पीएम कोरोना पर मीटिंग ले रहे थे और अरविंद राजनीति खेल रहे थे, मांगनी पड़ी माफी

पीएम मोदी शुक्रवार को कोरोना (Coronavirus) से सबसे ज्यादा प्रभावित 10 राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से बैठक कर रहे थे. बैठक में सीएम अरविंद केजरीवाल दिल्ली के हालात की जानकारी पीएम नरेंद्र मोदी के सामने पेश कर रहे थे. सीएम अरविंद केजरीवाल ने कहा कि देश के सभी ऑक्सीजन प्लांटों का अधिग्रहण कर सेना के कंट्रोल में दे देना चाहिए. जिससे प्रभावित राज्यों को तुरंत ऑक्सीजन पहुंच सके. इसी बीच पीएम मोदी को उनकी तकनीकी टीम ने जानकारी दी कि सीएम अरविंद केजरीवाल इस इनहाउस मीटिंग को सोशल मीडिया पर लाइव टेलीकास्ट कर रहे हैं. इस पर पीएम मोदी नाराज हो गए

  • पीएम के साथ प्राइवेट बातचीत को रिकॉर्ड कर टेलीविजन पर दिखाया गया
  • केंद्र खुद अपने पास वैक्सीन नहीं रखती है बल्कि राज्यों को ही देती है
  • भाजपा के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने केजरीवाल को घेरा

नयी दिल्ली/ चंडीगढ़:

देश में कोरोना महामारी के कारण हर जगह हालत बिगड़े हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र ने इसी स्थिति को देखते हुए शुक्रवार (अप्रैल 23, 2021) को सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ मीटिंग की। इस बैठक में महाराष्ट्र, उतर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, केरल के मुख्यमंत्री शामिल हुए।

बैठक में ऑक्सीजन आपूर्ति, रमेडेसिविर जैसी आवश्यक दवाइयों की उपलब्धता पर बात हुई। इससे पहले पीएम अधिकारियों से मीटिंग कर स्थिति के बाबत उठाए गए कदमों पर रिपोर्ट माँग चुके थे। बैठक में शामिल सभी मुख्यमंत्रियों ने अपने-अपने सुझाव दिए। 

मसलन छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पीएम मोदी के साथ चल रही बैठक में कहा कि केंद्र और राज्य को मिलने वाली वैक्सीन की कीमत एक होनी चाहिए। वहीं एक मई से 18 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को लगने वाली वैक्सीन के लिए कोरोना के टीके की उपलब्धता को लेकर केंद्र राज्य सरकारों को एक्शन प्लान जारी करे।

लेकिन, इस बैठक के बाद जो बात चर्चा में आई, वह अरविंद केजरीवाल और हर मामले में राजनीति करने वाली उनकी आदत थी। दरअसल, इस बैठक में केजरीवाल ने लाचारों की तरह पहले पीएम मोदी से ऑक्सीजन को लेकर अपील की और बाद में क्लोज डोर मीटिंग की बातचीत पब्लिक कर दी।

इस हरकत के बाद सरकारी सूत्रों ने केजरीवाल पर राजनीति करने का आरोप मढ़ा। टाइम्स नाऊ की रिपोर्ट के अनुसार, केजरीवाल ने पीएम से हुई अपनी बातचीत का प्रसारण कर दिया, जो कि नहीं होना था। बाकी लोगों को भी इसकी जानकारी नहीं थी कि अरविंद केजरीवाल क्या कर रहे हैं। किसी को सूचना दिए बगैर पीएम के साथ हुई बैठक में अपनी बात का सीएम ने प्रसारण किया।

इसके अलावा, सीएम केजरीवाल की स्पीच भी पूर्णत: राजनीति से प्रेरित थी। ऐसा पहली बार हुआ है कि पीएम के साथ हुई ऐसी निजी बातचीच को प्रसारित कर दिया गया हो। टेलीविजन वाले भी नहीं समझ पाए कि आखिर ये फुटेज आ कहाँ से रही है। लेकिन केजरीवाल को मालूम था कि उनकी स्पीच सार्वजनिक हो रही है। 

केजरीवाल द्वारा की गई इस हरकत के बाद इसे विश्वास के उल्लंघन के तौर पर देखा जा रहा है। भाजपा नेता अमित मालवीय ने अरविंद केजरीवाल को एक आपदा कहा है। मालवीय के अनुसार, केजरीवाल बिना तैयारी के पीएम के साथ बैठक में बैठते हैं। उन्हें चीजों की कोई जानकारी नहीं है कि राजधानी में ऑक्सीजन आपूर्ति के लिए पहले ही चीजें की जा रही हैं और टीकों की कीमत से भी वह बेखबर हैं। मालवीय का पूछना है कि आखिर ये शख्स दिल्ली को कैसे बचाएगा।

सीएम केजरीवाल ने इस बैठक में दिल्ली में हो रही ऑक्सीजन की कमी को उजागर कर राजनीति करनी चाही और इस तरह से ये दर्शाया कि उन्हें मदद नहीं मिल रही। समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, केजरीवाल ने एक जगह कहा, “दिल्ली में ऑक्सीजन की भारी कमी है। क्या अगर यहाँ कोई ऑक्सीजन प्रोड्यूसिंग प्लांट नहीं होगा तो दिल्ली को ऑक्सीजन नहीं मिलेगी। कृपया मुझे बताएँ कि जब दिल्ली आने वाला ऑक्सीजन सिलिंडर दूसरे राज्य में रोका जाए तो केंद्र सरकार से इस संबंध में किससे बात करें।”

बता दें कि केजरीवाल की इस नासमझी पर सरकारी सूत्रों ने उन पर निशाना साधा। सूत्रों ने कहा कि केजरीवाल ने जानबूझकर वैक्सीन की कीमत पर झूठ बोला। सीएम केजरीवाल ने एयरलिफ्ट की बात कही लेकिन वो नहीं जानते कि ये पहले से हो रहा है। सरकारी सूत्रों ने कहा कि केजरीवाल एकदम निचले स्तर पर गिर गए हैं। उनका पूरा भाषण किसी समाधान के लिए नहीं बल्कि राजनीति खेलने और जिम्मेदारी से बचने के लिए था।

भाजपा नेता संबित पात्रा ने केजरीवाल की इस हरकत को घटिया राजनीति कहा। उन्होंने कहा कि क्लोज डोर मीटिंग को सार्वजनिक करने के लिए पर्याप्त इंतजाम किए गए। ताकि राजीनित में नंबर बढ़ाए जा सकें।

उल्लेखनीय है कि दिल्ली के हालात अन्य राज्यों के मुकाबले बहुत बदतर हो रहे हैं। गुरुवार को यहाँ 26 हजार से ज्यादा केस आए हैं। कुल संक्रमितों की संख्या अब बढ़कर 956,348 हो गई और सबसे चिंताजनक बात ये है कि यहाँ संक्रमण दर रिकॉर्ड भी 36 प्रतिशत हो गया है, जिसके बाद कल राजधानी में 306 मृत्यु हुई।

राजऋषि दशरथ मेडिकल कालेज में 55 लाख की लागत से बनेगा ऑक्सिजन संयंत्र

देश में मेडिकल ग्रेड ऑक्सीजन की फ़िलहाल किल्लत है, जिसके लिए रिलायंस से लेकर टाटा और कई अन्य कंपनियाँ सामने आई हैं। टाटा को जब नए संसद भवन के निर्माण की जिम्मेदारी दी गई थी तो इन्हीं लोगों ने उसकी आलोचना की थी। अंबानी-अडानी को ये लोग रोज गाली देते हैं। इसी तरह अब वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों को भी निशाना बनाया जा रहा है। साथ ही एक वर्ग दोहरा रवैया अपनाते हुए ये भी पूछ रहा है कि 18 से कम के उम्र वालों को वैक्सीन पहले ही क्यों नहीं दी?

अब जब देश कोरोना काल में एक तरह के मेडिकल आपातकाल से गुजर रहा है, ऐसे समय में ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र’ ट्रस्ट देश में ऑक्सीजन की कमी को पूरा करने के लिए आया है। ट्रस्ट ने निर्णय लिया है कि वो दशरथ मेडिकल कालेज में ऑक्सीजन प्लांट स्थापित करेगा। देश में ऑक्सीजन की दिक्कत को देखते हुए ट्रस्ट ने ये बड़ा फैसला लिया है। इस ऑक्सीजन प्लांट को स्थापित करने में 55 लाख रुपए का खर्च आएगा।

‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र’ ट्रस्ट के ट्रस्टी डॉक्टर अनिल मिश्र ने इस सम्बन्ध में जानकारी देते हुए कहा कि इस समय पूरा देश कोरोना की दूसरी लहर से परेशान है, ऐसे में राम मंदिर की तरफ से भी जनहित में योगदान दिया जा रहा है। बता दें कि रामलला के अस्थायी मंदिर में दर्शन-पूजन पहले ही रोक दिया गया है, ताकि श्रद्धालुओं की भीड़ न जुटे। इसी तरह कुम्भ के अखाड़ों ने भी हरिद्वार में अब इसे प्रतीकात्मक रखने का फैसला किया।

इस खबर से गिरोह विशेष को ज़रूर परेशानी हो सकती है, जो लगातार मंदिर-मंदिर की रट लगाए हुए था और पूछा जा रहा था कि जिस देश में मंदिर बनवाए जाते हों, वहाँ स्वास्थ्य सिस्टम कैसे सुधरेगा? अब उन्हें आत्मचिंतन करने का समय आ गया है क्योंकि मंदिर सरकार नहीं, श्रद्धालु बनवा रहे हैं। हाँ, मंदिर की संपत्ति पर ज़रूर सरकार का कब्ज़ा है। क्या किसी अन्य मजहब में ऐसा होता है? हिसाब माँगा जाता है?

हाल ही में अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने इसी तरह का प्रोपेगंडा फैलाया था। स्वरा भास्कर को ये तो जानना ही चाहिए कि इस आपात स्थिति में राम मंदिर क्या कर रहा है, लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी दो और खबरें हैं, जो आजकल में ही आईं।

  1. राजस्थान के सांगनेर स्थित जामा मस्जिद में जब पुलिस लॉकडाउन का पालन कराने गई तो पुलिस पर ईंट-पत्थरों से हमला किया गया।
  2. गुजरात के कपड़वंज स्थित अली मस्जिद में भीड़ जुटाने से रोका गया तो पुलिस पर हमला हुआ।

अभी तक गिरोह विशेष के एक भी सेलेब्रिटी ने इन घटनाओं की निंदा नहीं की है। पिछले साल भी ऐसी कई घटनाएँ सामने आई थीं, ये नई नहीं हैं। कहीं ऐसा तो नहीं है कि गाँवों में स्थित छोटे मंदिरों से लेकर हजारों वर्ष पुराने भव्य मंदिर तक कोरोना काल में जिस तरह से गरीबों की सेवा कर रहे हैं, उसे छिपाने के लिए राम मंदिर के दान का मुद्दा बार-बार उठाया जाता है? साथ ही इससे इस्लामी कट्टरपंथियों की करतूतों पर भी पर्दा डाला जाता है?

असली कारण यही है। पीएम केयर्स फंड में जिस तरह से मंदिरों ने आगे आकर बढ़-चढ़ कर दान दिया, उसकी प्रशंसा इन सेलेब्रिटीज ने नहीं की। कुम्भ को सही समय पर समाप्त कर के अखाड़ों ने बिना किसी के कहे ही जनहित में निर्णय लिया, उसकी तारीफ़ इन वामपंथी पत्रकारों ने नहीं की। IIT कानपुर के उस रिसर्च पर आँख मूँद लिया गया, जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि कुम्भ से कोरोना के प्रसार पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

देश में मेडिकल ग्रेड ऑक्सीजन की फ़िलहाल किल्लत है, जिसके लिए रिलायंस से लेकर टाटा और कई अन्य कंपनियाँ सामने आई हैं। टाटा को जब नए संसद भवन के निर्माण की जिम्मेदारी दी गई थी तो इन्हीं लोगों ने उसकी आलोचना की थी। अंबानी-अडानी को ये लोग रोज गाली देते हैं। इसी तरह अब वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों को भी निशाना बनाया जा रहा है। साथ ही एक वर्ग दोहरा रवैया अपनाते हुए ये भी पूछ रहा है कि 18 से कम के उम्र वालों को वैक्सीन पहले ही क्यों नहीं दी?

असली दिक्कत ये नहीं है। अगर हम मंदिरों की सूची गिनाने लगें जिन्होंने कोरोना काल में गरीबों के भोजन से लेकर आमजनों में जागरूकता फैलाने का काम किया है तो कई पन्ने छोटे पड़ जाएँगे। सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि लिबरल गिरोह को ह्यूमन चेन टाइप की कोई स्टोरी आजकल मिल नहीं रही है क्योंकि तबलीगी जमात प्रकरण से लेकर अबकी रमजान में छूट की माँग तक, मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए कहानियों का उनके पास भी अभाव है।

आपको याद होगा एक युवती ने लिखा था कि जब राम मंदिर के लिए चंदा माँगने के लिए लोग उसके घर आए तो वो कई मिनटों तक गुस्से में काँपती रही। एक महिला ने तो चंदा माँगने वालों की बेइज्जती करते हुए वीडियो भी पोस्ट कर मजे लिए थे। अब यही लोग मंदिरों से हिसाब माँगते हैं, जबकि इन मंदिरों को बनाने से लेकर इनमें पूजा-पाठ तक, इनका योगदान शून्य ही होता है। अब सोशल मीडिया मंदिर के रुपयों से हिसाब का सवाल लिए भरा पड़ा है।

हाल ही में स्वामीनारायण मंदिर ने अपने परिसर में ही कोविड केयर यूनिट स्थापित किया। वजह ये है कि मोदी काल में पौने 2 लाख किलोमीटर सड़कें, 12 नए AIIMS, 7 नए IIT-IIM-IIIT और 35 एयरपोर्ट्स बने हैं; इन आँकड़ों को छिपाने के लिए ये नैरेटिव तो बनाना पड़ेगा न कि ‘मोदी सरकार मंदिर बनवाती है।’ अभी तो 3 करोड़ परिवारों को उज्ज्वला गैस योजना का लाभ मिलने और 11 करोड़ टॉयलेट्स बनवाने की बात हमने की ही नहीं।

मंदिर का पैसा सरकार रखती है। लेकिन, हज के लिए सब्सिडी सरकार देती है। कई राज्यों में मौलानाओं और मस्जिद के कर्मचारियों को वेतन सरकार देती है। पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में दरगाह के लिए खजाने सरकार खोलती है। राजस्थान और पंजाब जैसे राज्यों में CM की तस्वीर के साथ मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए विज्ञापन सरकार देती है। हज हाउस सरकार बनवाती है। अल्पसंख्यक कल्याण विभाग सरकार का मंत्रालय है।

अब जब इस कोरोना काल में ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र’ ट्रस्ट ने अयोध्या के राजाश्री दशरथ मेडिकल कॉलेज में 55 लाख रुपए की लागत से ऑक्सीजन प्लांट लगाने का निर्णय लिया है, तो लिबरल गिरोह की जुबान सिल जाएगी। तबलीगी जमात के सुपर स्प्रेडर्स का बचाव करने वाले ये लोग श्रीराम मंदिर ट्रस्ट द्वारा ऑक्सीजन प्लांट लगाने या देश के हजारों मंदिरों द्वारा कोरोना के खिलाफ लड़ाई में योगदान दिए जाने पर चूँ तक न करेंगे।

रेलगाड़ियां बन्द करने की बजाय फेरे कम करने का अग्रिम सुझाव

पिछले महीने तक लग रहा था कि महामारी से तबाह हुई भारत की अर्थव्यवस्था संभल रही है। इस रिकवरी को देखते हुए कई अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) ने वित्त वर्ष 2021-22 में भारत की विकास दर 10 से 13 प्रतिशत के बीच बढ़ने की भविष्वाणी की थी। लेकिन अप्रैल में कोरोना वायरस की दूसरी भयावह लहर के कारण न केवल इस रिकवरी पर ब्रेक लगा है बल्कि पिछले छह महीने में हुए उछाल पर पानी फिरता नज़र आता है। रेटिंग एजेंसियों ने अपनी भविष्यवाणी में बदलाव करते हुए भारत की विकास दर को दो प्रतिशत घटा दिया है। अब जबकि राज्य सरकारें लगभग रोज़ नए प्रतिबंधों की घोषणाएं कर रही हैं तो अर्थव्यवस्था के विकास में बाधाएं आना स्वाभाविक है। बेरोज़गारी बढ़ रही है, महंगाई के बढ़ने के पूरे संकेत मिल रहे हैं और मज़दूरों का बड़े शहरों से पलायन भी शुरू हो चुका है।

करणीदान सिंह, श्रीगंगानगर:

भारत एक बार फिर कोरोना संक्रमण की गिरफ़्त में आ गया। कोरोना संक्रमण की यह दूसरी लहर बहुत ज़्यादा ख़तरनाक साबित हो रही है और इसने भारत के शहरों को बुरी तरह जकड़ लिया है। कोरोना की इस दूसरी लहर में मध्य अप्रैल तक हर दिन संक्रमण के लगभग एक लाख मामले आने लगे। रविवार को भारत में कोरोना संक्रमण के 2,70,000 केस दर्ज किए गए थे और 1600 से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी थी. एक दिन में यह संक्रमण और मौतों का सबसे बड़ा रिकॉर्ड था।

ऐसे में रेल परिवहन पर बड़ा असर पड़ रहा है। प्रवासी श्रमिकों की घर वापीसी ने यह मुश्किलें और भी बढ़ा दी है। कोरोना संक्रमण को देखते हुए रेलवे ने कई रेलगाड़ियों की आवाजाही बंद करने के सुझाव/ निर्देश दिये हैं।

कोरोना की दूसरी लहर का रेल यात्रीभार पर काफी असर महसूस किया जा रहा हैं। जेडआरयूसीसी सदस्य भीम शर्मा ने रेलवे अधिकारियों को अग्रिम सुझाव भेजा हैं कि किसी भी ट्रेन को पूर्णतः बंद करने की बजाय उसके फेरों में कमी करके संचालन जारी रखा जाना चाहिये। अगर किसी दैनिक ट्रैन का यात्रीभार कम आंका जा रहा हैं तो उसे त्रि-साप्ताहिक या द्वि साप्ताहिक के रूप में चलाया जाना चाहिये। किसी भी ट्रेन का संचालन पूरी तरह से बन्द करना उचित नही होगा।

कृषि सुधार क़ानूनों के पश्चात अब सम्पत्ति क्षतिपूर्ति कानून के खिलाफ सडक़ों पर उतरी किसान सभा

सम्पत्ति क्षतिपूर्ति कानून के खिलाफ सडक़ों पर उतरी किसान सभा
सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर राष्ट्रपति को सौंपा ज्ञापन : बोले आंदोलन को कुचलने की साजिश रची तो परिणाम भुगतेगी सरकार
सतीश बंसल सिरसा 20 अप्रैल:

हरियाणा सरकार द्वारा पारित सम्पत्ति क्षतिपूर्ति कानून 2021 के विरोध में संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर जिले के किसानों द्वारा सडक़ों पर उतरकर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर नारेबाजी की गई और जिला उपायुक्त के माध्यम से राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपा गया।

संयुक्त किसान मोर्चा के घटक हरियाणा किसान सभा के नेता रोशन सुचान, बलराज बणी, प्रितपाल सिद्धू और हरदेव जोश ने राष्ट्रपति को सौंपे ज्ञापन में आरोप लगाया कि प्रदेश सरकार ने बीती 18 मार्च को विधानसभा में विधेयक पारित कर आंदोलनों के दौरान होने वाली सम्पत्ति के नुक्सान की वसूली आंदोलनकारियों से किए जाने का प्रावधान किया है, जिसमें सरकार द्वारा पुलिस और प्रशासन को लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने के लिए असीमित शक्तियां दी गई हैं, जिससे आंदोलन करने वालों, समर्थकों, योजना बनाने वालों व सलाहकारों को सम्पत्ति के नुक्सान का दोषी करार देकर उनसे वसूली किए जाने का निरंकुश प्रावधान है। इसलिए आज प्रदेश के सभी जिलों में किसान सडक़ों पर उतरकर इस कानून को रद्द करने की मांग कर रहे हैं।

विधेयक के बारे में: 

  • नुकसान की वसूली: यह विधेयक किसी जनसमूह, चाहे वह कानूनी हो अथवा गैर-कानूनी, द्वारा लोक व्यवस्था में उत्पन्न विघ्न के दौरान किसी व्यक्ति विशेष द्वारा किये गए संपत्ति के नुकसान की वसूली का प्रावधान करता है, इसमें दंगे और हिंसक गतिविधियाँ शामिल हैं।
  • पीड़ितों को मुआवज़ा: यह पीड़ितों के लिये मुआवज़ा भी सुनिश्चित करता है।
  • विस्तृत दायरा: नुकसान की वसूली केवल उन लोगों से नहीं की जाएगी जो हिंसा में लिप्त थे, बल्कि उन लोगों से भी की जाएगी जो विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व या आयोजन करते हैं , योजना में शामिल होते हैं और जो विद्रोहियों को प्रोत्साहित करते हैं।
  • दावा अधिकरण स्थापित करना: विधेयक में देयता या क्षतिपूर्ति का निर्धारण,  आकलन और क्षतिपूर्ति का दावा करने हेतु दावा अधिकरण के गठन का प्रावधान किया गया है। 
  • संपत्ति की कुर्की/ज़ब्ती: किसी भी व्यक्ति जिसके खिलाफ हर्ज़ाना राशि का भुगतान करने हेतु दावा अधिकरण में अपील की गई है, उसकी संपत्ति या बैंक खाते को सील करने की शक्ति प्रदान की गई है।
  • अधिकरण के खिलाफ अपील: पीड़ित व्यक्ति दावा अधिकरण के निर्णयों के खिलाफ पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के समक्ष अपील दायर कर सकता है।
  • हर्ज़ाने को लेकर दावे से संबंधित कोई भी प्रश्न सिविल कोर्ट के क्षेत्राधिकार में शामिल नहीं होगा। 

सरकार का रुख:

  • सरकार की ज़िम्मेदारी: राज्य की संपत्ति की सुरक्षा करना राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है, चाहे वह संपत्ति निजी हो या सरकारी।
  • अधिकारों और उत्तरदायित्व  के मध्य संतुलन: लोकतंत्र में सभी को शांतिपूर्ण तरीके से बोलने और विरोध प्रकट करने का अधिकार है, लेकिन संपत्ति को नुकसान पहुंँचाने का अधिकार  किसी को भी नहीं है।
  • निवारण: हिंसक गतिविधियों को अंज़ाम देने और इसका आयोजन करने वालो के या इस प्रकार की गतिविधियों को रोकने हेतु सरकार के पास एक कानूनी ढांँचा होना चाहिये।

किसान नेताओं ने कहा कि प्रदेश सरकार शांतिपूर्वक चल रहे किसान आंदोलन को कुचलने की नाकाम कोशिश करने के लिए यह कानून लेकर आई है जबकि सरकार सडक़ों खुद खोद रही है। ऐसे दमनकारी कानून अंग्रेजी राज की याद दिलाते हैं, जिनके विरोध में शहीद भगत सिंह सरीखे नौजवानों को असैम्बली में बम फैंकने के लिए मजबूर होना पड़ा था। किसान आंदोलन शांतिपूर्वक चल रहा है और पिछले पांच महीनों से सम्पत्ति के नुक्सान की कोई घटना नहीं हुई है, परन्तु सरकार किसानों-मजदूरों के शांतिपूर्वक आंदोलनों पर पुलिस बल और हजारों मुकदमे दर्ज करके तानाशाहीका सबूत दे रही है, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

किसान सभा ने राष्ट्रपति से मांग कर सम्पत्ति क्षतिपूर्ति अधिनियम कानून 2021 को रद्द करने, किसानों पर बने मुकदमे रद्द करने ओर आंदोलन के दमन पर रोक लगाने की मांग कर प्रदेश सरकार को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि अगर कोरोना के नाम पर आंदोलन कुचलने की कोशिश की तो सरकार को गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।

इस अवसर पर किसान सभा के नेता हरजिन्द्र भंगु, एआईएसएफ नेता अरमनान, सुमेर गिल, नवदीप विर्क, रूढ़ सिंह, सतनाम सिंह, दविन्द्र सिंह, गुरमेज सिंह, कुलदीप सिंह, निर्मल सिंह, गुरनाम सिंह करीवाला के अलावा अखिल भारतीय किसान सभा की ओर से जगरूप सिंह चौबुर्जा, बलवीर कौर गांधी, का० सुरजीत सिंह, गुरतेज बराड़ एडवोकेट, बलवीर फौजी, हरकिशन कम्बोज, राजकुमार, पालासिंह चीमा आदि उपस्थित थे।

लोक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम, 1984

  • इस अधिनियम के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति किसी भी सार्वजनिक संपत्ति को दुर्भावनापूर्ण कृत्य द्वारा नुकसान पहुँचाता है तो उसे पाँच साल तक की जेल अथवा जुर्माना या दोनों सज़ा से दंडित किया जा सकता है। अधिनियम के प्रावधान को भारतीय दंड संहिता में भी शामिल किया जा सकता है।
  • इस अधिनियम के अनुसार, लोक संपत्तियों में निम्नलिखित को शामिल किया गया है-
    • कोई ऐसा भवन या संपत्ति जिसका प्रयोग जल, प्रकाश, शक्ति या उर्जा के उत्पादन और वितरण में किया जाता है।
    • तेल प्रतिष्ठान।
    • खान या कारखाना।
    • सीवेज स्थल।
  • लोक परिवहन या दूर-संचार का कोई साधन या इस संबंध में उपयोग किया जाने वाला कोई भवन, प्रतिष्ठान और संपत्ति।

थॉमस समिति:

  • के.टी. थॉमस समिति ने सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान से जुड़े मामलों में आरोप सिद्ध करने की ज़िम्मेदारी की स्थिति को बदलने की सिफारिश की। न्यायालय को यह अनुमान लगाने का अधिकार देने के लिये कानून में संशोधन किया जाना चाहिये कि अभियुक्त सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट करने का दोषी है।
    • दायित्व की स्थिति में बदलाव से संबंधित यह सिद्धांत,  यौन अपराधों तथा इस तरह के अन्य अपराधों पर लागू होता है। 
    • सामान्यतः कानून यह मानता है कि अभियुक्त तब तक निर्दोष है जब तक कि अभियोजन पक्ष इसे साबित नहीं करता।
  • न्यायालय द्वारा इस सुझाव को स्वीकार कर लिया गया। 

नरीमन समिति :

  • इस समिति की सिफारशें सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की क्षतिपूर्ति से संबंधित थीं।
  • सिफारिशों को स्वीकार करते हुए न्यायालय ने कहा कि प्रदर्शनकारियों पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने का आरोप तय करते हुए संपत्ति में आई विकृति में सुधार करने के लिये क्षतिपूर्ति शुल्क लिया जाएगा।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालयों को भी ऐसे मामलों में स्वतः संज्ञान लेने के दिशा-निर्देश जारी किये तथा सार्वजनिक संपत्ति के विनाश के कारणों को जानने तथा क्षतिपूर्ति की जाँच के लिये एक तंत्र की स्थापना करने को कहा।

कहीं माध्यम वर्ग को समाप्त करने कि साज़िश तो नहीं कोरोना?

कोरोना के बढ़ते हुए मामलों को देख कर राजनैतिक कार्यक्रमों में जहां भीड़ होती है उनकी विवेचना और उन पर रोक की कार्रवाई न करके केवल बाजार बंद लॉकडाउन कर्फ्यू पर निर्णय हो जाता है।

 सोशल साइट पर और ग्रुपों में संचालक समाजसेवा करने वालों द्वारा ऐसा माहौल बनाया जाता है कि लॉकडाउन हो जाए। बड़ी तत्परता से ऐसे समाचार प्रसारित किए जाते हैं कि लॉक डाउन होने का हव्वा खड़ा हो जाए।

 सबसे बड़ा प्रश्न है कि:

  • क्या बाजार में दुकानदार व्यवसायी कोरोना रोग फैलाने में है? 
  • क्या उनके बाजार खोलने से कोरोना फैल रहा है? आखिर यह समीक्षा क्यों नहीं हो रही?

 प्रशासनिक अधिकारी जब बैठक करता है तब व्यापारियों के अगुआ नेता हां में हां मिलाते हुए बाजार बंद का निर्णय,कम समय तक खोलने का निर्णय कर बैठते हैं। ये प्रतिनिधि उपखंड में बैठक में 5- 7 ही होते हैं। 15:20 मिनट की बैठक में यह निर्णय हो जाता है। 

व्यापारियों ने दुकानदारों ने आपस में बैठकर कभी चर्चा की?कोरोना रोगी जिस किसी शहर में मिले हैं तो उनकी हिस्ट्री देखी गई? क्या उस हिस्ट्री में दुकान से या बाजार से कोरोनावायरस फैलना सामने आया?

व्यापारी प्रतिनिधि हां में हां मिलाते हुए बंद का,लोक डाउन कर्फ्यू निर्णय कर लेते हैं। व्यापारियों ने कभी भी उपखंड अधिकारी को लिखित में यह क्यों नहीं दिया कि केवल व्यापार पर अंकुश लगाया जाता है। राजनीतिक रैलियों चाहे वह किसी भी पार्टी की हो उन पर रोक क्यों नहीं है? उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई क्यों नहीं है? यह समीक्षा क्यों नहीं हो रही कि दुकानदार व्यापारी कोरोना फैलाते हैं या नहीं फैलाते? इसकी समीक्षा होनी चाहिए। रेलें,बसें चल रही है जिनमें भीड़ होती है। वहां कोरोना फैलने का खतरा अधिक है। यहां तक कि चिकित्सालयों में रजिस्ट्रेशन के लिए कतारों में,प्रचार रैलियों को झंडी दिखाने में,कोरोनावारियों को सम्मानित करने के फोटोशूट,मंत्रियोंअधिकारियों को भेंट ज्ञापन में कोई सोशल डिस्टेंस नहीं होता।

हिंदुस्तान में पिछले 1 साल से व्यापार बहुत बुरी हालत के अंदर है। दुकानदार व्यापारी जिनसे लाखों करोड़ों लोग परिवार पलते हैं। उनके कर्मचारी पलते हैं। वे सभी लोकडाउन और बंद से बेहाल हो जाते हैं। बाजार खुलते हैं तो अनेक प्रकार के कार्य भी मजदूरी और रोजगार साथ साथ चलते हैं। बाजार बंद होने से मजदूरी करने वाले रेहड़ी,थड़ी,खोमचे  लगाने वाले भी प्रभावित होते हैं। 

 हिंदुस्तान में अधिकतर बल्कि कहना चाहिए कि 90% व्यापारी दुकानदार मध्यम वर्गीय और कम आय वाले परिवारों से जुड़े हुए हैं। बंद से उनकी रोजी रोटी पर संकट आता है तो मध्यमवर्गीय परिवारों के हर प्रकार के कार्य रुक जाते हैं। अच्छा खासा परिवार जमीन पर आ पड़ता है। 

उसे घर चलाने के लिए और दुर्भाग्य से कोई बीमारी हो जाए तो कर्जा भी लेना पड़ जाता है।

 यहां स्पष्ट रूप से कहा जाना चाहिए कि शासन और प्रशासन दुकानदारों पर अंकुश लगाने के लिए आगे रहने की प्रवृति और सोच बंद करे। 

राजनीतिक रैलियों पर राजनेताओं के कार्यक्रमों की भीड़ पर किसी प्रकार की रोक नहीं लगाता।

 बाजार में जो लोग मास्क के बिना घेरे में आते हैं उन पर तो जुर्माना लग जाता है लेकिन रैलियों की भीड़ पर किसी प्रकार का कोई जुर्माना नहीं लगता। आज तक शासन प्रशासन ने रैलियां निकालने वाले नेताओं के विरुद्ध कोई मुकदमे दर्ज नहीं किए और किसी को गिरफ्तार नहीं किया। 

ये सारे सवाल व्यापारी नेताओं को लिखित में शासन प्रशासन को देना चाहिए। 

आखिर अकेले व्यापारी और दुकानदार ही क्यों बंद और जुर्माने के शिकार किए जाते रहें जब उनकी कोई गलती नहीं है। 

उनकी कोई भूल भी नहीं है तो हमेशा सरकार का कड़ा निर्णय व्यापारियों पर ही लागू क्यों होता है? 

व्यापारी संगठनों को सोशल मीडिया चलाने वाले स्थानीय ग्रुप वालों से भी सीधा सवाल करना चाहिए और मिलना चाहिए कि वह ग्रुपों में केवल व्यापारियों के पीछे ही हाथ धो करके क्यों पड़े रहते हैं? व्यापार बंद कराने से दुकानें बंद कराने से सोशल मीडिया वालों को क्या लाभ है? यह कौनसी समाजसेवा है? 

स्थानीय राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के विरुद्ध ग्रुपों में क्यों नहीं लिखते? व्यापारी ही उनको कमजोर नजर आते हैं इसलिए जब चाहे व्यापारियों के विरुद्ध माहौल बनाना शुरू कर दिया जाता है? 

व्यापारी नेताओं को शासन प्रशासन के सामने सीधा एक ही सवाल करना चाहिए कि देश में कानून सबके लिए बराबर है।  उनके अनुसार ही कार्रवाई हो। राजनीतिक रैलियों की राजनेताओं द्वारा भीड़ इकट्ठी करने की छूट है तो व्यापारी तो केवल अपनी दुकान करता है जिसके अंदर भीड़ नहीं होती। शासन प्रशासन से बात करने के लिए लिखित में देने के लिए वे प्रतिनिधि भेजे जाने चाहिए जो मुंह के ताला लगाए और हाथ बांधे हों। सरकार धार्मिक आयोजनों पर रोक लगाने से भी कतराती है यह साबित हो रहा है। 

सरकार के पास नौकरियां जरूरत के अनुसार है नहीं और होती भी नहीं है। लोग निजी क्षेत्रों में रोजी रोटी पाते हैं। 

कोरोना से बचाव के लिए तय गाइड लाईन का सख्ती से पालन हो और उस पर शासन प्रशासन को जोर लगाना चाहिए।

साभार : करणीदानसिंह राजपूत

पंजाब का किसान DBT(डाइरेक्ट बेनिफ़िट ट्रांसफर से खुश

पंजाब के किसान कृषि कानूनों खिलाफ आंदोलन के बीच केंद्र सरकार के एक फैसले से खुश हैं। केंद्र सरकार ने फसलों की खरीद का भुगतान सीधे किसानों के खाते में ऑनलाइन पेमेंट करने के निर्देश दिए हैं। इससे राज्‍य के किसान खुश हैं। दरअसल पंजाब के किसान लंबे समय से फसल खरीद की सीधी अदायगी की मांग कर रहे थे। इस निर्देश से आढ़तियों में बेचैनी है और वे चाहते हैं कि किसान संगठन इसका विराेध करें। केंद्र सरकार ने पंजाब को हरियाणा के मॉडल को अपनाने की सलाह दी थी, जहाँ एमएसपी की रकम जमा कराने के लिए जमीनों की जगह उत्पादकों की जानकारी का इस्तेमाल किया गया है। अब से मंडी तक लाई गई फसलों की कीमत आधार कार्ड के जरिए अदा की जाएगी।

इस आदेश से आढ़तिया परेशान

  • केंद्र ने फसल बिक्री का भुगतान सीधे किसानों के बैंक खातों में करने को कहा है।
  • अब तक किसानों को एमएसपी (MSP) का भुगतान आढ़तियों के जरिए किया जाता रहा है।
  • हरियाणा में बीजेपी सरकार है, इसलिए यह फैसला लागू कर दिया है।
  • इस साल की खरीद प्रक्रिया के दौरान 100 फीसदी ऑनलाइन भुगतान होगा।
  • रबी मार्केटिंग सीजन 2020-21 में 23 प्रतिशत किसानों ने सीधे खाते में पैसे लिए थे।
  • -धान के सीजन में 67 प्रतिशत किसानों ने सीधे खाते में पैसे लिए.

‘पुरनूर’ कोरल, चंडीगढ़ – 18 अप्रैल :

पंजाब के किसानों के अनाज की कीमतें सीधे उनके खातों में आनी शुरू हो गई हैं। इसके लिए हाल ही में फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया ने पंजाब सरकार से जमीनों का रिकॉर्ड माँगा था, ताकि किसानों के खातों में सीधे एमएसपी की रकम जमा की जा सके।

आढ़ती संगठन लगातार किसानों से बात करके उनके पक्ष में बयान देने को कह रहे हैं, लेकिन अभी तक बलबीर सिंह राजेवाल के अलावा किसी ने भी आढ़तियों के पक्ष में आवाज नहीं उठाई है। दरअसल ऐसा करना उनके लिए आसान नहीं है, क्योंकि लंबे समय से किसान ये मांग कर रहे हैं कि उन्हें उनकी फसल का भुगतान सीधा किया जाए न कि आढ़तियों के माध्यम से।

अमरिंदर सिंह सरकार ने केंद्र को जानकारी दी थी कि पंजाब के आधे किसान केवल फसलों के उत्पादक हैं, जमीनों के मालिक नहीं। इस पर केंद्र सरकार ने पंजाब को हरियाणा के मॉडल को अपनाने की सलाह दी थी, जहाँ एमएसपी की रकम जमा कराने के लिए जमीनों की जगह उत्पादकों की जानकारी का इस्तेमाल किया गया है। अब से मंडी तक लाई गई फसलों की कीमत आधार कार्ड के जरिए अदा की जाएगी।

खाद्य, नागरिक आपूर्ति और उपभोक्ता मामले विभाग के निदेशक रवि भगत ने कहा कि परीक्षणों के बाद बड़ी संख्या में किसानों ने अपने बैंक खातों में एमएसपी भुगतान प्राप्त करने लगे हैं।

दरअसल केंद्र सरकार एफसीआई के खर्चों को कम करने के लिए लगातार कदम उठा रही है। उसमें आढ़तियों को दी जाने वाली 2.5 फीसदी आढ़त और सरकार को दिया जाने वाला तीन फीसदी देहाती विकास फंड पर अंकुश लगाना भी शामिल है। आढ़तियों को यह भी लग रहा है कि केंद्र सरकार उन्हें धीरे-धीरे फसल खरीद सिस्टम से बाहर करना चाहती है। साथ ही आढ़तियों ने एक अप्रैल से हड़ताल पर जाने का ऐलान भी किया है।

डायरेक्ट पेमेंट सिस्टम को लेकर भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) दकौंडा के महासचिव और किसान नेता जगमोहन सिंह ने नई व्यवस्था को किसानों के जीवन में एक बड़ा दिन करार दिया है। उन्होंने कहा कि ऐसा पहली बार है, जब दूसरों पर निर्भर हुए बिना ही किसानों के हाथों में पैसा आ रहा है।

सरकार की नई व्यवस्था से लोगों के चेहरों पर खुशी के भाव हैं। राजपुरा के निकट नीलपुर गाँव के रहने वाले दलीप कुमार (39 वर्ष) डायरेक्ट पेमेंट की व्यवस्था को बेस्ट बताते हुए कहते हैं, “यह सबसे अच्छी प्रणाली है। हमारे खाते में हमारी फसल का भुगतान हो रहा है, इससे बेहतर क्या हो सकता है?”

आगामी रबी विपणन सीजन 2021-22 में गेहूं की सरकारी खरीद 10 अप्रैल 2021 से शुरू होने जा रही है, लेकिन फसल के दाम का किसानों के खाते में सीधा भुगतान करने में जमीन के रिकॉर्ड को लेकर पेंच फंसा हुआ है। हालांकि देश के अन्य राज्यों ने फसलों की सरकारी खरीद में जमीन के रिकॉर्ड को दाखिल करने की व्यवस्था लागू करके फसल के दाम का सीधा भुगतान किसानों के खाते में करना शुरू कर दिया है, लेकिन पंजाब में अब तक किसानों को आढ़तियों के मार्फत ही भुगतान होता है। केंद्र सरकार का कहना है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर फसलों की खरीद में किसानों की जमीन का रिकॉर्ड दाखिल करने और ऑनलाइन भुगतान होने से व्यवस्था में पारदर्शिता आएगी और असली किसानों को इसका फायदा मिलेगा, लेकिन पंजाब सरकार (Punjab Government) आगामी रबी सीजन में जमीन के रिकॉर्ड दाखिल करने की अनिवार्यता लागू करने को तैयार नहीं है. प्रदेश सरकार का कहना है कि इसके लिए उसे और समय की आवश्यकता है। केंद्र सरकार ने पंजाब को हरियाणा के मॉडल को अपनाने की सलाह दी थी, जहाँ एमएसपी की रकम जमा कराने के लिए जमीनों की जगह उत्पादकों की जानकारी का इस्तेमाल किया गया है। अब से मंडी तक लाई गई फसलों की कीमत आधार कार्ड के जरिए अदा की जाएगी। इसके बाद केंद्र सरकार ने पंजाब सरकार को चेतावनी दी थी कि वह एमएसपी का पैसा सीधे किसानों के खाते में भेजे, यदि सरकार किसानों के खाते में सीधे पैसा नहीं भेजती है तो राज्य में खाद्यान्न की खरीद बंद कर दी जाएगी। बता दें कि पंजाब सरकार आढ़तियों के जरिए एमसपी का पैसा देना चाहती थी। 

एक दैनिक समाचार पत्र की रिपोर्ट के मुताबिक, दलीप ने कहा कि वह बीते 15 साल के कृषि कर रहे हैं। उन्होंने मंडी के लिए 10 एकड़ में खेती की है। वह 40 एकड़ में खेती करते हैं और आने वाले दिनों में शेष गेहूँ खरीद के लिए ले जाएँगे। दलीप कहते हैं कि ऐसा पहली बार उनके साथ हो रहा है कि 1,975 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से एमएसपी उन्हें मिलेगी।

पुरानी व्यवस्था के बारे में दलीप बताते हैं, “पहले आढ़तिए हमें चेक दिया करते थे। फसल को मंडी में ले जाने के बाद सब कुछ एजेंट के हाथ में होता था। फसलों के लेनदेन में काफी समय लगता था, क्योंकि आढ़तिया हमेशा कुछ न कुछ बहाना बनाता ही रहता था। ताकि भुगतान को रोका जा सके।”

इससे पहले डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) के जरिए एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) का भुगतान करने पर केंद्र और पंजाब सरकार में ठन गई थी। इसके बाद केंद्र सरकार ने पंजाब सरकार को चेतावनी दी थी कि वह एमएसपी का पैसा सीधे किसानों के खाते में भेजे, यदि सरकार किसानों के खाते में सीधे पैसा नहीं भेजती है तो राज्य में खाद्यान्न की खरीद बंद कर दी जाएगी। बता दें कि पंजाब सरकार आढ़तियों के जरिए एमसपी का पैसा देना चाहती थी। 

कोरोना के आगे बोर्ड फेल छात्र पास, 10वीं की परीक्षाएं रद्द 12वीं पर फैसला सुरक्षित

स्टूडेंट्स 10वीं, 12वीं की परीक्षाओं को कैंसिल करने की मांग कर रहे थे और इसको लेकर ट्विटर पर #cancelboardexams2021 अभियान चला रहे थे। जिसके बाद कई लोग बोर्ड परीक्षाओं के रद्द करने के समर्थन में आगे आए, तब से इस पर लगातार चर्चा हो रही है। बैठक में पीएम नरेन्द्र मोदी ने सीबीएसई बोर्ड की परीक्षाओं को कराने को लेकर चर्चा की। इस दौरान शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक से विचार विमर्श किया। सीबीएसई बोर्ड की परीक्षाओं को कैंसिल करने की मांग की जा रही थी जिसके बाद से पीएम नरेन्द्र मोदी ने शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक और शिक्षा मंत्रालय के उच्चाधिकारियों के साथ आज बैठक हुई। बैठक के बाद सीबीएसई बोर्ड की परीक्षाओं को रदद करने का निर्णय लिया गया।

नयी दिल्ली(ब्यूरो):

कोरोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए सरकार ने CBSE स्टूडेंट्स के लिए बड़ा और जरूरी फैसला किया। 4 मई से शुरू होने वाली 10वीं की परीक्षाएं रद्द कर दीं और 12वीं की परीक्षाएं अभी टाल दी हैं। इस पर सरकार 1 जून को फैसला करेगी। दोनों ही परीक्षाओं से जुड़े सरकार के फैसले…

12वीं के छात्रों के लिए

  • 4 मई से 14 जून तक चलने वाली 12वीं बोर्ड की परीक्षाएं अभी टाली गई हैं। ये परीक्षाएं इसके बाद होंगी। बोर्ड 1 जून को हालात की समीक्षा करेगा। तब फैसला किया जाएगा।
  • अगर परीक्षाएं होती हैं तो कम से कम 15 दिन पहले छात्रों को इसके बारे में बताया जाएगा।

10वीं के छात्रों के लिए

  • इनकी भी परीक्षाएं 4 मई से 14 जून तक होनी थीं। ये रद्द यानी कैंसिल कर दी गई हैं। यानी इस साल इनकी परीक्षाएं नहीं होंगी। सभी स्टूडेंट्स अगली क्लास में प्रमोट किए जाएंगे, लेकिन रिजल्ट के साथ। इस रिजल्ट का आधार क्या होगा, CBSE बोर्ड इसे तय करेगा।
  • अगर कोई छात्र बोर्ड की ओर से दिए गए मार्क्स से संतुष्ट नहीं होगा तो वो परीक्षा में शामिल हो सकता है। लेकिन ये परीक्षा तब होगी जब इसके लिए देश में हालात समान्य होंगे।

ये फैसले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक की बुधवार दोपहर करीब घंटे भर चली बैठक में लिया गया। इससे पहले कई नेता और राज्य सरकारें CBSE की बोर्ड परीक्षाएं टालने की मांग कर चुके थे।

कहा जा रहा है कि बैठक में अधिकारियों का सुझाव था कि 12वीं और 10वीं दोनों की परीक्षाएं टाली जाएं। लेकिन प्रधानमंत्री ने सबके सुझाव सुनने के बाद कहा कि बच्चे पहले ही कोरोना में बहुत नुकसान और परेशानी झेल चुके हैं। ऐसे में 10वीं की परीक्षाओं को रद्द किया जाना चाहिए और 12वीं को परीक्षा को टाला जाना चाहिए।

4 मई से शुरू होनी थीं CBSE बोर्ड की परीक्षाएं
CBSE की 10वीं और 12वीं की परीक्षाएं 4 मई से होनी थीं। ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन भी 10वीं और 12वीं की परीक्षाओं को टालने की मांग कर चुकी थी। इस संबंध में एसोसिएशन की ओर से शिक्षा मंत्रालय को चिट्ठी लिखी गई थी। साथ ही छात्रों ने भी सोशल मीडिया पर #CancelBoardExam2021 कैंपेन चला रखा था।

CBSE की बोर्ड परीक्षाओं में 10वीं और 12वीं को मिलाकर करीब 35.81 लाख स्टूडेंट शामिल होने वाले थे। इनमें 12वीं के 14 लाख से अधिक और 10वीं के 21.50 लाख छात्र थेे।

कई राज्यों में कोरोना के हालात बेकाबू

कोरोना से महाराष्ट्र, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश समेत कई राज्य बहुत ज्यादा प्रभावित हैं। और कई अन्य राज्यों में स्थिति खराब होने की ओर बढ़ने लगी है। ऐसे में परीक्षा कराना बड़ी चुनौती थी। केंद्र के फैसले से पहले महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश की सरकारें अपने यहां होने वाली बोर्ड परीक्षाएं टाल चुकी थी। इसके साथ देश के स्टेट बोर्ड ने भी परीक्षाएं टाल दी हैं।

कॉन्ग्रेस का टिकट पाने के लिए पहले प्रशांत किशोर की फौज को खुश करना जरूरी होता है : कृष्ण कुमार बावा

पंजाब कांग्रेस के नेताओं में ऐसी भी सुगबुगाहट है कि प्रशांत किशोर टिकट बंटवारे में भी अहम भूमिका निभाएंगे. इस पर कैप्‍टन अमरिंदर सिंह ने मंगलवार को कहा, ‘प्रशांत किशोर का इस मामले से कोई लेना देना नहीं है. इसको लेकर कोई सवाल ही नहीं खड़ा होता है. प्रशांत किशोर की भूमिका मेरे मुख्‍य सलाहकार के रूप में सीमित है. उनका काम केवल सलाह देना ही है, निर्णय लेने का कोई भी अधिकार उनके पास नहीं है.’

नईदिल्ली/चंडीगढ़:

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से ऐन पहले प्रशांत किशोर के विरोध में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) में मची भगदड़ से आप बखूबी परिचित हैं। हाल ही में उनका क्लबचैट ऑडियो सामने आया था, जिसमें वह बंगाल चुनावों में प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी के जबर्दस्त प्रभाव को बयाँ कर रहे थे। उसके बाद से वह लगातार बंगाल चुनावों में ममता बनर्जी की संभावित हार से पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। कई लोगों का मानना है कि भविष्य की परियोजनाओं जिनमें पंजाब में कॉन्ग्रेस के लिए काम करना भी शामिल है, पर बंगाल के नतीजों की छाया नहीं पड़ने देने के मकसद से वे ऐसा कर रहे हैं।

पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। राज्य के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह पहले ही प्रशांत किशोर को अपना प्रधान सलाहकार बना चुके हैं। उन्होंने 2017 के विधानसभा चुनावों में भी पंजाब और उत्तर प्रदेश में कॉन्ग्रेस के लिए काम किया था। लेकिन, पंजाब के एक कॉन्ग्रेस नेता की किताब चुनाव से पहले प्रशांत किशोर और पार्टी दोनों की मुसीबत बढ़ा सकती हैं।

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता व पंजाब राज्य उद्योग विकास कार्पोरेशन के चेयरमैन कुमार कृष्ण कुमार बावा की किताब ‘संघर्ष के 45 साल’ रिलीज हुई है। इसमें बताया गया है कि कैसे पंजाब में कॉन्ग्रेस का टिकट पाने के लिए पहले प्रशांत किशोर की फौज को खुश करना जरूरी होता है।

एक दैनिक की रिपोर्ट में कृष्ण कुमार बावा की किताब के हवाले से कॉन्ग्रेस की भीतरी सच्चाई पर कई खुलासे किए गए हैं। बावा ने अपनी किताब में चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के काम करने के तरीकों को उजागर किया है। उन्होंने बताया कि यहाँ (कॉन्ग्रेस में) शरीफ होना पाप है। कई लोग जो कॉन्ग्रेस की विचारधारा से जुड़े भी नहीं है, वे भी यहाँ प्रशांत किशोर की फौज को खुश करके टिकट ले लेते हैं, जबकि शरीफ होने के नाते उन जैसों को साइड कर दिया जाता है। 2017 में उनके साथ ऐसा ही कुछ हुआ था। जहाँ पहले उन्हें लुधियाना पूर्वी हलके से चुनाव में उतारने की बात हुई, लेकिन बाद में उनका टिकट कट गया। 

गौरतलब है कि मैसेजिंग एप क्लबहाउस पर प्रशांत किशोर के साथ बातचीत में लुटियंस मीडिया के कई चेहरे शामिल थे। मसलन, रवीश कुमार, साक्षी जोशी, आरफा खानम शेरवानी, रोहिणी सिंह, स्वाति चतुर्वेदी वगैरह। इस दौरान प्रशांत किशोर ने कहा था, “मोदी के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी नहीं है। मोदी का पूरे देश में एक कल्ट बन गया है। 10 से 25 प्रतिशत लोग ऐसे हैं, जिनको मोदी में भगवान दिखता है। चाहे वो सही दिखे या गलत, वो एक अलग बहस का मुद्दा हो सकता है। यहाँ का हिंदी भाषी मोदी का कोर बेस सपोर्ट है और मोदी काफी पॉपुलर हैं। अगर आप इधर सर्वे कर कर रहे हैं तो मोदी-ममता समान रूप से पॉपुलर हैं।”

’आजादी का अमृत महोत्सव’ 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग के शहीदों को श्रद्वासुमन अर्पित किए गए

पंचकूला अप्रैल 13:

                        ’आजादी का अमृत महोत्सव’’ को लेकर आज  केन्द्रीय माल और सेवाकर क्षेत्र, चंडीगढ़ और पंचकूला द्वारा संयुक्त रूप से कार्यक्रर्मों का आयोजन किया गया।
 इस बारे में जानकारी देते हुए अनिल कुमार, प्रिंसीपल कमिश्नर, जीएसटी आॅडिट, पंचकूला ने कहा कि आजादी के 75 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं, इस संबंध में 30 मार्च से कार्यक्रमों का आयोजन शुरू किया गया है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम को मजबूत बनाने व वर्तमान पीढ़ी को देश को आजादी दिलाने वाले सभी ज्ञात व अज्ञात सेनानीयों के जीवन से प्रेरणा लेने तथा 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग के शहीदों को श्रद्वासुमन अर्पित करना ही इस कार्यक्रम का उद्देश्य है।

      इसी संदर्भ में आज लगभग 6 किलोमीटर की दौड़ सुखना झील से जीएसटी भवन, सैक्टर-17 चंडीगढ़, लगभग 30 किलोमीटर की साइकिलिंग जीएसटी भवन, सैक्टर-17 चंडीगढ़ से जीएसटी भवन, सैक्टर-25, पंचकूला के बीच आयोजित की गई। जिसे मुख्य आयुक्त सुरेश किशनानी, सीजीएसटी चंडीगढ़ और पंचकूला ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया।

               कोरोना महामारी जिससे पिछले एक वर्ष से सभी जूझ रहे हैं, इसको ध्यान में रखते हुए पंचकूला के सैक्टर-25 स्थित जीएसटी भवन में रक्तदान शिविर एवं मेडिकल हैल्थ चैकअप कैंप लगाया गया। उन्होंने बताया कि रक्तदान शिविर में कुल 33 यूनिट रक्त एकत्रित किया गया । वहीं पहली बार ग्रेड बी व सी के 40 वर्ष से अधिक आयुवर्ग के सभी कर्मचारियों का मेडिकल हैल्थ चैकअप कैंप लगाने की भी शुरूआत की गई है। पहले मेडिकल हैल्थ चैकअप कैंप ग्रेड ए के अधिकारियों के लिए ही लगाया जाता था।

मुख्य आयुक्त सुरेश किशनानी, सीजीएसटी चंडीगढ़ और पंचकूला द्वारा पंचकूला में पुरस्कार वितरण किया गया।

देश के सभी मुस्लिम मिल कर 2030 तक भारत को इस्लामिक स्टेट बनाने की योजना बनाई है : पीसी जॉर्ज

देश में लंबे समय से लव जिहाद पर कानून और भारत को ‘हिन्दू राष्ट्र’ घोषित किए जाने की मांग उठ रही है। इसी बीच केरल जनपक्षम (सेक्युलर) के विधायक पीसी जॉर्ज के कई तरह के दावों ने इन मांगों को और हवा दे दी। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय के लोगों ने साल 2030 तक भारत को एक इस्लामिक स्टेट बनाने की योजना तैयार की है। ऐसे में भारत को इससे बचने के लिए ‘हिन्दू राष्ट्र’ घोषित किया जाना चाहिए।

नयी दिल्ली(ब्यूरो):

केरल के विधायक PC जॉर्ज ने राज्य में ‘लव जिहाद’ की वास्तविकता को न सिर्फ स्वीकार किया है, बल्कि ये भी कहा है कि भारत को अब ‘हिन्दू राष्ट्र’ घोषित किया जाना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि देश के सभी मुस्लिम मिल कर भारत को एक इस्लामी मुल्क बनाने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। इसे रोकने के लिए ठोस कदम उठाना आवश्यक है। उन्होंने केरल के इडुक्की स्थित थोडुपुझा में ये बातें कही।

उन्होंने आदिवासियों के कल्याण के लिए कार्य करने वाली NGO ‘HDRC इंडिया’ द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि भारत को तुरंत ‘हिन्दू राष्ट्र’ घोषित किया जाना चाहिए, क्योंकि मुस्लिम समाज 2030 तक इसे इस्लामी मुल्क बनाने के काम पर लगा हुआ है। PC जॉर्ज ने कहा कि ये काम तेज़ी से चल रहा था, लेकिन बीच में PM मोदी ने जिस तरह से नोटबंदी की, उससे ये प्रक्रिया धीमी हो गई। उन्होंने कहा, “लव जिहाद वास्तविक है।”

LDF और UDF कर रहे है आतंकियों का सहयोग- जॉर्ज

इडुक्की में थोडुपुझा में आदिवासी कल्याण के लिए एक गैर सरकारी संगठन HRDS इंडिया द्वारा आयोजित एक समारोह में विधायक जॉर्ज ने कहा कि मुस्लिमों ने 2030 तक भारत को इस्लामिक स्टेट बनाने की योजना बनाई है।उन्होंने आरोप लगाया केरल में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) इस योजना को सफल बनाने के लिए आतंकियों का साथ दे रहे हैं। ऐसे में इससे बचने के लिए भारत को जल्द ही ‘हिन्दू राष्ट्र’ घोषित किया जाना चाहिए।

इस दौरान PC जॉर्ज ने फ्रांस सहित अन्य यूरोपियन देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह से ईसाई देश में घुसपैठ कर मुस्लिम जबरन इस्लाम कबूल करवा रहे हैं, ताकि उन्हें इस्लामी मुल्क बनाया जा सके- ये भयावह है। उन्होंने पूछा कि क्या भारत को किसी समुदाय विशेष के पास जाने दिया जा सकता है? उन्होंने कहा कि इस विषय पर विचार-विमर्श की आवश्यकता है और किसी को तो आवाज़ उठानी ही पड़ेगी।

PC जॉर्ज ने कहा, “दुनिया भर के अन्य देशों को देखिए। कई पूँजीवादी राष्ट्र हैं तो कितने ही गरीब देश भी हैं। फिर आ जाते हैं भारत जैसे देश, जो तीसरी दुनिया का हिस्सा हैं। सभी देश किसी न किसी मजहब को प्राथमिकता देते हैं। अरब मुल्कों की बात करें तो वहाँ इस्लाम न सिर्फ आधिकारिक मजहब है, बल्कि जो भी चीज इस्लामी नहीं है उसे अनुचित माना जाता है। अमेरिका जैसे भी इस जाल में फँस रहे हैं, लेकिन चीजें अब बदल रही हैं।”

उन्होंने कहा फ्रांस जैसे कई ईसाई देश का अतिक्रमण कर उसे इस्लामी बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने ‘लव जिहाद’ की वास्तविकता से इनकार किया है, लेकिन वे जानते हैं कि ऐसा हो रहा है। उन्होंने कहा कि इन सारी समस्याओं का एक ही समाधान है- भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करना। PC जॉर्ज इससे पहले भी विवादों में रहे हैं। केरल की महिला आयोग की अध्यक्ष ने उन पर धमकी देने के आरोप लगाए थे।

बता दें कि पिछले 31 वर्षों में 7 बार विधायक चुने जाने वाले प्लनथोट्टाथिल चाको जॉर्ज 2011-15 में कॉन्ग्रेस की सरकार के दौरान केरल विधानसभा के चीफ व्हिप भी रहे हैं। उन्होंने 1 बार KEC (1980), 1 बार JNP (1982), 3 बार KEC-M (1996, 2001, 2006), 1 बार निर्दलीय (2011) और 2016 में केरल कॉन्ग्रेस (M) से चुनाव जीता। उन्होंने 4 मलयालम फिल्मों में भी काम किया है, जिनमें से एक में उन्हें CM, एक में नेता प्रतिपक्ष और एक में पुलिस अधिकारी का किरदार मिला था।