खेतों में बिना ड्राईवर के ट्रैक्टर

शायद ट्रैक्टर चलाना और इससे खेतों की जुताई करना ना कभी इतना आसान रहा और पर्यावरण के बेहद अनुकूल भी नहीं। और फिर जब दुनिया तेजी से इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की ओर बढ़ रही है तो एक ई-ट्रैक्टर की जरूरत सेे इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में किसानों के एक सच्चे दोस्त मोनार्क ट्रैक्टर ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है।

  • इस ई-ट्रैक्टर में ऑटोनॉमस क्षमताएं हैं जो इसे अपने आप आगे बढ़ने की अनुमति देती हैं।
  • अमरीका में पेश मोनार्क ई-ट्रैक्टर एक बार फुल चार्ज होने पर 10 घंटे तक काम कर सकता है।
  • ई-ट्रैक्टर में पारंपरिक ट्रैक्टरों की तुलना में दोगुना टॉर्क है और एटीवी की तरह इस्तेमाल की सुविधा।

डेमोक्रेटिक फ्रंट॰कॉम, नयी दिल्ली/नोएडा :

एस्कॉर्ट्स लिमिटेड ने अपने सालाना इनोवेशन प्लेटफॉर्म ‘एसक्लूसिव 2018’ में देश का पहला ऑटोमेटेड ट्रैक्टर को पेश किया। ट्रैक्टर के अलावा कंपनी ने कई दूसरे एग्रीकल्चर प्रोडक्ट भी पेश किए। नये ऑटोमेटेड ट्रैक्टर में लेटेस्ट टेक्नोलजी का इस्तेमाल किया गया है। इसके लिए एस्कॉर्ट्स ने 7 बड़ी कंपनियों से हाथ मिलाया है। इन कंपनियों में माइक्रोसॉफ्ट, रिलायंस जियो, ट्रिम्बल, समवर्धन मदरसन ग्रुप, वैबको, एवीएल और बॉश शामिल हैं। इन कंपनियों से एस्कॉर्ट्स इलेक्ट्रिक ट्रांसमिशन, रिमोट व्हीकल मैनेजमेंट और डेटा-बेस्ड सॉइल और क्रॉप मैनेजमेंट में सहयोग लेगी।

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एस्कॉर्ट्स लिमिटेड ने अपने सालाना इनोवेशन प्लेटफॉर्म ‘

एस्कॉर्ट्स का यह ट्रैक्टर अपनी तरह का पहला ट्रैक्टर है। यह खेत में काम करने के लिए सैटेलाइट कनेक्टिविटी और जियो फेंसिंग जैसी तकनीक का इस्तेमाल करता है। इसमें कई तरह के एडवांस सेंसर लगे हैं जो इसे बिल्कुल सीधा चलाने में मदद करते हैं। साथ ही यह ओवरलैपिंग नहीं करेगा, जिससे खेत में बीज डालने का काम काफी आसान हो जाएगा।

यह ऑटो स्पीड, ऑटो ब्रेकिंग और ऑटो क्लच से लैस है। ऐसे में एक बार खेत में उतारने के बाद इसकी चिंता करने की जरूरत नहीं रहेगी। इसके रास्ते में कोई रुकावट आते ही यह ट्रैक्टर अपने आप रुक जाएगा। ऐसे में कोई हादसा होने की संभावना काफी कम हो जाती है। हालांकि, यह ट्रैक्टर सिर्फ खेत में इस्तेमाल किया जा सकता है। सामान ढोने और सड़क पर चलाने के लिए इसे तैयार नहीं किया गया है।

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स्मार्ट एग्रीकल्चर सॉल्यूशन्स भी हुए पेश

इस ऑटोनोमस ट्रैक्टर के साथ कंपनी ने कई दूसरे स्मार्ट एग्रीकल्चर सॉल्यूशंस भी पेश किए हैं। इनमें स्मार्ट स्प्रेयर, सीडर आदि शामिल है। स्मार्ट सीडर की बात करें तो यह ट्रैक्टर से सिग्नल लेगा और निश्चित मात्रा में बीज बोयेगा। साथ ही जमीन की जरूरत के मुताबिक खाद डालेगा। यह जमीन में पानी की गहराई, मात्रा आदि को सेंस कर लेता है।

इस मौके पर बात करते हुए एस्कॉर्ट्स लिमिटेड के चेयरमैन और एमडी निखिल नंदा ने बताया, ‘पिछले साल हमने विश्व का पहला इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर कॉन्सेप्ट लॉन्च किया था और इस वर्ष हम ऑटोमैटेड एग्रीकल्चर सॉल्यूशंस की शुरुआत कर रहे हैं। इसके लिए हमने कई कंपनियों से हाथ मिलाया है।’ उन्होंने कहा कि कि हम अब ट्रैक्टर कंपनी से सॉल्यूशन कंपनी की ओर बढ़ रहे हैं। यह सिर्फ ऑटोनोमस ट्रैक्टर की शुरूआत नहीं बल्कि यह स्मार्ट फार्मिंग और डिजिटली कनेक्टिड फार्मिंग की शुरुआत है। कीमत के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि इसकी कीमत भारतीय बाजार को ध्यान में रखकर तय की जाएगी।

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एस्कॉर्ट्स एग्री मशीनरी के चीफ एग्जीक्यूटिव शेनू अग्रवाल ने कहा कि यह ट्रैक्टर 80 फीसद ऑटोनोमस है। हम इसी सीमा तक इसमें ऑटोमेशन चाहते थे। इसी तैयार करने के लिए हमने किसानों से इनपुट लिए हैं और उनकी समस्याओं को ध्यान में रखकर इसे तैयार किया गया है। इसमें ऑटो स्टीयरिंग जैसे फीचर्स दिए गए हैं जो इसे ओवरलैपिंग से बचाएगा। इससे किसानों की लागत घटेगी और वो ज्यादा मुनाफा कमा सकेंगे। कीमत के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि यह अफॉर्डेबल प्राइस में उपलब्ध होगा।

कंपनी अगले साल मई तक इसका कमर्शियल ग्लोबल लॉन्च करेगी। इस मौके पर कंपनी ने ट्रैक्सी (ऐप के माध्यम से ट्रैक्टर की बुकिंग) 48 घंटे में स्पेयर पार्ट्स की डिलीवरी और एस्कॉर्ट्स क्रॉप सॉल्यून्श जैसी दूसरी सर्विसेज की भी घोषणा की।

तेजस्वी यादव ने अपनी बचपन की क्रिश्चियन दोस्त रिचेल गोडिन्हो से शादी कर ली, मामा नाराज़

नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने गुरुवार को बड़े गोपनीय ढंग से अपनी पुरानी दोस्त के साथ दिल्ली में शादी की। तेजस्वी की शादी को लेकर लोगों ने बधाई दी, मामा साधु यादव इससे खासे नाराज हैं। साधु यादव ने कहा है कि लालू यादव दूसरे को भकचोन्हर कहते हैं, लेकिन सबसे बड़ा भोकचोन्हर तो तेजस्वी यादव है। उसकी दूसरे धर्म में शादी से परिवार ही नहीं, पूरा समाज कलंकित हुआ है। क्‍या उसे अपने समाज में लड़की नहीं मिली? अब तेजस्‍वी यादव बिहार का मुख्‍यमंत्री बनने का सपना छोड़ दें।

राजविरेन्द्र वसिष्ठ, चंडीगढ़/नयी दिल्ली :

राजद नेता और बिहार के नेता विपक्ष तेजस्वी यादव की हरियाणा की रहने वाली रेचल के साथ शादी सुर्खियों में है। इस शादी से पहले सबसे ज्यादा चर्चा रेचल के क्रिश्चियन होने को लेकर थी, लेकिन अब एक और बात सामने आ रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक बचपन की दोस्त से शादी करने के लिए तेजस्वी को उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए मनाना पड़ा। रेचल ने शादी से पहले क्रिश्चियन धर्म छोड़कर हिंदू धर्म को कबूल किया है। इसके चलते उनका नाम भी बदल गया है। लालू परिवार में शामिल होने से पहले ही वे रेचल से राजेश्वरी यादव हो गई थीं। हालांकि इस बारे में लालू परिवार के किसी भी सदस्य ने अब तक आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

रिपोर्ट के मुताबिक, साधू यादव का कहना है कि आरजेडी प्रमुख लालू यादव ने बिहार पर 21 फीसदी यादवों के बल पर राज किया था। लेकिन, अब यादव समाज इनका विरोध करेगा। उन्होंने ये भी कहा कि लालू अपने बड़े बेटे तेज प्रताप को भकचोंहर कहते हैं, लेकिन ये तो सबसे बड़ा भकचोंहर है। उन्होंने ये भी कहा कि हम सभी ने मिलकर आरजेडी को खड़ा किया है, लेकिन अगर ये लोग इसे बर्बाद करने की कोशिश करेंगे तो हम उसमें ताला लगा देंगे।

साधू यादव के मुताबिक, बिहार का जो यादव समाज है वो लालू परिवार को अपना नेता मानता है। तेजस्वी के इस कार्य से यादवों का सपना टूट गया है। एक क्रिश्चियन लड़की से शादी करने के बाद अब तेजस्वी यादव से क्रिश्चियन बन चुके हैं। इसलिए मुख्यमंत्री बनने का सपना तो छोड़ ही दें।

अपने जीजा लालू प्रसाद यादव के संस्कार पर सवाल उठाते साधू यादव ने कहा कि वो (तेजस्वी) एक ईसाई लड़की के साथ 8 साल से रिलेशन में था और समाज और बिहार को ठगने का काम कर रहा था। लालू ने अपने बच्चों को संस्कार नहीं दिया, जिस कारण सारे बच्चे बिगड़ गए। उन्होंने सभी की पोल खोलने की धमकी दी और कहा कि अब बर्दाश्त की सीमा समाप्त हो गई है। ये केवल तेजस्वी की ही बात नहीं रह गई। मीसा भारती, चंदा यादव और अन्य सभी ने क्या-क्या किया, इसकी पोल खोलेंगे।

गौरतलब है कि 9 दिसंबर 2021 को लालू के छोटे लाल तेजस्वी यादव ने अपनी बचपन की दोस्त रिचेल गोडिन्हो से शादी कर ली। रिपोर्ट के मुताबिक, अब वो राजेश्वरी यादव के नाम से पहचानी जाएँगी।

छठ पूजा की एलजी द्वार अनुमत, कड़े नियमों का करना होगा पालन मनीष सीसोदिया की चेतावनी

मुस्लिम तुष्टिकरण और क्षेत्रवाद की राजनीति करने वाली केजरीवाल सरकार ईद – बकरीद पर खुद ही से फैसले दे देती है, वहीं जब हिन्दू जनता जब छट पूजा की अनुमति मांगती है तो हिन्दू विरोध के चलते पहले माना कर देती है ओर फिर टालने के लिए अनुमति मांगने का बहाना बना उपराज्यपाल के पास भेज देती है। उपराज्यपाल अनिल बैजल की अध्यक्षता में दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (डीडीएमए) की एक अहम बैठक के बाद उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने बताया कि दिल्ली में छठ पूजा को सार्वजनिक रूप से मनाने की अनुमति मिलेगी। एलजी द्वारा अनुमति देने के पश्चात भी केजरीवाल सरकार इसे अपनी तरफ सेहिंदुओं पर एहसान जता रही है। यह सरकार द्वारा पहले से तय किए गए स्थानों पर बहुत सख्त प्रोटोकाल के साथ किया जाएगा। COVID प्रोटोकाल के पालन के साथ सार्वजनिक स्थानों पर बेहद सीमित संख्या में लोगों को अनुमति दी जाएगी। इसके साथ 1 नवंबर से दिल्ली में सभी स्कूलों को खोलने पर भी सहमति बनी है। कोई हैरानगी नहीं मुसलिम बहुल इलाके में प्राचीन शिव मंदिर को कर कोर्ट में हलफनामा दे कर उसकी हमेशा के लिए सीलिंग करवा देती है।

दिल्ली में घोर प्रदूषण से ग्रस्त यमुना जी के घाट पर छट पूजा को मजबूर दिल्ली वासी

नयी दिल्ली(ब्यूरो) :

भाजपा और हिंदुओं के लगातार विरोध प्रदर्शन और पूर्वांचल वासियों के प्रतिरोध के आगे आम आदमी पार्टी सरकार को झुकना पड़ा है। दिल्ली सरकार ने छठ महापर्व मनाने की अनुमति दे दी है। दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने ‘दिल्ली आपदा की बैठक के बाद कहा कि त्योहारों का मौसम आ रहा है और खास कर छठ पूजा को लेकर लोगों की संवेदनाएँ थीं, इसीलिए निर्णय लिया गया है कि छठ पूजा कराने की अनुमति दिल्ली में दी जाएगी।

हालाँकि, उन्होंने इस दौरान ये भी कहा कि काफी कड़े दिशानिर्देशों के साथ दिल्ली सरकार द्वारा तय की गई पूर्व-निर्धारित जगहों पर सीमित संख्या में ही लोगों को शामिल होने की अनुमति दी जाएगी। उन्होंने कहा कि इस दौरान मास्क सहित कोरोना के सभी दिशानिर्देशों का पालन कराया जाएगा। उन्होंने दिल्ली वासियों से बहुत अच्छे से और सावधानी से छठ मनाने की अपील करते हुए कहा,”छठी मैया सबका कल्याण करें।” दिल्ली के डिप्टी सीएम ने इसे एक महत्वपूर्ण त्योहार बताया।

याद दिला दें कि हाल ही में भाजपा ने छठ के आयोजन पर लगे प्रतिबंधों को हटाने के लिए दिल्ली की AAP सरकार के विरुद्ध तगड़ा विरोध प्रदर्शन किया था, जिसमें पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी को गहरी चोटें आई थीं। उन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था। भाजपा ने छठ के आयोजन पर प्रतिबंधों का विरोध करते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की थी। दिल्ली सरकार ने इसका ठीकरा केंद्र के सिर फोड़ दिया था, जिसके बाद सवाल पूछे गए थे कि क्या ईद पर छूट देने के लिए केंद्र की सलाह ली गई?

भाजपा नेता तजिंदर पाल सिंह बग्गा ने सिसोदिया के केंद्र को भेजे गए पत्र पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था, “मनीष सिसोदिया जी, ईद पर बाजार मनसुख भाई से पूछ के खोला था? नाटक मत करो, आपके चेहरे नंगे हो चुके है।” वहीं दिल्ली भाजपा के उपाध्यक्ष सुनील यादव ने कहा था, “बकरीद और ईद पर जब दिल्ली सरकार ने छूट दी थी तब केंद्र सरकार को क्यों नहीं लिखा केजरीवाल जी? केजरीवाल और सिसोदिया, दोनों ने हजारों बच्चों को स्टेडियम में बुलाकर मेंटोर प्रोग्राम लॉन्च किया, तब क्यों ना लिए दिशानिर्देश केंद्र से?”

बता दें कि 30 सितंबर, 2021 को जारी किए गए एक आदेश में DDMA ने कोरोना संक्रमण का हवाला देते हुए हुए नदी के किनारे, घाटों और मंदिरों सहित सभी सार्वजनिक स्थानों पर छठ पूजा के आयोजनों पर रोक लगा दी थी। वहीं केंद्र सरकार द्वारा राजधानी दिल्ली में छठ पूजा में हिस्सा लेने वाले 10,000 लोगों के लिए मंगलवार से एक स्पेशल कोविड-19 टीकाकरण अभियान शुरू करने की घोषणा की गई है, जिसकी शुरुआत केंद्रीय आवास एवं शहरी मामलों के मंत्री हरदीप सिंह पुरी बुराड़ी के पास स्थित कादीपुर में करेंगे।

भाजपा और कांग्रेस चाहे जितनी कोशिशें कर लें अरविंद केजरीवाल को बदनाम नहीं कर सकती: योगेश्वर शर्मा

  • योगेश्वर शर्मा ने कहा: राजनीति छोडक़र तीसरी लहर से निबटने का इंतजाम करना चाहिए
  • भाजपा और कांग्रेस देश को गुमराह करने के लिए माफी मांगे

पंचकूला,26 जून:

आम आदमी पार्टी का कहना है कि  केंद्र की भाजपा सरकार और जगह जगह चारों खाने चित्त हो रही कांग्रेस अरविंद केजरीवाल को बदनाम करने की लाख कोशिशें कर लें,सफल नहीं होंगी। पार्टी का कहना है कि दिल्ली के लोग जानते हैं कि केजरीवाल उनके लिए लड़ता है और उनकी खातिर इन मौका प्रस्त पार्टियों के नेताओं की बातें भी सुनता है। यही वजह है कि दिल्ली की जनता ने तीसरी बार भी उन्हें सत्ता सौंपी तथा भाजपा को विपक्ष में बैठने लायक और कांग्रेस को कहीं का नहीं छोड़ा। आने वाले दिनों में यही हाल इन दोनों दलों का पंजाब मेें भी होने वाला है। इसी के चलते अब दोनों दल आम आदमी पार्टी व इसके मुखिया अरविंद केजरीवाल को निशाना बना रहे हैं।  पार्टी का कहना है कि अब तो इस मामले के लिए बनाई गई कमेटी  के अहम सदस्य एवं एम्स के प्रमुख डॉ. रणदीप गुलेरिया ने कहा है कि अब तक फाइनल रिपोर्ट नहीं आई है। ऐसे यह कहना जल्दबाजी होगी कि दिल्ली ने दूसरी लहर के पीक के वक्त जरूरी ऑक्सीजन की मांग को चार गुना बढक़र बताया। उन्होंने कहा कि मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में है, ऐसे में हमें जजमेंट का इंतजार करना चाहिए। ऐसे में अरविंद केजरीवाल को निशाना बनाने वाले भाजपा एवं कांग्रेस के नेता जनता को गुमराह के करने के लिए देश से माफी मांगे।
 आज यहां जारी एक ब्यान में आप के उत्तरी हरियाणा के सचिव योगेश्वर शर्मा ने कहा कि भाजपा और कांग्रेसी नेताओं को शर्म आनी चाहिए कि वे उस अरविंद केजरीवाल पर आरोप लगा रहे हैं जो अपने लोगों के लिए दिन रात एक करके काम करता है और उसने कोरोनाकाल में भी यही किया था। उन्होंने कहा कि देश की राजधानी दिल्ली में कोविड की दूसरी लहर जब अपने चरम पर थी तो यहां ऑक्सीजन की मांग में भी बेतहाशा वृद्धि हो गई थी। चाहे सोशल मीडिया देखें या टीवी चैनल हर जगह लोग अप्रैल और मई माह में ऑक्सीजन की मांग कर रहे थे। कई अस्पताल और यहां तक कि मरीजों के तीमारदार भी ऑक्सीजन की मांग को लेकर कोर्ट जा पहुंचे थे। उन्होंने कहा है कि अरविंद केजरीवाल ठीक ही तो कह रहे हैं कि उनका गुनाह यह है कि वह दिल्ली के  2 करोड़ लोगों की सांसों के लिए लड़े और वह भी उस समय जब  भाजपा और कांग्रेस के नेता चुनावी रैली कर रहे थे। तब भाजपा के दिल्ली के सांसद अपने घरों में छिपे बैठे थे। उन्होंने कहा कि दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने ठीक ही तो दावा किया है कि जिस रिपोर्ट के आधार पर अरङ्क्षवद केजरीवाल को बदनाम किया जा रहा है, वह है ही नहीं। है तो उसे सार्वजनिक करना चाहिए। उन्होंने कहा कि दरअसल भाजपा का आईटी सैल अरङ्क्षवद केजरीवाल के पंजाब दौरे के बाद से ही बौखलाया हुआ है, क्योंकि पंजाब में उसका आधार खत्म हो चुका है और आप पंजाब के साथ साथ अब गुजरात में भी सफलता के परचम फैला रही है। पंजाब व गुजरात में भाजपा के लोग आप का दामन थाम रहे हैं। ऐसे में उसे व कांग्रेस को आने वाले विधानसभा चुनावों में अगर किसी से खतरा है तो वह अरङ्क्षवद केजरीवाल और उनकी पार्टी आप से है। उन्होंने कहा कि ये पार्टियां और उनके नेता उन लोगों को झूठा बताकर उनका अपमान कर रहे हैं जिन लोगों ने अपनों को खोया है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को देश में अपने पोस्टर लगवाने के बजाये कोविड-19 की तीसरी लहर के खतरे से निपटने की तैयारियों पर ध्यान देना चाहिए।  उन्होंने प्रधानमंत्री को सचेत किया के स्वास्थ्य विशेषज्ञ तीसरी लहर की चेतावनी दे रहे हैं, इसलिए यह आराम का वक्त नहीं है, बल्कि सरकार को अग्रिम प्रबंध करने चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसा न हो कि जिस तरह केंद्र सरकार के दूसरी लहर से पहले के ढीले व्यवहार के कारण हजारों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी, वैसा ही तीसरी लहर के बाद हो। उन्होंने सरकार को वायरस के बदलते स्वरूप की तुरंत वैज्ञानिक खोज कर विशेषज्ञों की राय के अनुसार सभी इंतजाम करने को कहा। उन्होंने कहा कि अपनी नाकामियों का ठीकरा अरविंद केजरीवाल पर फोडऩे से काम नहीं चलेगा। काम करना होगा क्योंकि देश के लोग देख रहे हैं कि कौन काम कर रहा है और कौन ऐसी गंभीर स्थिति में भी सिर्फ राजनीति कर रहा है।

स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टरों संग अस्पताल में घूमते रहे और बाहर मरीज मर गए

हजारीबाग के एक कोरोना संक्रमित मरीज की मौत मंगलवार को रांची सदर अस्पताल में हो गयी। मौत से आक्रोशित परिजनों ने स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता को जमकर खरी-खोटी सुनायी और व्यवस्था पर सवाल खड़े किये। दरअसल इसी बीच परिजनों की नजर सदर अस्पताल में कोविड व्यवस्था का निरीक्षण करने पहुंचे स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता पर पड़ गई, फिर क्या था। मृतक की बेटी का गुस्सा फूट पड़ा। पिता को खोने वाली बेटी ने मंत्री बन्ना गुप्ता से कहा, ‘मंत्री जी यहीं (अस्पताल परिसर में) डॉक्टर- डॉक्टर चिल्लाती रह गई, लेकिन कोई डॉक्टर नहीं आया। अब आप क्या करेंगे, मेरे पिता को वापस लाकर देंगे।’

रांची, झारखंड:

झारखंड की राजधानी राँची के सदर अस्पताल से प्रशासन की लापरवाही का एक वीडियो सामने आया है। वीडियो में एक महिला अपने पिता के शव के पास रो-रोकर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री पर अपना गुस्सा उतार रही है। महिला को कहते सुना जा सकता है कि वह डॉक्टर-डॉक्टर चिल्लाती रही, लेकिन किसी ने उसकी नहीं सुनी।

घटना मंगलवार (अप्रैल 13, 2021) की है। महिला अपने बीमार पिता को सुबह से तमाम प्राइवेट अस्पतालों में ले जाकर थक चुकी थी और कहीं भी बेड उपलब्ध न होने के कारण वह हजारीबाग से उन्हें राँची के सदर अस्पताल लेकर आई। इसी बीच राज्य के स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता अस्पताल का निरीक्षण करने पहुँच गए। 

महिला ने आरोप लगाया कि वह लगातार डॉक्टरों से अपने पिता को देखने को कह रही थी, लेकिन कई घंटे उसकी किसी ने एक न सुनी। उन्हें घंटों बाहर गर्मी में इंतजार करना पड़ा। बहुत देर बाद डॉक्टर उन्हें अंदर लेकर गए, जहाँ उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। अपने पिता का शव अस्पताल से बाहर लाते हुए महिला की नजर स्वास्थ्य मंत्री पर पड़ी और महिला ने वहीं सबके सामने उन पर चिल्लाना शुरू कर दिया।

महिला ने कहा, “मंत्री जी! हम डॉक्टरों के लिए चिल्लाते रहे लेकिन कोई भी मेरे पिता को देखने नहीं आया। हम बाहर खड़े थे कि उन्हें अस्पताल में एडमिट कर लिया जाए, लेकिन वहाँ कोई भी नहीं था, उन्हें देखने के लिए। अंत में इलाज न मिलने से उनकी मौत हो गई।” महिला ने चिल्ला कर पूछा, “क्या मंत्री मेरे पिता को लौटाएँगे।”

महिला ने उन लोगों पर भी अपना गुस्सा उतारा जो वोट लेने के लिए आ जाते हैं, लेकिन उन्हें कोई मतलब नहीं होता आम जन किस दर्द से गुजर रहे हैं। वह बताती हैं कि इस समय हालात बहुत बुरे हैं और लोग इलाज के अभाव में मर रहे हैं।

स्वास्थ्य मंत्री ने घटना के संबंध में कहा कि इस समय हर जगह परेशानियाँ हैं और वह इससे निपटने का प्रयास कर रहे हैं। स्वास्थ्य मंत्री ने कहा, “हर दिन कोविड मरीजों की संख्या बढ़ रही है। हम बेडों का उसी हिसाब से इंतजाम कर रहे हैं। हमने प्राइवेट अस्पतालों से 50 प्रतिशत बेड कोविड मरीजों के लिए आरक्षित रखने को कहा है… जो भी गलतियाँ हैं हम उन्हें सुधारने की कोशिश कर रहे हैं।”

इस बीच राज्य के भाजपा अध्यक्ष दीपक प्रकाश ने महिला के पिता की मौत का इल्जाम राज्य सरकार पर लगाया। भाजपा अध्यक्ष ने लिखा, “राज्य सरकार की लापरवाही के कारण अपने पिता को खो देने से स्वास्थ्य मंत्री के समक्ष महिला ने आपा खो दिया। आखिर मुख्यमंत्री को अपनी जिम्मेदारियों का एहसास कब होगा।”

इससे पहले भाजपा अध्यक्ष ने राज्य में कोरोना के हालत से निपटने के लिए सीएम को पत्र लिखा था। पत्र में मुख्यमंत्री से मरीजों के लिए बेड, पर्याप्त ऑक्सीजन सप्लाई, अतिरिक्त वेंटिलेटर और पर्याप्त पैरा मेडिकल स्टाफ रखने की बात कही गई थी।

इस्लाम या ईसाई धर्म में परिवर्तन लेने के पश्चात दलित नहीं ले सकेंगे जातिगत आरक्षण का लाभ

हिन्दू धर्म में वर्ण व्यवस्था है, हिन्द धर्म 4 वर्णों में बंटा हुआ है, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वेश्या एवं शूद्र। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात पीढ़ियों से वंचित शूद्र समाज को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए संविधान में आरक्षण लाया गया। यह आरक्षण केवल (शूद्रों (दलितों) के लिए था। कालांतर में भारत में धर्म परिवर्तन का खुला खेल आरंभ हुआ। जहां शोषित वर्ग को लालच अथवा दारा धमका कर ईसाई या मुसलिम धर्म में दीक्षित किया गया। यह खेल आज भी जारी है। दलितों ने नाम बदले बिना धर्म परिवर्तन क्यी, जिससे वह स्वयं को समाज में नचा समझने लगे और साथ ही अपने जातिगत आरक्षण का लाभ भी लेते रहे। लंबे समय त यह मंथन होता रहा की जब ईसाई समाज अथवा मुसलिम समाज में जातिगत व्यवस्था नहीं है तो परिवर्तित मुसलमानों अथवा इसाइयों को जातिगत आरक्षण का लाभ कैसे? अब इन तमाम बहसों को विराम लग गया है जब एकेन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद सिंह ने सांसद में स्पष्ट आर दिया कि इस्लाम या ईसाई धर्म स्वीकार करने वाले दलितों के लिए आरक्षण की नीति कैसी रहेगी।

नयी दिल्ली(ब्यूरो):

इस्लाम या ईसाई धर्म में परिवर्तित होने वाले दलितों को चुनावों में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों से चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं होगी। इसके अलावा वह आरक्षण से जुड़े अन्य लाभ भी नहीं ले पाएँगे। गुरुवार (11 फरवरी 2021) को राज्यसभा में एक प्रश्न का जवाब देते हुए क़ानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने यह जानकारी दी। 

हिन्दू, सिख या बौद्ध धर्म स्वीकार करने वाले अनुसूचित जाति के लोग आरक्षित सीट से चुनाव लड़ने के योग्य होंगे। साथ ही साथ, वह अन्य आरक्षण सम्बन्धी लाभ भी ले पाएँगे। भाजपा नेता जीवी एल नरसिम्हा राव के सवाल का जवाब देते हुए रविशंकर प्रसाद ने इस मुद्दे पर जानकारी दी। 

आरक्षित क्षेत्रों से चुनाव लड़ने की पात्रता पर बात करते हुए रविशंकर प्रसाद ने कहा, “स्ट्रक्चर (शेड्यूल कास्ट) ऑर्डर के तीसरे पैराग्राफ के अनुसार, कोई भी व्यक्ति जो हिन्दू, सिख या बौद्ध धर्म से अलग है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा।” इन बातों के आधार पर क़ानून मंत्री ने स्पष्ट कर दिया कि इस्लाम या ईसाई धर्म स्वीकार करने वाले दलितों के लिए आरक्षण की नीति कैसी रहेगी। 

क़ानून मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि संसदीय या लोकसभा चुनाव लड़ने वाले इस्लाम या ईसाई धर्म में परिवर्तित होने वाले अनुसूचित जाति/जनजाति के व्यक्ति को निषेध करने के लिए संशोधन का प्रस्ताव मौजूद नहीं।    

एक राष्ट्र एक चुनाव, पक्ष – विपक्ष

2018 में विधि आयोग की बैठक में भाजपा और कांग्रेस ने इससे दूरी बनाए रखी. कॉंग्रेस का विरोध तो जग जाहिर है लेकिन भाजपा की इस मुद्दे पर चुप्पी समझ से परे है. 2018 में ऐसा क्या था कि प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता वाली भाजपा तटस्थ रही और आज मोदी इसका हर जगह इसका प्रचार प्रसार कर रहे हैं? 1999 में तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान विधि आयोग ने इस मसले पर एक रिपोर्ट सौंपी। आयोग ने अपनी सिफारिशों में कहा कि अगर किसी सरकार के खिलाफ विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव लेकर आता है तो उसी समय उसे दूसरी वैकल्पिक सरकार के पक्ष में विश्वास प्रस्ताव भी देना सुनिश्चित किया जाए। 2018 में विधि आयोग ने इस मसले पर एक सर्वदलीय बैठक भी बुलाई जिसमें कुछ राजनीतिक दलों ने इस प्रणाली का समर्थन किया तो कुछ ने विरोध। कुछ राजनीतिक दलों का इस विषय पर तटस्थ रुख रहा। भारत में चुनाव को ‘लोकतंत्र का उत्सव’ कहा जाता है, तो क्या पांच साल में एक बार ही जनता को उत्सव मनाने का मौका मिले या देश में हर वक्त कहीं न कहीं उत्सव का माहौल बना रहे? जानिए, क्यों यह चर्चा का विषय है.

सारिका तिवारी, चंडीगढ़:

हर कुछ महीनों के बाद देश के किसी न किसी हिस्से में चुनाव हो रहे होते हैं. यह भी चुनावी तथ्य है कि देश में पिछले करीब तीन दशकों में एक साल भी ऐसा नहीं बीता, जब चुनाव आयोग ने किसी न किसी राज्य में कोई चुनाव न करवाया हो. इस तरह के तमाम तथ्यों के हवाले से एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘एक देश एक चुनाव’ की बात छेड़ी है. अव्वल तो यह आइडिया होता क्या है? इस सवाल के बाद बहस यह है कि जो लोग इस आइडिया का समर्थन करते हैं तो क्यों और जो नहीं करते, उनके तर्क क्या हैं.

जानकार तो यहां तक कहते हैं ​कि भारत का लोकतंत्र चुनावी राजनीति बनकर रह गया है. लोकसभा से लेकर विधानसभा और नगरीय निकाय से लेकर पंचायत चुनाव… कोई न कोई भोंपू बजता ही रहता है और रैलियां होती ही रहती हैं. सरकारों का भी ज़्यादातर समय चुनाव के चलते अपनी पार्टी या संगठन के हित में ही खर्च होता है. इन तमाम बातों और पीएम मोदी के बयान के मद्देनज़र इस विषय के कई पहलू टटोलते हुए जानते हैं कि इस पर चर्चा क्यों ज़रूरी है.

क्या है ‘एक देश एक चुनाव’ का आइडिया?

इस नारे या जुमले का वास्तविक अर्थ यह है कि संसद, विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनाव एक साथ, एक ही समय पर हों. और सरल शब्दों में ऐसे समझा जा सकता है कि वोटर यानी लोग एक ही दिन में सरकार या प्रशासन के तीनों स्तरों के लिए वोटिंग करेंगे. अब चूंकि विधानसभा और संसद के चुनाव केंद्रीय चुनाव आयोग संपन्न करवाता है और स्थानीय निकाय चुनाव राज्य चुनाव आयोग, तो इस ‘एक चुनाव’ के आइडिया में समझा जाता है कि तकनीकी रूप से संसद और विधानसभा चुनाव एक साथ संपन्न करवाए जा सकते हैं.

पीएम मोदी की खास रुचि

जनवरी, 2017 में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक देश एक चुनाव के संभाव्यता अध्ययन कराए जाने की बात कही. तीन महीने बाद नीति आयोग के साथ राज्य के मुख्यमंत्रियों की बैठक में भी इसकी आवश्यक्ता को दोहराया. इससे पहले दिसंबर 2015 में राज्यसभा के सदस्य ईएम सुदर्शन नचियप्पन की अध्यक्षता में गठित संसदीय समिति ने भी इस चुनाव प्रणाली को लागू किए जाने पर जोर दिया था. 2018 में विधि आयोग की बैठक में भाजपा और कांग्रेस ने इससे दूरी बनाए रखी. चार दलों (अन्नाद्रमुक, शिअद, सपा, टीआरएस) ने समर्थन किया. नौ राजनीतिक दलों (तृणमूल, आप, द्रमुक, तेदेपा, सीपीआइ, सीपीएम, जेडीएस, गोवा फारवर्ड पार्टी और फारवर्ड ब्लाक) ने विरोध किया. नीति आयोग द्वारा एक देश एक चुनाव विषय पर तैयार किए गए एक नोट में कहा गया है कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को 2021 तक दो चरणों में कराया जा सकता है. अक्टूबर 2017 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने कहा था कि एक साथ चुनाव कराने के लिए आयोग तैयार है, लेकिन  निर्णय राजनीतिक स्तर पर लिया जाना है.

क्या है इस आइडिया पर बहस?

कुछ विद्वान और जानकार इस विचार से सहमत हैं तो कुछ असहमत. दोनों के अपने-अपने तर्क हैं. पहले इन तर्कों के मुताबिक इस तरह की व्यवस्था से जो फायदे मुमकिन दिखते हैं, उनकी चर्चा करते हैं.

कई देशों में है यह प्रणाली

स्वीडन इसका रोल मॉडल रहा है. यहां राष्ट्रीय और प्रांतीय के साथ स्थानीय निकायों के चुनाव तय तिथि पर कराए जाते हैं जो हर चार साल बाद सितंबर के दूसरे रविवार को होते हैं. इंडोनेशिया में इस बार के चुनाव इसी प्रणाली के तहत कराए गए. दक्षिण अफ्रीका में राष्ट्रीय और प्रांतीय चुनाव हर पांच साल पर एक साथ करा  जाते हैं जबकि नगर निकायों के चुनाव दो साल बाद होते हैं.

पक्ष में दलीलें

1. राजकोष को फायदा और बचत : ज़ाहिर है कि बार बार चुनाव नहीं होंगे, तो खर्चा कम होगा और सरकार के कोष में काफी बचत होगी. और यह बचत मामूली नहीं बल्कि बहुत बड़ी होगी. इसके साथ ही, यह लोगों और सरकारी मशीनरी के समय व संसाधनों की बड़ी बचत भी होगी.  एक अध्ययन के मुताबिक 2019 के लोकसभा चुनाव पर करीब साठ हजार करोड़ रुपये खर्च हुए. इसमें पार्टियों और उम्मीदवारों के खर्च भी शामिल हैं. एक साथ एक चुनाव से समय के साथ धन की बचत हो सकती है। सरकारें चुनाव जीतने की जगह प्रशासन पर अपना ध्यान केंद्रित कर पाएंगी.

2. विकास कार्य में तेज़ी : चूंकि हर स्तर के चुनाव के वक्त चुनावी क्षेत्र में आचार संहिता लागू होती है, जिसके तहत विकास कार्य रुक जाते हैं. इस संहिता के हटने के बाद विकास कार्य व्यावहारिक रूप से प्रभावित होते हैं क्योंकि चुनाव के बाद व्यवस्था में काफी बदलाव हो जाते हैं, तो फैसले नए सिरे से होते हैं.

3. काले धन पर लगाम : संसदीय, सीबीआई और चुनाव आयोग की कई रिपोर्ट्स में कहा जा चुका है कि चुनाव के दौरान बेलगाम काले धन को खपाया जाता है. अगर देश में बार बार चुनाव होते हैं, तो एक तरह से समानांतर अर्थव्यवस्था चलती रहती है.

4. सुचारू प्रशासन : एक चुनाव होने से सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल एक ही बार होगा लिहाज़ा कहा जाता है कि स्कूल, कॉलेज और ​अन्य विभागों के सरकारी कर्मचारियों का समय और काम बार बार प्रभावित नहीं होगा, जिससे सारी संस्थाएं बेहतर ढंग से काम कर सकेंगी.

5. सुधार की उम्मीद : चूंकि एक ही बार चुनाव होगा, तो सरकारों को धर्म, जाति जैसे मुद्दों को बार बार नहीं उठाना पड़ेगा, जनता को लुभाने के लिए स्कीमों के हथकंडे नहीं होंगे, बजट में राजनीतिक समीकरणों को ज़्यादा तवज्जो नहीं देना होगी, यानी एक बेहतर नीति के तहत व्यवस्था चल सकती है.

ऐसे और भी तर्क हैं कि एक बार में ही सभी चुनाव होंगे तो वोटर ज़्यादा संख्या में वोट करने के लिए निकलेंगे और लोकतंत्र और मज़बूत होगा. बहरहाल, अब आपको ये बताते हैं कि इस आइडिया के विरोध में क्या प्रमुख तर्क दिए जाते हैं.

1. क्षेत्रीय पार्टियां होंगी खारिज : चूंकि भारत बहुदलीय लोकतंत्र है इसलिए राजनीति में भागीदारी करने की स्वतंत्रता के तहत क्षेत्रीय पार्टियों का अपना महत्व रहा है. चूंकि क्षेत्रीय पार्टियां क्षेत्रीय मुद्दों को तरजीह देती हैं इसलिए ‘एक चुनाव’ के आइडिया से छोटी क्षेत्रीय पार्टियों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो जाएगा क्योंकि इस व्यवस्था में बड़ी पार्टियां धन के बल पर मंच और संसाधन छीन लेंगी.

2. स्थानीय मुद्दे पिछड़ेंगे : चूंकि लोकसभा और विधानसभा चुनाव अलग मुद्दों पर होते हैं इसलिए दोनों एक साथ होंगे तो विविधता और विभिन्न स्थितियों वाले देश में स्थानीय मुद्दे हाशिये पर चले जाएंगे. ‘एक चुनाव’ के आइडिया में तस्वीर दूर से तो अच्छी दिख सकती है, लेकिन पास से देखने पर उसमें कई कमियां दिखेंगी. इन छोटे छोटे डिटेल्स को नज़रअंदाज़ करना मुनासिब नहीं होगा.

3. चुनाव नतीजों में देर : ऐसे समय में जबकि तमाम पार्टियां चुनाव पत्रों के माध्यम से चुनाव करवाए जाने की मांग करती हैं, अगर एक बार में सभी चुनाव करवाए गए तो अच्छा खास समय चुनाव के नतीजे आने में लग जाएगा. इस समस्या से निपटने के लिए क्या विकल्प होंगे इसके लिए अलग से नीतियां बनाना होंगी.

4. संवैधानिक समस्या : देश के लोकतांत्रिक ढांचे के तहत य​ह आइडिया सुनने में भले ही आकर्षक लगे, लेकिन इसमें तकनीकी समस्याएं काफी हैं. मान लीजिए कि देश में केंद्र और राज्य के चुनाव एक साथ हुए, लेकिन यह निश्चित नहीं है कि सभी सरकारें पूर्ण बहुमत से बन जाएं. तो ऐसे में क्या होगा? ऐसे में चुनाव के बाद अनैतिक रूप से गठबंधन बनेंगे और बहुत संभावना है कि इस तरह की सरकारें 5 साल चल ही न पाएं. फिर क्या अलग से चुनाव नहीं होंगे?

यही नहीं, इस विचार को अमल में लाने के लिए संविधान के कम से कम छह अनुच्छेदों और कुछ कानूनों में संशोधन किए जाने की ज़रूरत पेश आएगी.

देशद्रोह के आरोपी स्टेन ‘स्वामी’ के समर्थन में उतरे जेएमएम और कॉंग्रेस पार्टी

‘स्वामी’ छद्म नाम से भारत में ईसाई धर्म का प्रचार कर रहे पादरी स्टेन ‘स्वामी’ भीमा कोरेगांव हिंसा और प्रधान मंत्री मोदी की हत्या के षड्यंत्र के आरोप में एनआईए की राडार पर थे। उन्हे नामकुम स्टेशन परिसर से गिरफ्तार किया गया। उनकी गिरफ्तारी के बाद ही से झारखंड मुक्ति मोर्चा के हेमंत सोरेन और कॉंग्रेस पार्टी समेत कई कई कैथोलिक संस्थाएँ गिरफ्तारी का विरोध कर रहीं हैं।

नयी दिल्ली(ब्यूरो):

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अब भीमा-कोरेगाँव हिंसा मामले में आरोपित पादरी स्टेन स्वामी के समर्थन में उतर आए हैं। स्टेन स्वामी को NIA ने हिरासत में लिया है। हेमंत सोरेन ने पूछा, “गरीब, वंचितों और आदिवासियों की आवाज़ उठाने’ वाले 83 वर्षीय वृद्ध ‘स्टेन स्वामी’ को गिरफ्तार कर केंद्र की भाजपा सरकार क्या संदेश देना चाहती है?” साथ ही कहा है, “अपने विरोध की हर आवाज को दबाने की ये कैसी जिद?

कई कांग्रेस नेता भी स्टेन स्वामी के बचाव में आ गए हैं। झारखंड कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सह राज्य के वित्त तथा खाद्य आपूर्ति मंत्री डॉ. रामेश्वर उराँव ने कहा कि फादर स्टेन स्वामी को ‘अर्बन नक्सलवाद’ के नाम पर गिरफ्तार किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने मोदी सरकार पर देश के विभिन्न हिस्से में रहने वाले बुद्धिजीवियों को प्रताड़ित करने का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि स्टेन स्वामी 25 वर्षों से राँची में जनजातीय वर्ग के उत्थान में जुटे हैं।

डॉक्टर उराँव ने कहा कि स्टेन स्वामी को फँसाने की साजिश रची गई है। एक दैनिक समाचार पत्र की खबर के अनुसार, प्रदेश कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता आलोक कुमार दुबे ने कहा कि केंद्र सरकार विभिन्न जाँच एजेंसियों का दुरुपयोग कर रही है। राज्य में पार्टी के एक अन्य प्रवक्ता लाल किशोरनाथ शाहदेव ने आरोप लगाया कि संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा को कम किया जा रहा है, जिसका परिणाम आने वाले दिनों में देश की जनता को भुगतना पड़ेगा।

राजेश गुप्ता छोटू और आदित्य विक्रम जायसवाल सहित झारखण्ड के कई कॉन्ग्रेस नेताओं ने स्टेन स्वामी का समर्थन किया है। इससे पहले भी कॉन्ग्रेस पार्टी के लोग खुल कर भीमा-कोरेगाँव के आरोपितों का समर्थन करते आए हैं। वामपंथी पार्टियाँ और नेतागण पहले से ही कहते आ रहे हैं कि सरकार भीमा-कोरेगाँव मामले में ‘एक्टिविस्ट्स को फँसा’ रही है। हालाँकि, इनमें से कई के खिलाफ चार्जशीट दायर हो चुकी है।

कई कैथोलिक संस्थाएँ और तथाकथित एक्टिविस्ट्स पहले से ही विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं और स्टेन स्वामी की गिरफ़्तारी को NIA की ‘एकतरफा कार्रवाई’ बता रहे हैं। इन सभी ने झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन से इस मामले में हस्तक्षेप करने की भी माँग की है। 2000 ‘बुद्धिजीवियों’ ने इसे मोदी सरकार का ‘विच हंट’ करार दिया है। वहीं झारखंड पुलिस ने मीडिया से कहा कि वो सारे सवाल NIA से पूछे, पुलिस से नहीं।

ज्ञात हो कि फादर स्टेन स्वामी पर दो साल पहले महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगाँव में हुई हिंसा व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश रचने में संलिप्तता का आरोप है। बताया जा रहा है कि स्टेन स्वामी पर भीमा-कोरेगाँव मामले में एनआईए ने आतंकवाद निरोधक क़ानून (यूएपीए) की धाराएँ भी लगाई गई हैं। एनआईए की एक टीम ने नामकुम स्टेशन परिसर में फादर स्टेन स्वामी को गिरफ्तार किया था।

पालघर साधुओं कि हत्या : फैक्ट फाइंडिंग टीम ने कई चौंकाने वाले दावे किए

महाराष्ट्र के पालघर में अप्रैल में हुई दो साधुओं सहित तीन लोगों की हत्या की जांच करने वाली एक स्वतंत्र फैक्ट फाइंडिंग टीम ने कई चौंकाने वाले दावे किए हैं। साधुओं की हत्या के पीछे गहरी साजिश और नक्सल कनेक्शन की तरफ इशारा किया है। रिटायर्ड जज, पुलिस अफसर और वकीलों को लेकर बनी इस कमेटी ने इस बड़ी साजिश के पदार्फाश के लिए पॉलघर मॉब लिंचिंग की जांच सीबीआई और एनआईए से कराने की सिफारिश की है। टीम ने कहा है कि पुलिस कर्मी चाहते तो घटना को रोक सकते थे, लेकिन उन्होंने हिंसा की साजिश में शामिल होने का रास्ता चुना। कमेटी ने शनिवार को एक ऑनलाइन कार्यक्रम के दौरान रिपोर्ट के चौंकाने वाले अंश पेश किए।

पुणे (महाराष्ट्र ब्यूरो):

महाराष्ट्र के पालघर में हुई साधुओं की हत्या के मामले में एक फैक्ट-फाइंडिंग पैनल के सदस्य संतोष जनाठे का दावा है कि एक एनसीपी नेता को उस भीड़ के बीच देखा गया था, जो पालघर में साधुओं की लिंचिंग की घटना में शामिल थे। फैक्ट फाइंडिंग टीम ने जिस NCP नेता को इस भीड़ हिंसा के बीच पाया है, उसका नाम काशीनाथ चौधरी है।

काशीनाथ चौधरी शरद पवार की ‘नेशनलिस्ट कॉन्ग्रेस पार्टी’ का जिला सदस्य है। उन पर आरोप लगे हैं कि साधुओं की लिंचिंग कर उनकी निर्मम हत्या करने वाली भीड़ में वामपंथी पार्टी सीपीएम के पंचायत सदस्य व उसके साथ विष्णु पातरा, सुभाष भावर और धर्मा भावर भी शामिल थे।

इस भीड़ में एनसीपी और सीपीएम नेताओं की मौजूदगी कई सवाल खड़े करती है। एनसीपी महाराष्ट्र की सत्ताधारी पार्टी है और शिवसेना के साथ गठबंधन में मिल कर सरकार चला रही है।

फैक्ट फाइंडिंग कमेटी ने कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। मसलन, झारखंड में नक्सल नेतृत्व वाले पत्थलगढ़ी आंदोलन की तर्ज पर पालघर में भी मुहिम चल रही है। कम्युनिस्ट कार्यकर्ता आदिवासियों को केंद्र और राज्य के कानूनों का पालन न करने के लिए भड़काने में जुटे हैं। आदिवासियों को अपने कानून का पालन करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। आदिवासियों को भ्रमित किया जा रहा है कि उनके पास सौ साल पुराना आदिवासी संविधान है। उन्हें सरकारी कानूनों का पालन करने की जगह आदिवासी संविधान का पालन करना चाहिए। कमेटी ने इस दावे के समर्थन में कुछ कम्युनिस्ट नेताओं के बयान और वीडियो भी जारी किए हैं।

फैक्ट फाइंडिंग समिति पहले भी इस निष्कर्ष पर पहुँच चुकी है कि क्षेत्र में काम करने वाले वामपंथी संगठन आदिवासियों के मन में सरकार और हिंदू धर्म गुरुओं, साधुओं और सन्यासियों के खिलाफ नफरत पैदा कर रहे हैं।

कमेटी ने करीब डेढ़ सौ पेज की जांच रिपोर्ट में कहा है, “झारखंड में नक्सल नेतृत्व वाले पत्थलगढ़ी आंदोलन की तर्ज पर पालघर में काम करने वाले वामपंथी संगठन संवैधानिक ढांचे और गतिविधियों के प्रति घृणा को बढ़ावा देने में लिप्त हैं। कम्युनिस्ट संगठन आदिवासी बाहुल्य गांवों की पूर्ण स्वायत्तता का दावा करते हुए संसद या राज्य के कानून का पालन न करने की घोषणा किए हैं। वामपंथी संगठनों की ओर से आदिवासियों में झूठ फैलाया जाता है कि आदिवासी हिंदू नहीं हैं।”

उनकी जाँच से यह निष्कर्ष निकला था कि कैथोलिक बिशप कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया, काश्तकारी संगठन, भूमिसेना, आदिवासी एकता परिषद, सीपीएम जैसे संगठनों के बढ़ते प्रभाव के साथ क्षेत्र में बढ़ती हिंसा, साधुओं की हत्या के रूप में सामने आई थी।

फैक्ट फाइंडिंग कमेटी ने कहा, “क्षेत्र में देश विरोधी गतिविधियां चल रहीं हैं। स्थानीय संगठन आदिवासियों के दिमाग में सरकार और साधुओं के खिलाफ नफरत पैदा कर रहे हैं। काश्तकारी संगठन, आदिवासी एकता परिषद, भूमि सेना और अन्य कई संगठन इसके लिए जिम्मेदार हैं। गांव में पत्थलगढ़ी आंदोलन की तरह संकल्प पारित करने के पीछे आदिवासी एकता परिषद के सदस्य का शामिल होना गहरी साजिश की तरफ इशारा करता है।”

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इसके साथ ही इस केस को अभी तक भी सीबीआई के पास नहीं दिया गया है। बताया जा रहा है कि महाराष्ट्र सरकार ने इस केस में अपनी क्षेत्रीय गौरव को आगे रखा है और वह इसलिए भी नहीं चाहती कि यह केस सीबीआई के पास ट्रांसफर हो क्योंकि सीबीआई गृह मंत्रालय के दायरे में आती है। महाराष्ट्र सरकार की इस केस को लेकर बरती गई उदासीनता पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही उन्हें फटकार लगा चुकी है।

सनद रहे कि महाराष्ट्र स्थित पालघर के गढ़चिंचले गाँव में गत 16 अप्रैल को दो साधुओं और उनके वाहन चालक की भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। बाद में यह कहा गया कि वह बच्चों की चोरी होने के संदेह में पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। जबकि, ये दोनों साधु ड्राइवर के साथ अपने गुरुभाई के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए सूरत जा रहे थे।

नाग पंचमी 2020

व्रत – उपवास – त्यौहार, चंडीगढ़ – 25 जुलाई:

नाग पंचमी का त्योहार आज 25 जुलाई को मनाया जा रहा है. आज लोग सांपों/नाग देवताओं की पूजा करेंगे और नाग देवता को दूध पिलाएंगे. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, नाग पंचमी के दिन नागदेव की पूजा करने से कुंडली के राहु और केतु से संबंधित दोष दूर होते हैं. जिन जातकों की कुंडली में सांप का भय और सर्पदंश का योग होता है वो नाग पंचमी के दिन कालसर्प योग की पूजा करेंगे. आज कई महिलाएं सांप को भाई मानकर उनकी पूजा करती हैं और भाई से अपने परिवार की रक्षा का आशीर्वाद मांगती हैं. आइए नाग पंचमी के मौके पर पढ़ते हैं नाग पंचमी कथा …

नाग पंचमी कथा:

नाग पंचमी की पौराणिक कथा के अनुसार, बहुत समय पहले की बात है जब प्राचीन नगर में एक सेठजी के सात पुत्र थे. सातों के विवाह हो चुके थे. सबसे छोटे पुत्र की पत्नी श्रेष्ठ चरित्र की विदूषी और सुशील थी, परंतु उसके भाई नहीं था.

एक दिन बड़ी बहू ने घर लीपने को पीली मिट्टी लाने के लिए सभी बहुओं को साथ चलने को कहा तो सभी धलिया और खुरपी लेकर मिट्टी खोदने लगी. तभी वहां एक सर्प निकला, जिसे बड़ी बहू खुरपी से मारने लगी. यह देखकर छोटी बहू ने उसे रोकते हुए कहा- ‘मत मारो इसे? यह बेचारा निरपराध है.’

यह सुनकर बड़ी बहू ने उसे नहीं मारा तब सर्प एक ओर जा बैठा. तब छोटी बहू ने उससे कहा-‘हम अभी लौट कर आती हैं तुम यहां से जाना मत. यह कहकर वह सबके साथ मिट्टी लेकर घर चली गई और वहां कामकाज में फंसकर सर्प से जो वादा किया था उसे भूल गई.

उसे दूसरे दिन वह बात याद आई तो सब को साथ लेकर वहां पहुंची और सर्प को उस स्थान पर बैठा देखकर बोली- सर्प भैया नमस्कार! सर्प ने कहा- ‘तू भैया कह चुकी है, इसलिए तुझे छोड़ देता हूं, नहीं तो झूठी बात कहने के कारण तुझे अभी डस लेता. वह बोली- भैया मुझसे भूल हो गई, उसकी क्षमा मांगती हूँ, तब सर्प बोला- अच्छा, तू आज से मेरी बहन हुई और मैं तेरा भाई हुआ. तुझे जो मांगना हो, मांग ले. वह बोली- भैया! मेरा कोई नहीं है, अच्छा हुआ जो तू मेरा भाई बन गया.

कुछ दिन व्यतीत होने पर वह सर्प मनुष्य का रूप रखकर उसके घर आया और बोला कि ‘मेरी बहन को भेज दो.’ सबने कहा कि ‘इसके तो कोई भाई नहीं था, तो वह बोला- मैं दूर के रिश्ते में इसका भाई हूं, बचपन में ही बाहर चला गया था. उसके विश्वास दिलाने पर घर के लोगों ने छोटी को उसके साथ भेज दिया. उसने मार्ग में बताया कि ‘मैं वहीं सर्प हूं, इसलिए तू डरना नहीं और जहां चलने में कठिनाई हो वहां मेरी पूंछ पकड़ लेना. उसने कहे अनुसार ही किया और इस प्रकार वह उसके घर पहुंच गई. वहां के धन-ऐश्वर्य को देखकर वह चकित हो गई.

एक दिन सर्प की माता ने उससे कहा- ‘देश परंतु सर्प के समझाने पर शांत हो गई. तब सर्प ने कहा कि बहिन को अब उसके घर भेज देना चाहिए. तब सर्प और उसके पिता ने उसे बहुत सा सोना, चांदी, जवाहरात, वस्त्र-भूषण आदि देकर उसके घर पहुंचा दिया.

इतना ढेर सारा धन देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्या से कहा- भाई तो बड़ा धनवान है, तुझे तो उससे और भी धन लाना चाहिए. सर्प ने यह वचन सुना तो सब वस्तुएं सोने की लाकर दे दीं. यह देखकर बड़ी बहू ने कहा- ‘इन्हें झाड़ने की झाड़ू भी सोने की होनी चाहिए’. तब सर्प ने झाडू भी सोने की लाकर रख दी.

सर्प ने छोटी बहू को हीरा-मणियों का एक अद्भुत हार दिया था. उसकी प्रशंसा उस देश की रानी ने भी सुनी और वह राजा से बोली कि- सेठ की छोटी बहू का हार यहां आना चाहिए.’ राजा ने मंत्री को हुक्म दिया कि उससे वह हार लेकर शीघ्र उपस्थित हो मंत्री ने सेठजी से जाकर कहा कि ‘महारानीजी छोटी बहू का हार पहनेंगी, वह उससे लेकर मुझे दे दो’. सेठजी ने डर के कारण छोटी बहू से हार मंगाकर दे दिया.

छोटी बहू को यह बात बहुत बुरी लगी, उसने अपने सर्प भाई को याद किया और आने पर प्रार्थना की- भैया ! रानी ने हार छीन लिया है, तुम कुछ ऐसा करो कि जब वह हार उसके गले में रहे, तब तक के लिए सर्प बन जाए और जब वह मुझे लौटा दे तब हीरों और मणियों का हो जाए. सर्प ने ठीक वैसा ही किया. जैसे ही रानी ने हार पहना, वैसे ही वह सर्प बन गया. यह देखकर रानी चीख पड़ी और रोने लगी.

यह देख कर राजा ने सेठ के पास खबर भेजी कि छोटी बहू को तुरंत भेजो. सेठजी डर गए कि राजा न जाने क्या करेगा? वे स्वयं छोटी बहू को साथ लेकर उपस्थित हुए. राजा ने छोटी बहू से पूछा- तुने क्या जादू किया है, मैं तुझे दंड दूंगा. छोटी बहू बोली- राजन ! धृष्टता क्षमा कीजिए, यह हार ही ऐसा है कि मेरे गले में हीरों और मणियों का रहता है और दूसरे के गले में सर्प बन जाता है. यह सुनकर राजा ने वह सर्प बना हार उसे देकर कहा- अभी पहनकर दिखाओ. छोटी बहू ने जैसे ही उसे पहना वैसे ही हीरों-मणियों का हो गया.

यह देखकर राजा को उसकी बात का विश्वास हो गया और उसने प्रसन्न होकर उसे बहुत सी मुद्राएं भी पुरस्कार में दीं. छोटी वह अपने हार और इन सहित घर लौट आई. उसके धन को देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्या के कारण उसके पति को सिखाया कि छोटी बहू के पास कहीं से धन आया है. यह सुनकर उसके पति ने अपनी पत्नी को बुलाकर कहा- ठीक-ठीक बता कि यह धन तुझे कौन देता है? तब वह सर्प को याद करने लगी.

तब उसी समय सर्प ने प्रकट होकर कहा- यदि मेरी धर्म बहन के आचरण पर संदेह प्रकट करेगा तो मैं उसे खा लूंगा. यह सुनकर छोटी बहू का पति बहुत प्रसन्न हुआ और उसने सर्प देवता का बड़ा सत्कार किया. उसी दिन से नागपंचमी का त्योहार मनाया जाता है और स्त्रियां सर्प को भाई मानकर उसकी पूजा करती हैं.