हिन्द में हिन्दी की त्रासदी — कब बनेगी हिन्दी, हिन्द के माथे की बिंदी ?

संविधान में वर्णित हिन्दी का इतिहास 

एस.के.जैन, पंचकुला:

एस.के.जैन 

आज हिंदुस्तान को आजाद हुए 74 वर्ष का एक लंबा अंतराल बीत चुका है। अखण्ड कहे जाने वाला हमारा देश 30 खंडों में बंटा हुआ है। यहाँ हर 20 कि.मी. के बाद बोलचाल की भाषा यानि (Dialect ) और हर 50 कि.मी. के बाद संस्कृति बदल जाती है।  याद करते हैं 14 सितंबर, 1949 का दिन।  उस दिन हिन्दी भाषा को “राजभाषा” का दर्जा दिया गया था।  भारतकोश के अनुसार हिन्दी को “राजभाषा” बनाने को लेकर संसद में 12 सितंबर से 14 सितंबर, 1949 को तीन दिन तक बहस हुई।  भारतकोश पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, संविधान सभा की भाषा विषयक बहस लगभग 278 पृष्ठों में मुद्रित हुई।  इसमें डॉ. कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी और गोपाल स्वामी आयंगर की अहम भूमिका रही थी।  भारतीय संविधान के भाग 17 के अध्याय की धारा 343 (1 ) में वर्णित किया गया कि भारत संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी।  भारत संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अन्तर्राष्ट्रीय रूप होगा और अंग्रेजी भाषा का चलन आधिकारिक तौर पर 15 वर्ष बाद, प्रचलन से बाहर कर दिया जाएगा।  

 26 जनवरी, 1950 को जब हमारा संविधान लागू हुआ था तब देवनागरी लिपि में लिखी गई हिन्दी  सहित 14 भाषाओं को आधिकारिक भाषाओं के रूप में आठवीं सूची में रखा गया था।  संविधान के अनुसार 26 जनवरी, 1965 को अंग्रेजी की जगह हिन्दी को पूरी तरह से देश की राजभाषा बनानी थी। लेकिन दक्षिण भारत के राज्यों में हिन्दी विरोधी आंदोलन के बीच वर्ष 1963 में राजभाषा अधिनियम पारित किया गया था , जिसने 1965 के बाद अंग्रेजी को आधिकारिक भाषा के रूप में प्रचलन से बाहर करने का फैंसला पलट दिया था।  दक्षिण भारत के राज्यों विशेष रूप से तमिलनाडु (तब का मद्रास ) में आंदोलन और हिंसा का एक जबरदस्त ज़ोर चला और कई छात्रों ने आत्मदाह तक किया।  इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की कैबिनेट में सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहीं इंदिरा गाँधी के प्रयासों से  समस्या का समाधान निकला, जिसके परिणाम स्वरूप 1967 को राजभाषा में संशोधन किया और यह माना गया कि अंग्रेजी देश की आधिकारिक भाषा रहेगी।  इस संशोधन के माध्यम से आज तक यह व्यवस्था जारी है। 

अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी दिवस और संयुक्त राष्ट्रसंघ :  

विश्व का पहला “अन्तर्राष्ट्रीय  हिन्दी सम्मेलन” 10 जनवरी, 1975 को नागपुर में आयोजित हुआ।  तत्पश्चात विश्व हिन्दी दिवस को हर वर्ष 10 जनवरी को मनाए जाने की घोषणा तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह जी ने  साल 2006 में की थी।  यानि इसे हर वर्ष आधिकारिक तौर पर मनाने में 31 साल लग गये, कारण आप सोच सकते हैं।  आज दुनिया के लगभग 170 देशों में हिन्दी किसी न किसी रूप में पढ़ाई व सिखाई जाती है।  संयुक्त राष्ट्र संघ बनते समय 4 राज भाषाएं यानि चीनी, अंग्रेजी, फ्रांसीसी और रूसी स्वीकृत की गई थीं।  जबकि 1993 में अरबी, स्पेनिश को जोड़ा गया लेकिन हिन्दी कहीं नहीं।  जो भाषाएं राष्ट्र संघ में आने के लिए मचल रहीं हैं उनमें बंगाली, मलय, पुर्तगाली, स्वाहिली और टर्किश भी कई सालों से दस्तक दे रही हैं। हिन्दी भाषा का दावा इसलिए सबसे मजबूत है क्योंकि हिन्दी दुनिया की चौथी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है।  

हिन्दी भाषा की त्रासदी : 

13 सितंबर, 1949 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने संसद में चर्चा के दौरान तीन प्रमुख बातें कहीं थी ; यथा – 1 ) किसी विदेशी भाषा से कोई भी राष्ट्र महान नहीं हो सकता। 2 ) कोई भी विदेशी भाषा  आमजन की भाषा नहीं हो सकती। 3 ) भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के हित में, ऐसा राष्ट्र जो अपनी आत्मा को पहचाने, जिसे आत्म विश्वास हो, जो संसार के साथ सहयोग कर सके, हमें हिन्दी को अपनाना चाहिए।        कागज़ी तौर पर तो हिन्दी राजभाषा बनी रही लेकिन फलती- फूलती रही अंग्रेजी भाषा।  इसके बाद अंग्रेजी मजबूत होती गई।  “राष्ट्रभाषा प्रचार समिति” द्वारा प्रत्येक वर्ष 14 सितंबर 1953 से हिन्दी दिवस का आयोजन किया जाता रहा और हिन्दी सिर्फ “14 सितंबर” तक ही सीमित होकर रह गई। यह कितना विसंगतिपूर्ण है कि हमारी कोई एक राष्ट्रभाषा नहीं है और देश का कोई एक सुनिश्चित नाम भी नहीं है।  भारतवर्ष, इंडिया, हिंदुस्तान नामों में पिछले 74 सालों से जंग जारी है।  विजय पताका अभी तक किसी को भी नहीं मिली।  

आज़ाद होने के बाद पूरे भारतवर्ष में एक भाषा और एक शिक्षा पद्धति की बातें उठी थीं।  लेकिन अफसोस प्रदेशवाद और जातिवाद के बोझ तले सब कुछ दबकर रह गया। दुनिया के ज्यादातर विकसित देशों की अपनी एक राष्ट्रभाषा है।  वहाँ की शिक्षा प्रणाली, प्रशासन व न्यायपालिका के सभी काम उनकी अपनी भाषा में होते हैं।  वहाँ विद्यार्थियों के कंधों पर हमारे देश की तरह तीन-तीन भाषाओं का बोझ नहीं होता है।  मुझे यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि हमारे देश के प्रसिद्ध समाचार पत्रों में ही करीब 30 प्रतिशत अंग्रेजी के शब्द देवनागरी में पढ़ने को मिलते हैं।  दूरदर्शन और समाचार पत्रों के विज्ञापनों में हिन्दी  शब्दों को रोमन लिपि में लिखा दिखाते हैं।  कहने का तात्पर्य यह है कि अगर समाचार पत्रों और टी.वी. चैनलों में हिन्दी की यह दुर्दशा है तो कैसे बनेगी हिन्दी, हिन्द के माथे की बिन्दी।  केंद्र व राज्य सरकारों की 9 हज़ार के लगभग वेबसाइट्स हैं , जो पहले अंग्रेजी के खुलती हैं फिर इनका हिन्दी विकल्प आता है।  यही हाल हिन्दी में कंप्यूटर टाइपिंग का है।  टाइप करते वक्त उसे रोमन लिपि में टाइप किया जाता है और बाद में उसे देवनागरी में बदला जाता है।  इसमें भी कई फॉन्ट होते हैं।  कई फॉन्ट तो कई कम्प्यूटरों में खुलते ही नहीं।  यह हिन्दी के साथ घोर अन्याय है।  चीन, रूस, जापान, फ़्रांस, यू.ए.ई. यहां तक की पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित बहुत से दूसरे देश कम्प्यूटर पर अपनी एक भाषा और एक फॉन्ट में काम करते हैं। 

हम किसी भी प्रान्त, जाति, धर्म के हों, लेकिन जब बात एक देश की हो तो भाषा व लिपि भी एक ही जरूरी है।  तभी हिन्दी के अच्छे दिन आएंगे। अभी  हाल ही में अरब अमीरात ने एक ऐतिहासिक फैंसला लेते हुए अरबी व अंग्रेजी के बाद हिन्दी को अपनी तीसरी आधिकारिक भाषा के रूप में शामिल कर लिया है। यह हमारे लिए बहुत ही गर्व की बात है और एक हम हैं कि 74 सालों में हिन्दी को वह दर्जा नहीं दे सके जो इसे देना चाहिए।  एक समाचार के मुताबिक तीन साल पहले हिन्दीभाषी उत्तरप्रदेश बोर्ड की परीक्षा में करीब 10 लाख बच्चे हिन्दी में  अंउत्तीर्ण   हो गए थे। यह हमारे लिए बहुत ही शर्म की बात है।  सोचिए अगर उत्तर भारत में  हिन्दी   का यह हाल है तो भारत के दूसरे प्रांतों का क्या हाल होगा।  इसका सबसे बड़ा कारण है कि कई दशकों से विद्यार्थियों को तमाम माध्यमों द्वारा यह बात सिखाई गई है कि जीवन में अगर कुछ करना है तो अंग्रेजी सीखों और उसी पर ध्यान दो। 

उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जी अंग्रेजी में पूछे गए सवालों का जवाब हिन्दी में देते हैं।  हम इसे राष्ट्रवाद कहेंगे।  इसके विपरीत दक्षिण भारत से काँग्रेस नेता शशि थरूर ने कहा था कि  हिन्दी   हम पर लादी जा रही है।  वह अंग्रेजी के विद्वान माने जाते हैं और उन्होंने कई अंग्रेजी में पुस्तकें लिखी हैं।  मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि आपने जब अंग्रेजी सीखी तो तब आप पर क्या वह लादी गई थी तो तब आपने इसका विरोध क्यों नहीं किया ? अंग्रेजी साम्राज्य के चलते अगर हम अंग्रेजी सीख सकते हैं तो क्या कारण है कि आज़ादी के बाद हम अपने ही देश में आज़ाद रहते  हुए अपनी भाषा  हिन्दी  नहीं सीख सकते।  इसका एक ही सबसे बड़ा कारण समझ में आता है और वह है कमज़ोर प्रजातंत्र यानि loose democracy , ऐसा मेरा मानना है।  

 कब तक शापित रहेगी हिन्दी  :

स्वतंत्रता के सूर्योदय के साथ जिस हिन्दी को भारत माँ के माथे की बिन्दी बनना चाहिए उस हिन्दी की हालत आज़ादी के 74 वर्षों के बाद भी गुलामी के 200 वर्षों से बदतर सिद्ध हो रही है।  जिस  हिन्दी  को आगे बढ़ाने के लिए अहिन्दी भाषी बंगाली राजा राम मोहन राय, ब्रह्म समाज के नेता केशवचन्द्र, सुभाष चंद्र बोस और राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने आस्था के दीये जलाए, वही हिन्दी आज अपने ही घर में बिलख रही है।  आज हिन्दी अपनों से हारी है अब  हिन्दी  अस्मिता की पहचान नही है। आजादी मिलते ही हम पूरे गुलाम हो गये। अब अंग्रेजी मम्मी-डैडी की संस्कृति गाँव के चौपाल तक पहुँच गई है।  पिता जी के अलावा बाकी सब अंकल हो गए है। जहां तक कि पालतू कुत्तों का भी अंग्रेजीकरण हो गया है।  कालू, झबरु, मोती अब टाइसन, बुलैट, वगैरा हो गए हैं । कुकरमुत्ते की तरह उगते अँग्रेजी स्कूल ग्रामीण भारतीय संस्कृति को विनष्ट करने पर तुले हैं।  जिस देश के लिए न जाने कितने जवानों ने स्वयं को बलिदान कर दिया , उस देश के लिए हमे मातृभाषा के प्रति मोहभंग करना पड़े तथा थोड़ी सी परेशानी उठानी पड़े तो उन जवानों के त्याग की तुलना में हमारा त्याग बहुत कम होगा।  हमें यह त्याग करना पड़ेगा क्योंकि राष्ट्र की एकता आज हमारे लिए सर्वोपरि है। 

वैसे तो हिंदी विदेशों में मारीशस, फिज़ी, सूरीनाम जैसे देशों में पल्लवित व पुष्पित है।  हॉलेंड में इसका तो पढ़ाई के साथ -साथ शोध कार्य भी हो रहा है।  परन्तु आज हिन्दीअपने ही घरों, में अंग्रेजी के आगे हार गई है।  इतने हिन्दी भाषियों के रहते आखिर कब तक अभिशप्त रहेगी हिन्दी ?

विदेशी हिन्दी सेवियों के अवदान : 

इस  हिन्दी  दिवस के महान अवसर पर  हिन्दी  के विद्वानों, लेखकों, साहित्कारों, आदि की बातें तो होंगी ही।  इनमें लगभग सभी हिन्दी पट्टी के ही होंगे।  क्या ही अच्छा हो कि इस अवसर पर हम उन हिन्दी सेवियों के अवदान को भी रेखांकित करें जो मूलत: भारतीय नहीं हैं।  उनकी मातृभाषा भी  हिन्दी  नहीं हैं, बावजूद इसके उन्होंने हिन्दी सीखी, आगे की पीढ़ी को भी पढ़ाया और अपनी रचनाओं से हिन्दी भाषा को समृद्ध किया।  

हिंदी सेवियों में पहला नाम फ़ादर कामिल बुल्के का सामने आता है।  वह आजीवन हिंदी की सेवा में जुटे रहे।  वे हिंदी अंग्रेजी शब्दकोश के निर्माण के लिए सामग्री जुटाने में सतत  प्रयत्नशील रहे।  उन्होंने इसमें 40 हजार नए शब्द जोड़े।  बाइबल का हिंदी अनुवाद भी किया।  वे रामचरित मानस के उदभट विद्वान थे और लगभग पूरा रामचरित मानस उन्हें कंठस्त था।  इसी क्रम में 85 साल की कात्सू सान भी आती हैं। वे 1956 में भारत आंई थी।  भारत को लेकर उनकी दिलचस्पी भगवान बौद्ध के कारण बढ़ी थी।  अब भारत ही उन्हें अपना देश लगता है और वे मानती है कि भारत संसार का आध्यात्मिक विश्व गुरु है। कात्सू जी ने हिन्दी काका साहेब कालेलकर जी से सीखी थी और 40 वर्ष पहले भारत की नागरिकता ग्रहण कर ली थी।  कुछ माह पहले राजधानी दिल्ली में संसद भवन की नई बनने वाली इमारत के भूमि पूजन के बाद सर्वधर्म प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया था। जिसमें बौद्ध , यहूदी, पारसी, बहाई , सिख, ईसाई , जैन, मुस्लिम और हिन्दू धर्मों की प्रार्थनाएं की गईं । 

ब्रिटेन से संबंधित जिलियन राइट का नाम भी सामने आता है। वे लंदन में बी.बी.सी. में भी काम करती थीं ।  सत्तर के दशक में भारत आने के बाद राही मासूम रज़ा के उपन्यास “आधा गाँव” व श्री लाल शुक्ला के उपन्यास “राग दरबारी” का अनुवाद अंग्रेजी में कर दिया।  भारत के चीन से संबंध कोई बहुत सौहार्दपूर्ण न भी रहे हों पर भारत चीन के हिन्दी  प्रेमी प्रो. च्यांग चिंगख्वेइ के प्रति सम्मान का भाव अवश्य ही रखता है।  वे दशकों से पेइचिंग यूनिवर्सिटी में हिन्दी पढ़ा रहे हैं।  साल 2014 में जब केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी (एन.डी.ए) की सरकार बनी तो हिन्दी भाषा को सरकारी कामकाज व विदेश नीति तक में तरजीह मिलने लगी।  अब नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी हिन्दी भाषा को प्राथमिकता दी जाने लगी है।  इंजीनियरिंग और मेडिकल शिक्षा पाठ्यक्रम भी हिंदी भाषा में शुरू किए जा रहे हैं।  हिन्दी के अच्छे दिन आने की संभावनाएं बढ़ती नज़र आ रही हैं और शायद हिन्दी को अपना वो अधिकार मिल सके जिसकी वह पिछले 74 वर्षों से हकदार थी।

इस निर्भया के लिए सरकार और जनता चुप क्यों है?

रमन विज, नयी दिल्ली:

दिल्ली में निर्भया के साथ दुष्कर्म करने के विरोध में सड़कों पर प्रदर्शन करने वाली आम जनता नहीं थी लेकिन सत्ता के लालची नेता और उनके समर्थन करने वाले गुंडे ही थे। यह कहना कोई गलत नहीं होगा आज का समय देखकर दिल्ली निर्भया कांड के बाद आए दिन एक निर्भया कांड होता है लेकिन बड़े दुख की बात है न सरकार और ना उनके समर्थन करने वाले कभी सड़क पर नजर नहीं आते हैं। तो इससे तो यह साबित होता है कि सरकार और उनके समर्थन करने वाले दोनों गुंडे ही हैं।

गोदी मीडिया भी इस खबर को 24 घंटे तक चला नहीं पा रही है क्योंकि समाज में देश में उसे जहर फैलाने से फुर्सत ही नहीं है। उसे तो बस पाकिस्तान अफगानिस्तान यही करना है हमारे समाज में हमारी बेटियों के साथ क्या हो रहा है इससे इस गोदी मीडिया जो गुंडों के हाथ बिकी हुई है कोई लेना-देना नहीं।

संगम विहार से परिवार वाले थाना गए कलेक्टर के पास गए लेकिन वहां से अभी तक कोई मदद नहीं मिली और न मिलने की उम्मीद नजर आ रही है हम अपने समाज को इस गंदी राजनीति के चक्कर में कहां से कहां ले कर जा रहे हैं। ठीक है आप किसी भी पार्टी को समर्थन दो यह आपकी अपनी स्वीकृति है लेकिन जब समाज में बहू बेटी पर कोई आंच आए तो इसी समाज को आगे आना चाहिए ना की कोई राजनैतिक पार्टी को गाली देना हो तो हम इकट्ठा होकर मशाले जलाकर रोड पर हंगामा करते हुए नजर आते हैं,

अभी हम पाकिस्तान अफगानिस्तान के लिए रोड पर हंगामा करते हैं, तो क्या आज हम अपनी बहन बेटी बहू के लिए सरकार से न्याय नहीं मांग सकते हैं? क्या हमारा अस्तित्व इतना नीचे गिर गया कि हमें पार्टी से ऊपर कुछ दिखाई नहीं देता?

मैं, रमन विज, केंद्र सरकार से यह पूछना चाहता हूं कि आप पूरे बहुमत से हिंदुस्तान में सरकार चला रहे हैं तो क्या आप विपक्ष को बस गाली देने के लिए सत्ता में बैठे हुए हैं? यह झूठ है भाषण देने के लिए हो आप ही भाषण देते हो, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ तो इस पर आपका मुंह क्यों नहीं खुल रहा हमारे यहां दिल्ली में ही कई महिला सांसद हैं क्या उन्हें दुख नहीं दिखाई दे रहा उन्हें तकलीफ नहीं हो रही यह सब देख कर ₹5 सिलेंडर पर बढ़ता था तो यह लोग रोड पर तांडव करती नजर आती थी विपक्ष को चूड़ियां और सारी भेजती थी आज इनके लिए क्या भेजा जाए?

निजीकरण व्यवस्था नहीं बल्कि पुनः रियासतीकरण है..

रमन विज, नई दिल्ली :

मात्र 70 साल में ही बाजी पलट गई। जहाँ से चले थे उसी जगह पहुंच रहे हैं हम। फर्क सिर्फ इतना कि दूसरा रास्ता चुना गया है और इसके परिणाम भी ज्यादा गम्भीर होंगे।

1947 जब देश आजाद हुआ था। नई नवेली सरकार और उनके मंन्त्री देश की रियासतों को आजाद भारत का हिस्सा बनाने के लिए परेशान थे। तकरीबन 562 रियासतों को भारत में मिलाने के लिए साम दाम दंड भेद की नीति अपना कर अपनी कोशिश जारी रखे हुए थे। क्योंकि देश की सारी संपत्ति इन्हीं रियासतों के पास थी।

कुछ रियासतों ने नखरे भी दिखाए, मगर कूटनीति और चतुरनीति से इन्हें आजाद भारत का हिस्सा बनाकर भारत के नाम से एक स्वतंत्र लोकतंत्र की स्थापना की। और फिर देश की सारी संपत्ति सिमट कर गणतांत्रिक पद्धति वाले संप्रभुता प्राप्त भारत के पास आ गई।

धीरे धीरे रेल, बैंक, कारखानों आदि का राष्ट्रीयकरण किया गया और एक शक्तिशाली भारत का निर्माण हुआ ।

मात्र 70 साल बाद समय और विचार ने करवट ली है। फासीवादी ताकतें पूंजीवादी व्यवस्था के कंधे पर सवार हो राजनीतिक परिवर्तन पर उतारू है। लाभ और मुनाफे की विशुद्ध वैचारिक सोच पर आधारित ये राजनीतिक देश को फिर से 1947 के पीछे ले जाना चाहती है। यानी देश की संपत्ति पुनः रियासतों के पास…….!

लेकिन ये नए रजवाड़े होंगे कुछ पूंजीपति घराने और कुछ बड़े बडे राजनेता, निजीकरण की आड़ में पुनः देश की सारी संपत्ति देश के चन्द पूंजीपति घरानो को सौंप देने की कुत्सित चाल चली जा रही है। उसके बाद क्या ..?

निश्चित ही लोकतंत्र का वजूद खत्म हो जाएगा। देश उन पूंजीपतियों के अधीन होगा जो परिवर्तित रजवाड़े की शक्ल में सामने उभर कर आयेंगे। शायद रजवाड़े से ज्यादा बेरहम और सख्त।

क्यों झूठ बोलते हो साहब चरखे से आज़ादी आई थी

“मैं बहुत गरीब हूँ , मेरे पास मेरी भारत माँ को देने के लिए कुछ नहीं था सिवा मेरे प्राणों के, जिसे आज मैं दे रहा हूँ”….“खुदीरामबोस” ऐसे देश प्रेमी,स्वदेशी प्रेमी क्रांतिकारी, जिसने 18वर्ष 8 महीने 8 दिन की अल्पायु में शहादत दी, आज पुण्यतिथि पर भावपूर्ण स्मरण, “जय हिंद” “जय भारत” 8 जून, 1908 को उन्हें अदालत में पेश किया गया और 13 जून को उन्हें मौत की सजा सुनाई गई। 11 अगस्त, 1908 को उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया। जब जज ने फैसला पढ़कर सुनाया तो खुदीराम बोस मुस्कुरा दिए। जज को ऐसा लगा कि खुदीराम सजा को समझ नहीं पाए हैं, इसलिए मुस्कुरा रहे हैं। कन्फ्यूज होकर जज ने पूछा कि क्या तुम्हें सजा के बारे में पूरी बात समझ आ गई है। इस पर बोस ने दृढ़ता से जज को ऐसा जवाब दिया जिसे सुनकर जज भी स्तब्ध रह गया। उन्होंने कहा कि न सिर्फ उनको सिर्फ फैसला पूरी तरह समझ में आ गया है, बल्कि समय मिला तो वह जज को बम बनाना भी सिखा देंगे।

स्वतन्त्रता संग्राम/इतिहास, डेमोक्रेटिकफ्रंट॰कॉम – चंडीगढ़ :

आजादी की लड़ाई का इतिहास क्रांतिकारियों के त्याग और बलिदान के अनगिनत कारनामों से भरा पड़ा है। क्रांतिकारियों की सूची में ऐसा ही एक नाम है खुदीराम बोस का, जो शहादत के बाद इतने लोकप्रिय हो गए कि नौजवान एक खास किस्म की धोती पहनने लगे जिनकी किनारी पर ‘खुदीराम’ लिखा होता था।

11 अगस्त, आज ही के दि‍न खुदीराम बोस देश की आजादी के लि‍ए शहीद हुए थे। आइए, उनकी वीर गाथा के बारे में जानें और उन्‍हें याद करें। कुछ इतिहासकार उन्हें देश के लिए फांसी पर चढ़ने वाला सबसे कम उम्र का देशभक्त मानते हैं।

खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर 1889 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर में त्रैलोक्यनाथ बोस के घर हुआ था। खुदीराम को आजादी हासिल करने की ऐसी लगन लगी कि 9वीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़कर वे स्वदेशी आंदोलन में कूद पड़े। इसके बाद वे रिवॉल्यूशनरी पार्टी के सदस्य बने और ‘वंदेमातरम्’ लिखे पर्चे वितरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में चले आंदोलन में भी उन्होंने बढ़-चढ़कर भाग लिया। उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों के चलते 28 फरवरी 1906 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन वे कैद से भाग निकले। लगभग 2 महीने बाद अप्रैल में वे फिर से पकड़े गए। 16 मई 1906 को उन्हें रिहा कर दिया गया।

6 दिसंबर 1907 को खुदीराम ने नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर बंगाल के गवर्नर की विशेष ट्रेन पर हमला किया, परंतु गवर्नर बच गया। सन् 1908 में खुदीराम ने दो अंग्रेज अधिकारियों वाट्सन और पैम्फायल्ट फुलर पर बम से हमला किया लेकिन वे भी बच निकले। खुदीराम बोस मुजफ्फरपुर के सेशन जज किंग्सफोर्ड से बेहद खफा थे जिसने बंगाल के कई देशभक्तों को कड़ी सजा दी थी।उन्होंने अपने साथी प्रफुल्लचंद चाकी के साथ मिलकर किंग्सफोर्ड को सबक सिखाने की ठानी। दोनों मुजफ्फरपुर आए और 30 अप्रैल 1908 को सेशन जज की गाड़ी पर बम फेंक दिया लेकिन उस गाड़ी में उस समय सेशन जज की जगह उसकी परिचित दो यूरोपीय महिलाएं कैनेडी और उसकी बेटी सवार थीं।

किंग्सफोर्ड के धोखे में दोनों महिलाएं मारी गईं जिसका खुदीराम और प्रफुल चंद चाकी को काफी अफसोस हुआ। अंग्रेज पुलिस उनके पीछे लगी और वैनी रेलवे स्टेशन पर उन्हें घेर लिया। अपने को पुलिस से घिरा देख प्रफुल चंद चाकी ने खुद को गोली से उड़ा लिया जबकि खुदीराम पकड़े गए। मुजफ्फरपुर जेल में 11 अगस्त 1908 को उन्हें फांसी पर लटका दिया गया। उस समय उनकी उम्र सिर्फ 19 साल थी।

देश के लिए शहादत देने के बाद खुदीराम इतने लोकप्रिय हो गए कि बंगाल के जुलाहे एक खास किस्म की धोती बुनने लगे। इतिहासवेत्ता शिरोल ने लिखा है- ‘बंगाल के राष्ट्रवादियों के लिए वह वीर शहीद और अनुकरणीय हो गया। विद्यार्थियों तथा अन्य लोगों ने शोक मनाया। कई दिन तक स्कूल बंद रहे और नौजवान ऐसी धोती पहनने लगे जिनकी किनारी पर खुदीराम लिखा होता था।’

तुम अख़बार हो तो बेखबर मैं भी नहीं

‘पुरनूर’ कोरल, चंडीगढ़ :

मीडिया में बाज़ार का दखल प्रत्यक्ष रूप में बढ़ता जा रहा है हालांकि कुछ अखबारें हमेशा से ही स्वयं को उपभोग वस्तु की श्रेणी में शामिल करती रही है जैसे कि लिख देना अ प्रोडक्ट ऑफ ….। लेकिन खबरों से ज़्यादा विज्ञापनों को स्थान देने के लिए अखबार के पन्नों में इज़ाफ़ा कर दिया गया।

अब अखबार मिशन नहीं व्यवसाय बन गया है । आजकल मिशन रखने वाले पत्रकारों को पागल कहते हैं अखबार रंगदार हो गए। धन और ताकत का स्रोत बन गए हैं । असल मे वर्ष 1995 में तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने उदारीकरण के नाम पर अर्थव्यवस्था खोल दी थी यह उसी का नतीजा है।

अमर्यादित तरीके से विज्ञापन हथियाने के लिए राजनेताओं और व्यवसायियों की चाटूकारिता करना , जहाँ ये न चले वहाँ ब्लैकमेलिंग के हथियार खुलकर इस्तेमाल किये जाते हैं।

बहुत बदल गया है मीडिया

आज माँ से बात कर रही थी तो उन्होंने बताया कि पहले सम्पादक स्वयं एक संस्था होते थे जो अब कमज़ोर हो गई पहले सम्पादक अपने संवादाताओं से अक्सर कहते थे इन विज्ञापन वालों से दूर रहना । बहुत चिढ़ते थे अखबार की मार्केटिंग टीम से लेकिन अब सब बदल गया। अखबारों के प्रबंधन किसी सम्पादक की नियुक्ति के समय टारगेट बाँध देते है और इसी तरह सम्पादक भी अपने अधीनस्थ पत्रकारों के टारगेट फिक्स कर देते हैं। जनरल मैनेजर (मार्केटिंग) सम्पादक का पर्याय बन गया है।

मीडिया में बाज़ारवाद का प्रभाव इस कद्र बढ़ गया है कि दौलत का अंबार ठिकाने लगाने के लिए इन संस्थाओं द्वारा अलग नामों से नित्य नए अखबार और चैनल चलाये जा रहे हैं।

एक और चीज़ ” मीडिया ट्रायल”

बहुत ही भयानक साबित होता है कई बार। हालांकि कई मामलों में यह कारगार भी साबित हुआ लेकिन ज़्यादातर सेल्फ स्टाइल्ड जासूसी पत्रकार जल्दबाजी में कानूनी प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं।

समाचारों और विचारों में बाज़ार इस कदर हावी है कि ख़बर और विज्ञापन में अन्तर कर पाना मुश्किल लगता है। यहाँ तक कि कुछ अख़बार तो श्राद्ध पक्ष के दौरान भी पुष्य नक्षत्र के आगमन के प्रायोजित समाचार छापकर पाठकों को बेवकूफ़ बनाने से बाज नहीं आते. तमाम अख़बार ख़रीदारी के लिए तरह-तरह के मेले लगाने को अपना परम कर्त्तव्य मान बैठे हैं. यह पाठकों के खिलाफ़ एक गहरी मीडियाई साजिश है।

रौनकें कहाँ दिखायी देती हैं अब पहले जैसी,
अख़बारों के इश्तेहार बताते हैं, कोई त्यौहार आया है!

ज्येष्ठ अमावस्या, 2021

ज्येष्ठ अमावस्या यह हिन्दी कैलेंडर का ज्येष्ठ महीना चल रहा है। इस महीने में पड़ने वाले अमावस्या तिथि को ज्येष्ठ अमावस्या कहते हैं। शास्त्रों में ज्येष्ठ अमावस्या का बड़ा महत्व है। दरअसल ज्येष्ठ अमावस्या के दिन ही शनि जयंती और वट सावित्री व्रत का पर्व मनाया जाता है।

ज्येष्ठ माह में आने वाली 15वीं तिथि ज्येष्ठ अमावस्या कहलाती है। हिंदू धर्म में ज्येष्ठ अमावस्या का खास महत्व होता है. इस साल ज्येष्ठ अमावस्या10 जून को मनाई जाएगी।ज्येष्ठ अमावस्या के मौके पर भगवान शिव-पार्वती, विष्णुजी और वट वृक्ष की पूजा की परंपरा है। अमावस्या के दिन स्नान और दान का काफी महत्व होता है।

धर्म/संस्कृति डेस्क, डेमोक्रेटिकफ्रंट॰कॉम :

हिन्दी पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि का प्रारंभ 9 जून 2021 दिन बुधवार को दोपहर 01 बजकर 57 मिनट से हो रहा है, जिसका समापन 10 जून 2021 दिन गुरुवार को शाम 04 बजकर 20 मिनट पर हो रहा है। स्नान दान के लिए उदया तिथि आज 10 जून को प्राप्त हो रही है। ऐसे में ज्येष्ठ अमावस्या 10 जून को है। इस दिन ही धार्मिक कार्य किए जाएंगे।

ज्येष्ठ अमावस्या के दौरान स्नान करने को महत्वपूर्ण बताया गया है। प्राचीन काल से यह परंपरा चली आ रही है. तीर्थ स्नान के बाद सूर्य को अर्घ्य देकर पितरों की शांति के लिए तर्पण किया जाता है। इसके बाद ब्राह्मण भोजन और जल दान का संकल्प लेना चाहिए। इस दिन अन्न और जल दान करने से पितर संतुष्ट होते हैं, जिससे परिवार में समृद्धि आती है। इस दिन स्नान करने से नकारात्मक तत्व दूर होते हैं और मानसिक बल मिलता है. ज्येष्ठ अमावस्या के मौके पर आइए जानते हैं कौन सी चीजें नहीं करनी चाहिए।

ज्येष्ठ अमावस्या की पूजा

अमावस्या के दिन प्रात: पवित्र नदी, जलाशय अथवा कुंड आदि में स्नान करना चाहिए। हालांकि इस समय महामारी का समय है, तो आप घर पर ही स्नान कर लें, यह उत्तम रहेगा। चाहें तो बाल्टी के पानी में गंगा जल डालकर स्नान कर सकते हैं। इस दिन सूर्य देव को अर्घ्य देने के बाद पितरों का तर्पण करना चाहिए। तांबे के पात्र में जल, लाल चंदन और लाल रंग के पुष्प डालकर सूर्य देव को अर्घ्य देना चाहिए। पितरों की आत्मा की शांति के लिए उपवास करें। अमावस्या के दिन किसी गरीब व्यक्ति को दान-दक्षिणा दें।

ज्येष्ठ अमावस्या क्यों है खास

हिन्दू पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ अमावस्या के दिन शनि जयंती और वट सावित्री व्रत रखा जाता है। इस बार ज्येष्ठ अमावस्या खास है क्योंकि इसी दिन सूर्य ग्रहण भी लग रहा है। यह इस साल का पहला सूर्य ग्रहण होगा। ग्रहण दोपहर 01:42 बजे से शुरू होगा, जो शाम 06:41 बजे समाप्त होगा।

  • ज्येष्ठ अमावस्या के दिन अगर आपके घर में कई गरीब मांगने वाला आता है तो उसे कभी भी मना नहीं करना चाहिए या खाली हाथ लौटाना नहीं चाहिए. उसे घर में बैठाएं और भोजन कराएं.
  • ज्येष्ठ अमावस्या को शनि जयंती के नाम से भी जाना जाता है इसलिए शनिदेव का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए इस दिन तन और मन से शुद्धता बनाए रखनी चाहिए. इस दिन भूलकर भी मांस-मदिरा के सेवन करने से बचना चाहिए. वरना शनिदेव नाराज हो सकते हैं.
  • ज्येष्ठ अमावस्या के दिन महिलाओं को बाल खोलकर नहीं रहना चाहिए. ऐसा अशुभ माना जाता है. अमावस्या की तिथि पर महिलाओं को हमेशा अपना बाल बांधकर रखने चाहिए.
  • ज्येष्ठ अमावस्या के दिन लोहा, कांच या सरसों का तेल आदि शनि से संबंधित किसी भी चीज की खरीदारी नहीं करनी चाहिए, ऐसा करना अशुभ बताया गया है. इन चीजों पर शनि व राहु-केतु का संबंध माना गया है.

यूपी भाजपा में घमासान क्या योगी के बिना संभव है मिशन 2024 ?

अरविंद शर्मा वाराणसी मॉडल तैयार कर सकते हैं या लखनऊ में बैठकर सूबे के बाकी जिलों पर भी नजर रख सकते हैं, लेकिन बीजेपी को लेकर जनता में योगी आदित्यनाथ जैसी खलबली नहीं मचा सकते – न ही वैसा जोश भर सकते हैं जिसकी बीजेपी को यूपी में अभी ही नहीं अगले आम चुनाव तक जरूरत पड़ेगी। कयास तो योगी आदित्यनाथ की कुर्सी पर खतरे के भी लगाये जा रहे थे, लेकिन लगता है पर ये संभावना कम है. वैसे भी लाख दिक्कतों के बावजूद बीजेपी अभी इस स्थिति में तो बिलकुल नहीं है कि उत्तराखंड की तरह यूपी में मुख्यमंत्री बदलने के बारे में सोच सके।

सारिका तिवारी:

यूपी विधानसभा चुनाव में अब महज नौ महीने ही बचे हैं और बीजेपी के लिए यूपी विधानसभा चुनाव जीतने का मकसद सिर्फ सत्ता में वापसी भर नहीं है, बल्कि अगले आम चुनाव के लिए भी मजबूत दावेदारी सुनिश्चित करना भी है। ये बात बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा हाल ही में यूपी के बीजेपी सांसदों के साथ वर्चुअल मुलाकात में भी कह चुके हैं। देश के बाकी सांसदों की ही तरह जेपी नड्डा यूपी मे सांसदों को भी बाहर निकल कर लोगों के बीच जाने और उनकी समस्याएं सुनने और आश्वस्त करने की सलाह दे चुके हैं।

अब योगी आदित्यनाथ की कैबिनेट में वैसे ही पूर्व नौकरशाह अरविंद शर्मा के शामिल होने और बड़ी जिम्मेदारी दिये जाने की चर्चा जोरों पर है। ध्यान देने वाली बात ये है कि योगी कैबिनेट में भी अगर ऐसा ही बदलाव होता है तो वो भी मोदी की ही मर्जी से होगी, न कि योगी की पसंद से। भाजपा ऐसी पार्टी है जो सूत्रों पर आधारित जिसके नाम की भी खबरें चलने लगती हैं पार्टी उसे मंत्रीमंडल में शामिल करने का इरादा कर भी रही होती है तो उसका नाम इस अवसर से कट जाता है। ऐसा कई बार हो चुका है आडवाणी और मनोज सिन्हा को कौन भूल सकता है हालांकि ऐसे दांव-पेंच में एके शर्मा जैसी शख्सियत की संभावित जिम्मेदारियों का रास्ता रोकने का कोई साहस नहीं कर सकता। क्योंकि ये बात तो सोलह  आने सही है कि वो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के करीबी, पसंदीदा और विश्वसनीय हैं।

 सियासी गलियारों में ये कहावत बहुत प्रसिद्ध है कि दिल्ली का रास्ता उत्तरप्रदेश से होकर जाता है। जवाहर लाल नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक सभी का संबंध उत्तरप्रदेश से रहा है। यहां तक कि जब प्रधानमंत्री बनने की बात आई तो लंबे समय तक गुजरात के मुख्यमंत्री रह चुके नरेंद्र मोदी को भी उत्तरप्रदेश का ही रुख करना पड़ा। 90 के दशक में जब राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस पार्टी की स्थिति डगमगाई तब क्षेत्रीय दलों ने मिलकर दिल्ली की राजनीति में महत्ता हासिल कर ली। ऐसे मे भी उनकी राजनीति में भी प्रधानमंत्री पद के लिए प्रमुखता से उत्तरप्रदेश से ही कई नाम रहे। एक बार फिर बीजेपी के अंदरखाने सियासी गलियारों में घमासान मचा है, जिससे अटकलों का दौर चल पड़ा है।

लेकिन क्या ये सियासी घमासान 2022 को टारगेट करके हो रहा है या फिर 2024 की केंद्रीय राजनीति का प्लॉट तैयार हो रहा है। राजनीति में राजनेता दूर की सोचकर निर्णय लेते हैं. शह-मात का खेल चलता रहता है और अचानक से कोई विजयी की भूमिका में सामने आ जाता है। सियासी चर्चाओं के बीच उत्तर प्रदेश में चुनावी वर्ष की शुरुआत हो चुकी है। जीत कैसे मिले इस पर काम चल रहा है। रणनीतिक तैयारियों के तहत बीजेपी के राष्ट्रीय महामंत्री संगठन बीएल संतोष और यूपी प्रभारी राधामोहन सिंह की रिपोर्ट केंद्रीय नेतृत्व के पास पहुंच चुकी है। रिपोर्ट मिलने के बाद राधामोहन सिंह दोबारा लखनऊ का दौरा करते हैं।

राजभवन में मुलाकात के पीछे गहरे मायने

राजभवन पहुंचकर राज्यपाल से मिलते हैं फिर बाहर आकर बताते हैं कि शिष्टाचार मुलाकात थी। उसी दिन वे विधानसभा अध्यक्ष से भी मिलते हैं और उसे पुराने संबंधों के आधार पर की गई मुलाकात बताते हैं। विधानसभा अध्यक्ष हृदयनारायण दीक्षित कहते हैं कि दोनों नेताओं में राष्ट्रवाद और प्राचीन इतिहास पर बात हुई है। एक दिन में दो संवैधानिक पदों पर बैठे हुए व्यक्तियों से मुलाकात के गहरे मायने हो सकते हैं। क्या पार्टी सदन में किसी विषम परिस्थिति में आने वाली है। प्रदेश मे अंदरखाने पक रही खिचड़ी के सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार के विक्रम राव 1982 का दौर याद करते हैं और कहते हैं कि 1982 में विश्वनाथ प्रताप सिंह उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे और श्रीपति मिश्र विधानसभा अध्यक्ष हुआ करते थे।

सियासत दांव पेंच का खेल

वे उन दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि बेहमई कांड हो चुका था। कानून-व्यवस्था पर सवाल उठने शुरू हुए थे. डकैतों पर कार्रवाई चल रही थी, इसी बीच वीपी सिंह के भाई की डकैतों ने हत्या कर दी और वीपी सिंह ने मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया था और तब एकदम से विधानसभा अध्यक्ष श्रीपति मिश्र मुख्यमंत्री बना दिए गए थे और बाद मे वीपी सिंह को केंद्रीय राजनीति मे लेकर मंत्री बना दिया गया. वे कहते हैं कि सियासत दांव पेंच के साथ ही संयोगों का खेल भी है जिससे कोई भी नई स्थिति उभरकर सामने आ सकती है जिसके बारे मे आमतौर पर सोचा भी नहीं जा सकता।

राजस्थान के व्यापारियों दुकानदारों जागो और सारे बाजार खुलने का ज्ञापन अभी दो

करणीदानसिंह राजपूत

राजस्थान में लॉकडाउन 8 जून सुबह तक बढाए जाने की गाइड लाइन में लिखा है कि जहां स्थिति सुधार पर होगी वहां 1 जून से छूट दी जाएगी। राजस्थान में किराना व्यापारियों की दुकानें पहले 5 दिन खुलती थी अब 4 दिन की अनुमति दी गई है लेकिन बाकी दुकानें बंद है और उन में पड़ा हुआ माल रेत गर्द में खराब हो रहा है।

कोरोना के विस्तार को रोकने के लिए हमेशा ही बाजार बंद का फैसला पहले नंबर पर रखा जाता रहा। व्यापारी संगठन अपनी आवाज नहीं उठा पाए। इस कमजोरी के कारण ही प्रशासन और शासन का पहला काम बाजार बंद करवाना रहा। बाजार में कुछ संख्या आती है जबकि सैकड़ों गुना संख्या शहर में होती है। शहर में मोहल्लों में गलियों में घूमने पर कानून कायदे तोड़ने पर कोई नियंत्रण नहीं है। कोई देख रेख नहीं है। बस!प्रशासन का आदेश व्यापारियों पर लागू हो जाता है। 

अब 8 जून तक के लॉक डाउन की गाइड लाइन में 1 जून से सुविधाएं शुरू होंगी जहां पर प्रशासन मानेगा की सब कुछ ठीक-ठाक है। अगर व्यापारी संगठन चुप रहे अपने आवाज को बुलंद नहीं कर पाए तो किराना के अलावा अन्य बहुत सी दुकानें बंद ही रहेंगी। सच तो यह है कि जो दुकाने अब बंद पड़ी हैं उनके बिना भी व्यक्ति का काम नहीं चल सकता। उनका खोला जाना भी अति आवश्यक है। 

व्यापारी कमजोर इसलिए पड़ रहा है कि उसने कभी भी यह नहीं कहा कि दुकानों से कोरोना नहीं फैला। दुकानदारों ने कोरोना नहीं फैलाया। यह दुकानदारों की बहुत बड़ी कमजोरी रही है। अब भी दुकानदारों और  व्यापारिक संगठनों का जागना बहुत जरूरी है।

श्री गंगानगर में संयुक्त व्यापार संगठन की ओर से जिला कलेक्टर को समस्त बाजार खोलने की मांग रखी गई है। यह कदम बहुत ही अच्छा और पहल करने वाला है। जिला कलेक्टर व उपखंड अधिकारी ही तय करेंगे कि 1 जून को बाजार कहां कहां खोला जा सकता है। 

राजस्थान के अन्य स्थानों के जिला मुख्यालय के संगठनों को अपने अपने जिला कलेक्टरों को आजकल में ही सारा बाजार खोलने का ज्ञापन दे देना चाहिए।  जहां उपखंड है वहां व्यापारिक संगठनों को उपखंड अधिकारी और जिला कलेक्टर दोनों को ही ज्ञापन 1 जून से छूट और पूरा बाजार खुलने की अनुमति प्रदान करने का आज ही दे दिया जाना चाहिए।

* व्यापारिक संगठन यह कोशिश रखें कि बाजार में मास्क और सोशल डिस्टेंस की शत प्रतिशत पालना हो सके और कोई चालान नहीं हो। चालान हों तो बहुत कम हो। तब प्रशासन के सामने बाजार खोलने से इनकार करने का कोई बिंदु नहीं रहेगा। 

रिपोर्ट यह आनी चाहिए कि फलां जगह बाजारों में दुकानदारों ने नागरिकों ने मास्क लगाने और सोशल डिस्टेंस 2 गज की दूरी का पूरा पूरा पालन किया है।  यह एक बहुत बड़ा प्रमाण होगा और 1 जून को किराना व्यापार के अलावा भी अन्य बहुत से व्यापार शुरू हो सकेंगे।

बाजार बंद रहने से सभी के धंधे चौपट हो रहे हैं और अपने घर की पूंजी को ही लोग खा कर के खत्म कर रहे हैं। सभी बर्बादी के कगार पर हैं इसलिए आजकल में ही अपने क्षेत्र के उपखंड अधिकारी जिला कलेक्टर आदि को 1 जून से बाजार खोलने का ज्ञापन जरूर दें।अपने क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों विधायकों, सांसद आदि को भी ज्ञापन जरूर दें और अपने साथ खड़ा रखें।

बाजार खोले जाने का समय सुबह 6 से 11 के बजाय उपयुक्त समय 9 बजे से शाम 7 बजे तक तो अवश्य हो।

ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण में नरेन्द्र मोदी एवं अमितशाह को तो आमंत्रित करना चाहिए था

करणीदानसिंह राजपूत, सूरतगढ़:

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने हैट्रिक जीत दर्ज कर इतिहास रच दिया। ममता ने महत्वपूर्ण इतिहास रचा है और भाजपा के बड़बोले नेताओं को ऐसी पटखनी दी है कि वे पांच साल तक अपनी चोटों से कराहते रहेंगे।

यह जीत इसलिए मायने रखती है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी,गृहमंत्री अमितशाह और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी.नड्डा ने ममता को हराने के लिए सब कुछ किया। ममता हारी नहीं और जे.पी.नड्डा जैसे दिग्गज धरना लगाने वाले स्तर पर पहुंच गए।

टीएमसी की मुखिया ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के तौर पर आज यानि बुधवार को राजभवन में शपथ ग्रहण करेंगी। कोविड-19 महामारी के चलते शपथ ग्रहण समारोह बेहद सादगी भरा होगा। 

बताया जा रहा है कि शपथ ग्रहण समारोह के लिए पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, निवर्तमान सदन के नेता प्रतिपक्ष अब्दुल मन्नान और माकपा के वरिष्ठ नेता बिमान बोस को कार्यक्रम का निमंत्रण भेजा गया है। 

ममता का मुख्यमंत्री पद की शपथ का समारोह चाहे कितना साधारण रखा गया हो उसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को तो जरूर बुलाना था। जो कहते थे कि 2 म ई को दीदी गई,उन्हें दिखलाना था कि दीदी नहीं गई। 

इधर, बंगाल में हिंसा की खबरों के बीच भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और दिलीप घोष धरना भी देंगे। 

 देश में कोविड-19 महामारी की वर्तमान परिस्थितियों के मद्देनजर अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों और अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं को समारोह में आमंत्रित नहीं किया गया है। उन्होंने कहा, ‘कोविड-19 महामारी को देखते हुए ममता बनर्जी के शपथ ग्रहण समारोह को बेहद साधारण रखने का निर्णय लिया गया है। 

बुधवार को केवल ममता बनर्जी अकेले शपथ लेंगी। यह बेहद संक्षिप्त कार्यक्रम होगा।’ 

तृणमूल कांग्रेस के सूत्रों ने कहा कि राजभवन में पांच मई को सुबह 10:45 बजे होने वाले शपथग्रहण समारोह में पार्टी सांसद अभिषेक बनर्जी, चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर और पार्टी के वरिष्ठ नेता फिरहाद हाकिम के भी शामिल होने की उम्मीद है। 

सूत्रों ने कहा कि शपथ ग्रहण करने के तुरंत बाद ममता बनर्जी राज्य सचिवालय जाएंगी, जहां उन्हें कोलकाता पुलिस सलामी देगी। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी 292 में से 213 सीटें जीतकर लगातार तीसरी बार सत्ता में आई है। बीजेपी को 77 सीटों पर जीत हासिल हुई है। वहीं, दो सीटों पर अन्य ने जीत दर्ज की है।

इधर चुनावी नतीजों के बाद से बंगाल में जारी हिंसा की खबरों के बीच भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा कोलकाता पहुंचे हैं। बंगाल में हिंसा के खिलाफ भाजपा आज यानी बुधवार को पूरे देशभर में धरना देगी। कोलकाता में जेपी नड्डा और दिलीप घोष खुद धरने पर बैठेंगे। इससे पहले भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा ने मंगलवार को कहा गया कि पश्चिम बंगाल में चुनाव बाद हुई व्यापक हिंसा ने उन अत्याचारों की याद दिला दी है जिसका सामना लोगों को देश के विभाजन के दौरान करना पड़ा था। नड्डा ने राज्य में पार्टी कार्यकर्ताओं को ”क्रूरता के विरूद्ध लोकतांत्रिक तरीके से लड़ने के लिए प्रेरित किया।

कौन हैं ममता बनर्जी

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी के शानदार प्रदर्शन के बाद ममता बनर्जी की छवि एक ऐसे सैनिक और कमांडर के रूप में बनी है जिसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा की चुनावी युद्ध मशीन को भी हरा दिया। तीसरी बार की यह जीत न सिर्फ राज्य में बनर्जी की स्थिति को और मजबूत करेगी, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने में भी मदद करेगी।

2019 से पहले बिना चुनौती के दीदी ने किया शासन

ममता बनर्जी ने एक दशक से अधिक पहले सिंगूर और नंदीग्राम में सड़कों पर हजारों किसानों का नेतृत्व करने से लेकर आठ साल तक राज्य में बिना किसी चुनौती के शासन किया। आठ साल के बाद उनके शासन को 2019 में तब चुनौती मिली जब भाजपा ने पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव में 18 सीटों पर अपना परचम फहरा दिया। ममता बनर्जी (66) ने अपनी राजनीतिक यात्रा को तब तीव्र धार प्रदान की जब उन्होंने 2007-08 में नंदीग्राम और सिंगूर में नाराज लोगों का नेतृत्व करते हुए वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ राजनीतिक युद्ध का शंखनाद कर दिया। इसके बाद वह सत्ता के शक्ति केंद्र ‘नबन्ना तक पहुंच गई।

यूपीए और एनडीए में भी बनीं मंत्री

पढ़ाई के दिनों में बनर्जी ने कांग्रेस स्वयंसेवक के रूप में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी। यह उनके करिश्मे का ही कमाल था कि वह संप्रग और राजग सरकारों में मंत्री बन गईं। राज्य में औद्योगीकरण के लिए किसानों से ‘जबरन भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर वह नंदीग्राम और सिंगूर में कम्युनिस्ट सरकार के खिलाफ दीवार बनकर खड़ी हो गईं और आंदोलनों का नेतृत्व किया। ये आंदोलन उनकी किस्मत बदलने वाले रहे और तृणमूल कांग्रेस एक मजबूत पार्टी के रूप में उभरकर सामने आई। बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होने के बाद जनवरी 1998 में तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की और राज्य में कम्युनिस्ट शासन के खिलाफ संघर्ष करते हुए उनकी पार्टी आगे बढ़ती चली गई।

2011 में लेफ्ट की सरकार को उखाड़ फेंका था

पार्टी के गठन के बाद राज्य में 2001 में जब विधानसभा चुनाव हुआ तो तृणमूल कांग्रेस 294 सदस्यीय विधानसभा में 60 सीट जीतने में सफल रही और वाम मोर्चे को 192 सीट मिलीं। वहीं, 2006 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की ताकत आधी रह गई और यह केवल 30 सीट ही जीत पाई, जबकि वाम मोर्चे को 219 सीटों पर जीत मिली। वर्ष 2011 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की पार्टी ने ऐतिहासिक रूप से शानदार जीत दर्ज करते हुए राज्य में 34 साल से सत्ता पर काबिज वाम मोर्चा सरकार को उखाड़ फेंका। उनकी पार्टी को 184 सीट मिलीं, जबकि कम्युनिस्ट 60 सीटों पर ही सिमट गए। उस समय वाम मोर्चा सरकार विश्व में सर्वाधिक लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली निर्वाचित सरकार थी।

पांच बार लोकसभा सांसद भी रह चुकी हैं दीदी

ममता बनर्जी अपनी पार्टी को 2016 में भी शानदार जीत दिलाने में सफल रहीं और तृणमूल कांग्रेस की झोली में 211 सीट आईं। इस बार के विधानसभा चुनाव में बनर्जी को तब झटके का सामना करना पड़ा जब उनके विश्वासपात्र रहे शुभेन्दु अधिकारी और पार्टी के कई नेता भाजपा में शामिल हो गए। बंगाली ब्राह्मण परिवार में जन्मीं बनर्जी पार्टी के कई नेताओं की बगावत के बावजूद अंतत: अपनी पार्टी को तीसरी बार भी शानदार जीत दिलाने में कामयाब रहीं। इस चुनाव में भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी, लेकिन बनर्जी एक ऐसी सैनिक और कमांडर निकलीं जिन्होंने भगवा दल की चुनावी युद्ध मशीन को पराजित कर दिया। वह 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 में कोलकाता दक्षिण सीट से लोकसभा सदस्य भी रह चुकी हैं।

कोरोना विशेष: बाजारों को बंद रखना इसलिए है जरूरी

करणीदान सिंह, सूरतगढ़:

करणीदान सिंह, सूरतगढ़:

शासन और प्रशासन की दृष्टि में तो यह माना जा रहा है कि धर्म और चुनाव रैलियों जिनमें लाखों लोग एक दूजे से सटे हुए भी कोरोना नहीं फैलाते। राजनीतिक लोग कार्यक्रम करते हैं वहां से भी कोरोना नहीं फैलता। भीड़ होती है लेकिन कोरोना नहीं फैलता।इनसे कोरोना फैलता तो सरकारें रोक लगाती। **

कोरोना दुकानों से फैलता है। यह सरकारों ने माना है। इसलिए बाजारों को बंद करवाना जरूरी होता है।

हालांकि किरयाना दुकान पर सौ के लगभग ग्राहकों से भी कोरोना नहीं फैलता। लेकिन फिर भी आशंका रहती है। इसलिए इनको कुछ घंटों की छूट है।
बाकी दुकानों में ग्राहक तो 15-20, या 40-50 ही आते हैं। भीड़ बिल्कुल नहीं होती।लेकिन सरकारों ने पक्का मान लिया है कि इनसे कोरोना फैलता है। यहां से कोरोना की चेन यानि कड़ी को तोड़ना है सो इनको बंद कराना पहला कदम है।
पूरे दिन बाजार खुले तो भीड़ नहीं होती लेकिन सरकारों ने समय कम कर दिया। भीड़ हो जाती है लेकिन इस पर नजर नहीं। बाजार बंद कोरोना की चेन खत्म होगी।
दुकानदार माल बेचने का तर्क ग्राहक पर तो आजमाता है लेकिन सरकारो से तर्क नहीं करता। बस,इसलिए मान कर ही चलें कि दुकानदार ही कोरोना के वाहक हैं प्रसारक हैं।

इसलिए बाजारों को बंद रखना जरूरी है। इसलिए अधिकारी जैसे जैसे बोलता है व्यापारी प्रतिनिधि नेता हां में हां मिलाते हैं और अधिकारी से भी ज्यादा करने की हां भी करते हैं। अधिकारी साल दो साल के लिए आता है। उसके साथ फोटो खिंचवा कर खुश। अधिकारी भी ऐसे व्यापारी नेताओं से खुश। इसलिए सभी मान लेते हैं कि दुकानों से फैलता है कोरोना। बाजारों को बंद करने का निर्णय प्रशासन के आदेश से पहले ही कर लेते हैं।