क्या झारखंड में ‘एड-हॉक अंजुमन इस्लामि’ के इशारे पर होते हैं तबादले ?

झारखंड में जब से कॉन्ग्रेस-झामुमो गठबंधन की सरकार बनी है उस पर राज्य में मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लग रहे हैं। लोहरदगा में ही इस साल 23 जनवरी को सीएए के समर्थन में निकाले गए जुलूस पर मुस्लिमों द्वारा हमला किया गया था। जिसमें नीरज प्रजापति की मौत हो गई थी। नीरज प्रजापति के सर पर लोहे की रॉड से हमला किया गया था। सीएए के समर्थन में रैली निकाल रहे लोगों पर पूर्व-नियोजित तरीके हमला किया गया था। मुसलमानों ने अपने घरों की छतों से ईंट-पत्थर फेंककर हमला किया था।

कॉंग्रेस और मुस्लिम तुष्टीकरण का चोली दमन का साथ है। झारखंड हो राजस्थान हो या हो महाराष्ट्र जहां भी कॉंग्रेस सरकार है वहाँ मुस्लिम तुष्टीकरण ज़ोरों पर है। जहां सभी देशों में कोरोना संक्रमित मृतकों के शवों को जलाया जा रहा है, वहीं भारत में मुस्लिम तुष्टीकरण के चलते उन्हे दफनाना ही होगा भले ही बाद में संक्रामण भयावह तरीके से फैले। काँग्रेस और इनके घटक दल भाजपा के उदय के पश्चात मुस्लिम तुष्टीकरण में अधिक प्रबलता से आगे आए हैं। शाहीन बाग हो या फिर तबलीगी मरकज़, जेएनयू हो या एएमयू, देवबंद हो जामिया सब में से यदा कडा भारत विरोध स्वर सुनाई पड़ते हैं लेकिन आज तक कॉंग्रेस और घटक दलों ने इसकी भर्त्सनानहीं की, उल्टे उनके साथ खड़े दिखाई पड़े। आज कॉंग्रेस अपने लुप्त होते जनाधार को बंगलादेशी घुसपैथियों और रोहिङ्ग्याओन में तलाश रह है और पूरे ममत्व के साथ उनका पोषण कर रही है।

पिछले दिनों झारखंड के लोहरदगा में रोहिंग्या और बांग्लादेशी मुसलमानों के छिपी होने की बात सामने आई थी। इस संबंध में रिपोर्ट देने वाले विशेष शाखा (खुफिया विभाग) के डीएसपी जितेंद्र कुमार का तबादला कर दिया गया है। उनकी जगह इमदाद अंसारी लेंगे। उन्हें लातेहार से यहॉं भेजा गया है।

जितेंद्र, इमदाद सहित कुल चार डीएसपी का तबादला हुआ है। लेकिन, जितेंद्र कुमार को पलामू भेजे जाने के पीछे राजनीतिक वजहें बताई जा रही है। दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर के अनुसार उन्होंने एडीजी (विशेष शाखा) को सौंपी रिपोर्ट में लोहरदगा के विभिन्न इलाकों के 13 लोगों पर रोहिंग्या और बांग्लादेशी मुसलमानों को संरक्षण देने का आरोप लगाया था। इस रिपोर्ट से पूरे प्रदेश में हलचल मची थी।

लोहरदगा की एड-हॉक अंजुमन इस्लामिया ने राज्य के डीजीपी को पत्र लिखकर इस रिपोर्ट पर सवाल उठाए थे। 11 अप्रैल को लिखे पत्र में रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कार्रवाई की मॉंग की गई थी। अंजुमन इस्लामिया के कंवेनर हाजी शकील अहमद की तरफ से लिखे पत्र में कहा गया था कि आजादी के बाद से ही लोहरदगा जिला में बांग्लादेश, पाकिस्तान या रोहिंग्या मुसलमानों का कोई वजूद नहीं है। विशेष शाखा की रिपोर्ट में जिस स्थान का जिक्र है, वहाँ भी ऐसे नागरिक नहीं हैं। रिपार्ट में जिन व्यक्तियों को संरक्षक बताया गया है, वे समाज के प्रतिष्ठित लोग हैं। एक साजिश के तहत उन्हें बदनाम करने की कोशिश की गई है।

पत्र में दैनिक जागरण में 11 अप्रैल को प्रकाशित एक रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया है। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में अवैध रूप से छिपकर रह रहे म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमानों की झारखंड के भी कई हिस्सों में उपस्थिति और सक्रियता के प्रमाण मिले हैं। पिछले दिनों तबलीगी जमात की तलाश में हुई छापेमारी के दौरान धनबाद के बैंक मोड़ इलाके से तीन रोहिंग्या मुसलमानों को भी पकड़ा गया था, वहीं लोहरदगा में भी कई रोहिंग्या के छिपकर रहने की खबर मिली थी।

इसके साथ ही लोहरदगा के ऐसे 13 लोगों का नाम व पता के सामने आने का भी जिक्र किया गया है, जिनके ऊपर रोहिंग्या व बांग्लादेशी घुसपैठियों को छिपाने का आरोप है। लोहरदगा के जिन मुहल्लों में बांग्लादेशी व रोहिंग्या मुसलमानों के रहने की सूचना पुलिस तक पहुँची है, उनमें ईदगाह मुहल्ला, राहत नगर, इस्लाम नगर, जूरिया, सेन्हा के चितरी, कुड़ू के जीमा व बगडु के हिसरी आदि गाँव के नाम शामिल हैं।

गौरतलब है कि झारखंड में जब से कॉन्ग्रेस-झामुमो गठबंधन की सरकार बनी है उस पर राज्य में मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लग रहे हैं। लोहरदगा में ही इस साल 23 जनवरी को सीएए के समर्थन में निकाले गए जुलूस पर मुस्लिमों द्वारा हमला किया गया था। जिसमें नीरज प्रजापति की मौत हो गई थी। नीरज प्रजापति के सर पर लोहे की रॉड से हमला किया गया था। सीएए के समर्थन में रैली निकाल रहे लोगों पर पूर्व-नियोजित तरीके हमला किया गया था। मुसलमानों ने अपने घरों की छतों से ईंट-पत्थर फेंककर हमला किया था।

नीरज प्रजापति की पत्नी ने सीएम हेमंत सोरेन से मदद की गुहार लगाई थी, लेकिन व्यस्त सीएम ने उन्हें मुआवजे का कोई आश्वासन नहीं दिया और प्रशासन ने नीरज की शव यात्रा में सिर्फ 35 लोग को जाने की अनुमति दी थी। साथ ही शमशान जाने के रास्ते को भी बदल दिया था, क्योंकि रास्ते में एक मस्जिद थी।  

सरकार ने मुआवजा देने से इनकार कर दिया तो पत्रकारों के प्रयासों के बाद जनता ने अब तक लगभग 32.5 लाख रुपए का सहयोग किया है। इसमें से 11.4 लाख रुपए क्राउडकैश के जरिए जुटाए गए, जबकि बाकी धनराशि लोगों ने दिवंगत नीरज की पत्नी के बैंक अकाउंट में ट्रांसफर किया।

मोदी के आवाहन पर भारत ने दिखाई एकता, की दीपावली

कोरोना के खिलाफ जंग में पीएम मोदी की अपील के बाद देशवासी आज रात 9 बजे 9 मिनट दीया, कैंडल, मोबाइल फ्लैश और टार्च जलाकर एकजुटता का परिचय देंगे. लोग दीया जलाने की तैयारी कर लिए हैं.

नई दिल्ली: 

कोरोना वायरस के खिलाफ पूरे देश ने एकजुट होकर प्रकाश पर्व मनाया. पीएम मोदी की अपील पर एकजुट होकर देश ने साबित कर दिया कि कोरोना के खिलाफ हिंदुस्तान पूरी ताकत से लड़ेगा. देश के इस संकल्प से हमारी सेवा में 24 घंटे, सातों दिन जुटे कोरोना फाइटर्स का भी हौसला लाखों गुना बढ़ गया. गौरतलब है कि पूरी दुनिया कोरोना महामारी की चपेट में हैं. अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विकसित देश कोरोना के आगे बेबस और लाचार नजर आ रहे हैं लेकिन भारत के संकल्प की वजह से देश में कोरोना संक्रमण विकसित देशों के मुकाबले कई गुना कम है.

Live Updates- 

  • कोरोना के खिलाफ एकजुट हुआ भारत, प्रकाश से जगमगाया पूरा देश
  • पीएम मोदी की अपील पर हिंदुस्तान ने किया कोरोना के खिलाफ जंग का ऐलान
  • कोरोना के खिलाफ जापान में जला पहला दीया,
  • कुछ देर बाद 130 करोड़ हिंदुस्तानी लेंगे एकजुटता का संकल्प

अमित शाह ने जलाए दीये

दिल्ली: गृह मंत्री अमित शाह ने अपने आवास पर सभी लाइट बंद करने के बाद मिट्टी के दीपक जलाए. 

योगी आदित्यनाथ ने जलाया दीया

यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने दीया जलाकर एकता की पेश की मिसाल. दीए की रोशनी से बनाया ऊं.

अनुपम खेर ने जलायी मोमबत्ती

अनुप खेर ने दीया जलाकर दिया एकता का संदेश

बता दें कि पीएम मोदी ने शुक्रवार को अपील की थी कि पूरे देश के लोग रविवार रात 9 बजे घर की बत्तियां बुझाकर अपने कमरे में या बालकनी में आएं और दीया, कैंडिल, मोबाइल और टॉर्च जलाकर कोरोना के खिलाफ जंग में अपनी एकजुटा प्रदर्शित करें.

क्या यह एक नयी जिहाद की तैयारी है?

जिहाद किसी भी प्रकार की हो सकती है। आप उसे खड्ग से लड़ने वाली अथवा लव जिहाद का नाम दे सकते हैं। अब जिहाद का एक नया स्वरूप सामने आ रहा है, वह है बीमारी फैलाने वाला वुहान वाइरसमक्का से आए कुछ लोग जिनहोने अपने quarantine stamps मिटा दिये थे या वह भी इसी का हिस्सा नहीं हैं? ऐसे लोगों पर क्या राष्ट्र द्रोह का मामला नहीं चलना चाहिए? वुहान वायरस से लड़ने के लिए पीएम मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार और अधिकांश राज्य सरकारों ने कमर कस ली है। पर कुछ लोग ऐसे भी हैं जो जानबूझकर इस काम में भी बाधा डाल रहे हैं। अभी पुलिस की कार्रवाई में कुछ ऐसे विदेशी प्रचारक पकड़े गए हैं, जो इस्लामिक प्रचार के नाम पर अपने कर्मों से वुहान वायरस फैलाने पर तुले हुए हैं। सूत्रों की मानें तो बंगाल में जहां रोहङियाओं को सरकारी पराश्रय मिलता है वहाँ इन लोगों की तादाद चिंताजनक ढंग से अधिक हो सकती है।

अभी हाल ही में बिहार में एक मस्जिद से एक दर्जन से भी ज़्यादा मुसलमान पकड़े गए हैं, जिन पर वुहान वायरस से संक्रमित होने का खतरा बताया जा रहा था। इसके पश्चात तो ऐसे संदिग्धों को पकड़ने के लिए देशभर में छापेमारी की जाने लगी।

रांची में भी 11 मौलवियों को धरा गया

इसी तरह रांची में भी इस्लामिक प्रचारकों की वजह से लोगों को कोरोना के खौफ का सामना करना पड़ा। दरअसल, कोरोना वायरस से सर्वाधिक प्रभावित देश चीन, कजाकिस्तान और किर्गिस्तान के 11 नागरिकों के रांची के तमाड़ के रडग़ांव स्थित एक मस्जिद में ठहरे होने की सूचना पर इलाके में हड़कंप मच गया। इसकी सूचना पुलिस प्रशासन को दी गई। पुलिस-प्रशासन मेडिकल टीम के साथ वहां पहुंची और सभी मौलवियों की स्वास्थ्य जांच की। सभी को रेस्क्यू करते हुए क्वारंटाइन के लिए मुसाबनी स्थित कांस्टेबल ट्रेनिंग स्कूल भेज दिया गया।

परन्तु प्रशासन को ऐसा क्यों करना पड़ा? ऐसी क्या आवश्यकता आ पड़ी? चलिए हम आपको बताते हैं… ऐसा इसलिए किया जा रहा है क्योंकि इस्लामिक प्रचारक मजहब के नाम पर विशाल भीड़ इकट्ठा कर लोगों में वुहान वायरस से संक्रमण का खतरा बढ़ा रहे हैं, जिसका प्रतिकूल असर दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ इस्लाम बहुल देशों में भी देखने को मिला है।

इस कारण से तमिलनाडु में भी कोरोना वायरस के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। शुक्रवार को राज्य सरकार के स्वास्थ्य मंत्री ने जानकारी दी कि राज्य में अब तक कुल 6 मामले आ चुके हैं। जिनमें से तीन विदेशी नागरिकों को पकड़ा गया है। एक थाई नागरिक है जबकि दूसरा इटली का रहने वाला बताया जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, थाईलैंड के दोनों ही नागरिक तबलीगी जमात के इस्लामिक धर्मगुरु हैं।

जब इन तीनों विदेशी नागरिकों का मेडिकल टेस्ट हुआ तो कोरोना पॉजिटिव आया। अधिकारियों के अनुसार ये दोनों इस्लामिक धर्मगुरु 6 मार्च को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के आईजीआई एयरपोर्ट पर उतरे इसके बाद ये दोनों किसी होटल में ठहरे। फिर 10 मार्च को मिलेनियम एक्सप्रेस से इरोड के लिए यात्रा की थी। अब इससे समझा जा सकता है कि इन दोनों ही इस्लामिक धर्मगुरुओं ने कितने लोगों की जान खतरे में डाली होगी।

अब बता दें कि दोनों थाई प्रचारक जिस तब्लीगी जमात से आते हैं, ये संगठन दुनिया के 213 मुल्कों में फैली हुई है। जमात से दुनियाभर के 15 करोड़ लोग जुड़े हुए हैं। जमात कोई सरकारी मदद नहीं लेती है। जमात की कोई बेवसाइट, अखबार या चैनल नहीं है। भारत में जमात का हेड ऑफिस दिल्ली में हज़रत निजामुउद्दीन दरगाह के पास है। जमात की एक खास बात ये है कि ये अपना एक अमीर (अध्यक्ष) चुनते हैं और उसी की बात मानते हैं।

अब बात करते हैं कोरोना वायरस फैलाने में मुस्लिम प्रचारकों के सहभागिता की। इस महामारी को फैलाने में विशेषकर तब्लीगी जमात ने मिडल ईस्ट में कई सभाएं की। इनमें से एक कुआलालंपुर में पेटलिंग मस्जिद में चार दिवसीय मुस्लिम जनसभा का आयोजन किया गया, जिसमें 1500 विदेशियों सहित 16 हजार स्थानीय लोग शामिल हुए थे। इस खबर के लिखे जाने तक मलेशिया में 1500 से ज़्यादा वुहान वायरस के केस कंफर्म हो चुके हैं।

बताया जाता है कि लगभग दो तिहाई मामलों को इस जनसभा के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था, जो 27 फरवरी से 1 मार्च के बीच आयोजित की गई थी। यही वजह था कि दक्षिण पूर्व एशिया में कोरोना का प्रकोप एकाएक बढ़ा।

परन्तु यह खतरा केवल तमिलनाडु या तेलंगाना तक ही सीमित नहीं है। इस खतरे की चपेट में दिल्ली जैसे राज्य भी हैं। धर्म के नाम पर जिस तरह इन लोगों ने शाहीन बाग में उपद्रव मचा रखा था, वह प्रदर्शन स्थल के उखाड़ कर फेंके जाने के बाद भी नहीं बदला है। ऐसे में धर्म के नाम पर जिस तरह से वुहान वायरस के कैरियर बनने में इस्लामिक प्रचारकों ने सहभागिता निभाई है, वह भारत सहित कई देशों के लिए काफी घातक सिद्ध हो सकता है।

रांची के तमाड़ इलाके में पुलिस ने 11 विदेशी मौलवियों को धर दबोचा

‘कितने अफ़ज़ल मारोगे, घर-घर से अफ़ज़ल निकलेगा’ ये नारा एक ज़माने में देशविरोधी जिहादियों को बहुत प्रिय हुआ करता था, लेकिन फिर जवाब आया ‘हर घर में घुसकर मारेंगे, जिस घर से अफ़ज़ल निकलेगा।’ इसके बाद से अफ़ज़ल प्रेमी गैंग के हौसले पस्त हैं। लेकिन लगता नहीं कि वो सुधरने वाले हैं। लगता है अब उनका नारा है “कितने विदेशी मौलवी पकड़ोगे, हर मस्जिद से विदेशी मौलवी निकलेगा”। कुछ दिन पहले पटना की एक मस्जिद से एक दर्जन विदेशी मौलवी पकड़े गए थे, उसके बाद से देशभर की मस्जिदों से विदेशी मौलवियों के पकड़े जाने का सिलसिला शुरू हो गया है। ताज़ा मामला झारखंड की राजधानी राँची की एक मस्जिद का है, जहां से 11 विदेशी मौलवी दबोचे गए। इसी तरह तमिलनाडु के अंबूर में भी 12 इंडोनेशियाई और 8 रोहिंग्या मौलवी पकड़े जाने की ख़बर है। ख़ुफ़िया सूत्रों के मुताबिक़ देश की कई मस्जिदों में ऐसे विदेशी मौलवी अवैध रूप से रह रहे हैं।

राँची की मस्जिद में हुई छापेमारी

रांची के तमाड़ इलाके में पुलिस ने 11 विदेशी मौलवियों (Foreign Clerics) को धर दबोचा। ये सभी चीन (China), किर्गिस्तान (Kyrgyzstan) और कजाकिस्तान (Kazakhstan) के रहने वाले हैं। ये सभी तमाड़ के रड़गांव के पास एक मस्जिद में रह रहे थे। गुप्त सूचना के आधार पर कार्रवाई करते हुए पुलिस ने सभी को कब्जे में लेकर क्वारंटाइन के लिए कांस्टेबल ट्रेनिंग स्कूल, मुसाबनी भेज दिया। शक जताया जा रहा है कि ये भारत में कोरोना वायरस फैलाने की किसी अंतरराष्ट्रीय साजिश का भी हिस्सा हो सकते हैं। फिलहाल इनके कागजातों की जांच की जा रही है और पूछताछ चल रही है। इनको शरण देने वाली मस्जिद के भारतीय मौलवियों से भी पूछताछ हो रही है। राँची पुलिस के डीएसपी (बुंडू) अजय कुमार ने बताया कि जांच पड़ताल के बाद सभी को कब्जे में ले लिया गया है। यह पता चला है कि ये सभी चीन, कजाकिस्तान और किर्गिस्तान के रहने वाले हैं। सभी के वीजा और पासपोर्ट को जब्त कर लिया गया है।

देशभर में फैले होने का है संदेह

दो दिन पहले ही तमिलनाडु के अंबूर में एक मस्जिद से कुल 20 विदेशी मौलवी गिरफ्तार किए गए। इनमें से 12 इंडोनेशिया के रहने वाले हैं, जबकि 8 रोहिंग्या मुसलमान हैं। इन सभी की मेडिकल जाँच कराई जा रही है ताकि पता चल सके कि उनमें से कोई कोरोना वायरस का वाहक तो नहीं है। पटना के ही सदिसोपुर में भी कुछ विदेशी मौलवियों के पकड़े जाने की ख़बर भी है। इन घटनाओं ने ख़ुफ़िया एजेंसियों के कान खड़े कर दिए हैं। यह पता चला है कि टूरिस्ट वीज़ा या धार्मिक पर्यटन के नाम पर ऐसे हज़ारों मौलवी भारत में आते हैं और इन्हें दूरदराज़ की मस्जिदों में शरण दी जाती है। ज़्यादातर को 10 से 20 के जत्थे में रखा जाता है ताकि प्रशासन को शक न हो। यह बात सामने आ रही है कि हैदराबाद, जयपुर, भोपाल और यूपी की कई मस्जिदों में भी अवैध विदेशी मौलवी ऐसे छिपकर रह रहे हैं। जिस बड़े पैमाने पर ये चल रहा है उससे इसके पीछे किसी बड़ी साज़िश का शक जताया जा रहा है। 

सामाजिक कार्यकर्ता और जाने-माने वकील प्रशांत पटेल ने इसके पीछे कोरोना जिहाद का शक जताया है। उन्होंने स्थानीय लोगों से अपील की है कि वो कहीं भी ऐसे मौलवियों को देखें तो फ़ौरन पुलिस को सूचना दें।

नीचे के ट्वीट में आप तमिलनाडु के अंबूर में पकड़े गए विदेशी मौलवियों की तस्वीर देख सकते हैं। इन सभी का कहना है कि वो इस्लाम के प्रचार के लिए भारत आए थे।

पटना से हुई थी शुरुआत

इस हफ़्ते की शुरुआत में पटना कुर्जी इलाके में दीघा मस्जिद से 12 विदेशी मौलवी पकड़े जाने से इस सिलसिले की शुरुआत हुई थी। उन सभी को भी फ़िलहाल क्वारंटाइन में रखा गया है। सोमवार को इन्हें हिरासत में लेने के बाद जाँच के लिए पटना एम्स भेजा गया था। पूछताछ में पता चला है कि ये सभी ताजिकिस्तान और किर्गिस्तान के रहने वाले हैं। पिछले चार महीने से ये देश की अलग-अलग मस्जिदों में रखे जा रहे थे। ख़ास बात यह है कि सभी को इस्लाम के प्रचार के नाम पर बुलाया जाता है, ताकि क़ानून इन पर शिकंजा न कस पाए। क्योंकि अगर मक़सद इस्लाम का प्रचार करना है तो वो काम ये विदेशी मौलवी कैसे कर सकते हैं, क्योंकि इनमें से ज़्यादातर को हिंदी, उर्दू या अंग्रेज़ी नहीं आती। माँग की जा रही है कि इस पूरे मामले की जाँच एनआईए से कराई जाए ताकि सच्चाई सामने आ सके।

कोरोना से घबरा कर होली फीकी न करें

होली जरूर मनाएं, लेकिन घर पर ही मनाएं। मोहल्लों और गांवों में एकत्रित होकर समूह में न मनाएं। रंगों के इस त्योहार के समय कोरोना अब महामारी बन चुका है। इससे बचाव के लिए जरूरी है कि भीड़ वाले जगहों पर न जाएं। क्योंकि किसी एक को संक्रमण होने पर कई दूसरे लोग इसकी गिरफ्त में आ सकते हैं। बेहतर होगा कि होली भी समूह में मनाने से बचें। हैप्पी होली।

चंडीगढ़:

आज होली है। फागुन के इस महीने में रंगों के इस त्योहार में हर कोई सराबोर होने को आतुर है, लेकिन एहतियात भी जरूरी है। चीन से पैदा हुआ कोरोना अंटार्कटिका को छोड़ सारे महाद्वीपों को अपने जद में ले चुका है। इंसानों से इंसानों में इसके वायरस का तेजी से संक्रमण हो रहा है। तभी तो विश्व स्वास्थ्य संगठन समेत तमाम स्वास्थ्य संस्थाएं सामूहिक जुटान न करने की सलाह दे रहे हैं। उनकी इसी सलाह पर प्रधानमंत्री मोदी के बाद एक-एक करके कई मशहूर हस्तियों ने होली न खेलने का निर्णय लिया। जनमानस के लिए तो साल भर का यह त्योहार है। वे भला होली से दूर क्यों रहें। विशेषज्ञ भी कहते हैं कि होली जमकर खेलिए, लेकिन एहतियात बरतना न भूलिए।

यह बात सही है कि विशेष परिस्थितियों में कोरोना सामान्य फ्लू की तुलना में दस गुना घातक है, लेकिन अगर व्यक्ति का प्रतिरक्षा तंत्र मजबूत है तो इसका वायरस लाचार हो जाता है। स्वस्थ जीवनशैली और खानपान से कोई भी अपने शरीर की प्रतिरक्षा इकाई को इस वायरस की कवच बना सकता है। बुजुर्गो और किसी अन्य रोग से ग्रसित व्यक्ति को खास एहतियात की दरकार होगी। होली की मस्ती में यह न भूलें कि कोरोना अब विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा महामारी घोषित की जा चुकी है। लिहाजा जमकर गुलाल उड़ाएं, रंगों की फुहारें छोड़ें, लेकिन अत्यधिक भीड़ में जाने से परहेज करें। कोरोना का वायरस हवा में तैरते अति सूक्ष्म कणों के साथ आंखों यहां तक कि फेस मास्क को भी भेदने की साम‌र्थ्य रखता है। सिर्फ खांसी या छींक के साथ निकलने वाले बड़े कणों को ही मास्क रोकने में सक्षम है। इसलिए सावधान रहिए, लेकिन होली के उल्लास को कम मत होने दीजिए।

विशेषज्ञ बोल

होली जरूर मनाएं, लेकिन घर पर ही मनाएं। मोहल्लों और गांवों में एकत्रित होकर समूह में न मनाएं। रंगों के इस त्योहार के समय कोरोना अब महामारी बन चुका है। इससे बचाव के लिए जरूरी है कि भीड़ वाले जगहों पर न जाएं। क्योंकि किसी एक को संक्रमण होने पर कई दूसरे लोग इसकी गिरफ्त में आ सकते हैं। बेहतर होगा कि होली भी समूह में मनाने से बचें। हैप्पी होली।

पहले 15 करोड़ अब ‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ AIMIM हर कदम बे-नकाब होती हुई

राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा कहाँ हैं? वास्तविक रूप में इनके हाथ में संविधान है, दिल में वारिस पठान है, आज ये स्पष्ट हो गया है, क्योंकि इनमें से एक भी व्यक्ति निकलकर कोई वारिस पठान पर सफाई नहीं मांग रहा है. संबित पात्रा ने कहा, “जब मंच के पीछे पाकिस्तान को ऑक्सीजन देने की बात होती है, और मंच के आगे संविधान और तिरंगा पकड़ने का नाटक किया जाता है, तो कभी-कभी हकीकत मुंह से निकल जाती है.”

चंडीगढ़ :

 नागरिकता संशोधन के खिलाफ लड़ाई ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ तक पहुंच गई है. जो लड़ाई जिन्ना वाली आजादी से शुरू हुई थी वो चिकन नेक काटने से होते हुए छीन कर लेंगे आजादी के बाद अब पाकिस्तान जिंदाबाद तक पहुंच गई है. मंच भी वही था जहां से 15 करोड़ वाली धमकी दी गई थी, जहां से हिंदुओं को हिलाने की धमकी दी गई थी. जहां से 15 करोड़ को 100 करोड़ वाला दंगा प्लान बताया गया था उसी मंच के पाकिस्तान जिंदाबाद का वायरस मुल्क में फैलाने की कोशिश की गई. सवाल ये है कि ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ वाला वायरस हिदुस्तान में कब तक बर्दाश्त करेगा. 

हालांकि, ओवैसी ने तुरंत मंच पर ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ कहने वाली लड़की को रोका लेकिन सवाल अभी भी वहीं बना हुआ है. देशद्रोह के लिए जिस मंच से उकसाया और भड़काया जाएगा, उस मंच से ऐसी ही चीजें निकलकर आना स्वाभाविक है. बीजेपी ने आरोप लगाया है कि मंच के पीछे पाकिस्तान को ऑक्सीजन दी जाती है, इसलिए तिरंगे और देशभक्ति वाली एक्टिंग ज्यादा समय तक नहीं चल पाई और सच्चाई सामने आ गई. 

बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “कहां हैं राहुल गांधी? कहां हैं प्रियंका जी? वास्तविक रूप में इनके हाथ में संविधान है, दिल में वारिस पठान है, आज ये स्पष्ट हो गया है, क्योंकि इनमें से एक भी व्यक्ति निकलकर कोई वारिस पठान पर सफाई नहीं मांग रहा है. पात्रा ने कहा, “जब मंच के पीछे पाकिस्तान को ऑक्सीजन देने की बात होती है, और मंच के आगे संविधान और तिरंगा पकड़ने का नाटक किया जाता है, तो कभी-कभी हकीकत मुंह से निकल जाती है.” 

उधर, कांग्रेस नेता हुसैन दलवई का कहना है कि जिन्ना इस तरह से ही बातें करते थे और उनको इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि इस देश में जिन्ना अभी पैदा नहीं होगा. ना जिन्ना को हिंदू मानेगा ना मुसलमान मानेगा. केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “जो लोग देशद्रोही नारे लगा रहे हैं, क्योंकि उनको कुछ राजनीतिक पार्टियों का समर्थन मिल रहा है.” शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत का कहना है कि आपके मंच पर ऐसी व्यक्ति आती है और नारे देती है उसका मतलब आपने इस देश में ज़हर घोल दिया है.

आज का पंचांग

विक्रमी संवत्ः 2076, 

शक संवत्ः 1941, 

मासः माघ़, 

पक्षः शुक्ल पक्ष, 

तिथिः चतुर्दशी सांय 04.02 तक है, 

वारः शनिवार, 

नक्षत्रः पुष्य रात्रि 10.05 तक, 

योगः आयुष्मान सांय 07.10 तक, 

करणः वणिज, 

सूर्य राशिः मकर, 

चंद्र राशिः कर्क, 

राहु कालः प्रातः 9.00 बजे से प्रातः 10.30 तक, 

सूर्योदयः 07.09, 

सूर्यास्तः 06.01 बजे।

विशेषः आज पूर्व दिशा की यात्रा न करें। शनिवार को देशी घी,गुड़, सरसों का तेल का दानदेकर यात्रा करें।

जब छोटे-छोटे पड़ोसी मुल्कों में हैं नागरिकता रजिस्टर कानून! भारत में ही NRC का विरोध क्यों?

भारत में अवैध घुसपैठिए से किसको फायदा हो रहा है, ये घुसपैठिए किसके वोट बैंक बने हुए हैं। अभी हाल में पश्चिम बंगाल में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने दावा किया कि बंगाल में तकरीबन 50 लाख मुस्लिम घुसपैठिए हैं, जिनकी पहचान की जानी है और उन्हें देश से बाहर किया जाएगा। बीजेपी नेता के दावे में अगर सच्चाई है तो पश्चिम बंगाल में मौजूद 50 घुसपैठियों का नाम अगर मतदाता सूची से हटा दिया गया तो सबसे अधिक नुकसान किसी का होगा तो वो पार्टी होगी टीएमसी को होगा, जो एनआरसी का सबसे अधिक विरोध कर रही है और एनआरसी के लिए मरने और मारने पर उतारू हैं।

नयी दिल्ली

असम एनआरसी के बाद पूरे भारत में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) बनाने की कवायद भले ही अभी पाइपलाइन में हो और इसका विरोध शुरू हो गया है, लेकिन क्या आपको मालूम है कि भारत के सरहद से सटे लगभग सभी पड़ोसी मुल्क मसलन पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका जैसे देशों में नागरिकता रजिस्टर कानून है।

पाकिस्तान में नागरिकता रजिस्टर को CNIC, अफगानिस्तान में E-Tazkira,बांग्लादेश में NID, नेपाल में राष्ट्रीय पहचानपत्र और श्रीलंका में NIC के नाम से जाना जाता है। सवाल है कि आखिर भारत में ही क्यों राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC)कानून बनाने को लेकर बवाल हो रहा है। यह इसलिए भी लाजिमी है, क्योंकि आजादी के 73वें वर्ष में भी भारत के नागरिकों को रजिस्टर करने की कवायद क्यों नहीं शुरू की गई। क्या भारत धर्मशाला है, जहां किसी भी देश का नागरिक मुंह उठाए बॉर्डर पार करके दाखिल हो जाता है या दाखिल कराया जा रहा है।

भारत में अवैध घुसपैठिए से किसको फायदा हो रहा है, ये घुसपैठिए किसके वोट बैंक बने हुए हैं। अभी हाल में पश्चिम बंगाल में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने दावा किया कि बंगाल में तकरीबन 50 लाख मुस्लिम घुसपैठिए हैं, जिनकी पहचान की जानी है और उन्हें देश से बाहर किया जाएगा। बीजेपी नेता के दावे में अगर सच्चाई है तो पश्चिम बंगाल में मौजूद 50 घुसपैठियों का नाम अगर मतदाता सूची से हटा दिया गया तो सबसे अधिक नुकसान किसी का होगा तो वो पार्टी होगी टीएमसी को होगा, जो एनआरसी का सबसे अधिक विरोध कर रही है और एनआरसी के लिए मरने और मारने पर उतारू हैं।

बीजेपी नेता के मुताबिक अगर पश्चिम बंगाल से 50 लाख घुसैपठियों को नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया तो टीएमसी प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के वोट प्रदेश में कम हो जाएगा और आगामी विधानसभा चुनाव में बीजेपी को कम से कम 200 सीटें मिलेंगी और टीएमसी 50 सीटों पर सिमट जाएगी। बीजेपी नेता दावा राजनीतिक भी हो सकता है, लेकिन आंकड़ों पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि उनका दावा सही पाया गया है और असम के बाद पश्चिम बंगाल दूसरा ऐसा प्रदेश है, जहां सर्वाधिक संख्या में अवैध घुसपैठिए डेरा जमाया हुआ है, जिन्हें पहले पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकारों ने वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया।

ममता बनर्जी अब भारत में अवैध रूप से घुसे घुसपैठियों का पालन-पोषण वोट बैंक के तौर पर कर रही हैं। वर्ष 2005 में जब पश्चिम बंगला में वामपंथी सरकार थी जब ममता बनर्जी ने कहा था कि पश्चिम बंगाल में घुसपैठ आपदा बन गया है और वोटर लिस्ट में बांग्लादेशी नागरिक भी शामिल हो गए हैं। दिवंगत अरुण जेटली ने ममता बनर्जी के उस बयान को री-ट्वीट भी किया, जिसमें उन्होंने लिखा, ‘4 अगस्त 2005 को ममता बनर्जी ने लोकसभा में कहा था कि बंगाल में घुसपैठ आपदा बन गया है, लेकिन वर्तमान में पश्चिम बंगाल में वही घुसपैठिए ममता बनर्जी को जान से प्यारे हो गए है।

क्योंकि उनके एकमुश्त वोट से प्रदेश में टीएमसी लगातार तीन बार प्रदेश में सत्ता का सुख भोग रही है। शायद यही वजह है कि एनआरसी को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सबसे अधिक मुखर है, क्योंकि एनआरसी लागू हुआ तो कथित 50 लाख घुसपैठिए को बाहर कर दिया जाएगा। गौरतलब है असम इकलौता राज्य है जहां नेशनल सिटीजन रजिस्टर लागू किया गया। सरकार की यह कवायद असम में अवैध रूप से रह रहे अवैध घुसपैठिए का बाहर निकालने के लिए किया था। एक अनुमान के मुताबिक असम में करीब 50 लाख बांग्लादेशी गैरकानूनी तरीके से रह रहे हैं। यह किसी भी राष्ट्र में गैरकानूनी तरीके से रह रहे किसी एक देश के प्रवासियों की सबसे बड़ी संख्या थी।

दिलचस्प बात यह है कि असम में कुल सात बार एनआरसी जारी करने की कोशिशें हुईं, लेकिन राजनीतिक कारणों से यह नहीं हो सका। याद कीजिए, असम में सबसे अधिक बार कांग्रेस सत्ता में रही है और वर्ष 2016 विधानसभा चुनाव में बीजेपी पहली बार असम की सत्ता में काबिज हुई है। दरअसल, 80 के दशक में असम में अवैध घुसपैठिओं को असम से बाहर करने के लिए छात्रों ने आंदोलन किया था। इसके बाद असम गण परिषद और तत्कालीन राजीव गांधी सरकार के बीच समझौता हुआ। समझौते में कहा गया कि 1971 तक जो भी बांग्लादेशी असम में घुसे, उन्हें नागरिकता दी जाएगी और बाकी को निर्वासित किया जाएगा।

लेकिन इसे अमल में नहीं लाया जा सका और वर्ष 2013 में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। अंत में अदालती आदेश के बाद असम एनआरसी की लिस्ट जारी की गई। असम की राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर सूची में कुल तीन करोड़ से अधिक लोग शामिल होने के योग्य पाए गए जबकि 50 लाख लोग अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाए, जिनमें हिंदू और मुस्लिम दोनों शामिल हैं। सवाल सीधा है कि जब देश में अवैध घुसपैठिए की पहचान होनी जरूरी है तो एनआरसी का विरोध क्यूं हो रहा है, इसका सीधा मतलब राजनीतिक है, जिन्हें राजनीतिक पार्टियों से सत्ता तक पहुंचने के लिए सीढ़ी बनाकर वर्षों से इस्तेमाल करती आ रही है। शायद यही कारण है कि भारत में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर जैसे कानून की कवायद को कम तवज्जो दिया गया।

असम में एनआरसी सुप्रीम कोर्ट की दखल के बाद संपन्न कराया जा सका और जब एनआरसी जारी हुआ तो 50 लाख लोग नागरिकता साबित करने में असमर्थ पाए गए। जरूरी नहीं है कि जो नागरिकता साबित नहीं कर पाए है वो सभी घुसपैठिए हो, यही कारण है कि असम एनआरसी के परिपेच्छ में पूरे देश में एनआरसी लागू करने का विरोध हो रहा है। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि भारत में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर नहीं होना चाहिए। भारत में अभी एनआरसी पाइपलाइन का हिस्सा है, जिसकी अभी ड्राफ्टिंग होनी है। फिलहाल सीएए के विरोध को देखते हुए मोदी सरकार ने एनआरसी को पीछे ढकेल दिया है।

पूरे देश में एनआरसी के प्रतिबद्ध केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कह चुके हैं कि 2024 तक देश के सभी घुसपैठियों को बाहर कर दिया जाएगा। संभवतः गृहमंत्री शाह पूरे देश में एनआरसी लागू करने की ओर इशारा कर रहे थे। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि देश के विकास के लिए बनाए जाने वाल पैमाने के लिए यह जानना जरूरी है कि भारत में नागरिकों की संख्या कितनी है। पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में, वहां के सभी वयस्क नागरिकों को 18 वर्ष की आयु तक पहुंचने पर एक यूनिक संख्या के साथ कम्प्यूटरीकृत राष्ट्रीय पहचान पत्र (CNIC) के लिए पंजीकरण करना होता है। यह पाकिस्तान के नागरिक के रूप में किसी व्यक्ति की पहचान को प्रमाणित करने के लिए एक पहचान दस्तावेज के रूप में कार्य करता है।

इसी तरह पड़ोसी मुल्क अफगानिस्तान में भी इलेक्ट्रॉनिक अफगान पहचान पत्र (e-Tazkira) वहां के सभी नागरिकों के लिए जारी एक राष्ट्रीय पहचान दस्तावेज है, जो अफगानी नागरिकों की पहचान, निवास और नागरिकता का प्रमाण है। वहीं, पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश, जहां से भारत में अवैध घुसपैठिए के आने की अधिक आशंका है, वहां के नागरिकों के लिए बांग्लादेश सरकार ने राष्ट्रीय पहचान पत्र (NID) कार्ड है, जो प्रत्येक बांग्लादेशी नागरिक को 18 वर्ष की आयु में जारी करने के लिए एक अनिवार्य पहचान दस्तावेज है।

सरकार बांग्लादेश के सभी वयस्क नागरिकों को स्मार्ट एनआईडी कार्ड नि: शुल्क प्रदान करती है। जबकि पड़ोसी मुल्क नेपाल का राष्ट्रीय पहचान पत्र एक संघीय स्तर का पहचान पत्र है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति के लिए विशिष्ट पहचान संख्या है जो कि नेपाल के नागरिकों द्वारा उनके बायोमेट्रिक और जनसांख्यिकीय डेटा के आधार पर प्राप्त किया जा सकता है।

पड़ोसी मुल्क श्रीलंका में भी नेशनल आइडेंटिटी कार्ड (NIC) श्रीलंका में उपयोग होने वाला पहचान दस्तावेज है। यह सभी श्रीलंकाई नागरिकों के लिए अनिवार्य है, जो 16 वर्ष की आयु के हैं और अपने एनआईसी के लिए वृद्ध हैं, लेकिन एक भारत ही है, जो धर्मशाला की तरह खुला हुआ है और कोई भी कहीं से आकर यहां बस जाता है और राजनीतिक पार्टियों ने सत्ता के लिए उनका वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करती हैं। भारत में सर्वाधिक घुसपैठियों की संख्या असम, पश्चिम बंगाल, बिहार और झारखंड में बताया जाता है।

भारत सरकार के बॉर्डर मैनेजमेंट टास्क फोर्स की वर्ष 2000 की रिपोर्ट के अनुसार 1.5 करोड़ बांग्लादेशी घुसपैठ कर चुके हैं और लगभग तीन लाख प्रतिवर्ष घुसपैठ कर रहे हैं। हाल के अनुमान के मुताबिक देश में 4 करोड़ घुसपैठिये मौजूद हैं। पश्चिम बंगाल में वामपंथियों की सरकार ने वोटबैंक की राजनीति को साधने के लिए घुसपैठ की समस्या को विकराल रूप देने का काम किया। कहा जाता है कि तीन दशकों तक राज्य की राजनीति को चलाने वालों ने अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण देश और राज्य को बारूद की ढेर पर बैठने को मजबूर कर दिया। उसके बाद राज्य की सत्ता में वापसी करने वाली ममता बनर्जी बांग्लादेशी घुसपैठियों के दम पर मुस्लिम वोटबैंक की सबसे बड़ी धुरंधर बन गईं।

भारत में नागरिकता से जुड़ा कानून क्या कहता है?

नागरिकता अधिनियम, 1955 में साफ तौर पर कहा गया है कि 26 जनवरी, 1950 या इसके बाद से लेकर 1 जुलाई, 1987 तक भारत में जन्म लेने वाला कोई व्यक्ति जन्म के आधार पर देश का नागरिक है। 1 जुलाई, 1987 को या इसके बाद, लेकिन नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2003 की शुरुआत से पहले जन्म लेने वाला और उसके माता-पिता में से कोई एक उसके जन्म के समय भारत का नागरिक हो, वह भारत का नागरिक होगा। नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2003 के लागू होने के बाद जन्म लेने वाला कोई व्यक्ति जिसके माता-पिता में से दोनों उसके जन्म के समय भारत के नागरिक हों, देश का नागरिक होगा। इस मामले में असम सिर्फ अपवाद था। 1985 के असम समझौते के मुताबिक, 24 मार्च, 1971 तक राज्य में आने वाले विदेशियों को भारत का नागरिक मानने का प्रावधान था। इस परिप्रेक्ष्य से देखने पर सिर्फ असम ऐसा राज्य था, जहां 24 मार्च, 1974 तक आए विदेशियों को भारत का नागरिक बनाने का प्रावधान था।

क्या है एनआरसी और क्या है इसका मकसद?

एनआरसी या नैशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन बिल का मकसद अवैध रूप से भारत में अवैध रूप से बसे घुसपैठियों को बाहर निकालना है। बता दें कि एनआरसी अभी केवल असम में ही पूरा हुआ है। जबकि देश के गृह मंत्री अमित शाह ये साफ कर चुके हैं कि एनआरसी को पूरे भारत में लागू किया जाएगा। सरकार यह स्पष्ट कर चुकी है कि एनआरसी का भारत के किसी धर्म के नागरिकों से कोई लेना देना नहीं है इसका मकसद केवल भारत से अवैध घुसपैठियों को बाहर निकालना है।

एनआरसी में शामिल होने के लिए क्या जरूरी है? एनआरसी के तहत भारत का नागरिक साबित करने के लिए किसी व्यक्ति को यह साबित करना होगा कि उसके पूर्वज 24 मार्च 1971 से पहले भारत आ गए थे। बता दें कि अवैध बांग्लादेशियों को निकालने के लिए इससे पहले असम में लागू किया गया है। अगले संसद सत्र में इसे पूरे देश में लागू करने का बिल लाया जा सकता है। पूरे भारत में लागू करने के लिए इसके लिए अलग जरूरतें और मसौदा होगा।

एनआरसी के लिए किन दस्तावेजों की जरूरत है?

भारत का वैध नागरिक साबित होने के लिए एक व्यक्ति के पास रिफ्यूजी रजिस्ट्रेशन, आधार कार्ड, जन्म का सर्टिफिकेट, एलआईसी पॉलिसी, सिटिजनशिप सर्टिफिकेट, पासपोर्ट, सरकार के द्वारा जारी किया लाइसेंस या सर्टिफिकेट में से कोई एक होना चाहिए। चूंकि सरकार पूरे देश में जो एनआरसी लाने की बात कर रही है, लेकिन उसके प्रावधान अभी तय नहीं हुए हैं। यह एनआरसी लाने में अभी सरकार को लंबी दूरी तय करनी पडे़गी। उसे एनआरसी का मसौदा तैयार कर संसद के दोनों सदनों से पारित करवाना होगा। फिर राष्ट्रपति के दस्तखत के बाद एनआरसी ऐक्ट अस्तित्व में आएगा। हालांकि, असम की एनआरसी लिस्ट में उन्हें ही जगह दी गई जिन्होंने साबित कर दिया कि वो या उनके पूर्वज 24 मार्च 1971 से पहले भारत आकर बस गए थे।

क्या NRC सिर्फ मुस्लिमों के लिए ही होगा?

किसी भी धर्म को मानने वाले भारतीय नागरिक को CAA या NRC से परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है। एनआरसी का किसी धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। यह भारत के सभी नागरिकों के लिए होगा। यह नागरिकों का केवल एक रजिस्टर है, जिसमें देश के हर नागरिक को अपना नाम दर्ज कराना होगा।

क्या धार्मिक आधार पर लोगों को बाहर रखा जाएगा?

यह बिल्कुल भ्रामक बात है और गलत है। NRC किसी धर्म के बारे में बिल्कुल भी नहीं है। जब NRC लागू किया जाएगा, वह न तो धर्म के आधार पर लागू किया जाएगा और न ही उसे धर्म के आधार पर लागू किया जा सकता है। किसी को भी सिर्फ इस आधार पर बाहर नहीं किया जा सकता कि वह किसी विशेष धर्म को मानने वाला है।

NRC में शामिल न होने वाले लोगों का क्या होगा?

अगर कोई व्यक्ति एनआरसी में शामिल नहीं होता है तो उसे डिटेंशन सेंटर में ले जाया जाएगा जैसा कि असम में किया गया है। इसके बाद सरकार उन देशों से संपर्क करेगी जहां के वो नागरिक हैं। अगर सरकार द्वारा उपलब्ध कराए साक्ष्यों को दूसरे देशों की सरकार मान लेती है तो ऐसे अवैध प्रवासियों को वापस उनके देश भेज दिया जाएगा।

आभार, Shivom Gupta

राहुल विरोध, एकेडमी ऑफ आर्ट के डायरेक्टर योगेश सोमन को भारी पड़ा, भेजे गए लंबी छुट्टी पर

‘आप वास्तव में सावरकर नहीं हैं. सच तो यह है कि तुम सच्चे गांधी भी नहीं हो.’ डायरेक्टर योगेश सोमन

काँग्रेस के दबाव में काम करना उद्धव ठाकरे की सावरकर व हिन्दू विरोध की राजनीति के आगे नतमस्त्क होना ही दर्शाता है। अब जब भी चुनाव होंगे तो वह अपना कौन सा चेहरा ले कर मैदान में कूदेंगे, प्रखर हिन्दू वादी का या फिर सौम्य छद्म सेकुलर का।

 कभी बीजेपी के साथ सत्ता का सुख भोग रही शिवसेना सरकार में अपने सहयोगी दल कांग्रेस एनसीपी के हाथों कठपुतली बन चुकी है. यही वजह है कि वह ऐसे मामले पर खुलकर विरोध भी नहीं कर पा रही है. ठाकरे सरकार एक तरफ सिटीजनशिप अमेंडमेंट एक्ट के खिलाफ बोलने वालों को अच्छे-अच्छे पद बांट रही है तो वहीं दूसरी तरफ वो अब कांग्रेस एनसीपी के खिलाफ बोलने वालों पर ऐक्शन लेने के मूड में दिखाई दे रही है.  

‘आप वास्तव में सावरकर नहीं हैं. सच तो यह है कि तुम सच्चे गांधी भी नहीं हो.’ डायरेक्टर योगेश सोमन

नयी दिल्ली(ब्यूरो):

 कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के बयान की निंदा करना मुंबई यूनिवर्सिटी में एकेडमी ऑफ आर्ट के डायरेक्टर योगेश सोमन को भारी पड़ा. योगेश सोमन ने वीर सावरकर को लेकर दिए राहुल गांधी के एक बयान की निंदा की थी. दरअसल राहुल गांधी ने झारखंड में चुनाव प्रचार के दौरान रेप की बढ़ती घटनाओं को लेकर रेप कैपिटल वाला बयान दिया था जिसके बाद बीजेपी और सहयोगी दलों ने मांग की थी कि राहुल गांधी इस बयान पर माफी मांगें.

माफी की मांग पर जवाब देते हुए राहुल गांधी ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा था, ‘मेरा नाम राहुल सावरकर नहीं, राहुल गांधी है. मैं माफी नहीं मांगूंगा.’ सावरकर को लेकर राहुल गांधी के इसी बयान पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए योगेश सोमन ने 14 दिसंबर को सोशल मीडिया पर अपना एक वीडियो पोस्ट किया था. इस वीडियो में सोमन ने कहा था कि, ‘आप वास्तव में सावरकर नहीं हैं. सच तो यह है कि तुम सच्चे गांधी भी नहीं हो.’

इस पोस्ट को लेकर कांग्रेस एवं वामदलों से जुड़े छात्र संगठन सोमन की बर्खास्तगी की मांग पर अड़े थे. आखिरकार महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे सरकार के गठन के बाद मुंबई यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर सुहास पेडेनकर ने राहुल गांधी के खिलाफ बयान करने पर योगेश सोमन को जबरन छुट्टी पर भेजने के अलावा इस मामले में एक जांच कमेटी का भी गठन किया. यह जांच कमेटी सोमन पर लगे तमाम आरोपों की जांच करेगी. 

हालांकि इस पूरे विवाद पर योगेश सोमन ने जी मीडिया से अपना पक्ष रखते हुए कहा कि “पहले मैं सारे तथ्य जांच कमेटी के सामने रखूंगा और फिर मीडिया से बात करूंगा.” योगेश सोमन के खिलाफ इस कार्रवाई को बीजेपी ने दुर्भाग्यपूर्ण बताया. बीजेपी ने शिवसेना, कांग्रेस, एनसीपी से सवाल किया है कि योगेश सोमन के खिलाफ की गई कार्रवाई असहिष्णुता नहीं तो क्या है? 

लेकिन राज्य सरकार इस कार्रवाई को सही ठहरा रही है. ठाकरे सरकार में कैबिनेट मंत्री नवाब मलिक ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार मे कार्यरत अधिकारी किसी दल या संगठन के विचार को प्रमोट करेंगे तो सरकार कठोर कार्रवाई करेगी. उसे सरकारी नौकरी छोड़नी पड़ेगी. इस पूरे मामले में सावरकर की विचारधारा में यकीन रखने वाली शिवसेना ने चुप्पी साध रखी है. जाहिर है कि कभी बीजेपी के साथ सत्ता का सुख भोग रही शिवसेना सरकार में अपने सहयोगी दल कांग्रेस एनसीपी के हाथों कठपुतली बन चुकी है. यही वजह है कि वह ऐसे मामले पर खुलकर विरोध भी नहीं कर पा रही है.

ठाकरे सरकार एक तरफ सिटीजनशिप अमेंडमेंट एक्ट के खिलाफ बोलने वालों को अच्छे-अच्छे पद बांट रही है तो वहीं दूसरी तरफ वो अब कांग्रेस एनसीपी के खिलाफ बोलने वालों पर ऐक्शन लेने के मूड में दिखाई दे रही है.  

झारखंड और महराष्ट्र के बाद बिहार से विलुप्त हो सकती है भाजपा

विधानसभा चुनावाें में साल दर साल भाजपा से अलग हाेती गई सहयोगी दलों की राह
2005 में सहयोगी दल को 18, 2009 में 14, 2014 में 8 व 2019 में सीटाें पर नहीं हुआ समझाैता

प्रशांत किशोर ने बिहार विधानसभा चुनाव के मद्देनजर एक बड़ा बयान दिया है. पीके ने कहा है कि जेडीयू को बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ना चाहिए। यह भाजपा से किनारा करने के संकेत हैं, वैसे भी 2014 चुनाव जीतने के बाद ही से मोदी प्रशांत की दोस्ती में खटास आ चुकी है, यह नहीं बंगाल विजय का सपना देखने वाली भाजपा के लिए पीके और ममता की दोस्ती भी मुश्किल खड़ी कर सकती हैभाजपा ने यदि आपण रणनीति नहीं बदली तो सभी राज्य धीरे धीरे भाजपा मुक्त हो जाएँगे।

नयी दिल्ली(ब्यूरो):

जेडीयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और चर्चित रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने बिहार विधानसभा चुनाव के मद्देनजर एक बड़ा बयान दिया है. प्रशांत किशोर ने कहा है कि जेडीयू को बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ना चाहिए. प्रशांत किशोर ने कहा है कि विधानसभा चुनावों में जेडीयू हमेशा से बीजेपी से बहुत बड़ी पार्टी रही है और इसी के आधार पर आगे भी रहेगी. प्रशांत किशोर ने कहा कि बिहार में जेडीयू हमेशा से बड़े भाई की भूमिका में रही है.

प्रशांत किशोर ने ये भी कहा कि विधानसभा चुनाव नीतीश कुमार के चेहरे पर लड़ा जाना चाहिए. इतना ही नहीं, जेडीयू उपाध्यक्ष ने साफ कर दिया कि बिहार में जेडीयू की सरकार है. बीजेपी उसकी सहयोगी पार्टी है.

प्रशांत किशोर ने कहा, ‘अगर 2010 के विधानसभा चुनाव को देखा जाए जिसमें जेडीयू और बीजेपी ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था तो यह अनुपात 1:1.4 था. अगर इसमें इस बार मामूली बदलाव भी हो, तो भी यह नहीं हो सकता कि दोनों दल समान सीटों पर चुनाव लड़ें. जेडीयू अपेक्षाकृत बड़ी पार्टी है जिसके करीब 70 विधायक हैं जबकि बीजेपी के पास करीब 50 विधायक हैं. 

प्रशांत किशोर के बयान को जेडीयू ने सही ठहराया है. जेडीयू नेता श्याम रजक ने कहा है कि, आगामी विधानसभा चुनाव में जेडीयू की बड़ी भूमिका में होगी. हालांकि ये अभी तय नहीं हुआ है. उधर, बीजेपी नेता नंद किशोर यादव ने कहा कि प्रशांत किशोर कोई पार्टी के अधिकारी नहीं हैं. हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष ने साफ कर दिया है कि, हम बिहार में मिलकर चुनाव लड़ेंगे. इसके बाद कुछ कहने की जरूरत नहीं है.