सिद्धू का सामान्य ज्ञान सिफर: ब्रह्म महिंदरा

चंडीगढ़:

पूर्व क्रिकेटर और पंजाब के कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू कैप्‍टन अमरिंदर सिंह कैबिनेट से इस्तीफा देने के बाद चौतरफा घिर गए हैैं। विरोधी उनके इस्‍तीफे के अंदाज पर सवाल कर रहे हैं और उन पर तीखे हमले कर रहे हैं। विरोधियों के साथ कैबिनेट सहयोगियों ने भी उन पर निशाना साधा है। पंजाब के एक वरिष्‍ठ मंत्री ने तो यहां तक कह दिया कि सिद्धू इतने बुद्धू नहीं हैं कि उनको इस्‍तीफे को लेकर प्रोफाइल का पता नहीं हो। एक अन्‍य मंत्री ने भी इसी तरह का सवाल उठाया है। कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा व अन्‍य दलों के नेताओं ने भी सिद्धू पर निशाने साधे हैं। दूसरी ओर आम आदमी पार्टी और पंजाब एकता पार्टी सिद्धू के साथ खड़े नजर आ रहे हैं।

वरिष्‍ठ मंत्री ब्रह्म मोहिंद्रा ने कहा- नाट्यशास्त्र के राजा सिद्धू इतने बुद्धू कि उन्हें प्रोटोकाल का पता नहीं

राहुल गांधी को इस्तीफा भेजने पर कैबिनेट मंत्री ब्रह्म मोहिंद्रा ने सिद्धू को नाट्यशास्त्र का महारथी करार दिया। बह्म मोहिंद्रा ने कहा, क्‍या नाट्यशास्‍त्र के राजा सिद्धू इतने बुद्धू हैं कि उन्हें प्रोटोकाल का पता नहीं है। सिद्धू को इस्तीफा सीधा मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को भेजना चाहिए था न कि पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी को।

इस्‍तीफा सिद्धू की नाटकबाली, इसके लिए ट्विटर उचित मंच नहीं : चन्नी

ब्रह्म माहिंद्रा के साथ ही कैबिनेट मंत्री चरणजीत सिंह चन्‍नी ने भी सिद्धू के इस्तीफे को नाटकबाजी बताया। उन्‍होंने कहा कि सिद्धू पहले इस्तीफे को ट्विटर पर डालते हैं और बाद में कहते हैं कि वह मुख्यमंत्री को भी अपना इस्तीफा भेज रहे हैं। जब उन्होंने 10 जून को इस्तीफा दे दिया था तो फिर इसकी घोषणा करने में 34 दिन क्यों लगा दिए? इसके अलावा इस्‍तीफा देने के लिए ट्विटर उचित मंच नहीं है।

दोनों मंत्रियों ने कहा कि सिद्धू ने 40 दिनों तक बिजली विभाग न संभाल कर काम अधर में लटकाए रखा। उन्होंने इस तथ्य का भी संज्ञान नहीं लिया कि धान की बिजाई के लिए बिजली महत्वपूर्ण है। उन्होंने अपने रवैये से होनेवाले दुष्प्रभाव की परवाह नहीं की। उन्हें केवल अपने लिए नहीं बल्कि राज्य और अपने लोगों के साथ-साथ उस पार्टी की तरफ भी सोचना चाहिए जिसने उन्हें इतना कुछ दिया था

इस्तीफा महज ड्रामेबाजी है : सुखबीर बादल

शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष एवं फिरोजपुर से सांसद सुखबीर सिंह बादल ने कहा कि सिद्धू का इस्तीफा महज ड्रामेबाजी है। कांग्रेस प्रधान को इस्तीफा देने का मतलब नहीं। यह तो केवल औपचारिकता की गई है। इससे स्पष्ट हो गया है कि सिद्धू ने कांग्रेस को ब्लैकमेल करने तथा अपनी मर्जी के अनुसार झुकाने के लिए एक माह पहले इस्तीफे का यह ड्रामा किया था। इससे यह भी साबित होता है कि सिद्धू एक बहुत बड़ा अवसरवादी है, जो हमेशा अपने ही फायदे के बारे में सोचता है। 

इस्तीफा उसे दिया जिसने खुद इस्तीफा दिया हुआ है : चुग

भाजपा के राष्ट्रीय सचिव तरुण चुग का कहना है कि नवजोत सिद्धू ने इस्तीफा भी उसे दिया जिसने खुद ही इस्तीफा दिया हुआ है। यह एक राजनीतिक ड्रामेबाजी है। कैप्टन अमरिंदर सिंह अब तक सिद्धू का इस्तीफा आने का इंतजार क्यों कर रहे हैं, उन्हें तो सिद्धू को कैबिनेट से बर्खास्त कर देना चाहिए।

सिद्धू को बिजली माफिया को नंगा करना चाहिए था : आप

आम आदमी पार्टी विधायक दल के नेता हरपाल सिंह चीमा ने कहा कि सिद्धू को तुरंत भ्रष्ट कांग्रेस पार्टी छोड़ देनी चाहिए। दस सालों के माफिया राज समेत बेअदबियों के मामलों पर सिद्धू का बादलों के विरुद्ध बेबाकी के साथ बोलना मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को रास नहीं आ रहा था। सिद्धू के बढ़ते राजनैतिक कद को कैप्टन अपनी कुर्सी के लिए भी खतरा समझने लगे थे। बेहतर तो यह होता कि सिद्धू प्राइवेट थर्मल कंपनियों के साथ किए महंगे और नाजायज शर्तों वाले समझौते रद करते और बादलों के बिजली माफिया को नंगा करते।

सच उजागर करने की कीमत चुकाई : खैहरा

पंजाबी एकता पार्टी के अध्यक्ष सुखपाल सिंह खैहरा ने कहा कि नवजोत सिंह सिद्धू ने कैप्टन और बादलों के गठजोड़ का सच उजागर करने की कीमत चुकाई है। करतारपुर कॉरिडोर को लेकर सिद्धू की लोकप्रियता बढ़ रही थी जो कैप्टन अमरिंदर सिंह को नहीं भा रही थी।

सिद्धू की कोठी पर पसरा सन्नाटा

अमृतसर। दूसरी ओर, नवजोत सिंह सिद्धू के इस्तीफे का खुलासा हाेने के बाद उनकी कोठी पर सन्नाटा पसरा है। अंदर लगी सिद्धू परिवार और सिक्योरिटी की गाडिय़ों से कयास लगाए जाते रहे कि वह घर पर ही हैं, लेकिन इसकी पुष्टि किसी ने नहीं की।

सिद्धू निवास के बैक साइड पर उनका सियासी कार्यालय भी है, जहां विधानसभा हलका पूर्वी ही नहीं, बल्कि शहर भर से लोग अपना काम करवाने आते हैं। सिद्धू समर्थकों और करीबियों का भी जमावड़ा आफिस में लगा रहता है, लेकिन कोठी के सारे गेट सबके लिए बंद थे। सिक्योरिटी में तैनात मुलाजिम ही कुछ बोल रहे थे। इतना ही नहीं जब उनसे पूछा गया कि क्या सिद्धू घर पर हैं, तो वह अंदर चले गए। सिद्धू की पत्नी डॉ. नवजोत कौर और उनके करीबियों के मोबाइल फोन या तो बंद मिले या फिर उन्होंने उठाया ही नहीं।

हताशा में सिद्धू खेमे के नेता

सिद्धू के कांग्रेस में शामिल होने के बाद उनके साथ ही भाजपा में सक्रिय कई नेता कांग्रेस में आ गए थे। अब कांग्रेस द्वारा उन्हें हाशिये पर डाले जाने के बाद सिद्धू खेमा भी सियासी हताशा में हैं। करीबियों की सिद्धू के सियासी करियर पर निगाह है, क्योंकि उनका सियासी करियर उन पर ही निर्भर करता है।

Indeed a Very Positive Budget, Sets Indian Economy rolling to new heights

Mazboot Budget for Mazboot Nagrik
“यकीन हो तो रास्ता निकलता है, हवा की ओट लेकर भी चिराग जलता है”

CA. Keshav R Garg

It is indeed a Mazboot Budget for Mazboot Nagrik. The maiden budget by first full time lady finance minister has set the tone for the growth of Indian Economy for next 5 years. It seems that day is not far when India will see its peak growth under the regime of very talented, humble and grounded finance minister. From village to cities, youth to old, MSME to Large Caps everyone has been touched in this well sought budget of newly elected government.

As far as a common man is concerned a number of initiatives have been introduced. We cannot just talk about tax benefits but those benefits as well which make life of common man easy. The government has introduced the concept of NCMC Transport card which will cater for all transport needs all across the country be it metros, buses, toll tax etc. Not only it will help in transportation but in case of emergencies, one can withdraw cash from ATM as well with the help of this card. Additional Tax benefit of Rs. 1.5 lakh each for purchase of electric vehicle and affordable house has also been granted. PAN Card shall no more be required for filing of ITR, it can simply be done with the help of Aadhaar Number. Both can now be used inter-changeably. Also a pre-filled income tax return form shall be made available for the Salaried class.

There had been special focus on start-ups in this budget. The Finance minister assured that the issue of angel investor and its investment shall now be resolved. There shall be no scrutiny on start-ups in respect of their valuation by the income tax department.Exemption from capital gains have been introduced where a persons sells his house and invests that money in a start-ups. Further aTV channel specifically for start-ups is set to be introduced which will help them hand holding in relation to fund raising and initial hiccups.

For bigger corporate house tax rate has been reduced from 28% to 25% where the annual turnover does not exceed Rs. 400 crores. Faceless E-assessment system shall be introduced from 2019 where the cases for scrutiny shall be selected from central repository without providing the details of officer to the taxpayer. This will be huge measure to reduce corruption. For super-rich an additional surcharge of 3% to 7% has been introduced in align with the government to reduce income gaps. Also a TDS of 2% has been introduced if one withdraws cash more than Rs. 1 crore in a financial year. This is in lieu to curb cash transactions.

Apart from above various measures such as Social Stock exchangeloan against Corporate bonds100% FDIs in various sectors,Government investment in banksInsurance Schemes for small traders/business units are all meant to increase the inflow of funds in the Indian economy. The additional resources of funds will certainly boost the business activities being carried out in every nook and corner of the country. FM dint even forget visually impaired, she announced introduction of special Rupee coins for them. Even for students New Education Policy to promote Study in India set to roll out. 

Government has brought huge changes as far as indirect taxes are concerned. A Sabka Vishwas (Legacy Dispute Resolution Scheme, 2019) has been introduced to square off service tax and central excise matters pending as on 30.06.2019. This is to off-load the burden of Pre-GST litigations from the department as well as from taxpayers. The person can pay 70%/50% of the tax dues where the amount is less than 50 lakhs/more than 50 lakhs respectively. No penalty/late fees shall be charged under this scheme. Further to provide relief to taxpayers and to settle ever going debate, CGST Act 2017 has been amended to provide that interest shall be charged on net cash liability instead of Gross Tax liability under GST. Further GST Act has been changed in order to effect the various taxpayer friendly decisions taken by 35th GST Council Meeting.

We at KRG Legal feel that this budget is really positive. It not only sets the tone for future growth of our country but also towards more transparent and compliant nation. With lesser interaction with tax officials, transparency is set to increase in the interest of taxpayers. The Legacy scheme/one-time settlement was a demand pending since long which has now been fulfilled. On the similar lines, states must also come out with such scheme. We also feel that this budget is achievable and has been prepared keeping in view the ground realities. We congratulate our Lady Finance Minister for her masterstroke and look forward to more such constructive work in future as well.

“Yakin ho to raasta nikalta hai, hawa ki aut lekar bhi chirag jalta hai”

गाँव के शहरीकरण ने बढ़ाया जल संकट

सारिका तिवारी

विलंबित मानसून, पिछले वर्ष की कमी मानसून से पहले, और भूजल के स्तर में गिरावट ने संकट को बढ़ा दिया है। जलाशयों के दो-तिहाई भाग में असामान्य जल स्तर चल रहा है। बढ़ते तापमान, खराब शहरी नियोजन, जिसके परिणामस्वरूप भराव, और निर्माण, आर्द्रभूमि, योजना प्रक्रिया में हाइड्रोलॉजिकल योजनाओं के प्रति कुल उपेक्षा और पारंपरिक जल संरक्षण ज्ञान के दुरुपयोग ने इस खतरनाक स्थिति में योगदान दिया है।

स्थिति और खराब हो जाएगी, 2030 तक पानी की मांग दोगुनी होने की उम्मीद है, अगर युद्धस्तर पर पानी से निपटना तुरंत नहीं लिया जाता है। पानी की कमी का आर्थिक गतिविधि के सभी क्षेत्रों के लिए खतरनाक प्रभाव है। यह कई सामाजिक लाभों के साथ-साथ लड़कियों के साथ, विशेष रूप से ग्रामीण भारत में पानी लाने के लिए स्कूल छोड़ने के लिए मजबूर होने पर घड़ी को वापस कर देगा। यह स्वच्छता क्रांति को भी बाधित करेगा।

रविवार को अपने रेडियो संबोधन में, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यक्तियों, समुदायों और कंपनियों को एक साथ आने के लिए कहा। जल दक्षता को बढ़ावा देने और अपव्यय को कम करने के लिए सरकार के हस्तक्षेप की तत्काल आवश्यकता है। इस भयावह संकट के लिए कोई चांदी की गोली नहीं है। यदि लोग जल संकट की तीव्रता का एहसास करने में विफल रहते हैं, तो भारत का सामना करना पड़ रहा है ।

अब चेन्नई को ही देखें तो वस्तुतः सूखा चला गया है, जबकि शहरी और ग्रामीण भारत के कई अन्य हिस्से पानी के संकट से जूझ रहे हैं। पानी की बर्बादी न तो नई है और न ही तमिलनाडु की राजधानी तक सीमित है।

अध्ययनों से पता चलता है कि अगले साल तक लगभग 20 शहर शहरों में भूजल से बाहर हो जाएंगे। जलवायु परिवर्तन, आक्रामक भूमि उपयोग परिवर्तन, अनुचित शहरी नियोजन और निर्माण ने देश में जल आपातकाल में योगदान दिया है। इस संकट को हल करने के लिए सभी हितधारकों – लोगों, उद्योग, वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं और सरकारों द्वारा सभी स्तरों पर मजबूत नीतिगत रूपरेखा और ठोस प्रयास की आवश्यकता होगी।

शुरुआत के लिए, भारत सरकार को जल संरक्षण, जल निकायों के संरक्षण, वितरण नेटवर्क को टक्कर देने और नए आवास में वर्षा जल संचयन को एक अनिवार्य विशेषता बनाना चाहिए।

भारत में फसलों के लिए भय, पाँच साल में जून रहा सबसे अधिक खुश्क

सारिका तिवारी, चंडीगढ़

मौसम विभाग ने कहा, भारत में पांच साल में सूखा पड़ा, मौसम विभाग ने कहा कि फसलों और व्यापक अर्थव्यवस्था के लिए आशंका बढ़ रही है।

कुल मिलाकर, मानसून की बारिश औसत से एक तिहाई कम थी, हालांकि कुछ राज्यों में, जिनमें गन्ना भी शामिल है, जो उत्तर प्रदेश के उत्तरी राज्य में बढ़ रहा है, वे 61 प्रतिशत कम थे, भारत मौसम विभाग (आईएमडी) के आंकड़ों से पता चला है।

भारत की कृषि योग्य भूमि का लगभग 55% हिस्सा वर्षा आधारित है, और कृषि एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का लगभग 15% हिस्सा बनाती है, जो पहले से ही मंदी का शिकार है।

विश्लेषकों ने कहा कि अगर अगले दो से तीन सप्ताह में बारिश में सुधार नहीं होता है, तो भारत को संकट का सामना करना पड़ सकता है। किसानों को उपभोक्ता से लेकर उपभोक्ता सामान तक सब कुछ बेचने वाली कंपनियाँ असुरक्षित होंगी।

कृषि मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है कि किसानों ने 28 जून को 14.7 मिलियन हेक्टेयर में फसलें लगाई थीं।

दिल्ली जल बोर्ड आखिर कब काम करेगा

राजविरेन्द्र वसिष्ठ

यकीन मानिए यदि दिल्ली को सम्पूर्ण राज्य का दर्जा मिल जाता है तो दिल्ली का जल बोर्ड बहुत ही तीव्रता से अपने काम करने लगेगा। आज यदि दिल्लीवासियों को पानी ठीक से नहीं मिल रहा है तो इसके पीछे केंद्र की मोदी सरकार है। मोदी सरकार के कारण दिल्ली में सीसीटीवी कैमरा नहीं लगे और इसी कारण जल बोर्ड पर मुख्यमंत्री नज़र नहीं रख पा रहे, जल बोर्ड को सुचारु रूप से काम करवाने के लिए मुख्यमंत्री ने महिलाओं को मेट्रो में मुफ्त यात्रा की सुविधा प्रदान की, छात्रों को 100 प्रतिशत वजीफा और फीस माफी भी की। लेकिन यह जल बोर्ड काम ही नहीं कर रहा। मुख्य मंत्री ने तो पानी भी लगभग मुफ्त कर दिया था, बस यह दिल्ली के नाशुक्रे लोग जो चीज़ मुफ्त कर दी वह और भी ज़्यादा चाहिए। भाई दिल्ली में औरतों के लिए मेट्रो का सफर मुफ्त है, भीषण गर्मी की दोपहर वह मेट्रो में बिताएँ, वातानुकूलित मेट्रो में। बस वह करें जिससे मुख्य मंत्री को न काम करना पड़े न जवाब देने पड़ें।

नई दिल्ली: शहर के निवासियों को चौबीसों घंटे पाइपलाइन के जरिए जलपूर्ति करने का दिल्ली सरकार का सपना अभी दूर की कौड़ी नजर आ रहा है. इस महत्वाकांक्षी परियोजना को लेकर शुरू की गई पायलट परियोजना की स्थिति देखें तो ऐसा लगता है कि दशकों के बाद भी यह सपना कहीं सिर्फ सपना ही ना बना रह जाए.

दिल्ली जल बोर्ड ने 2009 में सभी को चौबीसों घंटे पानी देने का विचार बनाया और जनवरी 2013 में सुएज कंपनी के साथ मिलकर एक पायलट परियोजना शुरू की. इस परियोजना का लक्ष्य दिसंबर 2014 तक मालवीय नगर के 50,000 और वसंत विहार के 8,000 कनेक्शनों को चौबीसों घंटे पानी मुहैया कराना था.

परियोजना के प्रमुख और वरिष्ठ अभियंता वीरेन्द्र कुमार के अनुसार, परियोजना शुरू होने के करीब साढ़े छह साल बाद भी अभी तक मालवीय नगर के नवजीवन विहार और गीतांजली एन्क्लेव में करीब 800 और वसंत विहार के करीब 450 कनेक्शनों को ही चौबीसों घंटे पानी मिल पा रहा है.

कुमार का दावा है कि जमीन के मालिकाना हक वाली तमाम एजेंसियों, नगर निकायों, डीडीए और वन विभाग, से मंजूरी मिलने में देरी भी परियोजना की लेट-लतीफी के लिए जिम्मेदार है.

सिर्फ इतना ही नहीं, यह पायलट परियोजना इसलिए भी पूरी नहीं हो पा रही है क्योंकि जल बोर्ड के पास चौबीसों घंटे जलापूर्ति के लायक पानी नहीं है.

औसतन दिल्ली में प्रत्येक कनेक्शन को दिन में चार घंटे जलापूर्ति होती है. दिल्ली जलबोर्ड एक दिन में 93.5 करोड़ गैलन पानी की आपूर्ति करता है जबकि मांग 114 करोड़ गैलन पानी की है.

अब देखना यह है की अब जल बोर्ड के खिलाफ एलजी के घर जा कर मोदी के खिलाफ धारणा दिया जाएगा। बहुत ज़रूरी है भाई

एक और ख़बर जो ख़बर न बन सकी

1951 में कांग्रेस सरकार ने “हिंदू धर्म दान एक्ट” पास किया था। इस एक्ट के जरिए कांग्रेस ने राज्यों को अधिकार दे दिया कि वो किसी भी मंदिर को सरकार के अधीन कर सकते हैं।
इस एक्ट के बनने के बाद से आंध्र प्रदेश सरकार नें लगभग 34,000 मंदिर को अपने अधीन ले लिया था। कर्नाटक, महाराष्ट्र, ओडिशा, तमिलनाडु ने भी मंदिरों को अपने अधीन कर दिया था। इसके बाद शुरू हुआ मंदिरों के चढ़ावे में भ्रष्टाचार का खेल। उदाहरण के लिए तिरुपति बालाजी मंदिर की सालाना कमाई लगभग 3500 करोड़ रूपए है। मंदिर में रोज बैंक से दो गाड़ियां आती हैं और मंदिर को मिले चढ़ावे की रकम को ले जाती हैं। इतना फंड मिलने के बाद भी तिरुपति मंदिर को सिर्फ 7 % फंड वापस मिलता है, रखरखाव के लिए।

आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री YSR रेड्डी ने तिरुपति की 7 पहाड़ियों में से 5 को सरकार को देने का आदेश दिया था। इन पहाड़ियों पर चर्च का निर्माण किया जाना था। मंदिर को मिलने वाली चढ़ावे की रकम में से 80 % “गैर हिंदू” कामों के लिए किया जाता है।

तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक हर राज्य़ में यही हो रहा है। मंदिर से मिलने वाली रकम का इस्तेमाल मस्जिदों और चर्चों के निर्माण में किया जा रहा है। मंदिरों के फंड में भ्रष्टाचार का आलम ये है कि कर्नाटक के 2 लाख मंदिरों में लगभग 50,000 मंदिर रखरखाव के अभाव के कारण बंद हो गए हैं।
दुनिया के किसी भी लोकतंत्रिक देश में धार्मिक संस्थानों को सरकारों द्वारा कंट्रोल नहीं किया जाता है, ताकि लोगों की धार्मिक आजादी का हनन न होने पाए। लेकिन भारत में ऐसा हो रहा है। सरकारों ने मंदिरों को अपने कब्जे में इसलिए किया क्योंकि उन्हे पता है कि मंदिरों के चढ़ावे से सरकार को काफी फायदा हो सकता है।

लेकिन, सिर्फ मंदिरों को ही कब्जे में लिया जा रहा है। मस्जिदों और चर्च पर सरकार का कंट्रोल नहीं है। इतना ही नहीं, मंदिरों से मिलने वाले फंड का इस्तेमाल मस्जिद और चर्च के लिए किया जा रहा है।

इन सबका कारण अगर खोजे तो 1951 में पास किया हुआ कॉंग्रेस का वो बिल है। हिन्दू मंदिर एक्ट की पुरजोर मांग करनी चाहिए जिससे हिन्दुओ के मंदिरों का प्रबंध हिन्दू करे ।गुरुद्वारा एक्ट की तर्ज पर हिन्दू मंदिर एक्ट बनाया जाए।

राजीव कुमार सैनी,
एडवोकेट हाई कोर्ट इलाहाबाद
स्वयंसेवक
संयोजक , भाजपा विधि प्रकोष्ठ, हाई कोर्ट इलाहाबाद इकाई, प्रयागराज

यूपीए द्वारा चंद्रयान-2 को तवज्जो न दिये जाने से नाराज़ हैं पूर्व इसरो प्रमुख

इसरो के पूर्व प्रमुख सिवन इन दिनों रक्षा एवं अंतरिक्ष अनुसंधान को ले कर यूपीए की तरफ से बरती गईं कोताहीयों को ले कर काफी मुखर हैं। सीवन की सुनें तो यूपीए काल में अंतरिक्ष अनुसंधान को ले कर भारत के बढ़ते कदमों को क्यों रोका गया था यह इक शोध का विषय है। उनकी मानें तो आज जो कुछ भी मोदी राज में हो रहा है यह सब तब ही हो गया होता और आज इसरो कुछ अलग कामों में जुटा होता।
चंद्रयान-1 के मुख्य कर्ता धर्ता रहे नायर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के प्रमुख और अंतरिक्ष विभाग में 2003 से 2009 तक सचिव के पद पर रहे थे और चंद्रयान-1, 22 अक्टूबर, 2008 में छोड़ा गया था.
सनद रहे चंद्रयान-2 जुलाई-15-2019 को अंतरिक्ष में छोड़ा जाएगा

हैदराबाद: इसरो के पूर्व प्रमुख जी माधवन नायर ने बुधवार को दावा किया कि चंद्रयान-2 मिशन पहले ही रवाना किया जा सकता था पर तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार ने 2014 के लोकसभा चुनावों को देखते हुए ‘राजनीतिक कारणों’ से ‘मंगलयान’ परियोजना को आगे बढ़ा दिया. चंद्रयान-1 के मुख्य कर्ता धर्ता रहे नायर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के प्रमुख और अंतरिक्ष विभाग में 2003 से 2009 तक सचिव के पद पर रहे थे और चंद्रयान-1, 22 अक्टूबर, 2008 में छोड़ा गया था. उन्होंने कहा कि चंद्रयान-2 को 2012 के अंत में रवाना किया जाना था. नायर बीते साल अक्ट्रबर में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए थे.

वहीं कांग्रेस ने चंद्रयान-2 मिशन में संप्रग सरकार के विलंब करने से जुड़े पूर्व इसरो प्रमुख जी माधवन नायर के दावे की निंदा की है. पार्टी प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने नायर के बयान के बारे में पूछे जाने पर संवाददाताओं से कहा, ”मैंने यह वक्तव्य नहीं देखा है, लेकिन ऐसा है तो मैं इसकी आलोचना करता हूं. इसकी कड़े शब्दों में निंदा करता हूं.” उन्होंने कहा, ”आपका काम सरकार की आलोचना करना नहीं है. आप वैज्ञानिक हैं, आपका स्थान तो गौरवान्वित करने वाला है. आप देखते हैं कि एक पार्टी सत्ता से बाहर है तो कुछ बोलने लगते हैं. कल को कांग्रेस सत्ता में आई तो इसकी धुन गाने लगेंगे.” 

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Former ISRO Chief & BJP leader G Madhavan Nair: Original plan was to launch Chandrayaan-2 in 2012 but due to some policy level decisions of UPA-2 government it was delayed. After Modi ji took over, he gave thrust to such projects, especially Gaganyaan & Chandrayaan-2. (13.6.19)3,76408:06 – 14 Jun 20191,223 people are talking about this

सिंघवी ने कहा कि सरकार और भाजपा को भी नायर के इस बयान की निंदा करनी चाहिए.  इसरो के पूर्व प्रमुख जी माधवन नायर ने बुधवार को दावा किया था कि चंद्रयान-2 मिशन पहले ही रवाना किया जा सकता था, लेकिन तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार ने 2014 के लोकसभा चुनावों को देखते हुये ‘राजनीतिक कारणों’ से ‘मंगलयान’ परियोजना को आगे बढ़ा दिया. गौरतलब है कि नायर पिछले साल अक्टूबर में भाजपा में शामिल हुए थे.

बता दें चंद्रमा की सतह पर खनिजों के अध्ययन और वैज्ञानिक प्रयोग करने के लिए भारत के दूसरे चंद्र अभियान, ‘चंद्रयान-2’ को 15 जुलाई को रवाना किया जाएगा. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) प्रमुख के. सिवन ने बुधवार को यह घोषणा की. सिवन ने यहां संवाददाताओं को बताया कि यह चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास छह या सात सितंबर को उतरेगा. चंद्रयान-2 का प्रक्षेपण श्रीहरिकोटा स्थित अंतरिक्ष केंद्र से 15 जुलाई को तड़के दो बज कर 51 मिनट पर होगा. जीएसएलवी मार्क-3 रॉकेट इसे लेकर अंतरिक्ष में जाएगा. इसरो ने इससे पहले प्रक्षेपण की अवधि नौ जुलाई से 16 जुलाई के बीच रखी थी. अंतरिक्ष यान का द्रव्यमान 3.8 टन है. इसमें तीन मॉड्यूल हैं — आर्बिटर, लैंडर(विक्रम) और रोवर(प्रज्ञान). सिवन ने कहा कि ‘आर्बिटर’ में आठ पेलोड, तीन लैंडर और दो रोवर होंगे.

उन्होंने इस बात का जिक्र किया कि चंद्रयान-2 अभियान में उपग्रह से जुड़ी लागत 603 करोड़ रूपये की है. वहीं, जीएसएलवी मार्क-3 की लागत 375 करेाड़ रूपये है. इसरो के मुताबिक, ऑर्बिटर, पेलोड के साथ चंद्रमा की परिक्रमा करेगा. लैंडर चंद्रमा के पूर्व निर्धारित स्थल पर उतरेगा और वहां एक रोवर तैनात करेगा. ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर पर लगे वैज्ञानिक पेलोड के चंद्रमा की सतह पर खनिज और तत्वों का अध्ययन करने की उम्मीद है. गौरतलब है कि चंद्रयान-2 अपने पूर्ववर्ती चंद्रयान-1 का उन्नत संस्करण है. चंद्रयान-1 को करीब 10 साल पहले भेजा गया था.

रूको, अरे सुनो , नए फैशन के पत्रकार:

हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर विशेष:
सरिका तिवारी

रूको, अरे सुनो , नए फैशन के पत्रकार ।
ऐसा कौन सा कर्म-कुकर्म तुमने कर डाला, जो तुम्‍हारे गले की हड्डी की तरह फंसा हुआ है : कलम को तोप नहीं, तमंचा को परमाणु मानते हैं यह जर्नलिस्‍ट : तुम्‍हें इतना ही डर लगता है, तो पत्रकारिता को क्‍यों बदनाम करते हो : दास्‍तान-ए-डरपोंक पत्रकार-एक :

आवश्यकता है

‘‘चाहिए स्वराज्य के लिए एक संपादक। वेतन-दो सूखी रोटियां, एक गिलास ठंडा पानी और प्रत्येक संपादकीय के लिए दस साल जेल और विशेष अवसर पे अपना सिर कटाने के लिये तैयार, योग्य कलमकार’’

ढम्‍म, ढम्‍म, ढम्‍म।
सुनो, सुनो।
आज के कुछ पत्रकारों की कहानी सुनो। 
बिलकुल नएदौर के पत्रकारों की कहानी।
नये टेस्‍ट वाले पत्रकारों की कहानी।
अनोखे बिजूखा-टाइप नये-नये अंदाज के पत्रकारों की कहानी।
बिना कलम वाले पत्रकारों की कहानी। बिना किसी खबर वाले पत्रकारों की कहानी।
बकलोल पत्रकारों की कहानी।
बहादुर होने का चोला पहन कर डर पोंक रहे पत्रकारनुमा पत्रकारों की कहानी।
सिर्फ दलाली पर आमादा पत्रकारों की कहानी। खबर लिखने की तमीज नहीं, लेकिन इन्‍हें भय बहुत है।
इतने भयभीत हैं यह पत्रकार, कि उन्‍हें गनर चाहिए। सरकारी गनर, विद कारबाइन।
ढम्‍म, ढम्‍म, ढम्‍म।

जी हां, आइये ऐसे पत्रकारों की कहानी सुनिये, जो कर्म से भले पत्रकार न हों, लेकिन खुद को पत्रकार के तौर पर यत्र-तत्र-सर्वत्र विचरण करते रहते हैं। मनुष्‍यरूपेण मृगाचरन्ति। यह गजब कहानी है पत्रकारिता के उन पहरूओं की, जिनका पत्रकारिता से धेला भर लेना-देना नहीं होता। वे दावा तो करेंगे कि वह करते हैं पत्रकारिता, लेकिन डर-डर कर। इतना डरेंगे कि डरपोंक मारेंगे। डर के मारे नानी मरती है इन बहादुर पत्रकारों की। लिखने की तमीज भले न हो, लेकिन उन्‍हें अपनी सुरक्षा के लिए वे यत्र-तत्र-सर्वत्र चिल्‍ल-पों करते दिख जाते हैं। जिस किस की भी चरण-धूलि अपने माथे पर टीका की तरह सजा लेंगे और फिर भिक्षा में मांगेंगे गनर। सरकारी गनर। सरकारी स्‍टेनगन के साथ वाला गनर।
उस समय सबकी ज़रूरत सिर्फ और सिर्फ आजादी थी और उसे किसी भी हाल में हासिल करने का एकमात्र उद्देश्य लोगों के ज़हन में था। बंदूक, तलवार, तोपें और तमाम बड़े-बड़े हथियारों से क्रांतिकारी स्वतंत्रता की जंग लड़ रहे थे किंतु क्रांति का हर प्रयास सिर्फ निराशा को ही देने वाला था और इसका परिणाम था 1857 की क्रांति की विफलता। बस इसी दौर में हथियारों से परे आजादी की अलख जगाने का जिम्मा कलमकारों ने अपने हिस्से लिया और कलम की ताकत कुछ ऐसी चमकी, कि मशहूर शायर अकबर इलाहबादी को कहना पड़ा-

“खींचों न कमानों को न तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो”

जुझारू पत्रकारों के इस अमिट योगदान को बयाँ करने के लिये महान् कवियत्री महादेवी वर्मा को कहना पड़ा “पत्रकारों के पैरों के छालों से आज का इतिहास लिखा जाएगा”

इतना ही नहीं, ‘स्वराज्य’ नामक अखबार ने अपने संपादक पद के लिए छपा यह विज्ञापन इस बात को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है- ‘‘चाहिए स्वराज्य के लिए एक संपादक। वेतन-दो सूखी रोटियां, एक गिलास ठंडा पानी और प्रत्येक संपादकीय के लिए दस साल जेल और विशेष अवसर पे अपना सिर कटाने के लिये तैयार, योग्य कलमकार’’

स्वदेशी आंदोलन के समय 1907 में उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद के निवासी शांति नारायण भटनागर ने अपनी जमीन-जायदाद बेचकर स्वराज्य नामक साप्ताहिक अखबार निकाला। स्वराज्य अखबार के सम्पादकों को कुल 125 वर्ष के काले पानी की सजा हुई, फिर भी डिगे नहीं। स्वराज के संस्थापक भटनागर जी ‘रायजादा’ कहलाते थे उन्हें भी सरकार ने नहीं छोड़ा। तीन वर्षों का सश्रम कारावास हुआ। स्वराज प्रेस जब्त कर लिया गया। नया प्रेस खुला। बलिदानी सम्पादकों ने फिर कमान संभाल ली। होती लाल वर्मा को 10 वर्ष तथा बाबू राम हरि को 11 अंकों के प्रकाशन के बाद 21 वर्षों की सजा हुयी। मुंशी राम सेवक नये सम्पादक के रूप में कलेक्टर को अपना घोषणा पत्र ही दे रहे थे कि उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। कलेक्टर ने चुनौती दी कि और भी कोई है इस तख्त पर गद्दीनशीन होने के लिये। तब आगे आये देहरादून के नंद गोपाल चोपड़ा। जिन्हें 12 अंकों के सम्पादन के बाद 30 वर्षों की सजा दी गयी। तब एकदम से 12 नामों की सूची सम्पादक बनने के लिए आयी। सभी ने कहा हम करेंगे सम्पादन। किंतु पंजाब के फील्ड मार्शल कहे जाने वाले लद्धा राम कपूर सम्पादक बने। उन्हें तीन सम्पादकीय लिखने पर प्रति सम्पादकीय 10 वर्ष अर्थात् कुल तीस वर्षों की सजा हुई। इसके पश्चात अमीर चन्द्र जी इसके सम्पादक बने। किन्तु यहां महत्व का विषय यह है कि हर सम्पादक के जेल जाने के बाद स्वराज में एक विज्ञापन छपता था ‘सम्पादक चाहिए- वेतन दो सूखे ठिक्कड़ (रोटी), एक गिलास ठंडा पानी, हर सम्पादकीय लिखने पर 10 वर्ष काले पानी की कैद’। फिर भी लोग डरे नहीं, दमन के सम्मुख झुके नहीं। स्वाभाविक रूप से उनकी प्रेरणा का आधार बिगड़ती व्यवस्था का अंर्तनाद ही था।

लेकिन अब इन्‍हें अपने पेशे को चमकाने के लिए खबरों और व्‍याकरणों की जरूरत नहीं पड़ती है। बल्कि उसके ठीक उलट, उन्‍हें अपना धंधा चमकाने के लिए सरकारी स्‍टेनगन लादे एक सरकारी गनर की जरूरत पड़ती है, जिसके साथ वे खड़े हों और छाती ठोंक कर यह प्रदर्शन करने की मूर्खता कर सकें कि उनकी सुरक्षा अब सरकार का जिम्‍मा बन चुका है। जाहिर है कि वह दलाली ही है, जिसका दारोमदार इस नये दौर के पत्रकारों ने थाम लिया है। इनमें से ही कई लोग भी हैं, जो खुद को वरिष्‍ठ पत्रकार के तौर पर पेश करते हैं, लेकिन अपनी काली-करतूतों के चलते गनर हासिल कर उसका सार्वजनिक प्रदर्शन करते रहते हैं।

जी हां, अब नतीजा यह कि पत्रकारिता अब कलम के सिपहसालारों की संख्‍या अब बेहद न्‍यून होती जा रही है। उनकी जगह ले लिया है बनावटी और दिखावटी पत्रकारों ने, जिनको पत्रकारिता का ककहरा तक नहीं आता, लेकिन झूठ और चापलूसियों की ऐसी-ऐसी लन्‍तरानियां उछालने में माहिर हैं यह पत्रकार।

लोक सभा ही नहीं राज्य सभा में भी बढ़ेंगी भाजपा की सीटें

अजेय भाजपा के रथ को रोक्न गठबंधन के भी बस का नहीं है, कारण कई सांसदिया क्षेत्रों में विपक्ष के मिल कर भी उतने मत नहीं हैं जो भाजपा को हटा पाते। लेकिन विपक्ष मोदी की प्रचंड जीत के बाद भी अभी बाज नहीं आया है। कांग्रेस को यकीन है की अब वह लोक सभा में मात्र 44 थे तब उन्होने सांसद नहीं चलने दी थी तो अब तो वह फिर 51 हैं, राज्य सभा में भी विपक्ष बहू संख्या में है इसी लिए विपक्ष अपनी मन मर्ज़ी करेगा। लें राज्य सभा में भारी लत फेर के संकेत हैं।

नई दिल्ली: लोकसभा चुनाव में भारी सफलता के बाद भाजपा नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पास अगले साल के अंत तक राज्यसभा में बहुमत हो जाएगा और उसके बाद मोदी सरकार के लिए अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने में आसानी हो जाएगी. फिलहाल राजग के पास राज्यसभा में 102 सदस्य हैं, जबकि कांग्रेस नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन संप्रग के पास 66 और दोनों गठबंनों से बाहर की पार्टियों के पास 66 सदस्य हैं.

राजग के खेमे में अगले साल नवंबर तक लगभग 18 सीटें और जुड़ जाएंगी. राजग को कुछ नामित, निर्दलीय और असंबद्ध सदस्यों का भी समर्थन मिल सकता है. राज्यसभा में आधी संख्या 123 है और ऊपरी सदन के सदस्यों का चुनाव राज्य विधानसभा के सदस्य करते हैं. अगले साल नवंबर में उत्तर प्रदेश में खाली होने वाली राज्यसभा की 10 में से अधिकांश सीटें भाजपा जीतेगी. इनमें से नौ सीटें विपक्षी दलों के पास हैं. इनमें से छह समाजवादी पार्टी (सपा) के पास, दो बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और एक कांग्रेस के पास है.

अगले साल असम, अरुणाचल प्रदेश, उत्तराखंड, ओडिशा, हिमाचल प्रदेश में सीटें मिलेंगी
उत्तर प्रदेश विधानसभा में भाजपा के 309 सदस्य हैं. सपा के 48, बसपा के 19 और कांग्रेस के सात सदस्य हैं. अगले साल तक बीजेपी को असम, अरुणाचल प्रदेश, उत्तराखंड, ओडिशा, हिमाचल प्रदेश में सीटें मिलेंगी. भाजपा राजस्थान, बिहार, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में सीटें गंवाएगी. महाराष्ट्र और हरियाणा में विधानसभा चुनाव के परिणामों का भी राजग की सीट संख्या पर असर होगा. हालांकि असम की दो सीटों के चुनाव की घोषणा हो चुकी है, जबकि तीन अन्य सीटें राज्य में अगले साल तक खाली हो जाएंगी. बीजेपी और उसके सहयोगी दलों के पास राज्य विधानसभा में दो-तिहाई बहुमत है.

एक तिहाई सीटें जून और नवंबर में खाली होंगी
ऊपरी सदन की लगभग एक-तिहाई सीटें इस साल जून और अगले साल नवंबर में खाली हो जाएंगी. दो सीटें अगले महीने असम में खाली हो जाएंगी और छह सीटें इस साल जुलाई में तमिलनाडु में खाली हो जाएंगी. उसके बाद अगले साल अप्रैल में 55 सीटें खाली होंगी, पांच जून में, एक जुलाई में और 11 नवंबर में खाली होंगी.

कई अहम बि‍ल पास करा सकेगी बीजेपी
भाजपा नेतृत्व वाली सरकार का प्रयास अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने का होगा, जो पिछले पांच सालों के दौरान विपक्ष के विरोध के कारण आगे नहीं बढ़ पा रही थीं. सरकार तीन तलाक विधेयक को पास नहीं करा सकी, जबकि यह विधेयक लोकसभा में पारित हो चुका है. नागरिकता संशोधन विधेयक भी पास नहीं हो पाया है. बीजू जनता दल और तेलंगाना राष्ट्र समिति दोनों ने हालांकि भाजपा और कांग्रेस से समान रूप से दूरी बना रखी है, लेकिन दोनों दलों ने पिछले साल राज्यसभा के उपसभापति पद के लिए हरिवंश का समर्थन किया था.

पत्रकारिता के पितृ परूष की जयंती पर विशेष

मेरे मत में पत्रकारिता, पाखंड की पीठ पर चुनौती का चाबुक है और देवर्षि नारद इधर-उधर घूमते हुए जो पाखंड देखते हैं उसे खंड-खंड करने के लिए ही तो लोकमंगल की दृष्टि से संवाद करते हैं :
– अजहर हाशमी

शास्त्रों में उल्लेख के अनुसार ‘नार’ शब्द का अर्थ जल है। ये सबको जलदान, ज्ञानदान करने एवं तर्पण करने में निपुण होने की वजह से नारद कहलाए। अथर्ववेद में भी अनेक बार नारद नाम के ऋषि का उल्लेख है। प्रसिद्ध मैत्रायणी संहिता में नारद को आचार्य के रूप में सम्मानित किया गया है। कुछ स्थानों पर नारद का वर्णन बृहस्पति के शिष्य के रूप में भी मिलता है।

अविरल भक्ति के प्रतीक और ब्रह्मा के मानस पुत्र माने जाने वाले देवर्षि नारद का पुराणों में विस्तार से बारम्बार वर्णन आता है। आम आदमी नारद को भिड़ाऊ और कलह- विशेषज्ञ मानता है, परंतु इनकी यह छवि सर्वथा असत्य है क्योंकि नारद का मुख्य उद्देश्य प्रत्येक भक्त की पुकार भगवान तक पहुंचाना है।

सृष्‍टि के प्रथम संदेशवाहक देवर्षि नारद नाम सुनते ही इधर-उधर विचरण करने वाले व्यक्तित्व की अनुभूति होती है। आम धारणा यही है कि देवर्षि नारद ऐसी ‘विभूति’ हैं जो ‘इधर की उधर’ करते रहते हैं। प्रायः नारद को चुगलखोर के रूप में जानते हैं। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। मेरा मत है कि नारद इधर-उधर घूमते हुए संवाद-संकलन का कार्य करते हैं। इस प्रकार एक घुमक्कड़, किंतु सही और सक्रिय-सार्थक संवाददाता की भूमिका निभाते हैं और अधिक स्पष्ट शब्दों में कहें तो यह कि देवर्षि ही नहीं दिव्य पत्रकार भी हैं नारद।

महर्षि वेदव्यास विश्व के पहले संपादक हैं- क्योंकि उन्होंने वेदों का संपादन करके यह निश्चित किया कि कौन-सा मंत्र किस वेद में जाएगा अर्थात्‌ ऋग्वेद में कौन-से मंत्र होंगे और यजुर्वेद में कौन से, सामवेद में कौन से मंत्र होंगे तथा अर्थर्ववेद में कौन से? वेदों के श्रेणीकरण और सूचीकरण का कार्य भी वेदव्यास ने किया और वेदों के संपादन का यह कार्य महाभारत के लेखन से भी अधिक कठिन और महत्वपूर्ण था।

देवर्षि नारद दुनिया के प्रथम पत्रकार या पहले संवाददाता हैं, क्योंकि देवर्षि नारद ने इस लोक से उस लोक में परिक्रमा करते हुए संवादों के आदान-प्रदान द्वारा पत्रकारिता का प्रारंभ किया। इस प्रकार देवर्षि नारद पत्रकारिता के प्रथम पुरुष/पुरोधा पुरुष/पितृ पुरुष हैं। जो इधर से उधर घूमते हैं तो संवाद का सेतु ही बनाते हैं। जब सेतु बनाया जाता है तो दो बिंदुओं या दो सिरों को मिलाने का कार्य किया जाता है।

दरअसल देवर्षि नारद भी इधर और उधर के दो बिंदुओं के बीच संवाद का सेतु स्थापित करने के लिए संवाददाता का कार्य करते हैं। इस प्रकार नारद संवाद का सेतु जोड़ने का कार्य करते हैं तोड़ने का नहीं। परंतु चूंकि अपने ही पिता ब्रह्मा के शाप के वशीभूत (देवर्षि नारद को ब्रह्मा का मानस-पुत्र माना जाता है। ब्रह्मा के कार्य में पैदा होते ही नारद ने कुछ बाधा उपस्थित की। अतः उन्होंने नारद को एक स्थान पर स्थित न रहकर घूमते रहने का शाप दे दिया।) नारद को इधर से उधर (इस लोक से उस लोक में) घूमना पड़ता है तो इसमें संवाद की जो अदला-बदली हो जाती है उसे लोगों ने नकारात्मक दृष्टि से देखा और नारद को ‘भिड़ाने वाले’ या ‘कलह कराने वाले’ किरदार के फ्रेम में फिट कर दिया। नारद की छवि को इस प्रकार प्रस्तुत किया कि वे ‘चोर को कहते हैं कि चोरी कर और साहूकार को कहते हैं कि जाग।’ लेकिन यह सच नहीं है। सच तो यह है कि नारद घूमते हुए सीधे संवाद कर रहे हैं और सीधे संवाद भेज रहे हैं इसलिए नारद सतत सजग-सक्रिय हैं यानी नारद का संवाद ‘टेबल-रिपोर्टिंग’ नहीं ‘स्पॉट-रिपोर्टिंग’ है इसलिए उसमें जीवंतता है।

अजहर हाशमी मत में पत्रकारिता, पाखंड की पीठ पर चुनौती का चाबुक है और देवर्षि नारद इधर-उधर घूमते हुए जो पाखंड देखते हैं उसे खंड-खंड करने के लिए ही तो लोकमंगल की दृष्टि से संवाद करते हैं। रामावतार से लेकर कृष्णावतार तक नारद की पत्रकारिता लोकमंगल की ही पत्रकारिता और लोकहित का ही संवाद-संकलन है। उनके ‘इधर-उधर’ संवाद करने से जब राम का रावण से या कृष्ण का कंस से दंगल होता है तभी तो लोक का मंगल होता है। अतः देवर्षि नारद दिव्य पत्रकार के रूप में लोकमंडल संवाददाता हैं।