मगर पश्चिम बंगाल सरकार में परिवहन मंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बागी तेवर अपना कर ममता बनर्जी को एक नई टेंशन दे दी है। यह टेंशन भी ऐसी है कि ममता की करीब 20 सीटें प्रभावित हो सकती हैं। राजनीतिक गलियारों में ऐसी चर्चा है कि पूर्वी मिदनापुर जिले से आने वाले शुभेंदु अधिकारी टीएमसी से नाराज चल रहे हैं और ऐसे में वह पार्टी का साथ छोड़कर भाजपा में भी शामिल हो सकते हैं। फिलहाल, शुभेंदु अपना सियासी पत्ता नहीं खोल रहे हैं। 

कभी नंदीग्राम में ममता बनर्जी के लिए सिपाही की भूमिका निभाने वाले शुभेंदु अधिकारी आखिर अब बागी क्यों हो गए हैं? ऐसा क्या हो गया है कि वो लगातार पार्टी बीते कुछ समय से पार्टी के खिलाफ अप्रत्यक्ष तौर पर आवाज बुलंद कर रहे हैं? क्यों टीएमसी उन्हें मनाने में जुटी है? ऐसे कई सवाल हैं जो न सिर्फ बंगाल, बल्कि देश की राजनीतिक गलियारों में भी तैर ही हैं। दरअसल, शुभेंदु बंगाल में काफी ताकतवर राजनीतिक परिवार से आते हैं। उनका प्रभाव न सिर्फ उनके क्षेत्र पर है, बल्कि पूर्वी मिदनापुर के अलावा आस-पास के जिलों में भी उनका राजनीतिक दबदबा है। 

राजनीतिक पंडितों की मानें तो शुभेंदु अधिकारी ममता बनर्जी के भतीजे और लोकसभा सांसद अभिषेक बनर्जी से नाराज चल रहे हैं। इसके अलावा, जिस तरह से प्रशांत किशोर ने बंगाल में संगठनात्मक बदलाव किया है, उससे भी वह नाखुश हैं। साथ ही शुभेंदु अधिकारी चाहते हैं कि पार्टी कई जिलों की 65 विधानसभा सीटों पर उनकी पसंद के उम्मीदवारों को मैदान में उतारे। पिछले साल लोकसभा चुनाव में भाजपा के सामने बुरे प्रदर्शन ने टीएमसी को एक तरह से झटका दिया और विधानसभा चुनाव के लिए चेताया। यही वजह है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के साथ हाथ मिलाया। बताया जाता है कि ममता बनर्जी ने भतीजे और सांसद अभिषेक बनर्जी के कहने पर ही प्रशांत किशोर के साथ हाथ मिलाया। 

इसके बाद प्रशांत किशोर ने बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए कई स्तर पर संगठनात्मक बदलाव किया है। इस बदलाव से शुभेंदु अधिकारी नाखुश बताए जाते है। शुभेंदु को ऐसा महसूस होता है कि उनकी पार्टी में अब उपेक्षा हो रही है। यहां ध्यान देने वाली बात है कि पूर्वी मिदनापुर में ही नंदीग्राम आता है, जहां जमीन अधिग्रहण विरोधी आंदोलन ने ममता बनर्जी की पार्टी के सत्ता में पहुंचने की राह तैयार की थी। इस आंदोलन में शुभेंदु ने सेनापति की भूमिका निभाई थी और जो कभी लेफ्ट का गढ़ हुआ करता था, वहां शुभेंदु ने टीएमसी का राज स्थापित करवाया था। 

शुभेंदु अधिकारी की नाराजगी टीएमसी को बहुत भारी पड़ सकती है, इस बात का अंदाजा खुद ममता बनर्जी और प्रशांत किशोर को भी है। यही वजह है कि जैसे ही शुभेंदु की नाराजगी की खबर मीडिया में जोर-शोर से आई, प्रशांत किशोर और ममता उन्हें मनाने में जुट गए। एक ओर जहां ममता ने टीएमसी नेताओं और कार्यकर्ताओं को शुभेंदु अधिकारी के खिलाफ बयानबाजी से मना किया है, वहीं दूसरी ओर खुद शुभेंदु अधिकारी को मनाने बीते दिनों प्रशांत किशोर उनके घर पहुंचे थे। हालांकि, प्रशांत किशोर की यह कोशिश बेकार गई, क्योंकि उस दिन शुभेंदु से उनकी मुलाकात नहीं हो पाई। बता दें कि 2019 में राज्य की 42 लोकसभा सीटों में से 18 सीटें जीतने वाली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने भी शुभेंदु अधिकारी को एक तरह से पार्टी में आने का ऑफर दिया है। भाजपा ने कहा है कि अधिकारी अगर पाला बदलने को लेकर गंभीर हैं तो उनके लिए पार्टी दरवाजे खुले हैं। बता दें कि चुनाव से पहले और बाद में कई टीएमसी नेता भाजपा में शामिल हुए हैं। 

दो बार सांसद रह चुके शुभेंदु अधिकारी का परिवार राजनीतिक तौर पर काफी मजबूत है। पूर्वी मिदनापुर को कभी वामपंथ का गढ़ माना जाता था मगर शुभेंदु ने अपनी रणनीतिक कौशल से बीते कुछ समय में इसे टीएमसी का किला बना दिया है। अगर वह टीएमसी से बाहर होते हैं तो ममता बनर्जी को काफी नुकसान पहुंचा सकते हैं। यही वजह है कि पार्टी उन्हें मनाने में जुटी है। शुभेंदु अधिकारी के भाई दिब्येंदु तमलुक से लोकसभा सदस्य हैं, जबकि तीन भाई-बहनों में सबसे छोटे सौमेंदु कांथी नगर पालिका के अध्यक्ष हैं। उनके पिता सिसिर अधिकारी टीएमसी के सबसे वरिष्ठ लोकसभा सदस्य हैं, जो कांथी निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं।

नंदीग्राम भारत के पश्चिमी बंगाल राज्य के पूर्व मेदिनीपुर जिला का एक ग्रामीण क्षेत्र है। यह क्षेत्र, कोलकाता से दक्षिण-पश्चिम दिशा में 70 कि॰मी॰ दूर, औद्योगिक शहर हल्दिया के सामने और हल्दी नदी के दक्षिण किनारे पर स्थित है। यह क्षेत्र हल्दिया डेवलपमेंट अथॉरिटी के तहत आता है। 2007 में, पश्चिम बंगाल की सरकार ने सलीम ग्रूप को ‘स्पेशल इकनॉमिक ज़ोन’ नीति के तहत, नंदीग्राम में एक ‘रसायन केन्द्र’ (केमिकल हब) की स्थापना करने की अनुमति प्रदान करने का फ़ैसला किया। ग्रामीणों ने इस फ़ैसले का प्रतिरोध किया जिसके परिणामस्वरूप पुलिस के साथ उनकी मुठभेड़ हुई जिसमें 14 ग्रामीण मारे गए और पुलिस पर बर्बरता का आरोप लगा।

नंदीग्राम आंदोलन की लहर पर सवार होकर शुभेंदु 2019 में तमलुक सीट से लोकसभा चुनाव जीते थे। इसके बाद वह 2014 भी वह जीते। बंगाल विधानसभा चुनाव में जीतने के बाद उन्हें ममता कैबनिनेट में परिवहन मंत्री बनाया गया। बताया जाता है कि न सिर्फ पूर्वी मेदनीपुर जिला बल्कि मुर्शिदाबाद और मालदा में भी उन्होंने कांग्रेस को कमजोर करने और टीएमसी को मजबूत करने के लिए काम किया है। क्योंकि वह ग्रासरूट लेवल के नेता हैं, इसलिए बीते कुछ समय में उनकी स्वीकार्यता भी काफी बढ़ी है। उन्हें मेदिनीपुर, झारग्राम, पुरुलिया, बांकुरा और बीरभूम जिलों में टीएमसी के आधार का विस्तार करने का भी श्रेय दिया जाता है। इस तरह से राजनीतिक पंडितों का मानना है कि शुभेंदु अगर टीएमसी से अलग होते हैं तो इसका असर करीब 20 सीटों पर दिख सकता है। यानी शुभेंदु बंगाल में ममता की करीब 20 सीटें खराब करने की क्षमता रखते हैं। 

शुभेंदु अधिकारी की ममता बनर्जी से बगावत की तस्वीर उस वक्त सामने आई, जब गुरुवार को ट्रांसपोर्ट मंत्री शुभेंदी ने पूर्व मिदनापुर के नंदीग्राम में एक रैली को संबोधित किया, जहां आज से 13 साल पहले पार्टी कार्यकर्ता की हत्या कर दी गई थी। इसी की याद में हुए कार्यक्रम में नंदीग्राम में शुभेंदु ने सभा को संबोधित किया। बता दें कि इसी नंदीग्राम की घटना ने ममता बनर्जी को बंगाल की कुर्सी तक पहुंचाया था। उस रैली में शुभेंदु ने कहा था कि पत्रकार और राजनैतिक पर्यवेक्षक मेरे राजनीतिक कार्यक्रम की घोषणा करने के लिए मेरा इंतजार कर रहे हैं। वे मुझे उन बाधाओं के बारे में बात करते हुए सुनना चाहते हैं जो मैं झेल रहा हूं और जो रास्ता मैं लेने जा रहा हूं। मैं इस पवित्र मंच से अपने राजनीतिक कार्यक्रम की घोषणा नहीं करूंगा। 

उद्धव ठाकरे की पत्नी रश्मि ठाकरे के अन्वय नायक की पत्नी के साथ थे व्यापारिक संबंध : किरीट सोमैया

रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ अर्नब गोस्वामी के मामले में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। दरअसल, महाराष्ट्र भाजपा के तेज-तर्रार नेता किरीट सोमैया ने दावा किया है कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के परिवार का स्वर्गीय अन्वय नाइक के परिवार के साथ जमीन की लेनदेन का मामला था। भाजपा नेता सोमैया ने कहा कि उनके पास इस बात के पर्याप्त सबूत हैं, जो ठाकरे और नाइक परिवार के बीच हुए जमीन के सौदे को साबित करते हैं। उद्धव ठाकरे की पत्नी रश्मि ठाकरे ने मनीषा रविंद्र वायकर के साथ मिलकर दिवंगत अन्वय नाइक और अक्षिता नाइक से 2.20 करोड़ रुपए की जमीन खरीदी। क्या यह अर्णब गोस्वामी को फँसाने की वजह हो सकती है?”

मुंबई/ नयी दिल्ली:

भाजपा नेता किरीट सोमैया ने महाराष्ट्र सरकार और रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी के विवाद के बीच एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। दरअसल भाजपा नेता ने दावा किया है कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के परिवार का स्वर्गीय अन्वय नाइक के परिवार के साथ भूमि के लेनदेन का मामला था। सोमैया ने कहा कि उनके पास पर्याप्त सबूत हैं, जो ठाकरे और नाइक परिवार के बीच हुए जमीन के सौदे को साबित करते हैं।

सोमैया ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार की वेबसाइट में मौजूद मुरुद रायगढ़ के भूमि रिकॉर्ड के अनुसार उद्धव ठाकरे की पत्नी का स्वर्गीय अन्वय नाइक के परिवार के साथ भूमि का लेनदेन हुआ था। इस मामले में उन्होंने संबंधित दस्तावेज एसपी और कलेक्टर को भेज दिए हैं।

भाजपा नेता व सांसद किरीट सोमैया ने यह सारी जानकारी ट्विटर के माध्यम से साझा की है। उन्होंने लिखा कि उद्धव ठाकरे की पत्नी रश्मि ठाकरे ने मनीषा रविंद्र वायकर के साथ मिलकर दिवंगत अन्वय नाइक और अक्षिता नाइक से मार्च 2014 में 2.20 करोड़ रुपए की जमीन खरीदी थीं। बता दें कि अक्षिता नाइक स्वर्गीय अन्वय नाइक की पत्नी हैं।

यही नहीं, किरीट सोमैया ने उद्धव ठाकरे पर आरोप लगाते हुए यह भी पूछा कि क्या यह रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी को फँसाने की वजह भी हो सकती है? साथ ही उन्होंने अपने ट्वीट में कुछ दस्तावेज शेयर करते हुए उन्हें जमीन सौदे से संबंधित बताया।

उन्होंने अपने अगले ट्वीट में कहा, “मैंने इन सभी दस्तावेजों की जाँच पड़ताल कर इसे कलेक्टर और एसपी को भेज दिया है।” उन्होंने बताया कि यह जानकारी उन्हें महाराष्ट्र सरकार की भूमि रिकॉर्ड के जरिए मिली है।

बहरहाल, बीजेपी नेता द्वारा किए गए इस खुलासे को उस संदर्भ को फिर से देखना अनिवार्य है, जिसके आधार पर रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्णब गोस्वामी को गिरफ्तार किया गया था।

अर्णब की गिरफ्तारी

गौरतलब है कि रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के एडिटर इन चीफ अर्णब गोस्वामी को चार नवंबर की सुबह उनके घर से पुलिस ने बिना किसी सूचना के गिरफ्तार कर लिया था। अर्णब को दो साल पुराने केस में गिरफ्तार किया गया, जो पहले ही बंद हो गया था। गिरफ्तारी के दौरान मुंबई पुलिस ने अर्णब के अलावा उसके परिजनों से भी बद्तमीजी की थी।

गिरफ्तार करने के बाद पुलिस ने अर्णब गोस्वामी को अलीबाग कोर्ट में पेश किया गया था, जहाँ पर पुलिस कस्टडी की माँग की गई थी, हालाँकि कोर्ट ने पुलिस कस्टडी देने से इनकार कर दिया था।

उल्लेखनीय है कि यह मामला एक इंटीरियर डिजाइनर अन्वय नाइक की मृत्यु से संबंधित है, जिन्होंने मई 2018 में आत्महत्या कर ली थी। इस दौरान पुलिस ने एक सुसाइड नोट बरामद किया था। जिसमें आरोप लगाया गया कि अर्णब गोस्वामी ने उनको 83 लाख का बकाया राशि नहीं दिया था।

अन्वय नाइक और उनकी माँ कुमुद अपने अलीबाग फार्महाउस में मृत पाए गए। सुसाइड नोट में दो अन्य लोगों के नाम भी थे, जिनका नाम फ़िरोज़ शेख और नितेश सारदा था। इन पर भी 4 करोड़ और 55 लाख नहीं देने का आरोप था। वहीं अप्रैल 2019 में मामला बंद कर दिया गया था लेकिन राज्य सरकार के कथित प्रतिशोध की भावना के चलते इसे दोबारा से खोला गया है।

एक दैनिक समाचार पत्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, उस समय अन्वय नाइक आत्महत्या मामले की जाँच कर रहे अधिकारियों को रिपब्लिक टीवी के संपादक अर्णब गोस्वामी, नितेश सारदा और फ़िरोज़ शेख के बीच कोई संबंध नहीं मिला था। हत्या के लिए उकसाने वाला मामले में पर्याप्त सबूत नहीं होने की वजह से पुलिस ने इसे खारिज कर दिया था। साथ ही मामले की जाँच कर रही रायगढ़ पुलिस ने अप्रैल 2019 में मजिस्ट्रेट के सामने अपनी क्लोजर रिपोर्ट भी दायर की थी।

एकता कपूर पर चलेगा मुक़द्दमा, प्राथमिकी निरस्त करने की याचिका खारिज

“उच्च न्यायालय ने कहा, “शारीरिक अंतरंगता और अश्लीलता के प्रदर्शन की स्वीकार्य सीमाएं हैं,” के बीच हमेशा एक पतली रेखा होती है।

इंदौर. 

फिल्म निर्माता निर्देशक एकता कपूर के खिलाफ मध्य प्रदेश के इंदौर में मुकदमा चलेगा. हाई कोर्ट ने एकता कपूर को राहत देने वाली याचिका खारिज कर दी है. अश्लील वेब सीरीज चलाने व भारतीय सेना के अपमान को लेकर एफआईआर दर्ज की गई थी. इस एफआईआर में धार्मिक भावनाएं भड़काने और राष्ट्रीय प्रतीक के अपमान की धाराएं भी लगाई गईं थीं. इंदौर के अन्नापूर्णा पुलिस थाने में एकता के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है.

हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ से एकता कपूर को राहत नहीं मिली है. हाई कोर्ट ने इंदौर के अन्नापूर्णा पुलिस थाने में दर्ज एफआइआर निरस्त करने से इन्कार कर दिया है. हालांकि कोर्ट ने मामूली राहत देते हुए एफआइआर में से धार्मिक भावना भड़काने और राष्ट्रीय चिन्ह के अपमान की धाराओं को कम करने को कहा है. इंदौर निवासी वाल्मीकि शकरगाए ने 5 जून 2020 को अन्नापूर्णा पुलिस थाने में एकता कपूर के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी.

इसलिए कराई एफआईआर

एफआईआर में कहा गया था कि एकता कपूर निर्माता-निर्देशक हैं. उनकी कंपनी आल्ट बालाजी सोशल मीडिया पर ट्रिपल एक्स वेब सीरीज चलाती है. इस कंपनी की वेब सीरीज में अश्लीलता परोसी जा रही है और सेना का अपमान किया जा रहा है. एक एपीसोड में दिखाया गया कि पुरुष किरदार भारतीय सेना जैसी वर्दी पहने था और एक महिला पात्र उसकी वर्दी फाड़ रही है. शिकायत पर कार्रवाई करते हुए पुलिस ने एकता के खिलाफ केस दर्ज कर लिया था, जिसमें पुलिस ने अश्लीलता परोसने, धार्मिक भावनाएं भड़काने और राष्ट्रीय प्रतीक के अपमान की धाराएं लगाईं थीं.

एकता की ओर से लगाई गई थी याचिका

इस एफआईआर को निरस्त करने के लिए एकता कपूर ने हाई कोर्ट में याचिका लगाई थी. उनकी तरफ से कहा गया था कि वेब सीरीज में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है. जांच और पक्ष सुने बगैर पुलिस ने केस दर्ज कर लिया है. इसे निरस्त किया जाना चाहिए. जिस वेब सीरीज में अश्लीलता दिखाने का आरोप है, वे उसकी निर्माता-निर्देशक नहीं हैं. उन्होंने निर्माता को सिर्फ ओटीटी प्लेटफॉर्म उपलब्ध करवाया था. शिकायतकर्ता और पुलिस की ओर से कहा गया कि ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आपत्तिजनक और अश्लील सामग्री भी बगैर संपादित पेश की जा रही है. इसलिए निर्माता निदेशकों पर कठोर कार्रवाई जरूरी है.

कोर्ट ने सुरक्षित रखा था फैसला

हाई कोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद करीब महीने भर पहले फैसला सुरक्षित रख लिया था और बुधवार को जस्टिस सतीशचंद्र शर्मा, जस्टिस शैलेंद्र शुक्ला की खंडपीठ ने विस्तृत फैसला सुनाया और एकता की याचिका खारिज कर दी. पुलिस की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता पुष्यमित्र भार्गव ने पैरवी की. उन्होंने बताया कि कोर्ट ने एकता को मामूली राहत देते हुए एफआईआर में से धार्मिक भावना भड़काने और राष्ट्रीय प्रतीक के अपमान की धाराएं कम करने को कहा है.

चिराग की चिंगारी जेडीयू पर भारी

एलजेपी को अकेले चुनावी मैदान में उतरने से एनडीए को 24 सीटों पर सियासी फायदा भी मिला है. इनमें बीजेपी को एक सीट, जेडीयू को 20 , जीतनराम मांझी की हम को 2 और वीआईपी को 1 सीट पर चुनावी फायदे मिले हैं. वहीं, एलजेपी के चुनावी मैदान में उतरने से महागठबंधन के दलों को 30 सीटों पर सियासी फायदा मिला है. इनमें आरजेडी को 24 सीट और कांग्रेस 6 सीट पर जीत मिली है. इन सीटों पर एलजेपी को इतना वोट मिला था, जो अगर एनडीए को मिला होता तो वह सीटें उसके खाते में जातीं. 

नयी दिल्ली(ब्यूरो):

बिहार चुनाव में एनडीए से अलग होकर अकेले चुनावी मैदान में उतरे एलजेपी प्रमुख चिराग पासवान अपने खुद के घर में भले ही रौशन नहीं कर सके, लेकिन एनडीए और महागठबंधन की तस्वीर धूमिल कर दी है. एलजेपी बिहार की 134 सीटों पर चुनावी मैदान में अपने प्रत्याशी उतारकर महज एक सीट ही जीत सकी है. लेकिन 54 सीटों पर राजनीतिक दलों का सियासी खेल बिगाड़ दिया है. इस तरह से एलजेपी ने एनडीए के दलों को 30 सीटों और महागठबंधन को 24 सीटों पर नुकसान पहुंचाया है. 

चिराग पासवान ने बिहार विधासनभा चुनाव में 134 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे. इनमें से ज्यादातर प्रत्याशी जेडीयू कैंडिडेट के खिलाफ चुनावी ताल ठोकते नजर आए थे. हालांकि, गोविदंगज, लालगंज, भागलपुर, राघोपुर, रोसड़ा और नरकटियागंज जैसी सीट पर एलजेपी प्रत्याशी बीजेपी के खिलाफ भी चुनाव लड़ रहे थे. मंगलवार देर रात आए बिहार चुनाव नतीजे में एलजेपी को महज एक सीट मिली है जबकि कई सीटों पर वो दूसरे और तीसरे नंबर पर रही है. ऐसे में एलजेपी सबसे बड़ी मुसीबत जेडीयू के लिए बनी है जबकि बीजेपी को महज एक सीट पर नुकसान पहुंचाया है. 

एलजेपी ने जेडीयू के खिलाफ तमाम बीजेपी के 22 बागी प्रत्याशियों को टिकट देकर चुनावी मैदान में उतारा था. इनमें से एक भी बागी जीत नहीं सके, लेकिन जेडीयू को नुकसान जरूर पहुंचाने में सफल रहे हैं. बिहार में जेडीयू को 25 सीटों पर एलजेपी के चलते हार का सामना करना पड़ा है जबकि बीजेपी को एक सीट पर और एनडीए में शामिल वीआईपी को 4 सीटों पर नुकसान पहुंचाया. बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने एक निजी चैनल पर बोलते हुए कहा था कि अगर एलजेपी साथ मिलकर लड़ती तो हम 150 सीटें आसानी से जीत लेते. 

वहीं, दूसरी ओर महागठबंधन में शामिल आरजेडी को बिहार में 12 सीटों पर एलजेपी प्रत्याशियों के चलते हार झेलनी पड़ी है. ऐसे ही 10 सीटों पर कांग्रेस को एलजेपी ने गहरी चोट दी है और दो सीटों पर सीपीआई (माले) के प्रत्याशी को हार का मुंह देखना पड़ा है. हालांकि, एलजेपी के चुनावी मैदान में उतरने से सिर्फ नुकसान ही नहीं बल्कि कुछ सीटों पर सियासी फायदे भी एनडीए और महागठबंधन को मिले हैं. 

एलजेपी को अकेले चुनावी मैदान में उतरने से एनडीए को 24 सीटों पर सियासी फायदा भी मिला है. इनमें बीजेपी को एक सीट, जेडीयू को 20 , जीतनराम मांझी की हम को 2 और वीआईपी को 1 सीट पर चुनावी फायदे मिले हैं. वहीं, एलजेपी के चुनावी मैदान में उतरने से महागठबंधन के दलों को 30 सीटों पर सियासी फायदा मिला है. इनमें आरजेडी को 24 सीट और कांग्रेस 6 सीट पर जीत मिली है. इन सीटों पर एलजेपी को इतना वोट मिला था, जो अगर एनडीए को मिला होता तो वह सीटें उसके खाते में जातीं. 

अब सूचना-प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आएंगे सभी ऑनलाइन न्यूज और OTT प्लेटफॉर्म : प्रकाश जावडेकर

मोदी सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है, जिसके तहत अब ऑनलाइन न्यूज पोर्टलों, ऑनलाइन कंटेंट प्रोवाइड, OTT प्लेटफॉर्म सभी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आएंगे। इसके लिए बकायदा सरकार ने अधिसूचना जारी कर दी है। ऑनलाइन कंटेंट प्रोवाइडर्स को लेकर लंबे समय से सरकार विचार कर रही थी। सुप्रीम कोर्ट में एक मामले की सुनवाई के दौरान भी सरकार ने इस बात की वकालत की थी कि ऑनलाइन माध्यमों का नियमन टीवी से ज्यादा जरूरी है। अब कंटेंट्स बच्चों के देखने लायक नहीं हैं तो उन्हें अलग से क्लसिफाई करना पड़ेगा और स्पष्ट रूप से बताना होगा कि कौन से कंटेंट किस कैटेगरी में आते हैं। प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरह इनके लिए भी नियम-कायदे होंगे। हालाँकि, ये किस तरह का होगा – ये कुछ दिनों में स्पष्ट होगा। फ़िलहाल तो ये OTT प्लेटफॉर्म्स I&B मंत्रालय के अंतर्गत लाए गए हैं।

नयी दिल्ली(ब्यूरो):

मान लीजिए कि आप टीवी पर बैठ कर कुछ देख रहे हैं और आपका पूरा परिवार आपके साथ बैठा हुआ है, अचानक से माँ-बहन की गालियाँ दी जानी लगे और पोर्न चालू हो जाए? डिजिटल कंटेंट प्लेटफॉर्म्स ने कुछ ऐसा ही माहौल बना दिया था। OTT प्लेटफॉर्म्स के साथ यही समस्या थी। हर वो चीज जो टीवी पर नहीं आ सकती या सिनेमा हॉल्स में नहीं दिखाई जा सकती, उन्हें वहाँ दिखाया जा रहा था। अब वो ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल्स के साथ-साथ I&B मंत्रालय के अंतर्गत आ गए हैं।

एकता कपूर के प्लेटफॉर्म ‘ऑल्ट बालाजी’ पर भी एक बी-ग्रेड शो ‘गन्दी बात’ आई थी, जिसमें अश्लीलता के अलावा कुछ था ही नहीं और इसके सहारे एक तरह से पोर्नोग्राफी को मुख्यधारा में लाया जा रहा था। इसमें महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक के नाम का आपत्तिजनक रूप से इस्तेमाल किया गया था। ये बस एक उदाहरण है, ‘पाताल लोक’ और ‘मिर्जापुर’ से लेकर ‘आश्रम’ तक, ऐसी चीजें लगातार होती रही हैं।

क्यों ज़रूरी था OTT प्लेटफॉर्म्स का नियंत्रण?

अब तक जितने भी वेब सीरीज आए हैं, उनमें कहानी जो भी हो लेकिन अश्लीलता ठूँसने पर पूरा जोर लगाया गया। उनके ऊपर किसी का नियंत्रण नहीं था। उन्हें किसी सेंसर बोर्ड से प्रमाण-पत्र नहीं लेना था। सेक्स और गालियों का मिश्रण कर के कुछ भी बना दिया, जिसे बच्चे भी देख रहे हैं। ऐसा कुछ तो है नहीं, जिससे बच्चों को ऐसे हानिकारण कंटेंट्स देखने से रोका जा सके। हर किसी का एक्सेस था ही, लॉगिन करो और देखो।

इंटरनेट पर एक से एक सामग्रियाँ उपलब्ध हैं। अगर किसी वेबसाइट को प्रतिबंधित कर दिया जाता है तो फिर VPN की मदद से या अन्य तरीकों से उसे देखने के कई माध्यम हैं। लेकिन, सामस्य ये थी कि अमेज़न, हॉटस्टार, एमएक्स प्लेयर, ऑल्ट बालाजी और नेटफ्लिक्स जैसे बड़े ब्रांड्स ऐसी-ऐसी सामग्रियों को मुख्यधारा में जोड़ कर उसका समान्यीकरण कर रहे थे, जो भद्दे और अश्लील होते हैं और महिलाओं के लिए भी अपमानजनक होते हैं।

हाल ही में रिलीज हुई कई वेब सीरीज में इसका उदाहरण भी देखा गया था, जिनमें न सिर्फ हिन्दूफोबिया को जम कर बढ़ावा दिया गया, बल्कि सेक्स दृश्यों और माँ-बहन की गालियों को ही फोकस में रखा गया। महिलाओं के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने वालों ने भी महिलाओं के लिए लगातार आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग करने वाले इन वेब सीरीज पर चुप्पी साधे रखी। जो मन बना दो, परोस दो और पहुँच टीवी-सिनेमा से भी ज्यादा।

इससे पहले ‘इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ एक सेल्फ-रेगुलेशन कोड लेकर आया था, जिसे सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने नकार दिया था। इस पर 15 OTT प्लेटफॉर्म्स ने हस्ताक्षर कर के सेल्फ-रेगुलेशन की बात की थी। चूँकि सरकार ने भी सेल्फ-रेगुलेशन की बात कहते हुए सेंसरशिप की व्यवस्था को नकार दिया था, इन प्लेटफॉर्म्स ने उम्र की सीमाओं, कंटेंट के बारे में पूरी जानकारी और एक्सेस कंट्रोल सहित कई मुद्दों पर पारदर्शी बनने की बात कही थी।

केंद्रीय IB मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने की थी सेल्फ-रेगुलेशन की बात

हाल ही में केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर से एक साक्षात्कार में उनसे इस विषय में सवाल पूछे गए थे। केंद्रीय मंत्री से जब पूछा गया कि डिजिटल मीडियम में फिलहाल किस तरह की चुनौतियाँ हैं? तो उन्होंने इसका जवाब देते हुए कहा था कि यह बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू है और उनका मानना है कि डिजिटल मीडिया खुद ही इसे सेल्फ रेग्युलेट करे, लेकिन अगर उन्हें मदद चाहिए, तो वो मदद करने के लिए भी तैयार हैं। उन्होंने आगे कहा था:

केंद्र सरकार ने तो इन प्लेटफॉर्म्स को कई बार मोहलत दी। मार्च 2020 की शुरुआत में ही उन्हें एक संस्था बना कर ‘कोड ऑफ कंडक्ट’ तैयार करने के लिए 100 दिनों का समय दिया गया था। नई दिल्ली में 45 मिनट तक चली बैठक में इन प्लेटफॉर्म्स ने ‘डिजिटल कंटेंट कंप्लेंट काउंसिल (DCCC)’ का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया था और अमेज़न प्राइम ने तो ऐसे किसी भी विचार पर आपत्ति भी जताई थी

ऐसा नहीं है कि इससे पहले सरकार ने उन्हें नियम-कायदे बनाने को नहीं कहा था। अक्टूबर 2019 में भी प्रकाश जावड़ेकर ने उन्हें टोका था और कहा था कि वो खुद से अपने टर्म्स लेकर आएँ, जिस पर सब एकमत हो सकें। DCCC का गठन कर कर के फ़रवरी 2019 में रिटायर्ड जज एपी शाह को उसका अध्यक्ष बनाया गया था। मंत्री का सीधा कहना है था जो चीजें परिवार साथ में देखता है, उन्हें नियंत्रित किया जाना आवश्यक है।

इन प्लेटफॉर्म्स की खासियत ये है कि इसका इस्तेमाल कर के सरकारी योजनाओं और कानूनों को गलत रूप में पेश किया जा सकता है। चाइल्ड पोर्नोग्राफी को बढ़ावा मिलता है और महिलाओं का अपमान किया जाता है। एक खास नैरेटिव बनाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। धार्मिक भावनाओं को आहत करने और राष्ट्रीय प्रतीक चिह्नों का अपमान किया जाता है। और आजकल तो कॉमेडी शो भी खास एजेंडे के तहत इस पर डाले जाते हैं।

असल में इससे पहले जो सेल्फ-रेगुलेटरी मैकेनिज्म बनाया गया था, उसमें प्रतिबंधित कंटेंट्स को लेकर कोई क्लासिफिकेशन नहीं था, ऐसा सरकार का मानना था। इनके संगठनों में मात्र एक स्वतंत्र सदस्य थे, जो जाहिर है कि माइनॉरिटी में होता। फिर तो सब कुछ वैसे ही चलता, जैसे चलता आ रहा था। इसीलिए, अब उनका सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आने से प्रतिबंधित कंटेंट्स के प्रसारण को रोकने में मदद मिलेगी।

सोमवार (नवंबर 9, 2020) को ही केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हस्ताक्षर वाला गैजेट नोटिफिकेशन जारी किया, जिसमें बताया गया है कि सभी OTT प्लेटफॉर्म्स अब I&B मंत्रालय के अंतर्गत आ गए हैं। अभी तक इन कंटेंट्स के नियंत्रण के लिए न कोई ऑटोनोमस बॉडी है और न ही कोई क़ानून है। मीडिया के लिए PCI है और सिनेमा के लिए सेंसर बोर्ड, लेकिन ये अब तक खुले ही बेलगाम घूम रहे थे।

अब सवाल है कि आगे क्या? अब सरकार इन कंटेंट्स को नियंत्रित करने के लिए दिशा-निर्देश जारी करेगी और उन्हें इसका पालन करना पड़ेगा। अब कंटेंट्स बच्चों के देखने लायक नहीं हैं तो उन्हें अलग से क्लसिफाई करना पड़ेगा और स्पष्ट रूप से बताना होगा कि कौन से कंटेंट किस कैटेगरी में आते हैं। प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरह इनके लिए भी नियम-कायदे होंगे। हालाँकि, ये किस तरह का होगा – ये कुछ दिनों में स्पष्ट होगा। फ़िलहाल तो ये OTT प्लेटफॉर्म्स I&B मंत्रालय के अंतर्गत लाए गए हैं।

आज अर्णब तो कल आप हम भी हो सकते हैं

सारिका तिवारी, चंडीगढ़:

महाराष्ट्र पुलिस-प्रशासन ने जिस प्रकार अर्णब गोस्वामी को एक पुराने एवं लगभग बंद पड़े मामले में जिस तरह से गिरफ़्तार किया, जो कि सरासर गैरकानूनी है ऐसा कानूनविद कहते हैं क्योंकि केस फ़ाइल दोबारा खोलने के लिए न्यायालय से अनुमति लेना आवश्यक है आप जानते ही हैं कि जब अप्रैल 2020 मे यह मामला बंद किया गया उसके बाद पीड़ितों के परिवार जनों ने खिन भी इसके विरुद्ध गुहार नहीं लगाई, अतः सरकार की नीयत साफ नहीं यह तो स्पष्ट है ओर उसकी मंशा एवं कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े होना भी स्वाभाविक है। उससे भी ज्यादा सवाल उन कथित बुद्धिजीवियों पर खड़े हो रहे हैं, जो बात – बात पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ढिंढोरा पीटते रहते हैं, लेकिन अर्णब की गिरफ़्तारी पर मुंह सिले हैं।

पालघर में दो सन्तों की निर्मम हत्या के पश्चात महाराष्ट्र सरकार की सबसे ताकतवर शख्सियत सोनिया गांधी उर्फ अंटोनिओ माइनो से कुछ कड़े प्रश्न पूछने पर महाराष्ट्र सरकार की नज़रों में चढ़े अर्णब गोस्वामी सुशांत राजपूत की अप्राकृतक मृत्यु को ज़ोरशोर से उठाने के कारण सवालों के घेरे में आए मुंबई के आभिजात्य वर्ग की नज़रों में भी चढ़ गए। बार बार चेताने पर भी अर्णब ने मुद्दों को नहीं छोड़ा जिनसे महाराष्ट्र सरकार और उसके कृपापात्रों को निरंतर जांच के घेरे में आने से महाराष्ट्र सरकार तिलमिला उठी और अर्णब के विरोध में अलग अलग तरह से उन्हे प्रताड़ित करती रही।

लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ माना जाता है। नागरिक अधिकारों की रक्षा करने एवं लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूती प्रदान करने में विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के साथ-साथ मीडिया की विशेष भूमिका होती है। उसका उत्तरदायित्व निष्पक्षता से सूचना पहुंचाने के साथ-साथ जन सरोकार से जुड़े मुद्दे उठाना, जनजागृति लाना, जनता और सरकार के बीच संवाद का सेतु स्थापित करना और जनमत बनाना भी होता है। सरोकारधर्मिता मीडिया की सबसे बड़ी विशेषता रही है। यह भी सत्य है कि सरोकारधर्मिता की आड़ में कुछ चैनल-पत्रकार अपना एजेंडा भी चलाते रहे हैं। हाल के वर्षों में टीआरपी एवं मुनाफ़े की गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा ने मीडिया को अनेक बार कठघरे में खड़ा किया है। उसका स्तर गिराया है। उसकी साख़ एवं विश्वसनीयता को संदिग्ध बनाया है। निःसंदेह कुछ चैनल-पत्रकार पत्रकारिता के उच्च नैतिक मानदंडों एवं मर्यादाओं का उल्लंघन करते रहे हैं। जनसंचार के सबसे सशक्त माध्यम से जुड़े होने के कारण उन्हें जो सेलेब्रिटी हैसियत मिलती है, उसे वे सहेज-संभालकर नहीं रख पाते और कई बार सीमाओं का अतिक्रमण कर जाते हैं।

स्वतंत्रता-पूर्व से लेकर स्वातन्त्रयोत्तर काल तक भारतवर्ष में पत्रकारिता की बड़ी समृद्ध विरासत एवं परंपरा रही है। उच्च नैतिक मर्यादाओं एवं नियम-अनुशासन का पालन करते हुए भी पत्रकारिता जगत ने जब-जब आवश्यकता पड़ी, लोकतंत्र एवं लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी। सत्य पर पहरे बिठाने की निरंकुश सत्ता द्वारा जब-जब कोशिशें हुईं, मीडिया ने उसे नाकाम करने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आपातकाल के काले दौर में तमाम प्रताड़नाएं झेलकर भी उसने अपनी स्वतंत्र एवं निर्भीक आवाज़ को कमज़ोर नहीं पड़ने दिया। लोकतंत्र को बंधक बनाने का वह प्रयास विफल ही मीडिया के सहयोग के बल पर हुआ। पत्रकारिता के गिरते स्तर पर बढ़-चढ़कर बातें करते हुए हमें मीडिया की इन उपलब्धियों और योगदान को कभी नहीं भुलाना चाहिए|

अर्णब का दोष केवल इतना है कि, जो संबंध परदे के पीछे निभाए जाते रहे, उसे अर्णब ने बिना किसी लाग-लपेट के परदे के सामने ला भर दिया। उन्होंने आम लोगों की भाषा में जनभावनाओं को बेबाक़ी से स्वर दे दिया। जिसे समर्थकों ने राष्ट्रीय तो विरोधियों ने एजेंडा आधारित पत्रकारिता का नाम दिया। पर सवाल यह है कि केवल अर्णब ही सत्ता के आसान शिकार और कोपभाजन क्यों ?

महाराष्ट्र पुलिस-प्रशासन ने जिस प्रकार अर्णब गोस्वामी को एक पुराने एवं लगभग बंद पड़े मामले में जिस तरह से आनन-फ़ानन में गिरफ़्तार किया, वह उसकी मंशा एवं कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। पुराने मामले में किसी को ख़ुदकुशी के लिए उकसाने के आरोप में अर्णब को गिरफ्तार करने की महाराष्ट्र सरकार एवं मुंबई पुलिस की नीयत जनता ख़ूब समझती है।

पुलिस इस केस की क्लोजर रिपोर्ट भी दाख़िल कर चुकी है। अब अचानक पुलिस को ऐसा कौन-सा सबूत मिल गया कि वह अर्णब को गिरफ़्तार करने पहुँच गई। और वह भी इतने बड़े लाव-लश्कर, एनकाउंटर स्पेशलिस्ट और हथियारों से लैस! कमाल की बात यह कि उसने कोर्ट से अर्णब को पुलिस रिमांड में रखने की इजाज़त भी मांगी।

ज्ञात हो कि अर्णब गोस्वामी का कोई आपराधिक अतीत नहीं है। न वे कोई सजायाफ्ता मुज़रिम या आतंकी हैं। बल्कि वे मुख्य धारा के बड़े पत्रकार हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अपने चैनल पर विभिन्न मुददृों पर प्रश्न पूछा जाना इन महत्वाकांक्षी, वंशवादी नेताओं को नागवार गुजरा है ? क्या सत्ता के अहंकार के कारण वे अर्णब को घेरने और उनकी आवाज उठाने—दबाने की कोशिश कर रहे हैं ?

यदि अर्णब ने कुछ ग़लत भी किया है तो न्यायिक प्रक्रिया के अंतर्गत पारदर्शी तरीके से कार्रवाई होनी चाहिए, न कि जोर-जबरदस्ती से ? यदि निष्पक्षता पत्रकारिता का धर्म है तो कार्यपालिका एवं सरकार का तो यह परम धर्म होना चाहिए। उसे तो अपनी नीतियों एवं निर्णयों के प्रति विशेष सतर्क एवं सजग रहना चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर स्वविवेक का नियंत्रण तो ठीक है, परंतु उस पर सरकारी पहरे बिठाना, उसे डरा-धमकाकर चुप कराना संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का सीधा हनन है। जब देश ने आपातकाल थोपने वालों को जड़-मूल समेत उखाड़ फेंका तो वंशवादी बेलें क्या बला हैं ? जो इस मौके पर चुप हैं, समय उनके भी अपराध लिख रहा है। आज अर्णब की तो कल हमारी या किसी और की बारी है|

“आपातकाल 2.0 में आपका हार्दिक स्वागत है।”, तेजिंदर पल सिंह बग्गा

रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के प्रधान संपादक अर्नब गोस्वामी की मुंबई पुलिस द्वारा की गई गिरफ्तारी का मुद्दा देशभर में गरमा गया है। अर्नब की गिरफ्तारी के बाद देशभर में इस पर राजनीति भी तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी समेत तकरीबन सभी राजनीतिक दलों ने अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी को तानाशाही और फांसीवादी कृत्य बताया है, साथ ही महाराष्ट्र सरकार की आलोचना की है। दिल्ली में लोगों को आपातकाल फिर से डराने लगा है। इसे लेकर जगह-जगह पोस्टर लगाए गए हैं। जिसमें लिखा गया है- दिल्ली के कुछ इलाकों में लगाए गए पोस्टर में आपातकाल 2.0  में आपका हार्दिक स्वागत है। यह पोस्टर भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता तजिंदर पाल सिंह बग्गा की ओर से लगाया है। इस पोस्टर में नीचे की ओर लिखा है- ‘issued by: Tajinder Pal Singh Bagga’।

नयी दिल्ली(ब्यूरो):

भाजपा नेता तजिंदर पाल सिंह बग्गा ने बुधवार (नवंबर 04, 2020) को मुंबई पुलिस द्वारा रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी के विरोध में दिल्ली स्थित महाराष्ट्र सदन के बाहर ’आपातकाल 2.0’ के पोस्टर चिपकाए। इन पोस्टर्स में लिखा है- “आपातकाल 2.0 में आपका हार्दिक स्वागत है।”

एक पुराने बंद मामले की फ़ाइल अदालत की सहमति के बिना खोलकर अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी के बाद, महाराष्ट्र की उद्धव सरकार और महाराष्ट्र पुलिस को लगातार आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। सोशल मीडिया से लेकर देशभर में इस अलोकतांत्रिक कार्रवाई का विरोध स्पष्ट रूप से नज़र आ रहा है। इसी कड़ी में देश की राजधानी दिल्ली में ‘आपातकाल 2.0’ के पोस्टर्स लगाए गए हैं।

इन पोस्टर्स में साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि उद्धार ठाकरे की तुलना इंदिरा गाँधी से की जा रही है। पोस्टर में एक तरफ उद्धव ठाकरे की तस्वीर लगी है और दूसरी तरफ इंदिरा गाँधी की और नीचे लिखा हुआ है – ‘आपातकाल 2.0।’ यानी, महाराष्ट्र की उद्धव सरकार द्वारा अर्णब गोस्वामी पर की गई कार्रवाई इंदिरा गाँधी के आपातकाल के दौर की याद दिलाती है।

जिस तरह कॉन्ग्रेस के शासन वाली इंदिरा सरकार में पत्रकारों को अत्याचार और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा था। ठीक वैसा ही शिवसेना – कॉन्ग्रेस और एनसीपी की गठबंधन सरकार में भी हो रहा है। 

यह पोस्टर कॉन्ग्रेस मुख्यालय समेत राजधानी दिल्ली के तमाम क्षेत्रों में लगाया जा चुका है। दिल्ली की सड़कों पर चस्पा किए गए इन पोस्टर्स में लिखा है, ‘आपातकाल 2.0 में आपका हार्दिक स्वागत है।’

इन पोस्टर्स का उद्देश्य यह दिखाना है कि महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार की यह अलोकतांत्रिक कार्रवाई आपातकाल के भयावह दौर की यादें ताज़ा करती है। इस घटनाक्रम में वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन का कहना है, “महाराष्ट्र में सत्ता और शक्ति का दुरुपयोग किया जा रहा है। राज्यपाल को प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा देना चाहिए।” 

गौरतलब है कि मुंबई पुलिस ने रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी को 14 दिन की पुलिस हिरासत में रखने के लिए मुंबई की अदालत में याचिका दायर की थी जिसे अदालत ने खारिज कर दिया था। अदालत ने कहा कि हिरासत में लेकर पूछताछ करने की जरूरत नहीं है। साथ ही, अर्णब को जल्द ही जमानत मिलने की भी सम्भावना है, जिसका आशय है कि शायद उन्हें न्यायिक हिरासत में भी न रहना पड़े।

मुंबई पुलिस ने अर्णब गोस्वामी को बीते दिन (4 नवंबर 2020) एक पुराने ‘बंद मामले’ में गिरफ्तार किया था। आधी रात में चली सुनवाई के बाद अलीबाग न्यायालय ने रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। इसका मतलब यह है कि इस दौरान मुंबई पुलिस उनसे पूछताछ नहीं कर पाएगी। अदालत में महाराष्ट्र पुलिस द्वारा दायर की गई माँग याचिका खारिज किए जाने के बाद अर्नब ने अदालत से निकलते हुए कहा था, “मुंबई पुलिस हार चुकी है।”