शाश्वत गरीब ही चुनावी उत्सव रौनक

सारिका तिवारी, डेमोक्रेटिक फ्रंट, चंडीगढ़:

“लोकतंत्र में सरकार लोगों की, लोगों के लिए और लोगों के द्वारा” होती है कहें तो यह मात्र एक जुमला है जो कि उस समय लोकप्रिय नेता द्वारा छोड़ा गया। जुमलों का बाज़ार आज भी गर्म है।

तुम हमें वोट दो;
हम तुम्हें … लैपटॉप देंगे ……सायकिल देंगे…स्कूटी देंगे …..मुफ्त की बिजली देंगे …… लोन माफ कर देंगे
..कर्जा डकार जाना, माफ कर देंगे … ये देंगे .. वो देंगे … वगैरह, वगैरह।

क्या ये खुल्लम खुल्ला रिश्वत नहीं?

काला धन वापिस लाएंगे, भ्र्ष्टाचार मुक्त भारत बनाएंगे।

एक दक्षिण भारतीय फिल्म टेलीविजन पर प्रसारित हो रही थी जिसमे पैराशूट उम्मीदवार को अपने द्वारा किए गए कामों की फरहिस्त देने की ज़रूरत नहीं न उसे आम जनता के बीच जाने की ही कोई ज़रूरत नेता जी जब भी दिखाई देते हैं गाड़ी में बैठते हुए या उतरते समय या कोई फरियादी सामने आ जाए तो हज़ार रदो हज़ार रुपये से उसकी मदद करते। उचित समय यानि चुनावी दिनों में पाँच सौ के एक या दो दो नोट, एक बोतल, बीस किलो आटा, दस किलो चावल और स्वादानुसार कुछ मीठी बातें।
पिछले दो चुनावों के दौरान देखा गया उम्मीदवारों ने घर घर अपनी तस्वीर वाले प्रेशर कुकर, दीवार घड़ियां, सिलाई करने वाले लोगों को अपनी फोटो छपी मशीनें, रेहड़ी फड़ी वालों को अपनी तस्वीरों वाली छतरियां बाँटी गईं।
हम अब भी उम्मीद करते हैं कि इन सब प्रलोभनों से चुनाव निष्पक्ष होंगे।

वोट के लिए क्या आप कुछ भी प्रलोभन दे सकते हैं?
ये जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा है लेकिन आम जनता इस ओर सोचती ही नहीं।

मध्यमवर्ग खुश हो जाता है डी ए की किश्त से। वो नहीं समझ रहा कि वह भर भर कर टैक्स चुका रहा है, महंगा पेट्रोल खरीद रहा है , महंगाई की मार झेल रहा है डिफाल्टर की कर्जमाफी… फोकट की स्कूटी…हराम की बिजली…हराम का घर…दो रुपये किलो गेंहू…एक रुपया किलो चावल…चार से छह रुपये किलो दाल…

गरीब हैं, थोकिया वोट बैंक हैं, इसलिए फोकट खाना, घर, बिजली, कर्जा माफी दिए जा रहे हैं,
बाकी लोग किस बात की सजा भोगें ?

जबकि होना ये चाहिये कि टैक्स से सर्वजनहिताय काम हों,
देश के विकास का काम हों,सड़कें, पुल दुरुस्त हों,रोजगारोन्मुखी कल कारखानें हों, विकास की खेती लहलहाती हो,
तो सबको टैक्स चुकाना अच्छा लगता.. ।

लेकिन राजनीतिक दल देश के एक बहुत बड़े भाग को शाश्वत गरीब ही बनाए रखना चाहते हैं। उसके लिए रोजगार सृजन के अनूकूल परिस्थिति बनाने की बजाए तथाकथित सोशल वेलफेयर की खैराती योजनाओं के माध्यम से अपना अक्षुण्ण वोट बैंक स्थापित कर रहे हो।

कर्मशील देश के बाशिन्दों को तुरंत कानून लाकर कुछ भी फ्री देने पर बंदिश लगाई जाए ताकि देश के नागरिक निकम्मे व निठल्ले न बने।

जनता को सिर्फ न्याय,शिक्षा व चिकित्सा के अलावा और कुछ भी मुफ्त में नहीं मिलनी चाहिए। तभी देश का विकास संभव है ।
जनसंख्या कंटरोल बिल का क्या बना इस पर भी जनता को पूछना चाहिए।
सोचने की शक्ति को पथभ्रष्ट करने की हर सम्भव कोशिश की जाती है भले ही सत्तासीन दल हो या फिर विपक्ष। चाहे टी वी के डिबेट शो हों या सोशल मीडिया दोनो ही असल मुद्दों से भटकाव के कामों में इस्तेमाल हो रहे हैं जाँचेंगे तो इसके पीछे भी राजनीतिक षड्यंत्र और बड़ा आर्थिक झोल दिखेगा।
डिजिटल इंडिया के नाम पर हाथ हाथ मे स्मार्ट फोन और प्रोग्राम्ड सोच और आसान बनती दलों की पावर शेयरिंग की सुरंग रूपी डगर ।

स्वास्थ्य सुविधाओं की दृष्टि से सरकारी तंत्र सवालों के घेरे में,जनता पर पड़ रही दोहरी मार

:– स्वास्थ्य सुविधाओं की दृष्टि से धरातल पर कार्य करने की है अति आश्यकता
:-स्वास्थ्य सुविधाओं के आभाव में जनता की अपेक्षाओं से हो रहा खिलवाड़
:-ड़ेंगू से जूझ रही आम जनता को स्वास्थ्य सुविधाओं की दरकार
:-स्वास्थ्य सुविधाओं की दृष्टि से सरकारी तंत्र सवालों के घेरे में,जनता पर पड़ रही दोहरी मार
:-जनता को संपूर्ण स्वास्थ्य सुविधाएं देने में विफ़ल होती शासन व्यवस्था
:- स्वास्थ्य सुविधाओं की दृष्टि से धरातल पर कार्य करने की है अति आवश्यकता
:- बेहतर सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए सरकार की प्रतिबद्धता अपेक्षित

सुशिल पंडित

किसी भी देश की लोकतंत्र स्वस्थ व सुदृढ़ होना वहाँ की जनता को मिल रही मूलभूत सुविधाओं पर निर्भर करता है। जनता की अपेक्षाओं और भावनाओं पर खरा उतरना मौजूदा शासन व्यवस्था की नैतिक जिम्मेदारी होती है। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, यहां के सविधान में लोगो को राज्य से आधारभूत सुविधाओं की मांग की गारंटी दी गई है। भारतीय संविधान के अनुछेद 21ए में मौलिक अधिकार का प्रावधान है। इन अधिकारों की श्रखला में स्वास्थ्य सुविधाओं को मुख्य रूप से अंकित किया गया है परंतु यह अधिकार आम व अति निम्न स्तर के व्यक्ति की पहुँच से कोसो दूर दिखाई दे रहा है। यदि विकसित देशों की बात करें तो वहां की सरकारों के द्वारा प्रत्येक व्यक्ति को स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने के लिए कुल खर्च का 80 से 90 प्रतिशत सरकार वहन करती है और यह गारंटी सवैधानिक रूप से सार्वजनिक सुविधाओं के माध्यम से प्रदान की जा रही हैं परंतु भारत में निर्धारित वर्ग के अलावा अन्य जरुरतमंद के पास यह अधिकार नही है। वर्तमान परिस्थितियों में भारत की जनता ड़ेंगू जैसी बीमारी की चपेट में है, यदि स्पष्ठ शब्दों में कहा जाए कि देश में डेंगू का कहर है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। सरकारी आंकड़ो की बात करें तो ड़ेंगू के बहुत अधिक केस नही है परंतु यदि वास्तविकता की दृष्टि से और निजी अस्पतालों व प्रयोगशालाओं की रिपोर्ट के आधार पर हर तीसरा बीमार व्यक्ति वर्तमान में डेंगू का मरीज है। सरकारी अस्पतालों में बेड का न मिलना और निजी अस्पतालों की रोजाना बढ़ती भीड़ से मौजूद सरकार की कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वभाविक से लग रहा है।स्वास्थ्य सुविधाओं की दृष्टि से वर्तमान में देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली का बुरा हाल है, वही दूसरी ओर निजी अस्पतालों में निरन्तर सुविधा का विस्तार जारी हैं, जिसके चलते लोंगो का रुझान निजी अस्पतालों की ओर होना स्वभाविक हो चुका है। चौथे राष्ट्रीय परिवार और स्वास्थ्य सर्वे के मुताबिक, 56 फीसदी शहरी व 49 फीसदी ग्रामीण लोगों ने निजी स्वास्थ्य सेवाओं का विकल्प चुना है। अत: देश की स्वास्थ्य सुविधाओं में सार्वजनिक व निजी दोनों की भूमिका की जांच करने की आवश्यकता हैं। निजी अस्पतालों की मनमानी और सरकारी अस्पतालों में व्यापक स्तर पर सुविधाओं का आभाव जनता की अपेक्षाओं के प्रतिकूल माना जा सकता है। सरकार के द्वारा निजी अस्पतालों के लिए कोई ऐसी नीति भी नही तैयार की गई जिसके तहत आम आदमी पर आर्थिक बोझ न पड़े। डेंगू को लेकर जहां सरकार के सभी प्रयास विफल नजर आ रहे हैं वहीं आम आदमी निजी अस्पतालों की लूट का शिकार होता दिखाई दे रहा है। मौजूद हालात को देखते हुए सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर जनता का विश्वास न होना भी निजी अस्पतालों की भीड़ का बड़ा कारण माना जा सकता है। वस्तुतः निजी अस्पतालों द्वारा प्रदान की जाने वाली सुविधाओं और सरकारी अस्पतालों में पूर्णतः उपचार के अभाव चलते भी लोंगो का रुझान निजी क्षेत्र से मिलने स्वास्थ्य सुविधाओं की ओर हो रहा है अब इस डर कहे या मजबूरी? दरअसल कोरोना के कारण जनता डर के साये में जीने के लिए विवश हैं वहीं मौसम के परिवर्तन से उतपन्न हुई ड़ेंगू वायरल बुखार ने आम आदमी को शारीरिक,मानसिक व आर्थिक रूप से निर्बल कर दिया है। सरकार के द्वारा स्वास्थ्य सुविधाओं की व्यापक व्यवस्थाओं का ढिंढोरा पीटा जा रहा है परंतु जब बात आम आदमी की जान की आती है तो सभी स्वास्थ्य सुविधाएं छू मंतर क्यों हो जाती है? देश के की राज्यों में डेंगू का कहर बढ़ता ही जा रहा है, राजधानी दिल्ली में एक हफ़्ते में एक हजार से अधिक मरीजों संख्या होना चिंता का विषय बना हुआ है।वही उतरप्रदेश में 2016 के बाद सबसे अधिक है यहां ड़ेंगू के मरीजों की संख्या 23 हजार से अधिक बताई जा रही हैं। पंजाब में हालात बद से बदत्तर बने है यहां 60 से अधिक मौते हो चुकी हैं, जम्मूकश्मीर में मरीज़ो की संख्या 1100 से अधिक बताई जा रही है। राजस्थान 13 हजार से अधिक मरीज़ ड़ेंगू पीड़ित पाए गए। अभी तक देश में लगभग 1 लाख 20 हज़ार मरीज़ ड़ेंगू से प्रभावित है। वास्तविकता के आधार पर ड़ेंगू का ईलाज सरकारी अस्पतालों में संभव न होने के कारण लोंगो को मज़बूरन निजी अस्पतालों की ओर रुख करना पड़ रहा है। सरकार के द्वारा शिक्षा,स्वास्थ्य व रोजग़ार को प्राथमिकता देने की बात चुनावी रैलियों और जनसभाओं में करना आम बात हो चुकी है परंतु धरातल के पटल पर कार्य करना सरकार और सम्बन्धित विभागों के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नही है। शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के आभाव का लाभ निजी क्षेत्र में कार्य कर रहे लोग उठा रहे है,निजी अस्पतालों में एक दिन के ईलाज का मतलब है कि आम आदमी की एक महीने की तनख्वाह का स्वाह हो जाना परन्तु अपनी व अपनो की जान के बदले हर व्यक्ति को यह सौदा सस्ता ही लगता है। सरकार के द्वारा ड़ेंगू मरीज़ों के आंकड़ो की जादूगरी और विपक्षी दलों का राजनैतिक रोटियां सेंकने का खेल बदस्तूर जारी है परंतु आम आदमी के जीवन की महत्ववता न के बराबर है।2014 के चुनाव के बाद मौजूदा सरकार के प्रतिनिधि प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी जी ने कार्यभार संभालने के पाश्चत एक राष्ट्रव्यापी सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली का अनावरण किया था जिसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य गारंटी योजना के नाम से जाना जाता हैं। जिसका मुख्य लक्ष्य देश के प्रत्येक नागरिक को मुफ्त दवाएं,नैदानिक उपचार और गंभीर बीमारियों के लिए बीमा उपल्ब्ध करना था परंतु वर्तमान में यह योजना कागज़ी दस्तावेजो की शोभा बढ़ा रही हैं। सरकार के पास डेंगू और मलेरिया से संबंधित सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।  पिछले कई दशकों में डेंगू के मरीज़ों की संख्या तीन गुना बढ़ना देश की स्वास्थ्य प्रणाली पर सीधे तौर पर प्रश्नचिन्ह मेंआज सकता है। अमेरिका की ब्रांडेस यूनिवर्सिटी के डोनाल्ड शेपर्ड के अक्टूबर 2014 में जारी शोध पत्र के अनुसार भारत विश्व में सबसे अधिक डेंगू प्रभावित देशों मे शामिल हो चुका है जो चिंता का विषय है। एक सर्वेक्षण के अनुसार 2012 में दक्षिण एशिया क्षेत्र में डेंगू के लगभग दो लाख नब्बे हजार मामले दर्ज हुए थे, जिसमें करीब 20 प्रतिशत भागीदारी भारत की थी वतर्मान में जब हर वर्ष डेंगू के मामले बढ़ रहे हों, तो यह गंभीर समस्या हो सकती है। वर्ष 2010 में डेंगू के 20 हजार से ज्यादा मामले दर्ज हुए, जो बढ़कर 2012 में 50 हजार और 2013 में 75 हजार हो गए। राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम के आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2014 में 40 हजार केस दर्ज हुए थे। वर्तमान में यह संख्या दोगुनी से भी अधिक हो चुकी है। देश की खराब स्वास्थ्य सेवाओं और असंतुलित डॉक्टर-मरीज अनुपात को देखते हुए इस संख्या को कम करना सरकार और सम्बन्धित विभागों के लिए बहुत बड़ी चुनौती है। देश में प्रति 1800 मरीजों पर एक चिकित्सक की उपलब्धता सराकर की कथनी और करनी का अंतर स्पष्ठ करने के लिए प्रयाप्त होगा। देश के 10 बड़े चिकितसा संस्थान इस क्षेत्र में निरंतर प्रयास कर रहे हैं परंतु अभी तक सफलता नही मिल सकी और न ही प्रयाप्त संसाधन उपलब्ध हो सके हैं।वर्तमान परिदृश्य में डेंगू मलेरिया जैसी बीमारी को जड़मूल से समाप्त करना संभव नही होगा परन्तु इसके लिए व्यापक पैमाने पर स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना सराकर की जिम्मेदारी बनती हैं। भारत मे सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली बहुत अच्छी न होने के कारण आज हमारा देश अपने पड़ौसी देशों से पिछड़ता दिखाई दे रहा है। अभी कुछ समय पहले आई एक वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार स्वास्थ्य सुविधाओं की दृष्टि से भारत 194 देशों में 145 वे स्थान पर है स्पष्ठ तौर पर यदि कहा जाए तो भारत स्वास्थ्य संसाधनों की दृष्टि से पड़ौसी देश श्रीलंका,भूटान और बंगलादेश से भी पिछड़ा हुआ है जो भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली की गंभीरता को प्रदर्शित करने के लिए क़ाफी होगा और यही कारण है कि लोंगो को निजी अस्पतालों की शरण मे जाना पड़ता है। इस लचर व्यवस्था से जहाँ आम आदमी पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ रहा है वहीं आम वर्ग स्वास्थ्य सुविधाओं का आभाव झेलने के लिए विवश हो रहा है। इस बीमारी के फैलने का कारण जहाँ स्वंम की लापरवाहीं है वहीं सरकार द्वारा निर्धारित किए गए विभागों की सुस्त कार्यप्रणाली भी मुख्य कारण है। सरकार के द्वारा प्रतिवर्ष इस प्रकार की बीमारियों की रोकथाम हेतु अरबों रुपए खर्च किए जा रहे हैं लेकिन वस्तविक रूप से कार्य करने के अभाव के चलते हर वर्ष लाखों लोग इन बीमारियों की चपेट में आते हैं। जनसहभागिता की कमी और विभागीय अधिकारियों की लापरवाही के कारण हर वर्ष मरीज़ों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही हैं। इस मच्छर जनित बीमारी से जहाँ आम आदमी का बजट बिगड़ रहा है वहीं देश की अर्थव्यवस्था को भी प्रतिवर्ष लगभग 13000 हजार करोड़ रुपए का नुक्सान होता है।बहरहाल सरकारी तंत्र और मौजूदा शासन को आगे दौड़ पीछे छोड़ की नीति को त्याग कर धरातल पर कार्य करना होगा। जनता की आवश्यकताओं और अपेक्षाओं पर आधारित व्यवस्था प्रदान करने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता बहुत महत्व रखती है। जनता के द्वारा विभिन्न प्रकार के टेक्सिस के माध्यम से अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी पूर्ण की जा रही और इसके बदले में मिलने वाली सुविधाओं की दरकार भी जनता ही करेगी। देश की अधिकतर जनसंख्या सामाजिक,आर्थिक व अन्य कारणों से निजी स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ लेने में असक्षम हैं, साथ ही एक लोककल्याणकारी व्यवस्था का यह दायित्व बनता है कि देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधा का मजबूत आधारभूत ढांचा तैयार करे जिसमें कोई भी व्यक्ति आसानी व शीघ्र स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ ले सके। 

देश की स्वतंत्रता व स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान करने वाली अभिनेत्री से पद्म पुरस्कार लिया जाना चाहिए वापिस- हुड्डा

12 नवंबर, चंडीगढ़: पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने हाल ही में पद्मश्री से पुरस्कृत एक अभिनेत्री द्वारा देश की आजादी के बारे में दिये गये बयान की कड़े शब्दों में आलोचना की है। हुड्डा ने कहा कि किसी को भी देश की स्वतंत्रता और स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। इतना ही नहीं, आज़ादी व आज़ादी के संघर्ष के दौरान हमारे महान स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को अपमानित करने वाली अभिनेत्री को जो पद्म पुरस्कार दिया गया है, उसे भी वापस लिया जाना चाहिए।

भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा कि वर्षों के संघर्ष और अनगिनत कुर्बानियों के बाद हमारे देश को स्वतंत्रता मिली है। जिन लोगों को लगता है कि देश को आजादी भीख में मिली है, उन्होंने शायद कभी स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में पढ़ा तक नहीं है। महारानी लक्ष्मी बाई, मंगल पांडे, तात्यां टोपे से लेकर महात्मा गांधी, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर आजाद, खुदी राम बोस, सुभाष चंद्र बोस, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, लाला लाजपत राय, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, अशफाकउल्ला खां समेत अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों ने देश की आजादी के लिए संघर्ष किया। यहां तक कि देश की आज़ादी के लिए अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए। तब कहीं जाकर हम एक आजाद मुल्क बन पाए हैं।

हुड्डा ने कहा कि वो खुद एक स्वतंत्रता सेनानी परिवार से हैं। उनके पिता स्वर्गीय चौधरी रणबीर सिंह हुड्डा ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों का अत्याचार सहा और कई बरस विभिन्न जेलों में गुज़ारे। अपने निजी और पारिवारिक लाभ-हानि व सुख को त्याग कर उन्होंने अपना सब कुछ स्वतंत्रता आंदोलन में झोंक दिया था। ऐसे कितने ही हजारों लाखों जाने अनजाने महान स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और बलिदान ने अंग्रेजों को भारत छोड़कर भागने के लिए मजबूर किया।

हुड्डा ने कहा कि जिस पीढ़ी को आजादी के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ा, जिसने गुलामी का दौर नहीं देखा और जिसको आजादी विरासत में मिली है, उसे आजादी के संघर्ष व स्वतंत्रता सेनानियों की कुर्बानी को कभी भूलना नहीं चाहिए। इस पीढ़ी के लोगों को हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में ज्यादा से ज्यादा पढ़ना, समझना और जानना चाहिए, ताकि उन्हें भी हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के जीवन, तप, त्याग, बलिदान से देशप्रेम की प्रेरणा मिल सके।
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वरुण कंगना पर बरसे , वक्तव्य को बताया पागलपन

वरुण गांधी ने कंगना पर बरसते हुए कहा कि ऐसे बयान को कंगना का पागलपन कहा जाए या के देशद्रोह । उन्होंने ट्वीट कर कहा कि कंगना ने भारतीय स्वतंत्रता को भीख में मिली आजादी कह कर महात्मा गांधी , लक्ष्मी बाई, मंगल पांडे जैसे महान स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान किया है, जोकि घोर निंदनीय है ।
उधर विपक्ष कंगना से पद्मश्री वापस लेने की मांग कर रहा है पिछले दिनों एक न्यूज़ चैनल को दिए इंटरव्यू में कंगना ने अपने आप को बहुत बड़ा देश भक्त बताया और कांग्रेस को नरम दल, जो अंग्रेजों कि सदा अंग्रेजों की राह आसान करती रही। इसी कड़ी में उन्होंने यहां तक कह डाला कि वर्ष 1947 में मिली आजादी भीख में मिली आजादी थी जबकि असल आज़ादी वर्ष 2014 में मिली इस पर विपक्ष बवाल कर रहा है।
आपको बता दें ट्विटर एकाउंट पर बैन लगने के बाद कंगना व्यक्तिगत रूप से खुलेआम भाजपा पक्ष में बयान बाजी करती हैं ।बहुत से राजनीतिक विचारक यहां तक कह रहे हैं कंगना देश भक्ति की बातों की आड़ में अन्य पार्टियों पर कीचड़ उछालती है और भाजपा का अजेंडा लेकर चलती हैं। राष्ट्रवाद के नाम पर भाजपा का अजेंडा चलाना सरासर निंदनीय है।

भारतीय लोकतंत्र में अब नेता और अभिनेता घी खिचड़ी की तरह साथ हो लिए हैं पहले भी अभिनेता चुनाव लड़ते थे संसद जाते थे लेकिन अब राजनीतिक दलों के स्पोक्सपर्सन की तरह डिजिटल मीडिया पर छाए हुए हैं और अनर्गल बयानबाजी करने से भी बाज नहीं आते।
कंगना रनोत हों या स्वरा भास्कर अनगर्ल बयानों की वजह से कोई ना कोई विवाद खड़ा कर अपने राजनीतिक नासमझी का परिचय देती रहती है। ऐसे नासमझी वाले बयान जनता को असल मुद्दों से वरगलाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं ।
बदले में अभिनेता दोनों ही अपना अपना लाभ लेते हैं जनता प्राइम टाइम पर इन विवादों पर बहस सुनती है और मीडिया को अपनी अलग से टीआरपी का लाभ मिलता है।

स्त्री : पूजनीय बनाम सम्मानित

कार्येषु दासी, करणेषु मंत्री, भोज्येषु माता, शयनेषु रम्भा ।
धर्मानुकूला क्षमया धरित्री, भार्या च षाड्गुण्यवतीह दुर्लभा ॥

क्यों हम नारी के बारे में बात करते हैं तो हिंदू समाज की सभी देवियों को याद करते हैं ।हम चाहते हैं की खाना बनाने में वो माँ अन्नपूर्णा हो , सुंदरता उर्वशी के जैसी हो ,उसके अंदर प्रेम राधा जैसा हो ,धार्मिक मीरा जैसी हो ,बहु. लक्ष्मी जैसी हो ,पत्नी सीता जैसी हो ,ममता यशोधा जैसी ,धैर्य धरती माँ जैसा हो ,शीतलता गंगा की हो तो बुद्धि और बोली सरस्वती की हो और कभी उसका रौद्र रूप हो तो दुर्गा का हो । क्यों हम उसको एक सामान्य इंसान नहीं रहने देते । बल्कि उसमें देवी को देखना चाहतें हैं । हमने एक आदर्श नारी कि परिभाषा ही इतनी कठिन बनायी है कि शायद ही कोई नारी उस मापदंड में खरी उतर पायी है ।

रमन विज, नयी दिल्ली :

वरदान ? कभी देखो उस स्त्री की आँखों में जो मिट्टी की नहीं सजीव हैं ।गौर से देखो , घबराकर निगाहें मत फेरों कि उस सजीव स्त्री के साथ बलात्कार हुआ है ! देखो उसको भी जिसके साथ भयानक घरेलू हिंसा हुयी है और वहाँ तक भी जाओ जहां कोई मंडप या पंडाल नहीं सरे राह स्त्री का अपमान हो रहा है , उसके अधिकारों पर डाका डाला जा रहा है ।
वह माँ बनी , यह सम्मान का विषय नहीं , यह तो निखालिस प्राकृतिक विधान है ।हाँ अगर माँ न बन पायी तो इस बात को सामाजिक कलंक से जोड़ दिया , यह कोई भी स्त्री बर्दाश्त क्यों करे ? मगर यह समाज इसी मुद्दे पर स्त्री को कलंकित करता रहता है ।यदि उसका पति मर जाता है तो समाज में स्त्री की स्थिति ही बदल जाती है ।उसे फिर देवी की तरह सजने नहीं दिया जाता , लोग उस पर अपने रूप को उजाड़ने की अनिवार्यता लागू कर देते हैं ।

तब ठीक है आप उस स्त्री को ही स्वीकार करोगे जो तुम्हारे नियंत्रण में रहे ।इसलिये ही शक्तिशालिनी, दुर्जन संहारिणी और अष्टभुजा वाली स्त्री की ताक़त को पहचान कर उससे दूर दूर ही रहे ।पहचान नहीं दी , पूजा उपासना के बहाने उसको मिट्टी की मूर्ति बना दिया ।जब न तब पंडाल सजाते रहे ।हाथ जोड़कर मौन व्रती तुम उस मूर्ति से कौन से वरदान माँगते हो ?

देवी है कि स्त्री है , स्त्री है कि देवी ?
इन दिनों को नवरात्रि कहा जाता है ।इन दिनों लोग व्रत रख कर देवी की मूर्ति के सामने मन्दिर में या पंडाल में हाथ जोड़कर खड़े दिखाई देते हैं । ये सब देवी के भक्तों में शुमार हैं , उसी देवी के जो स्त्री के रूप में मूर्तिमान है ।स्त्री रूप की आराधना करने वालों तुम ही तो हो जो अपने घर की स्त्री सताने में कोर कसर नहीं छोड़ते । तुम ही हो जो स्त्री के यौनांगों से जोड़कर साथी पुरुष को गालियाँ देते हो ।तुम्हारी मान्यता के अनुसार मनुष्य जीवन में स्त्री दोयम दर्जे पर है ।परिवार और समाज की मान्यताऐं तुमने बनाई हैं जिन पर स्त्री को आँखें बन्द कर के चलने का नियम जारी है ।गौर से देखा जाये तो चारों ओर से स्त्री की गतिशीलता पर शिकंजा है।

अब सवाल यह है कि आप किस स्त्री रूपा देवी की पूजा अर्चना में उपवास किये खड़े रहते हैं ? यदि देवी माता स्त्री जैसी स्त्री है तो उसका नौ दिन ही पूजा पाठ क्यों हो ,ताजिन्दगी  सम्मान क्यों नहीं ? मालुम हो कि आप किसी देवी देवता के वरदान से पैदा नहीं हुये और न हो सकते थे , यह तो प्राकृतिक चक्र के वैज्ञानिक संयोग का परिणाम है जिसके आधार माता पिता हैं ।स्त्री को देवी बनाकर स्त्री से अलग कर दिया ! आख़िर ऐसा क्यों करना पड़ा ? इसलिये कि स्त्री के लिये अपमान ,हिंसा और उत्पीडन के रास्ते खुले रखने थे जो उसे दासता की ओर लेजा सकें ।
पूछने का मन करता है कि ये क़ायदे इसलिये तो नहीं कि ऐसी नृशंसताऐं ही आपको शासक बनाती हैं ।इसमें सन्देह नहीं कि यह विभाजन पितृसत्ता का सुनहरा जाल है ।

हिन्द में हिन्दी की त्रासदी — कब बनेगी हिन्दी, हिन्द के माथे की बिंदी ?

संविधान में वर्णित हिन्दी का इतिहास 

एस.के.जैन, पंचकुला:

एस.के.जैन 

आज हिंदुस्तान को आजाद हुए 74 वर्ष का एक लंबा अंतराल बीत चुका है। अखण्ड कहे जाने वाला हमारा देश 30 खंडों में बंटा हुआ है। यहाँ हर 20 कि.मी. के बाद बोलचाल की भाषा यानि (Dialect ) और हर 50 कि.मी. के बाद संस्कृति बदल जाती है।  याद करते हैं 14 सितंबर, 1949 का दिन।  उस दिन हिन्दी भाषा को “राजभाषा” का दर्जा दिया गया था।  भारतकोश के अनुसार हिन्दी को “राजभाषा” बनाने को लेकर संसद में 12 सितंबर से 14 सितंबर, 1949 को तीन दिन तक बहस हुई।  भारतकोश पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, संविधान सभा की भाषा विषयक बहस लगभग 278 पृष्ठों में मुद्रित हुई।  इसमें डॉ. कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी और गोपाल स्वामी आयंगर की अहम भूमिका रही थी।  भारतीय संविधान के भाग 17 के अध्याय की धारा 343 (1 ) में वर्णित किया गया कि भारत संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी।  भारत संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अन्तर्राष्ट्रीय रूप होगा और अंग्रेजी भाषा का चलन आधिकारिक तौर पर 15 वर्ष बाद, प्रचलन से बाहर कर दिया जाएगा।  

 26 जनवरी, 1950 को जब हमारा संविधान लागू हुआ था तब देवनागरी लिपि में लिखी गई हिन्दी  सहित 14 भाषाओं को आधिकारिक भाषाओं के रूप में आठवीं सूची में रखा गया था।  संविधान के अनुसार 26 जनवरी, 1965 को अंग्रेजी की जगह हिन्दी को पूरी तरह से देश की राजभाषा बनानी थी। लेकिन दक्षिण भारत के राज्यों में हिन्दी विरोधी आंदोलन के बीच वर्ष 1963 में राजभाषा अधिनियम पारित किया गया था , जिसने 1965 के बाद अंग्रेजी को आधिकारिक भाषा के रूप में प्रचलन से बाहर करने का फैंसला पलट दिया था।  दक्षिण भारत के राज्यों विशेष रूप से तमिलनाडु (तब का मद्रास ) में आंदोलन और हिंसा का एक जबरदस्त ज़ोर चला और कई छात्रों ने आत्मदाह तक किया।  इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की कैबिनेट में सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहीं इंदिरा गाँधी के प्रयासों से  समस्या का समाधान निकला, जिसके परिणाम स्वरूप 1967 को राजभाषा में संशोधन किया और यह माना गया कि अंग्रेजी देश की आधिकारिक भाषा रहेगी।  इस संशोधन के माध्यम से आज तक यह व्यवस्था जारी है। 

अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी दिवस और संयुक्त राष्ट्रसंघ :  

विश्व का पहला “अन्तर्राष्ट्रीय  हिन्दी सम्मेलन” 10 जनवरी, 1975 को नागपुर में आयोजित हुआ।  तत्पश्चात विश्व हिन्दी दिवस को हर वर्ष 10 जनवरी को मनाए जाने की घोषणा तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह जी ने  साल 2006 में की थी।  यानि इसे हर वर्ष आधिकारिक तौर पर मनाने में 31 साल लग गये, कारण आप सोच सकते हैं।  आज दुनिया के लगभग 170 देशों में हिन्दी किसी न किसी रूप में पढ़ाई व सिखाई जाती है।  संयुक्त राष्ट्र संघ बनते समय 4 राज भाषाएं यानि चीनी, अंग्रेजी, फ्रांसीसी और रूसी स्वीकृत की गई थीं।  जबकि 1993 में अरबी, स्पेनिश को जोड़ा गया लेकिन हिन्दी कहीं नहीं।  जो भाषाएं राष्ट्र संघ में आने के लिए मचल रहीं हैं उनमें बंगाली, मलय, पुर्तगाली, स्वाहिली और टर्किश भी कई सालों से दस्तक दे रही हैं। हिन्दी भाषा का दावा इसलिए सबसे मजबूत है क्योंकि हिन्दी दुनिया की चौथी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है।  

हिन्दी भाषा की त्रासदी : 

13 सितंबर, 1949 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने संसद में चर्चा के दौरान तीन प्रमुख बातें कहीं थी ; यथा – 1 ) किसी विदेशी भाषा से कोई भी राष्ट्र महान नहीं हो सकता। 2 ) कोई भी विदेशी भाषा  आमजन की भाषा नहीं हो सकती। 3 ) भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के हित में, ऐसा राष्ट्र जो अपनी आत्मा को पहचाने, जिसे आत्म विश्वास हो, जो संसार के साथ सहयोग कर सके, हमें हिन्दी को अपनाना चाहिए।        कागज़ी तौर पर तो हिन्दी राजभाषा बनी रही लेकिन फलती- फूलती रही अंग्रेजी भाषा।  इसके बाद अंग्रेजी मजबूत होती गई।  “राष्ट्रभाषा प्रचार समिति” द्वारा प्रत्येक वर्ष 14 सितंबर 1953 से हिन्दी दिवस का आयोजन किया जाता रहा और हिन्दी सिर्फ “14 सितंबर” तक ही सीमित होकर रह गई। यह कितना विसंगतिपूर्ण है कि हमारी कोई एक राष्ट्रभाषा नहीं है और देश का कोई एक सुनिश्चित नाम भी नहीं है।  भारतवर्ष, इंडिया, हिंदुस्तान नामों में पिछले 74 सालों से जंग जारी है।  विजय पताका अभी तक किसी को भी नहीं मिली।  

आज़ाद होने के बाद पूरे भारतवर्ष में एक भाषा और एक शिक्षा पद्धति की बातें उठी थीं।  लेकिन अफसोस प्रदेशवाद और जातिवाद के बोझ तले सब कुछ दबकर रह गया। दुनिया के ज्यादातर विकसित देशों की अपनी एक राष्ट्रभाषा है।  वहाँ की शिक्षा प्रणाली, प्रशासन व न्यायपालिका के सभी काम उनकी अपनी भाषा में होते हैं।  वहाँ विद्यार्थियों के कंधों पर हमारे देश की तरह तीन-तीन भाषाओं का बोझ नहीं होता है।  मुझे यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि हमारे देश के प्रसिद्ध समाचार पत्रों में ही करीब 30 प्रतिशत अंग्रेजी के शब्द देवनागरी में पढ़ने को मिलते हैं।  दूरदर्शन और समाचार पत्रों के विज्ञापनों में हिन्दी  शब्दों को रोमन लिपि में लिखा दिखाते हैं।  कहने का तात्पर्य यह है कि अगर समाचार पत्रों और टी.वी. चैनलों में हिन्दी की यह दुर्दशा है तो कैसे बनेगी हिन्दी, हिन्द के माथे की बिन्दी।  केंद्र व राज्य सरकारों की 9 हज़ार के लगभग वेबसाइट्स हैं , जो पहले अंग्रेजी के खुलती हैं फिर इनका हिन्दी विकल्प आता है।  यही हाल हिन्दी में कंप्यूटर टाइपिंग का है।  टाइप करते वक्त उसे रोमन लिपि में टाइप किया जाता है और बाद में उसे देवनागरी में बदला जाता है।  इसमें भी कई फॉन्ट होते हैं।  कई फॉन्ट तो कई कम्प्यूटरों में खुलते ही नहीं।  यह हिन्दी के साथ घोर अन्याय है।  चीन, रूस, जापान, फ़्रांस, यू.ए.ई. यहां तक की पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित बहुत से दूसरे देश कम्प्यूटर पर अपनी एक भाषा और एक फॉन्ट में काम करते हैं। 

हम किसी भी प्रान्त, जाति, धर्म के हों, लेकिन जब बात एक देश की हो तो भाषा व लिपि भी एक ही जरूरी है।  तभी हिन्दी के अच्छे दिन आएंगे। अभी  हाल ही में अरब अमीरात ने एक ऐतिहासिक फैंसला लेते हुए अरबी व अंग्रेजी के बाद हिन्दी को अपनी तीसरी आधिकारिक भाषा के रूप में शामिल कर लिया है। यह हमारे लिए बहुत ही गर्व की बात है और एक हम हैं कि 74 सालों में हिन्दी को वह दर्जा नहीं दे सके जो इसे देना चाहिए।  एक समाचार के मुताबिक तीन साल पहले हिन्दीभाषी उत्तरप्रदेश बोर्ड की परीक्षा में करीब 10 लाख बच्चे हिन्दी में  अंउत्तीर्ण   हो गए थे। यह हमारे लिए बहुत ही शर्म की बात है।  सोचिए अगर उत्तर भारत में  हिन्दी   का यह हाल है तो भारत के दूसरे प्रांतों का क्या हाल होगा।  इसका सबसे बड़ा कारण है कि कई दशकों से विद्यार्थियों को तमाम माध्यमों द्वारा यह बात सिखाई गई है कि जीवन में अगर कुछ करना है तो अंग्रेजी सीखों और उसी पर ध्यान दो। 

उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जी अंग्रेजी में पूछे गए सवालों का जवाब हिन्दी में देते हैं।  हम इसे राष्ट्रवाद कहेंगे।  इसके विपरीत दक्षिण भारत से काँग्रेस नेता शशि थरूर ने कहा था कि  हिन्दी   हम पर लादी जा रही है।  वह अंग्रेजी के विद्वान माने जाते हैं और उन्होंने कई अंग्रेजी में पुस्तकें लिखी हैं।  मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि आपने जब अंग्रेजी सीखी तो तब आप पर क्या वह लादी गई थी तो तब आपने इसका विरोध क्यों नहीं किया ? अंग्रेजी साम्राज्य के चलते अगर हम अंग्रेजी सीख सकते हैं तो क्या कारण है कि आज़ादी के बाद हम अपने ही देश में आज़ाद रहते  हुए अपनी भाषा  हिन्दी  नहीं सीख सकते।  इसका एक ही सबसे बड़ा कारण समझ में आता है और वह है कमज़ोर प्रजातंत्र यानि loose democracy , ऐसा मेरा मानना है।  

 कब तक शापित रहेगी हिन्दी  :

स्वतंत्रता के सूर्योदय के साथ जिस हिन्दी को भारत माँ के माथे की बिन्दी बनना चाहिए उस हिन्दी की हालत आज़ादी के 74 वर्षों के बाद भी गुलामी के 200 वर्षों से बदतर सिद्ध हो रही है।  जिस  हिन्दी  को आगे बढ़ाने के लिए अहिन्दी भाषी बंगाली राजा राम मोहन राय, ब्रह्म समाज के नेता केशवचन्द्र, सुभाष चंद्र बोस और राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने आस्था के दीये जलाए, वही हिन्दी आज अपने ही घर में बिलख रही है।  आज हिन्दी अपनों से हारी है अब  हिन्दी  अस्मिता की पहचान नही है। आजादी मिलते ही हम पूरे गुलाम हो गये। अब अंग्रेजी मम्मी-डैडी की संस्कृति गाँव के चौपाल तक पहुँच गई है।  पिता जी के अलावा बाकी सब अंकल हो गए है। जहां तक कि पालतू कुत्तों का भी अंग्रेजीकरण हो गया है।  कालू, झबरु, मोती अब टाइसन, बुलैट, वगैरा हो गए हैं । कुकरमुत्ते की तरह उगते अँग्रेजी स्कूल ग्रामीण भारतीय संस्कृति को विनष्ट करने पर तुले हैं।  जिस देश के लिए न जाने कितने जवानों ने स्वयं को बलिदान कर दिया , उस देश के लिए हमे मातृभाषा के प्रति मोहभंग करना पड़े तथा थोड़ी सी परेशानी उठानी पड़े तो उन जवानों के त्याग की तुलना में हमारा त्याग बहुत कम होगा।  हमें यह त्याग करना पड़ेगा क्योंकि राष्ट्र की एकता आज हमारे लिए सर्वोपरि है। 

वैसे तो हिंदी विदेशों में मारीशस, फिज़ी, सूरीनाम जैसे देशों में पल्लवित व पुष्पित है।  हॉलेंड में इसका तो पढ़ाई के साथ -साथ शोध कार्य भी हो रहा है।  परन्तु आज हिन्दीअपने ही घरों, में अंग्रेजी के आगे हार गई है।  इतने हिन्दी भाषियों के रहते आखिर कब तक अभिशप्त रहेगी हिन्दी ?

विदेशी हिन्दी सेवियों के अवदान : 

इस  हिन्दी  दिवस के महान अवसर पर  हिन्दी  के विद्वानों, लेखकों, साहित्कारों, आदि की बातें तो होंगी ही।  इनमें लगभग सभी हिन्दी पट्टी के ही होंगे।  क्या ही अच्छा हो कि इस अवसर पर हम उन हिन्दी सेवियों के अवदान को भी रेखांकित करें जो मूलत: भारतीय नहीं हैं।  उनकी मातृभाषा भी  हिन्दी  नहीं हैं, बावजूद इसके उन्होंने हिन्दी सीखी, आगे की पीढ़ी को भी पढ़ाया और अपनी रचनाओं से हिन्दी भाषा को समृद्ध किया।  

हिंदी सेवियों में पहला नाम फ़ादर कामिल बुल्के का सामने आता है।  वह आजीवन हिंदी की सेवा में जुटे रहे।  वे हिंदी अंग्रेजी शब्दकोश के निर्माण के लिए सामग्री जुटाने में सतत  प्रयत्नशील रहे।  उन्होंने इसमें 40 हजार नए शब्द जोड़े।  बाइबल का हिंदी अनुवाद भी किया।  वे रामचरित मानस के उदभट विद्वान थे और लगभग पूरा रामचरित मानस उन्हें कंठस्त था।  इसी क्रम में 85 साल की कात्सू सान भी आती हैं। वे 1956 में भारत आंई थी।  भारत को लेकर उनकी दिलचस्पी भगवान बौद्ध के कारण बढ़ी थी।  अब भारत ही उन्हें अपना देश लगता है और वे मानती है कि भारत संसार का आध्यात्मिक विश्व गुरु है। कात्सू जी ने हिन्दी काका साहेब कालेलकर जी से सीखी थी और 40 वर्ष पहले भारत की नागरिकता ग्रहण कर ली थी।  कुछ माह पहले राजधानी दिल्ली में संसद भवन की नई बनने वाली इमारत के भूमि पूजन के बाद सर्वधर्म प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया था। जिसमें बौद्ध , यहूदी, पारसी, बहाई , सिख, ईसाई , जैन, मुस्लिम और हिन्दू धर्मों की प्रार्थनाएं की गईं । 

ब्रिटेन से संबंधित जिलियन राइट का नाम भी सामने आता है। वे लंदन में बी.बी.सी. में भी काम करती थीं ।  सत्तर के दशक में भारत आने के बाद राही मासूम रज़ा के उपन्यास “आधा गाँव” व श्री लाल शुक्ला के उपन्यास “राग दरबारी” का अनुवाद अंग्रेजी में कर दिया।  भारत के चीन से संबंध कोई बहुत सौहार्दपूर्ण न भी रहे हों पर भारत चीन के हिन्दी  प्रेमी प्रो. च्यांग चिंगख्वेइ के प्रति सम्मान का भाव अवश्य ही रखता है।  वे दशकों से पेइचिंग यूनिवर्सिटी में हिन्दी पढ़ा रहे हैं।  साल 2014 में जब केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी (एन.डी.ए) की सरकार बनी तो हिन्दी भाषा को सरकारी कामकाज व विदेश नीति तक में तरजीह मिलने लगी।  अब नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी हिन्दी भाषा को प्राथमिकता दी जाने लगी है।  इंजीनियरिंग और मेडिकल शिक्षा पाठ्यक्रम भी हिंदी भाषा में शुरू किए जा रहे हैं।  हिन्दी के अच्छे दिन आने की संभावनाएं बढ़ती नज़र आ रही हैं और शायद हिन्दी को अपना वो अधिकार मिल सके जिसकी वह पिछले 74 वर्षों से हकदार थी।

इस निर्भया के लिए सरकार और जनता चुप क्यों है?

रमन विज, नयी दिल्ली:

दिल्ली में निर्भया के साथ दुष्कर्म करने के विरोध में सड़कों पर प्रदर्शन करने वाली आम जनता नहीं थी लेकिन सत्ता के लालची नेता और उनके समर्थन करने वाले गुंडे ही थे। यह कहना कोई गलत नहीं होगा आज का समय देखकर दिल्ली निर्भया कांड के बाद आए दिन एक निर्भया कांड होता है लेकिन बड़े दुख की बात है न सरकार और ना उनके समर्थन करने वाले कभी सड़क पर नजर नहीं आते हैं। तो इससे तो यह साबित होता है कि सरकार और उनके समर्थन करने वाले दोनों गुंडे ही हैं।

गोदी मीडिया भी इस खबर को 24 घंटे तक चला नहीं पा रही है क्योंकि समाज में देश में उसे जहर फैलाने से फुर्सत ही नहीं है। उसे तो बस पाकिस्तान अफगानिस्तान यही करना है हमारे समाज में हमारी बेटियों के साथ क्या हो रहा है इससे इस गोदी मीडिया जो गुंडों के हाथ बिकी हुई है कोई लेना-देना नहीं।

संगम विहार से परिवार वाले थाना गए कलेक्टर के पास गए लेकिन वहां से अभी तक कोई मदद नहीं मिली और न मिलने की उम्मीद नजर आ रही है हम अपने समाज को इस गंदी राजनीति के चक्कर में कहां से कहां ले कर जा रहे हैं। ठीक है आप किसी भी पार्टी को समर्थन दो यह आपकी अपनी स्वीकृति है लेकिन जब समाज में बहू बेटी पर कोई आंच आए तो इसी समाज को आगे आना चाहिए ना की कोई राजनैतिक पार्टी को गाली देना हो तो हम इकट्ठा होकर मशाले जलाकर रोड पर हंगामा करते हुए नजर आते हैं,

अभी हम पाकिस्तान अफगानिस्तान के लिए रोड पर हंगामा करते हैं, तो क्या आज हम अपनी बहन बेटी बहू के लिए सरकार से न्याय नहीं मांग सकते हैं? क्या हमारा अस्तित्व इतना नीचे गिर गया कि हमें पार्टी से ऊपर कुछ दिखाई नहीं देता?

मैं, रमन विज, केंद्र सरकार से यह पूछना चाहता हूं कि आप पूरे बहुमत से हिंदुस्तान में सरकार चला रहे हैं तो क्या आप विपक्ष को बस गाली देने के लिए सत्ता में बैठे हुए हैं? यह झूठ है भाषण देने के लिए हो आप ही भाषण देते हो, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ तो इस पर आपका मुंह क्यों नहीं खुल रहा हमारे यहां दिल्ली में ही कई महिला सांसद हैं क्या उन्हें दुख नहीं दिखाई दे रहा उन्हें तकलीफ नहीं हो रही यह सब देख कर ₹5 सिलेंडर पर बढ़ता था तो यह लोग रोड पर तांडव करती नजर आती थी विपक्ष को चूड़ियां और सारी भेजती थी आज इनके लिए क्या भेजा जाए?

निजीकरण व्यवस्था नहीं बल्कि पुनः रियासतीकरण है..

रमन विज, नई दिल्ली :

मात्र 70 साल में ही बाजी पलट गई। जहाँ से चले थे उसी जगह पहुंच रहे हैं हम। फर्क सिर्फ इतना कि दूसरा रास्ता चुना गया है और इसके परिणाम भी ज्यादा गम्भीर होंगे।

1947 जब देश आजाद हुआ था। नई नवेली सरकार और उनके मंन्त्री देश की रियासतों को आजाद भारत का हिस्सा बनाने के लिए परेशान थे। तकरीबन 562 रियासतों को भारत में मिलाने के लिए साम दाम दंड भेद की नीति अपना कर अपनी कोशिश जारी रखे हुए थे। क्योंकि देश की सारी संपत्ति इन्हीं रियासतों के पास थी।

कुछ रियासतों ने नखरे भी दिखाए, मगर कूटनीति और चतुरनीति से इन्हें आजाद भारत का हिस्सा बनाकर भारत के नाम से एक स्वतंत्र लोकतंत्र की स्थापना की। और फिर देश की सारी संपत्ति सिमट कर गणतांत्रिक पद्धति वाले संप्रभुता प्राप्त भारत के पास आ गई।

धीरे धीरे रेल, बैंक, कारखानों आदि का राष्ट्रीयकरण किया गया और एक शक्तिशाली भारत का निर्माण हुआ ।

मात्र 70 साल बाद समय और विचार ने करवट ली है। फासीवादी ताकतें पूंजीवादी व्यवस्था के कंधे पर सवार हो राजनीतिक परिवर्तन पर उतारू है। लाभ और मुनाफे की विशुद्ध वैचारिक सोच पर आधारित ये राजनीतिक देश को फिर से 1947 के पीछे ले जाना चाहती है। यानी देश की संपत्ति पुनः रियासतों के पास…….!

लेकिन ये नए रजवाड़े होंगे कुछ पूंजीपति घराने और कुछ बड़े बडे राजनेता, निजीकरण की आड़ में पुनः देश की सारी संपत्ति देश के चन्द पूंजीपति घरानो को सौंप देने की कुत्सित चाल चली जा रही है। उसके बाद क्या ..?

निश्चित ही लोकतंत्र का वजूद खत्म हो जाएगा। देश उन पूंजीपतियों के अधीन होगा जो परिवर्तित रजवाड़े की शक्ल में सामने उभर कर आयेंगे। शायद रजवाड़े से ज्यादा बेरहम और सख्त।

क्यों झूठ बोलते हो साहब चरखे से आज़ादी आई थी

“मैं बहुत गरीब हूँ , मेरे पास मेरी भारत माँ को देने के लिए कुछ नहीं था सिवा मेरे प्राणों के, जिसे आज मैं दे रहा हूँ”….“खुदीरामबोस” ऐसे देश प्रेमी,स्वदेशी प्रेमी क्रांतिकारी, जिसने 18वर्ष 8 महीने 8 दिन की अल्पायु में शहादत दी, आज पुण्यतिथि पर भावपूर्ण स्मरण, “जय हिंद” “जय भारत” 8 जून, 1908 को उन्हें अदालत में पेश किया गया और 13 जून को उन्हें मौत की सजा सुनाई गई। 11 अगस्त, 1908 को उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया। जब जज ने फैसला पढ़कर सुनाया तो खुदीराम बोस मुस्कुरा दिए। जज को ऐसा लगा कि खुदीराम सजा को समझ नहीं पाए हैं, इसलिए मुस्कुरा रहे हैं। कन्फ्यूज होकर जज ने पूछा कि क्या तुम्हें सजा के बारे में पूरी बात समझ आ गई है। इस पर बोस ने दृढ़ता से जज को ऐसा जवाब दिया जिसे सुनकर जज भी स्तब्ध रह गया। उन्होंने कहा कि न सिर्फ उनको सिर्फ फैसला पूरी तरह समझ में आ गया है, बल्कि समय मिला तो वह जज को बम बनाना भी सिखा देंगे।

स्वतन्त्रता संग्राम/इतिहास, डेमोक्रेटिकफ्रंट॰कॉम – चंडीगढ़ :

आजादी की लड़ाई का इतिहास क्रांतिकारियों के त्याग और बलिदान के अनगिनत कारनामों से भरा पड़ा है। क्रांतिकारियों की सूची में ऐसा ही एक नाम है खुदीराम बोस का, जो शहादत के बाद इतने लोकप्रिय हो गए कि नौजवान एक खास किस्म की धोती पहनने लगे जिनकी किनारी पर ‘खुदीराम’ लिखा होता था।

11 अगस्त, आज ही के दि‍न खुदीराम बोस देश की आजादी के लि‍ए शहीद हुए थे। आइए, उनकी वीर गाथा के बारे में जानें और उन्‍हें याद करें। कुछ इतिहासकार उन्हें देश के लिए फांसी पर चढ़ने वाला सबसे कम उम्र का देशभक्त मानते हैं।

खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर 1889 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर में त्रैलोक्यनाथ बोस के घर हुआ था। खुदीराम को आजादी हासिल करने की ऐसी लगन लगी कि 9वीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़कर वे स्वदेशी आंदोलन में कूद पड़े। इसके बाद वे रिवॉल्यूशनरी पार्टी के सदस्य बने और ‘वंदेमातरम्’ लिखे पर्चे वितरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में चले आंदोलन में भी उन्होंने बढ़-चढ़कर भाग लिया। उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों के चलते 28 फरवरी 1906 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन वे कैद से भाग निकले। लगभग 2 महीने बाद अप्रैल में वे फिर से पकड़े गए। 16 मई 1906 को उन्हें रिहा कर दिया गया।

6 दिसंबर 1907 को खुदीराम ने नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर बंगाल के गवर्नर की विशेष ट्रेन पर हमला किया, परंतु गवर्नर बच गया। सन् 1908 में खुदीराम ने दो अंग्रेज अधिकारियों वाट्सन और पैम्फायल्ट फुलर पर बम से हमला किया लेकिन वे भी बच निकले। खुदीराम बोस मुजफ्फरपुर के सेशन जज किंग्सफोर्ड से बेहद खफा थे जिसने बंगाल के कई देशभक्तों को कड़ी सजा दी थी।उन्होंने अपने साथी प्रफुल्लचंद चाकी के साथ मिलकर किंग्सफोर्ड को सबक सिखाने की ठानी। दोनों मुजफ्फरपुर आए और 30 अप्रैल 1908 को सेशन जज की गाड़ी पर बम फेंक दिया लेकिन उस गाड़ी में उस समय सेशन जज की जगह उसकी परिचित दो यूरोपीय महिलाएं कैनेडी और उसकी बेटी सवार थीं।

किंग्सफोर्ड के धोखे में दोनों महिलाएं मारी गईं जिसका खुदीराम और प्रफुल चंद चाकी को काफी अफसोस हुआ। अंग्रेज पुलिस उनके पीछे लगी और वैनी रेलवे स्टेशन पर उन्हें घेर लिया। अपने को पुलिस से घिरा देख प्रफुल चंद चाकी ने खुद को गोली से उड़ा लिया जबकि खुदीराम पकड़े गए। मुजफ्फरपुर जेल में 11 अगस्त 1908 को उन्हें फांसी पर लटका दिया गया। उस समय उनकी उम्र सिर्फ 19 साल थी।

देश के लिए शहादत देने के बाद खुदीराम इतने लोकप्रिय हो गए कि बंगाल के जुलाहे एक खास किस्म की धोती बुनने लगे। इतिहासवेत्ता शिरोल ने लिखा है- ‘बंगाल के राष्ट्रवादियों के लिए वह वीर शहीद और अनुकरणीय हो गया। विद्यार्थियों तथा अन्य लोगों ने शोक मनाया। कई दिन तक स्कूल बंद रहे और नौजवान ऐसी धोती पहनने लगे जिनकी किनारी पर खुदीराम लिखा होता था।’

तुम अख़बार हो तो बेखबर मैं भी नहीं

‘पुरनूर’ कोरल, चंडीगढ़ :

मीडिया में बाज़ार का दखल प्रत्यक्ष रूप में बढ़ता जा रहा है हालांकि कुछ अखबारें हमेशा से ही स्वयं को उपभोग वस्तु की श्रेणी में शामिल करती रही है जैसे कि लिख देना अ प्रोडक्ट ऑफ ….। लेकिन खबरों से ज़्यादा विज्ञापनों को स्थान देने के लिए अखबार के पन्नों में इज़ाफ़ा कर दिया गया।

अब अखबार मिशन नहीं व्यवसाय बन गया है । आजकल मिशन रखने वाले पत्रकारों को पागल कहते हैं अखबार रंगदार हो गए। धन और ताकत का स्रोत बन गए हैं । असल मे वर्ष 1995 में तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने उदारीकरण के नाम पर अर्थव्यवस्था खोल दी थी यह उसी का नतीजा है।

अमर्यादित तरीके से विज्ञापन हथियाने के लिए राजनेताओं और व्यवसायियों की चाटूकारिता करना , जहाँ ये न चले वहाँ ब्लैकमेलिंग के हथियार खुलकर इस्तेमाल किये जाते हैं।

बहुत बदल गया है मीडिया

आज माँ से बात कर रही थी तो उन्होंने बताया कि पहले सम्पादक स्वयं एक संस्था होते थे जो अब कमज़ोर हो गई पहले सम्पादक अपने संवादाताओं से अक्सर कहते थे इन विज्ञापन वालों से दूर रहना । बहुत चिढ़ते थे अखबार की मार्केटिंग टीम से लेकिन अब सब बदल गया। अखबारों के प्रबंधन किसी सम्पादक की नियुक्ति के समय टारगेट बाँध देते है और इसी तरह सम्पादक भी अपने अधीनस्थ पत्रकारों के टारगेट फिक्स कर देते हैं। जनरल मैनेजर (मार्केटिंग) सम्पादक का पर्याय बन गया है।

मीडिया में बाज़ारवाद का प्रभाव इस कद्र बढ़ गया है कि दौलत का अंबार ठिकाने लगाने के लिए इन संस्थाओं द्वारा अलग नामों से नित्य नए अखबार और चैनल चलाये जा रहे हैं।

एक और चीज़ ” मीडिया ट्रायल”

बहुत ही भयानक साबित होता है कई बार। हालांकि कई मामलों में यह कारगार भी साबित हुआ लेकिन ज़्यादातर सेल्फ स्टाइल्ड जासूसी पत्रकार जल्दबाजी में कानूनी प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं।

समाचारों और विचारों में बाज़ार इस कदर हावी है कि ख़बर और विज्ञापन में अन्तर कर पाना मुश्किल लगता है। यहाँ तक कि कुछ अख़बार तो श्राद्ध पक्ष के दौरान भी पुष्य नक्षत्र के आगमन के प्रायोजित समाचार छापकर पाठकों को बेवकूफ़ बनाने से बाज नहीं आते. तमाम अख़बार ख़रीदारी के लिए तरह-तरह के मेले लगाने को अपना परम कर्त्तव्य मान बैठे हैं. यह पाठकों के खिलाफ़ एक गहरी मीडियाई साजिश है।

रौनकें कहाँ दिखायी देती हैं अब पहले जैसी,
अख़बारों के इश्तेहार बताते हैं, कोई त्यौहार आया है!