शिवाजी भोंसले उर्फ़ छत्रपति शिवाजी महाराज

संकलन: राजविरेन्द्र वशिष्ठ

छत्रपति शिवाजी भोसले

शिवाजी भोंसले उर्फ़ छत्रपति शिवाजी महाराज एक भारतीय शासक और मराठा साम्राज्य के संस्थापक थे। शिवाजी ने आदिलशाही सल्तनत की अधीनता स्वीकार ना करते हुए उनसे कई लड़ाईयां की थी। शिवाजी को हिन्दूओं का नायक भी माना जाता है। शिवाजी महाराज एक बहादुर, बुद्धिमान और निडर शासक थे। धार्मिक कार्य में उनकी काफी रूचि थी। रामायण और महाभारत का अभ्यास वह बड़े ध्यान से करते थे। वर्ष 1674 में शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ और उन्हें छत्रपति का ख़िताब मिला।

माँ जीजाबाई की गोद में बालक शिवा

शिवाजी महाराज का जन्म 19 फ़रवरी 1630 में शिवनेरी दुर्ग में हुआ था। इनके पिता का नाम शाहजी भोसलें और माता का नाम जीजाबाई था। शिवनेरी दुर्ग पुणे के पास है। उनकी माता ने उनका नाम भगवान शिवाय के नाम पर शिवाजी रखा। उनकी माता भगवान शिवाय से स्वस्थ सन्तान के लिए प्रार्थना किया करती थी। शिवाजी के पिताजी शाहजी भोंसले एक मराठा सेनापति थे, जो कि डेक्कन सल्तनत के लिए कार्य किया करते थे। शिवाजी के जन्म के समय डेक्कन की सत्ता तीन इस्लामिक सल्तनतों बीजापुर, अहमदनगर और गोलकोंडा में थी। शिवाजी अपनी माँ जीजाबाई के प्रति बेहद समर्पित थे। उनकी माँ बहुत ही धार्मिक थी। उनकी माता शिवाजी को बचपन से ही युद्ध की कहानियां तथा उस युग की घटनाओं के बारे में बताती रहती थीं, खासकर उनकी माँ उन्हें रामायण और महाभारत की प्रमुख कहानियाँ सुनाती थीं। जिन्हें सुनकर शिवाजी के ऊपर बहुत ही गहरा असर पड़ा था। इन दो ग्रंथो की वजह से वो जीवनपर्यन्त हिन्दू महत्वो का बचाव करते रहे। इसी दौरान शाहजी ने दूसरा विवाह किया और अपनी दुसरी पत्नी तुकाबाई के साथ कर्नाटक में आदिलशाह की तरफ से सैन्य अभियानो के लिए चले गए। उन्होंने शिवाजी और जीजाबाई को दादोजी कोंणदेव के पास छोड़ दिया। दादोजी ने शिवाजी को बुनियादी लड़ाई तकनीकों के बारे में जैसे कि- घुड़सवारी, तलवारबाजी और निशानेबाजी सिखाई।

कोंडना पर हमला

शिवाजी महाराज ने वर्ष 1645 में, आदिलशाह सेना को बिना सूचित किए कोंड़ना किला पर हमला कर दिया। इसके बाद आदिलशाह सेना ने शिवाजी के पिता शाहजी को गिरफ्तार कर लिया। आदिलशाह सेना ने यह मांग रखी कि वह उनके पिता को तब रिहा करेगा जब वह कोंड़ना का किला छोड़ देंगे। उनके पिता की रिहाई के बाद 1645 में शाहजी की मृत्यु हो गई। पिता की मृत्यु के बाद शिवाजी ने फिर से आक्रमण करना शुरू कर दिया।

वर्ष 1659 में, आदिलशाह ने अपने सबसे बहादुर सेनापति अफज़ल खान को शिवाजी को मारने के लिए भेजा। शिवाजी और अफज़ल खान 10 नवम्बर 1659 को प्रतापगढ़ के किले के पास एक झोपड़ी में मिले। दोनों के बीच एक शर्त रखी गई कि वह दोनों अपने साथ केवल एक ही तलवार लाए गए। शिवाजी को अफज़ल खान पर भरोसा नही था और इसलिए शिवाजी ने अपने कपड़ो के नीचे कवच डाला और अपनी दाई भुजा पर बाघ नख (Tiger’s Claw) रखा और अफज़ल खान से मिलने चले गए। अफज़ल खान ने शिवाजी के ऊपर वार किया लेकिन अपने कवच की वजह से वह बच गए, और फिर शिवाजी ने अपने बाघ नख (Tiger’s Claw) से अफज़ल खान पर हमला कर दिया। हमला इतना घातक था कि अफज़ल खान बुरी तरह से घायल हो गया, और उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद शिवाजी के सैनिकों ने बीजापुर पर आक्रमण कर दिया।

शिवाजी ने 10 नवम्बर 1659 को प्रतापगढ़ के युद्ध में बीजापुर की सेना को हरा दिया। शिवाजी की सेना ने लगातार आक्रमण करना शुरू कर दिया। शिवाजी की सेना ने बीजापुर के 3000 सैनिक मार दिए, और अफज़ल खान के दो पुत्रों को गिरफ्तार कर लिया। शिवाजी ने बड़ी संख्या में हथियारों ,घोड़ों,और दुसरे सैन्य सामानों को अपने अधीन कर लिया। इससे शिवाजी की सेना और ज्यादा मजबूत हो गई, और मुगल बादशाह औरंगजेब ने इसे मुगल साम्राज्य का सबसे बड़ा खतरा समझा।

मुगलों के शासक औरंगजेब का ध्यान उत्तर भारत के बाद दक्षिण भारत की तरफ गया। उसे शिवाजी के बारे में पहले से ही मालूम था। औरंगजेब ने दक्षिण भारत में अपने मामा शाइस्ता खान को सूबेदार बना दिया था। शाइस्ता खान अपने 150,000 सैनिकों को लेकर पुणे पहुँच गया और उसने वहां लूटपाट शुरू कर दी। शिवाजी ने अपने 350 मावलो के साथ उनपर हमला कर दिया था, तब शाइस्ता खान अपनी जान बचाकर भाग खड़ा हुआ और शाइस्ता खान को इस हमले में अपनी 3 उँगलियाँ गंवानी पड़ी। इस हमले में शिवाजी महाराज ने शाइस्ता खान के पुत्र और उनके 40 सैनिकों का वध कर दिया। शाइस्ता खान ने पुणे से बाहर मुगल सेना के पास जा कर शरण ली और औरंगजेब ने शर्मिंदगी के मारे शाइस्ता खान को दक्षिण भारत से हटाकर बंगाल का सूबेदार बना दिया।

सूरत की लूट जहां शिवाजी को 132 लाख की संपत्ति हासिल हुई

इस जीत के बाद शिवाजी की शक्ति और ज्यादा मजबूत हो गई थी। लेकिन कुछ समय बाद शाइस्ता खान ने अपने 15,000 सैनिकों के साथ मिलकर  शिवाजी के कई क्षेत्रो को जला कर तबाह कर दिया, बाद में शिवाजी ने इस तबाही का बदला लेने के लिए मुगलों के क्षेत्रों में जाकर लूटपाट शुरू कर दी। सूरत उस समय हिन्दू मुसलमानों का हज पर जाने का एक प्रवेश द्वार था। शिवाजी ने 4 हजार सैनिकों के साथ सूरत के व्यापारियों को लूटने का आदेश दिया, लेकिन शिवाजी ने किसी भी आम आदमी को अपनी लूट का शिकार नहीं बनाया।

शिवाजी महाराज को आगरा बुलाया गया जहां उन्हें लागा कि उनको उचित सम्मान नहीं दिया गया है। इसके खिलाफ उन्होंने अपना रोष दरबार पर निकाला और औरंगजेब पर छल का आरोप लगाया। औरंगजेब ने शिवाजी को कैद कर लिया और शिवाजी पर 500 सैनिकों का पहरा लगा दिया। हालांकि उनके आग्रह करने पर उनकी स्वास्थ्य की दुआ करने वाले आगरा के संत, फकीरों और मन्दिरों में प्रतिदिन मिठाइयाँ और उपहार भेजने की अनुमति दे दी गई थी। कुछ दिनों तक यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहा। एक दिन शिवाजी ने संभाजी को मिठाइयों की टोकरी में बैठकर और खुद मिठाई की टोकरी उठाने वाले मजदूर बनकर वहा से भाग गए। इसके बाद शिवाजी ने खुद को और संभाजी को मुगलों से बचाने के लिए संभाजी की मौत की अफवाह फैला दी। इसके बाद संभाजी को मथुरा में एक ब्राह्मण के यहाँ छोड़ कर शिवाजी महाराज बनारस चले गए। औरंगजेब ने जयसिंह पर शक करके उसकी हत्या विष देकर करवा डाली। जसवंत सिंह ( शिवाजी का मित्र) के द्वारा पहल करने के बाद सन् 1668 में शिवाजी ने मुगलों के साथ दूसरी बार सन्धि की। औरंगजेब ने शिवाजी को राजा की मान्यता दी। शिवाजी के पुत्र संभाजी को 5000 की मनसबदारी मिली और शिवाजी को पूना, चाकन और सूपा का जिला लौटा दिया गया, लेकिन, सिंहगढ़ और पुरन्दर पर मुग़लों का अधिपत्य बना रहा। सन् 1670 में सूरत नगर को दूसरी बार शिवाजी ने लूटा, नगर से 132 लाख की सम्पत्ति शिवाजी के हाथ लगी और लौटते वक्त शिवाजी ने एक बार फिर मुगल सेना को सूरत में हराया।

सन 1674 तक शिवाजी के सम्राज्य का अच्छा खासा विस्तार हो चूका था। पश्चिमी महाराष्ट्र में स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के बाद शिवाजी ने अपना राज्याभिषेक करना चाहा, परन्तु ब्राहमणों ने उनका घोर विरोध किया। क्योंकि शिवाजी क्षत्रिय नहीं थे उन्होंने कहा की क्षत्रियता का प्रमाण लाओ तभी वह राज्याभिषेक करेगा। बालाजी राव जी ने शिवाजी का सम्बन्ध मेवाड़ के सिसोदिया वंश से समबंद्ध के प्रमाण भेजे जिससे संतुष्ट होकर वह रायगढ़ आया और उन्होंने राज्याभिषेक किया। राज्याभिषेक के बाद भी पुणे के ब्राह्मणों ने शिवाजी को राजा मानने से इनकार कर दिया। इसके बाद शिवाजी ने अष्टप्रधान मंडल की स्थापना कि। विभिन्न राज्यों के दूतों, प्रतिनिधियों के अलावा विदेशी व्यापारियों को भी इस समारोह में आमंत्रित किया गया। इस समारोह में लगभग रायगढ़ के 5000 लोग इकट्ठा हुए थे। शिवाजी को छत्रपति का खिताब दिया गया। उनके राज्याभिषेक के 12 दिन बाद ही उनकी माता का देहांत हो गया। इस कारण फिर से 4 अक्टूबर 1674 को दूसरी बार उनका राज्याभिषेक हुआ। दो बार हुए इस समारोह में लगभग 50 लाख रुपये खर्च हुए। इस समारोह में हिन्दू स्वराज की स्थापना का उद्घोष किया गया था।

शिवाजी के परिवार में संस्कृत का ज्ञान अच्छा था और संस्कृत भाषा को बढ़ावा दिया गया था। शिवाजी ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अपने किलों के नाम संस्कृत में रखे जैसे कि- सिंधुदुर्ग, प्रचंडगढ़, तथा सुवर्णदुर्ग। उनके राजपुरोहित केशव पंडित स्वंय एक संस्कृत के कवि तथा शास्त्री थे। उन्होंने दरबार के कई पुराने कायदों को पुनर्जीवित किया एवं शासकिय कार्यों में मराठी तथा संस्कृत भाषा के प्रयोग को बढ़ावा दिया।

शिवाजी एक कट्टर हिन्दू थे, वह सभी धर्मों का सम्मान करते थे। उनके राज्य में मुसलमानों को धार्मिक स्वतंत्रता थी। शिवाजी ने कई मस्जिदों के निर्माण के लिए दान भी दिए था। हिन्दू पण्डितों की तरह मुसलमान सन्तों और फ़कीरों को बराबर का सम्मान प्राप्त था। उनकी सेना में कई मुस्लिम सैनिक भी थे। शिवाजी हिन्दू संकृति का प्रचार किया करते थे। वह अक्सर दशहरा पर अपने अभियानों का आरम्भ किया करते थे।

शिवाजी, भारतीय नौसेना के पितामह

शिवाजी ने काफी कुशलता से अपनी सेना को खड़ा किया था। उनके पास एक विशाल नौसेना (Navy) भी थी। जिसके प्रमुख मयंक भंडारी थे। शिवाजी ने अनुशासित सेना तथा सुस्थापित प्रशासनिक संगठनों की मदद से एक निपुण तथा प्रगतिशील सभ्य शासन स्थापित किया। उन्होंने सैन्य रणनीति में नवीन तरीके अपनाएं जिसमें दुश्मनों पर अचानक आक्रमण करना जैसे तरीके शामिल थे।

अष्टप्रधान

शिवाजी को एक सम्राट के रूप में जाना जाता है। उनको बचपन में कुछ खास शिक्षा नहीं मिली थी, लेकिन वह फिर भी भारतीय इतिहास और राजनीति से अच्छी तरह से परिचत थे। शिवाजी ने प्रशासकीय कार्यों में मदद के लिए आठ मंत्रियों का एक मंडल तैयार किया था, जिसे अष्टप्रधान कहा जाता था। इसमें मंत्रियों प्रधान को पेशवा कहते थे, राजा के बाद सबसे ज्यादा महत्व पेशवा का होता था। अमात्य वित्त मंत्री और राजस्व के कार्यों को देखता था, और मंत्री राजा के दैनिक कार्यों का लेखा जोखा रखता था। सचिव दफ्तरी काम किया करता था। सुमन्त विदेश मंत्री होता था जो सारे बाहर के काम किया करता था। सेनापति सेना का प्रधान होता था। पण्डितराव दान और धार्मिक कार्य किया करता था। न्यायाधीश कानूनी मामलों की देखरेख करता था।

शिवाजी और अष्टप्रधान

मराठा साम्राज्य उस समय तीन या चार विभागों में बटा हुआ था। प्रत्येक प्रान्त में एक सूबेदार था जिसे प्रान्तपति कहा जाता था। हरेक सूबेदार के पास एक अष्टप्रधान समिति होती थी। न्यायव्यवस्था प्राचीन प्रणाली पर आधारित थी। शुक्राचार्य, कौटिल्य और हिन्दू धर्मशास्त्रों को आधार मानकर निर्णय दिया जाता था। गाँव के पटेल फौजदारी मुकदमों की जाँच करते थे। राज्य की आय का साधन भूमिकर था, सरदेशमुखी से भी राजस्व वसूला जाता था। पड़ोसी राज्यों की सुरक्षा की गारंटी के लिए वसूले जाने वाला सरदेशमुखी कर था। शिवाजी अपने आपको मराठों का सरदेशमुख कहा करते थे और इसी हैसियत से सरदेशमुखी कर वसूला जाता था।

शिवाजी महाराज ने अपने पिता से स्वराज की शिक्षा हासिल की, जब बीजापुर के सुल्तान ने उनके पिता को गिरफ्तार कर लिया था तो शिवाजी ने एक आदर्श पुत्र की तरह अपने पिता को बीजापुर के सुल्तान से सन्धि कर के छुड़वा लिया। अपने पिता की मृत्यु के बाद ही शिवाजी ने अपना राज-तिलक करवाया। सभी प्रजा शिवजी का सम्मान करती थी और यही कारण है कि शिवाजी के शासनकाल के दौरान कोई आन्तरिक विद्रोह जैसी घटना नहीं हुई थी। वह एक महान सेना नायक के साथ-साथ एक अच्छे कूटनीतिज्ञ भी थे। वह अपने शत्रु को आसानी से मात दे देते थे।

शिवाजी के सिक्के

एक स्वतंत्र शासक की तरह उन्होंने अपने नाम का सिक्का चलवाया। जिसे “शिवराई” कहते थे, और यह सिक्का संस्कृत भाषा में था।

3 अप्रैल, 1680 में लगातार तीन सप्ताह तक बीमार रहने के बाद यह वीर हिन्दू सम्राट सदा के लिए इतिहासों में अमर हो गया, और उस समय उनकी आयु 50 वर्ष थी। शिवाजी महाराज एक वीर पुरुष थे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन मराठा, हिन्दू साम्राज्य के लिए समर्पित कर दिया। मराठा इतिहास में सबसे पहला नाम शिवाजी का ही आता है। आज महाराष्ट्र में ही नहीं पूरे देश में वीर शिवाजी महाराज की जयंती बड़े ही धूम-धाम के साथ मनाई जाती है।

प्राचीन भारतीय सिक्षा का स्वर्णिम युग बनाम वर्तमान शिक्षा व्यवस्था

विश्लेषण


Er. S. K. Jain – Feature Editor

भारतवर्ष आर्यभट्ट, वाराहमिहिर, चाणक्य जैसे विद्वानों का देश रहा है। हमारे देश में उस समय तक्षशिला, नालंदा व पुष्पगिरी जैसे विश्व विद्यालय थे जबकि पश्चिमी देशों के लोग फूहड़ और अनपढ़ थे। नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना 5वीं शताब्दी में हुई थी, उस वक्त वहाँ करीब 10,000 देशी एवं विदेशी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करते थे। करीब 1500 वर्ष पहले यह विश्व विद्यालय ज्ञान और विज्ञान के अंतर्राष्ट्रीय केंद्र माने जाते थे। विदेशी छात्र इन विश्व विद्यालयों में पढ़ने के पश्चात तमाम उम्र अपने शिक्षकों से प्रभावित रहते थे और उन्हे उफार भेजते रहते थे। चीन के छत्र भारतीय संस्कृति से इतने प्रभावित थे कि उन्होने अपने चाइनीज़ नाम बदल कर भारतीय नाम रख लिए थे। जैसे प्रकाशमती, श्रीदेव, चरित्रवर्मा, प्रज्ञावर्मा, प्रज्ञादेव इत्यादि। यह हमारे लिए बहुत ही गर्व कि बात थी। कई चीनी विद्वानों ने इन विश्व विद्यालयों को भारत और चीन के सामाजिक एवं सांस्कृतिक सम्बन्धों को जोड़ने वाला सेतु कहा था।

नालंदा विश्व विद्यालय के छत्रों में चीन के प्रसिद्ध यात्री और विद्वान हयून्त्सांग, फ़ाहियान, सांगयून एवं इतसिंग भी शामिल थे। हयून्त्सांग नालंदा के आचार्य शीलभद्र के शिष्य थे। हयून्त्सांग ने 6 साल तक विषविद्यालय में रह कर विधिविशारद (कानून) की पढ़ाई की थी। चीनी मूल के छात्र इत्सिंग को चीनी-संस्कृत शब्दकोश लिखने का श्रेय दिया जाता है। उस समय की हमारी शिक्षा ने हमारा नैतिक स्टार इतना बढ़ा दिया था की हमें अपनी किसी भी चीज़ को ताला लगा कर रखने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। चोरी – चकारी के बारे में हम सोच भी नहीं सकते थे। चीनी यात्रियों ने अपने स्न्समरणों में लिखा था की भारत में लोग अपने घरों को ताले नहीं लगाते हैं। आज हम पढ़ कर अपने आप को गौरवान्वित महसूस करते हैं। और आज के युग में हम अपने साइकिल को भी ताला लगाए बिना नहीं छोड़ सकते। इसे हम अपनी नैतिकता के हनन की पराकाष्ठा की संज्ञा दे सकते हैं। भारत ने शून्य(0) और दशमलव(॰) की खोज की और दुनिया को गिनती सिखाई। अगर शून्य न होता तो आज कम्प्यूटर और सुपरकम्प्यूटर इस दुनिया मेननहीन होते। क्योंकि कंपूतर की भाषा को बाइनेरी भाषा यानि शून्य और एक (0 and 1) पर ही आधारित है।

आज हमारे भारत में शिक्षा व्यवस्था की की स्थिति है, इसे जानकार हमें घोर आश्चर्य और निराशा का सामना करना पद सकता है। ए सर्वे में कुछ छात्रों को हिन्दी का एक वाक्य लिख कर दिया गया, जिसे पढ़ कर सुनाने के लिए कहा गया। यह वाक्य साधारण सा दूसरी कक्षा के सतर का था। जानकार हैरानी हुई कि हमारे देश के ग्रामीण इलाके के तीसरी कक्षा के 73%, पाँचवीं कक्षा के 50% और आठवीं कक्षा के 27% बच्चे यह वाक्य नहीं पढ़ सकते। इससे बच्चों कि बौद्धिक क्षमता के सतर का पता चलता है। यह आंकड़े सान 2018 की ANNUAL STATUS OF EDUCATION की एक रिपोर्ट में लिखा है। सरकारी संगठन हर वर्ष ग्रामीण भारत की शिक्षा सतर को दर्शाने वाली रिपोर्ट प्रकाशित करता है। यह 336 पन्नों की रिपोर्ट है। बहुत अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि आज भारत के, ख़ास तौर पर ग्रामीण इलाकों के बाचचे ‘हिन्दी’ के वाक्य पढ़ने में असमर्थ हैं और गणित के साधारण से सवालों को हल नहीं कर सकते। क्या यही बच्चे भारत का भविष्य तय करेंगे।

ए॰ एफ़॰ आई॰ आर॰ कि रिपोर्ट में बताया गया है कि गैर सरकारी संगठन PRATHAM ने भारत के 28 राज्यों के 596 जिलों के ग्रामीण इलाकों से अपने आंकड़े इकट्ठे किए हैं। इस संस्था ने 3 से 16 वर्ष कि आयु के 50 हज़ार बच्चों का परीक्षण किया, इस संस्था ने भारत के ग्रामीण इलाकों के निजी व सरकारी विद्यालयों के बहचोन से बात की।  इस रिपोर्ट में ,ईख है की 8वीं कक्षा पास बहुत से छात्र गणित के साधारण सवालों को भी हल नहीं कर सकते। 8वीं कक्षा के 56% छात्र 3 अंकों की एक संख्या को एक अंक की संख्या से भाग(÷)  नहीं दे सकते। 5वीं कक्षा के 72% छात्र किसी भी प्रकार के भाग(÷)  का सवाल हल नहीं कर सकते। 3सरी कक्षा के 70% छात्र एक संख्या को दूसरी संख्या से घटाना नहीं जानते। सबसे बुरी स्थिति राजस्थान प्रदेश की है जहां इस तरह के बच्चों की संख्या 92% है। केरल राज्य में यह स्थिति कुछ अच्छी है उस सर्वे से यह भी पता चला की उत्तर भारत के मुक़ाबले दक्षिण भारत के विद्यार्थियों का शिक्षा सार बेहतर है। अंक गणित के बारे में लड़कियां लड़कों से पीछे हैं। ग्रामीण भारत में 50% छात्रों के मुक़ाबिल सिर्फ 44% छात्राएं ही भाग(÷)   करना जानतीं हैं।

भारत का इतिहास सिर्फ 70 साल पुराना नहीं बल्कि हजारों वर्षों पुराना है। आज चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है और माना जा रहा है की कुछ वर्षों के अंतराल में चीन सबको पीछे छोड़ता हुआ सुपर – पावर बन जाएगा। इतिहास का वह भी दौर रहा है की चीन के छात्र भारत विद्यार्जन के लिए आते थे। आज हमारे मन में यह सवाल उठ रहा होगा इ अगर भारत कभी विश्वगुरु था और हमारी शिक्षा पद्धति इतनी अच्छी और विशाल थी तो क्या कार्न थे की शिक्षा के मामले में हमारी स्थिति आज इतनी दयनीय और ख़राब हो गयी है। करीब 1300 साल पहले भारत पर अर्ब और तुर्क सेनाओं ने हमले शुरू किए। सोने की चिड़िया कहे जाने वाले इस देश को लूटा और बर्बाद किया। विदेशी आक्रांताओं ने हमार मंदिरों और विश्वविद्याल्यों पर आक्रमण कर वहाँ के शिख्स्कोन की हत्याएँ कीं, विश्वविद्यालयों में स्थित पुस्तकालयों को भीषण आग के हवाले कर दिया गया। इस नरसंहार और विद्ध्वंस में लाखो दुर्लभ ग्रंथ और पांडुलिपियाँ हमेषा हमेशा के लिए नष्ट हो गईं। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि कई पुस्तकालय तो 3 महीने तक सुलगते रहे। कई इतिहास कारों का कहना है कि इन हमलों में चीनी छात्रों द्वारा किए गए शोध कार्यों कि पांडुलिपियाँ भी नाश हो गईं।

800 साल मुगलों और 200 साल अंग्रेजों कि गुलामी ने हमारे राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और शिक्षा क्षेत्रों के ढ़ाचे को चकनाचूर करने में कोई कसर नहीं छोड़िए और हमारे देश को बहुत पीछे धकेल दिया। हमारी नैतिक और नैसर्गिक प्रतिभा का भी बहुत ह्रास हुआ। अब धीरे धीरे भारत उठ रहा है, आज NASA में 38%वैज्ञानिक भारतीय मूल के हैं। हमारा ISRO संगठन आज दुनिया में अपनी पहचान बना चुका है। आशा करते हैं कि बहुत जल्द हमारी शिक्षा पद्धति में सुधार होगा और एक बार फिर भारत अपनी खोई हुई पहचान पाने में सफल होगा। हमारा यह सपना है कि वह समय वापिस आएगा और भारत पुन: ज्ग्त्गुरु बनेगा।

आतंकियों और उनके समर्थकों सभी को सीधे गोली मारने की छूट सेना को मिलनी चाहिए।खून का बदला सिर्फ खून😡😡😡

Facebook से अशोक कुमार जी से साभार

सेनानायक चंदन सिंह ठाकुर जी की कलम से।

ये काश्मीर समस्या की जड़ फारूक अब्दुल्ला बोल रहे कि पाकिस्तान नहीं दोषी, काश्मीरी युवाओं से पूछो। ये वही अब्दुल्ला हैं जिनकी तीन पीढ़ियों ने काश्मीर को बर्बाद कर दिया और काश्मीर को अगला पाकिस्तान बनाने की बहाबी कट्टरपंथ की चाल चलती रही सारे काश्मीरी हिंदू सिख पलायन कर गये।
और अब पाकिस्तान युद्ध की मांग कर रहा है और भारत का नैतिक अधिकार है कि पाकिस्तान को युद्ध का पुरस्कार दिया जाय। शायद मोदी जी को यह मौका है जब अनुच्छेद 370 हटा दे, बलूचिस्तान को आजाद कराये और काश्मीर में सभी भारतीयों के रहने बसने का अधिकार दे। क्या मोदी जी ऐसा करेंगे क्या मुल्क उनसे जो उम्मीदे पाल रखा है उसपर अब खरे उतरेंगे। शायद मोदीजी सरकार नहीं करेगी तो तारीख कभी माफ न करे। अभि तक की बीजेपी की केन्द्र सरकार काश्मीर मामले में कांग्रेस की पूर्व सरकार की नकल ही की है। 
जो गद्दार पत्थरबाजों को अपना अब्बा हजूर समझकर उनके मानवाधिकार की बात करते हैं क्या वो दोगले ये बतायेंगे कि इन आतंकियों को किसने यह सब करने का अवसर दिया। क्या अफजल और याकूब के हमदर्द नमक हराम हरामखोर यह बतायेंगे कि जो स्लीपर सेल ऐसी घिनौनी कायराना हरकत करते हैं उनके लिए जो सडकों पर उतरतै है वो भी आतंकी है और जवानों और मासूमों के खून से इनके हाथ भी सने हैं।
जो मीडिया वाले जो वकील जो बदमिजाज बुद्धिजीवी इनकी सार्वजनिक और न्यायालय में पैरवी करते हैं वो भी जवानों के खून की शहादत के दोषी हैं। जेएनयू में कन्हैया जैसे गद्दार जो भारत तेरे टुकड़े होंगे के नारे लगाते हैं वो भी जवानों के नाहक खून के दोषी है। यदि चीन होता तो अबतक आतंकवाद और आतंकियों और उनके प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष समर्थकों को दोजख भेज दिया गया होता।वैसे गद्दारी तो भारतीय लोकतंत्र की राजनीति के मुख्यधारा में भी शामिल है 😡😡😡
सडक पर खडा कर इन सभी को सीधे गोली मार दी जाती।
लेकिन यह मजबूत भारत वर्ष है जहां बहुत सारे गद्दार हरामखोर दोगले जिनके खून में दोष है वो पैदा है जिनके समर्थन से आतंकी लोगो को घुसपैठ करने छिपने और कायराना हत्या करने का मौका मिलता है। भारत को एक मजबूत कठोर निर्णय लेने वाली ताकतवर बहुमत की केन्द्र सरकार और कद्दावर नेता की जरूरत है। बहुत दुखद घटना। शहीदों को नमन उनके परिवार को नमन और गद्दारों के लिए फांसी मौत की मांग करता हूं।
भारत की संकल्पना ऐसे कायराना हरकत से कमजोर होने वाली नहीं है।
बाहर और अंदर दोनों दुश्मनों गद्दारों का सफाया ही एकमात्र समाधान है।

जय जवान। जय हिंद के जनगण मन।

कैप्टन अमरिन्दर सिंह द्वारा बलात्कार मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक अदालतों पर ज़ोर

चंडीगढ़, 13 फरवरी:

लुधियाना में घटे सामुहिक बलात्कार मामले का गंभीर नोटिस लेते हुए पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने बलात्कार मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक अदालतों पर ज़ोर देते हुए सदन को भरोसा दिया कि वह ऐसे मामलों में जल्दी न्याय को यकीनी बनाने के लिए पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस के पास पहुँच करके उनके निजी दख़ल की माँग करेंगे। 

हाल ही में लुधियाना में घटे सामुहिक बलात्कार केस पर लोक इन्साफ पार्टी के विधायक सिमरजीत सिंह बैंस और आप विधायक कुलतार सिंह संधवां द्वारा उठाए गए मामले पर जवाब देते हुए मुख्यमंत्री ने सदन को भरोसा दिलाया कि वह चीफ़ जस्टिस को फास्ट ट्रैक अदालतों में ऐसे मामलों की रोज़मर्रा की सुनवाई करने की अपील करेंगे। उन्होंने पीडि़तों को जल्द न्याय मुहैया करवाने के अलावा ऐसे घिनौने जुर्मों के दोषियों को मिसाली सज़ा की ज़रूरत पर ज़ोर दिया जिससे ऐसी घटनाओं को रोका जा सके। मुख्यमंत्री ने विधान सभा को अवगत करवाया कि इस घिनौने अपराध में शामिल छह व्यक्तियों में से तीन को गिरफ्तार किया जा चुका है जबकि बाकियों को भी जल्दी ही पकड़ लिया जायेगा। राज्य में अमन कानून की व्यवस्था की कोई भी समस्या न होने का जि़क्र करते हुए  कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने विरोधी पक्ष को इस मामले पर बहस करने की चुनौती दी। मुख्यमंत्री ने कहा कि जबसे उनकी सरकार ने सत्ता संभाली है, उस समय से अब तक राज्य में अमन कानून की कोई भी बड़ी समस्या पैदा नहीं हुई। मुख्यमंत्री ने कहा कि पिछली सरकार की सरपरस्ती मेें सिर उठाने वाले सभी बड़े गैंगस्टरों पर सफलता के साथ कार्यवाही की गई और इसी तरह लक्षित करके किये कत्ल के मामलों को भी सुलझाया गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार ने अपने कार्यकाल के दौरान लोगों का भरोसा बहाल किया है। 

बंगाल का गुंडाराज बनाम लोकतन्त्र


Rajesh Sainbhi
Curtsy Face Book

 ममता बनर्जी का कहना है कि मोदी पागल हो गया है. देश के प्रधानमंत्री के लिए एक मुख्यमंत्री के मुंह से ऐसे शब्द शोभा देते है क्या ? यह औरत बंगाल में सभी चोरों को इकट्ठा कर के लोकतंत्र बचाने की बात कर रही है.

रोज वैली चिट फंड घोटाला : 15000 करोड़
शारदा चिट फंड घोटाला     : 2500 करोड़

इसी मामले में सीबीआई अधिकारी, कोलकाता पुलिस कमिश्नर से पूछताछ करने गए थे, क्योंकि कमिश्नर सीबीआई के समन का जवाब नहीं दे रहे थे, जहां ममता बानो कमिश्नर के बचाव में पहुंच गई और सीबीआई अधिकारियों को कोलकाता पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया जैसे सीबीआई अधिकारी कोई अपराधी हो. जबकि सीबीआई देश की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था है.

सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार इस घोटाले की जांच चल रही है, और ममता बनर्जी तानाशाही पर उतारू है, यह कहते हुए कि वो मोदी और अमित शाह से लोकतंत्र बचा रही है.

कोलकाता में केंद्रीय दफ्तरों पर पैरामिलिट्री फोर्स तैनात कर दी गई है.

पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र कैसे बचा रही है ममता बनर्जी देखिए :

 देख लीजिए, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी इस तरह लोकतंत्र को बचा रही है. बंगाल में लोकतंत्र समाप्त हो चुका है, सिर्फ और सिर्फ ममता बानो की तानाशाही और टीएमसी के गुंडों की गुंडागर्दी जारी है.

  • अमित शाह और योगी आदित्यनाथ के हेलीकॉप्टर को बंगाल में उतरने की अनुमति न देकर.
  • पश्चिम बंगाल में सीबीआई के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाकर.
  •  चिट फंड की जांच करने गई सीबीआई टीम को कोलकाता पुलिस द्वारा गिरफ्तार करवा कर.
  •  अवैध बंगलदेशी और रोहिंग्या को बंगाल में शरण देकर.
  •  बीजेपी कार्यकर्ताओं की हत्या करवा कर.
  •  बंदूक की नोक पर टीएमसी की रैलियों में ले जाकर
  •  बंदूक की नोक पर बैलेट बॉक्स को तालाबों में फिंकवा कर.
  •  बंगाल में बीजेपी का वोट प्रतिशत बढ़ने पर ईमानदार पुलिस अधिकारी पर ट्रांसफर का दबाव बनाकर.
  •  बंगाल में शांतिदूतों के घरों में बम बंदूक बनाने की फैक्ट्री मिलती है.
  •  बंगाल में टीएमसी के गुंडों द्वारा भाजपा और आरएसएस के कार्यालय में बम फिकवा कर.
  •  भाजपा की रथ यात्रा को अनुमति न देकर.
  •  चुनाव में प्रत्याशियों को डराया धमकाया जाता है, जिसके कारण पश्चिम बंगाल में वॉट्सएप से भाजपा प्रत्याशी नामांकन करते है.
  •  चुनाव के टाइम पर टीएमसी के गुंडों द्वारा बूथ कैपचरिंग करवा कर, जनता को घरों में रोक कर, चुनाव में वोट के लिए निकलने न देकर.
  •  टीएमसी के गुंडों द्वारा बड़े बड़े दंगे, फसाद, तोड़फोड़ करवा कर.
  •  अवैध घुसपैठियों का खुले आम समर्थन करते हुए एनआरसी का विरोध करके.
  •  बांग्लादेश और म्यांमार से भाग कर अवैध तरीके से भारत में घुसे घुसपैठियों को सुरक्षित पनाह देना और वोट बैंक के लिए उनका वोटर कार्ड, आधार कार्ड इत्यादि दस्तावेज बनवा देना.

देख लीजिए, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी इस तरह लोकतंत्र को बचा रही है. बंगाल में लोकतंत्र समाप्त हो चुका है, सिर्फ और सिर्फ ममता बानो की तानाशाही और टीएमसी के गुंडों की गुंडागर्दी जारी है.

 देख लीजिए, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी इस तरह लोकतंत्र को बचा रही है. बंगाल में लोकतंत्र समाप्त हो चुका है, सिर्फ और सिर्फ ममता बानो की तानाशाही और टीएमसी के गुंडों की गुंडागर्दी जारी है.

ममता का सत्ताग्रह

courtesy zee news

सबसे पहले ये समझिए कि इस सीबीआई vs ममता विवाद की जड़ क्या है ? आपको पश्चिम बंगाल के सारदा और Rose Valley घोटाले याद होंगे, जिनमें ममता बनर्जी की पार्टी के कई नेता फंसे हुए हैं. ये घोटाले करीब 19 हज़ार 500 करोड़ रुपये के हैं. इसमें 17 लाख से भी ज़्यादा लोगों का पैसा फंसा हुआ है. 

इन्हीं घोटालों के संबंध में CBI कोलकाता के मौजूदा पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार से पूछताछ करना चाहती है. इसके लिए राजीव कुमार को कई बार Summon किया गया, लेकिन वो नहीं आए. कल शाम को CBI के अफसरों की एक टीम राजीव कुमार से पूछताछ करने के लिए उनके घर जाना चाहती थी. लेकिन कोलकाता पुलिस ने उन्हें अंदर नहीं जाने दिया. काफी देर तक ये ड्रामा होता रहा. इसके बाद कोलकाता पुलिस, CBI के करीब 25 अधिकारियों को लेकर थाने चली गई. और दो घंटे तक उन्हें हिरासत में रखा. 

इसके बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने CBI के खिलाफ कल रात 9 बजे से कोलकाता में धरना शुरू कर दिया. और इस धरने में उनके साथ कोलकाता के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार भी शामिल हैं. ये धरना इस वक़्त भी जारी है. ममता बनर्जी की उम्र 64 वर्ष है, लेकिन इस उम्र में भी अपने राजनीतिक धरने के लिए उनके पास ऊर्जा की कोई कमी नहीं है.
 
ममता बनर्जी ने पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक रंग दे दिया. और ये आरोप लगाए कि CBI केन्द्र सरकार के इशारे पर काम कर रही है. और देश का संघीय ढांचा खतरे में है. इसके साथ ही ममता बनर्जी के इस धरने के खिलाफ देश भर की विपक्षी पार्टियां इक्कठी हो गईँ. ममता बनर्जी के धरने को चंद्रबाबू नायडू, अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव समेत बहुत से नेताओं का समर्थन मिल गया है. राहुल गांधी, पहले ममता बनर्जी का विरोध करते थे, उन पर सवाल उठाते थे. लेकिन अब उन्होंने यू-टर्न ले लिया है. आगे हम इस पर भी विस्तार से बात करेंगे. 

एक मुख्यमंत्री के तौर पर ममता बनर्जी के जितने भी काम थे, वो आज उन्होंने इसी धरना स्थल से किए. ममता बनर्जी ने इसी धरना स्थल पर कैबिनेट की मीटिंग की, किसानों की रैली को संबोधित किया और पुलिसवालों को कुछ अवॉर्ड्स भी दिए. यानी ममता बनर्जी ने पूरी तैयारी की हुई है और वो इस धरने को एक तरह की राजनीतिक Vacation बनाना चाहती हैं?

हालांकि राजनीतिक लाभ के लिए देश की संस्थाओं की हत्या करना बहुत ख़तरनाक है. और जब भी ऐसा होता है, तो देश विखंडित हो जाता है. और देश के छोटे छोटे राज्य भी.. संविधान के नैतिक दायित्वों का उल्लंघन करने लगते हैं. ज़रा सोचिए कि क्या अब भारत में वो समय आ गया है जब पश्चिम बंगाल जाने के लिए वीज़ा लगेगा? वहाँ ना तो भारत का पासपोर्ट चलेगा और न ही भारत की नागरिकता मान्य होगी ? अगर यही फॉर्मूला देश के दूसरे राज्यों में चल निकला, तो कुछ दिन बाद मायावती,लालू यादव और चंद्रबाबू नायडू सहित विपक्षी दलों के तमाम नेता अपना अलग देश बना लेंगे. और वो परिस्थिति भारत की अखंडता के लिए शुभ नहीं होगी. 
 
बड़ा सवाल ये है कि देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी CBI को किसी राज्य में पूछताछ और कार्रवाई करने का अधिकार है या नहीं ? अगर किसी राज्य में कोई घोटाला हुआ है, तो वहां जांच के लिए CBI नहीं जाएगी तो कौन जाएगा? क्या ममता बनर्जी अपने नेताओं और पुलिस अधिकारियों पर लगे आरोपों की जांच, अपनी ही पुलिस से करवाना चाहती हैं? वैसे CBI को ये जांच सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सौंपी गई थी, तो क्या ये भी मान लिया जाए कि ममता बनर्जी को इस देश के सुप्रीम कोर्ट पर भी विश्वास नहीं है? 

अगर कल को ममता बनर्जी की तरह ही देश के हर राज्य का मुख्यमंत्री ये कह दे कि उसे CBI पर विश्वास नहीं है और अगर CBI उसके राज्य में कोई कार्रवाई करेगी, तो वो CBI के अफसरों को गिरफ्तार करवा देगा, तो फिर क्या होगा? क्या ये देश के संघीय ढांचे के साथ छेड़छाड़ नहीं होगी? इस तरह तो मायावती, लालू यादव और चंद्रबाबू नायडू सहित विपक्षी दलों के तमाम नेता, अपनी मनमानी करके.. एक तरह से अपना अलग देश बना लेंगे. और वो परिस्थिति भारत की अखंडता के लिए शुभ नहीं होगी. 

CBI के अधिकारियों को हिरासत में लेने के पीछे कोलकाता पुलिस का पहला तर्क ये था कि इन अधिकारियों के पास कोई वॉरंट या कागज़ नहीं थे. जबकि हमारे पास CBI की वो पत्र मौजूद है, जो पुलिस कमिश्नर के घर जाने से पहले CBI के अधिकारियों ने पुलिस को लिखा था. 
 
ये पत्र CBI ने कल कोलकाता पुलिस को लिखी थी. इस चिट्ठी में CBI ने सुरक्षा की मांग की है. CBI ने लिखा है कि उसे कोलकाता पुलिस के कमिश्नर राजीव कुमार के घर पर एक Secret Operation करना है, इसलिए उन्हें सुरक्षा दी जाए. ये चिट्ठी CBI के पुलिस इंस्पेक्टर प्रसेनजीत मुखर्जी की तरफ से लिखी गई है. 
 
अब आपको ये बताते हैं कि कोलकाता पुलिस ने CBI के अधिकारियों के साथ कैसा व्यवहार किया ? आज पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ने केन्द्रीय गृह मंत्रालय को एक रिपोर्ट सौंपी है और इस रिपोर्ट में बहुत बड़े खुलासे हुए हैं. पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केसरी नाथ त्रिपाठी ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि पश्चिम बंगाल पुलिस और राज्य सरकार ने कानून व्यवस्था की गंभीर समस्या पैदा कर दी है. रिपोर्ट में लिखा है कि ना सिर्फ CBI के अधिकारियों को रोका गया, बल्कि पश्चिम बंगाल पुलिस ने उनके मोबाइल फोन और कागज़ात भी छीन लिए. CBI के बहुत से अधिकारियों, और यहां तक कि महिला अधिकारियों के साथ भी बुरा व्यवहार किया गया. और उन्हें थाने में अवैध हिरासत में रखा गया. 

रिपोर्ट में लिखा है कि ना सिर्फ CBI के अफसरों को बल्कि CBI के Joint डायरेक्टर पंकज श्रीवास्तव के परिवार को भी परेशान किया गया. पश्चिम बंगाल पुलिस ने पंकज श्रीवास्तव के घर की घेराबंदी कर दी थी और इस दौरान उनकी पत्नी और बेटी को परेशान किया गया. हमने कल रात से अब तक के इस घटनाक्रम पर एक रिपोर्ट तैयार की है. ये एक हाई वोल्टेज राजनीतिक ड्रामा था. इसके हर एक पहलू के बारे में आपको पता होना चाहिए.

अब आपको उस व्यक्ति के बारे में बताते हैं, जिसकी वजह से पश्चिम बंगाल में राजनीति की आग लगी हुई है. और ममता बनर्जी और CBI के बीच ये पूरा हंगामा हुआ है. ये व्यक्ति हैं कोलकाता पुलिस के कमिश्नर राजीव कुमार जो ममता बनर्जी के साथ धरने पर बैठे हुए हैं. आपके मन में भी ये सवाल ज़रूर आ रहा होगा कि इन घोटालों में राजीव कुमार की क्या भूमिका है? 

राजीव कुमार की उम्र 53 वर्ष है. वो 1989 बैच के IPS अफसर हैं. IPS का मतलब होता है – Indian Police services. यानी भारतीय पुलिस सेवा. लेकिन उनका जो आचरण है वो इससे मेल नहीं खाता. वो ममता बनर्जी के साथ धरने पर बैठकर भारत की नहीं बल्कि ममता बनर्जी की सेवा कर रहे हैं. 

राजीव कुमार चिट फंड घोटालों के लिए राज्य सरकार की तरफ से बनाई गई Special Investigation Team यानी SIT के प्रमुख थे. उन्होंने 2013 में सारदा और Rose Valley घोटाले की जांच की थी. लेकिन 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने ये दोनों मामले CBI को सौंप दिए. बाद में CBI ने आरोप लगाया कि राजीव कुमार ने कई Documents, Pen Drive और जांच से जुड़े Mobile Phones उसे नहीं सौंपे. इस बारे में राजीव कुमार को कई बार समन भेजा गया लेकिन वो CBI के सामने पेश नहीं हुए. CBI के मुताबिक इन्‍हीं सबूतों के सिलसिले में उसके अधिकारी रविवार रात राजीव कुमार के आवास पर गए थे.
  
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे दो बड़े घोटाले छिपे हुए हैं. जिनका नाम है सारदा चिटफंड घोटाला और Rose Valley घोटाला. और जब तक आपको इन घोटालों की जानकारी नहीं होगी, आपको इस केस की गंभीरता का पता नहीं चलेगा. आप ये नहीं समझ पाएंगे कि ममता बनर्जी किस तरह भ्रष्टाचारियों को बचा रही हैं? पूरे देश में ममता बनर्जी की राजनीति की बात हो रही है. Mamta vs Modi जैसी राजनीतिक शब्दावली का प्रयोग हो रहा है. लेकिन कोई भी उन लोगों की बात नहीं कर रहा जिन्होंने घोटाले में अपना सब कुछ गंवा दिया.

सारदा घोटाले में देश के कई राज्यों के लाखों गरीबों के जीवन भर की कमाई, कुछ ताकतवर लोगों ने लूट ली, और अपनी जेबें भर लीं. गरीबों की कमाई से इन ताकतवर लोगों ने जमकर अय्याशी की…टीवी चैनल खोले…बेहिसाब पैसा जुटाया….और गरीबों को धोखा दे दिया. इसमें सत्ता के तंत्र से लेकर मीडिया तक, सब शामिल रहे.
 
सारदा ग्रुप ने पश्चिम बंगाल, ओडिशा सहित देश के कई राज्यों में करीब 17 लाख लोगों से करोड़ों रुपये जुटाए. Ponzi Schemes के ज़रिए लोगों को बड़े मुनाफे का लालच दिया गया और बाद में इन योजनाओं के Agents ने दुकानें बंद कर ली. 2013 में सारदा ग्रुप का घोटाला सामने आया और ये घोटाला करीब ढाई हज़ार करोड़ रुपये का बताया गया. सारदा ग्रुप के 17 लाख निवेशक थे, और घोटाला सामने आने के बाद पूरे बंगाल में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए. यहां तक कि सारदा ग्रुप की स्कीम में पैसा लगाने वाले करीब 311 एजेंटों और लोगों ने खुदकुशी भी कर ली. वर्ष 2013 में घोटाला सामने आने के बाद इसके मुख्य आरोपी और सारदा ग्रुप के चेयरमैन सुदीप्तो सेन को गिरफ्तार किया गया. 

सारदा ग्रुप के ज़रिए जिन लोगों ने अपनी जेबें भरीं और जिनका नाम इस घोटाले में आया…उनमें से कई मंत्री और सांसद भी थे, जिन्हें सीबीआई ने गिरफ्तार भी किया था लेकिन इनमें से ज़्यादातर आरोपी ज़मानत पर बाहर आ चुके हैं. इस लिस्ट में तृणमूल कांग्रेस के निलंबित सांसद कुणाल घोष, ममता बनर्जी सरकार के पूर्व परिवहन मंत्री मदन मित्रा, तृणमूल कांग्रेस के पूर्व सांसद श्रृंजॉय बोस, पश्चिम बंगाल के पूर्व डीजीपी और तृणमूल कांग्रेस के नेता रजत मजूमदार और तृणमूल कांग्रेस के सांसद तापस पॉल हैं. इसके अलावा पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के नेता मतंग सिंह भी जेल से बाहर आ चुके हैं . यानी इस घोटाले में बहुत बड़े बड़े लोगों के नाम शामिल हैं. अब आपको Rose Valley घोटाले के बारे में बताते हैं. 
 
ये घोटाला भी सारदा घोटाला की तरह ही हुआ था. ये करीब 17 हज़ार करोड़ रुपये का घोटाला है. इस घोटाले में लोगों से किश्तों में पैसे लिए जा रहे थे. और उन्हें ये भरोसा दिया जा रहा था कि उन्हें मकान दिए जाएंगे और विदेश यात्राएं करवाई जाएंगी. निवेशकों के पास ये भी विकल्प था कि अगर वो चाहें तो सारी किश्त जमा होने के बाद अच्छे खासे ब्याज़ पर अपने पैसे वापस भी ले सकते हैं. इसका मास्टरमाइंड था गौतम कुंडू जो इस Rose Valley Group का चेयरमैन था. लेकिन पैसा जमा होने के बाद लोगों को ना तो पैसे मिले और ना ही विदेश यात्राएं. केन्द्र सरकार ने दखल दिया. और निवेशकों को उनका पैसा लौटाने का आदेश दिया. लेकिन इस स्कीम में पैसा लगाने वाले लोगों को उनका पैसा आज तक वापस नहीं मिला. 
 
हमने आज ऐसे बहुत से लोगों से बात की है, जिन्हें आज भी अपना पैसा वापस मिलने की आस है. सबसे बड़ा विरोधाभास ये है कि इस पूरे मामले में ममता बनर्जी, सारदा और Rose Valley घोटाले के पीड़ितों के साथ अन्याय कर रही हैं. CBI इस मामले के दोषियों पर कार्रवाई करना चाहती है. लेकिन ममता बनर्जी CBI की कार्रवाई के खिलाफ़ ही धरना दे रही हैं और इसे सत्याग्रह बता रही हैं. जबकि असलियत में ये सत्याग्रह नहीं, बल्कि सत्ताग्रह है. 

अंतरिम बजट से ठीक पहले पीयूष गोयल को मिला वित्त मंत्रालय का जिम्मा

पीयूष गोयल को यह जिम्मेदारी अस्थायी तौर पर दी गई है क्योंकि अरुण जेटली अमेरिका गए हैं

नई दिल्ली: अंतरिम बजट पेश करने से नौ दिन पहले रेल मंत्री पीयूष गोयल को बुधवार को वित्त और कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया गया. अरुण जेटली अस्वस्थ हैं और इलाज के लिए विदेश में हैं, इस वजह से उनके मंत्रालयों का प्रभार गोयल को दिया गया है. 

राष्ट्रपति भवन की ओर से जारी सूचना में कहा गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सलाह पर वित्त और कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार अस्थायी रूप से गोयल को सौंपा गया है. गोयल के पास पहले से जो मंत्रालय हैं वह उसका कामकाज भी देखते रहेंगे. बीजेपीकी अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार को एक फरवरी को अपने मौजूदा कार्यकाल का अंतिम बजट पेश करना है. 

जेटली को बनाया गया बिना पोर्टफोलियो वाला मंत्री 
इसके अलावा अरुण जेटली को उनके इलाज तक बिना पोर्टफोलियो वाला मंत्री बनाया गया है. स्वस्थ होने के बाद जेटली फिर से वित्त और कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालेंगे. 

इससे पहले पिछले साल मई में भी गोयल को दोनों मंत्रालयों का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था. उस समय जेटली का गुर्दा प्रत्यारोपण हुआ था. गोयल ने 100 दिन तक जेटली की अनुपस्थिति में इन मंत्रालयों का प्रभार संभाला था. जेटली पिछले साल 23 अगस्त को काम पर लौट आए थे और उन्होंने वित्त और कॉरपोरेट मंत्रालयों की जिम्मेदारी फिर संभाल ली थी. 

जेटली का अमेरिका में आपरेशन हुआ, दो सप्ताह आराम की सलाह
केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली का मंगलवार को न्यूयॉर्क के एक अस्पताल में आपरेशन हुआ। सूत्रों ने यह जानकारी दी। सूत्रों ने बताया कि चिकित्सकों ने जेटली को दो सप्ताह आराम करने की सलाह दी है।

अरुण जेटली 13 जनवरी को अमेरिका गए थे। सूत्रों ने कहा कि इस सप्ताह ही उनकी ‘सॉफ्ट टिश्यू’ कैंसर के लिए जांच की गई थी। इस दौरान भी जेटली सोशल मीडिया पर सक्रिय रहे। फेसबुक पर पोस्ट लिखने के अलावा उन्होंने मौजूदा मुद्दों पर ट्वीट भी किए। इससे पहले पिछले साल 14 मई को जेटली का एम्स में गुर्दा प्रत्यारोपण हुआ था। उसके बाद से वह विदेश नहीं गए थे। 

… … नसीरूदीन शाह ने आवाज़ की बुलंद … …

Er S.K.Jain

बुलन्दशहर की हिंसा पर अपनी आवाज बुलन्द करते हुए टीoवीo पर कहा कि मुझे अपने बच्चों के बारे में सोच कर बड़ी फिक्र होती है। कल को किसी भीड़ ने उन्हें घेर कर पूछा कि तुम हिंदू हो या मुसलमान तो मेरे बच्चों के पास कोई जवाब नहीं होगा। क्यों कि मैंने उन्हें ना हिंदू बनाया ना मुसलमान। मुझे हालात जल्दी सुधरते तो नजर नहीं आ रहे। मुझे डर नहीं लग रहा बल्कि गुस्सा आ रहा है।मैं चाहता हूँ कि हर इन्सान को गुस्सा आना चाहिये।

नसीरुद्दीन मानते हैं कि इन्सान की हत्या कानूनन अपराध है। क्या वो यह नहीं मानते कि गौ हत्या भी कानूनन अपराध है?वो गौ हत्या करने वाले कसाई यों के खिलाफ नहीं बोलते लेकिन गौ हत्या का विरोध करने वालों के खिलाफ बोलते हैं। क्या कारण है कि 21 गायों को काटने के बारे में कोई नहीं बोलता लेकिन असहिष्णुता के नये एपीसोड को लेकर नसीरुद्दीन शाह सामने हैं ? जिस नसीरुद्दीन को लोग हीरो मानते थे, अभिनेता मानते थे, आज उसे गाली दे रहे हैं। क्योंकि उसकी सच्चाई सामने आ चुकी है। भगवान श्री कृष्ण ने कहा था कि एक गाय के लिए हम अगर कई जन्म भी कुर्बान कर दे तो भी काफी नहीं है।

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जिस सुमित की हत्या हुई उसकी बहन सुमित पर 15 सैकिण्ड बोली बाकी सारा समय वो गाय पर बोली। उसके माता-पिता भी अपने बेटे पर कम और गौ रक्षा के पर ज्यादा बोले। थैलियों का दूध पीने वाले नसीरुद्दीन शाह को क्या पता कि इस देश में गाय पर श्रद्धा रखने वाले 100 करोड़ से भी ज्यादा का एक सभ्य समाज है। अगर 21 गायों को काटा नहीं गया होता तो किसी प्रकार के दंगों की कोई संभावना नहीं होती। नसीरूद्दीन पैसे लेकर कुछ भी संवाद बोल सकते हैं यह हम विज्ञापनों में देख सकते हैं। लोगों का कहना है कि ऐसे लोगों को समुद्र में फेंक देना चाहिए अगर वह तैर सकते हैं तो तैर कर पाकिस्तान चले जाएं नहीं तो समुद्र के नीचे ओसामा बिन लादेन के पास चले जाएं।

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1984 में हजारों लोगों को मारा गया। कश्मीर में हिंदू पंडितों को मारा गया और उन्हें बाहर कर विस्थापित कर दिया गया तब नसीरुद्दीन की आवाज नहीं निकली। नसीरूद्दीन शाह ने, जिस याकूब मेनन के लिए रात के 2:00 बजे अदालत के दरवाजे खुलवाए गये, इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। जिस देश में रहते हैं, जिसका अन्न खाते हैं, जो उन्हें शोहरत और पैसा देता है उसी के साथ गद्दारी करते हैं। लोग कहते हैं कि शाहरुख खान हो, आमिर खान हो, नसीरुद्दीन शाह हो, सब के सब एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं।

1983 के मुम्बई बम ब्लास्ट,1984 के दंगों के वक्त नसीरुद्दीन शाह नहीं जागा। अब जाग गया है क्योंकि 2018 आ रहा है और 2019 में चुनाव आ रहे हैं। शायद आने वाले चुनाव में जाने के लिए यह ड्रामा किया जा रहा है। लोगों की प्रतिक्रिया आ रही है कि यह नसीरूदीन नहीं जहरुद्दीन है। देश की फिजां में जहर घोलने का काम कर रहा है। नसीरुद्दीन ने ट्वीट कर कहा की एक शख्स जो कश्मीर में नहीं रहता, उसने कश्मीरी पंडितों की लड़ाई शुरू कर दी और खुद को विस्थापित कर दिया। इनका यह ट्वीट कश्मीरी पंडितों की लड़ाई लड़ने वाले अनुपम खेर के लिए किया गया है। वह खुद भी तो मुम्बई में रह कर बुलन्दशहर वालों के लिए क्यों लड़ रहे हैं। फिल्मी पर्दे पर अपनी सोच बदलने वाले असल जिंदगी में भी अपनी सोच कैसे बदल लेते हैं, देखने की बात है।

पत्थरबाजी : काश्मीर से चल कर पहुंची केरल

Er. S. K. Jain

काश्मीर में पाकिस्तान द्वारा भेजे गए आतंकियों ने वहाँ के युवाओं को गुमराह कर सेना पर पत्थरबाजी कारवाई। हमें नाज़ है हमारे जवानों पर जिनहोने संयम से काम लेते हुए पत्थर बाजों पर गोलियां नहीं चलाईं बल्कि खुद घायल होते रहे। ऐसी सहनशीलता की मिसाल दुनिया में कहीं नहीं मिलेगी। अभी हाल ही में केरल से ख़बरें आ रहीं हैं की वहाँ भी पत्थरबाजी ने अपने “अदरक के पंजे” फैलाने शुरू कर दिये हैं

हमारे देश में हिन्दू आस्था के खिलाफ षड्यंत्र करने वालों व इसे तहस नहस करने वालों की संख्या दिन-ओ-दिन बढ़ती ही जा रही है। साजिशे रचीं जा रहीं हैं। अब तो केरल सरकार और प्रशासन इसका हिस्सा बनते हुए नज़र आ रहे हैं। हिन्दू आस्था को बदनाम और तार तार करने के लिए नए नए तरीके अपनाए जा रहे हैं।  मदिर में प्रवेश करने के लिए केरल की वामपंथी सरकार साजिश रचती है। 2 महिलाओं को धोखे से मंदिर के अंदर प्रवेश करवाया जाता है। इन महिलाओं ने मंदिर में प्रवेश करने के लिए किसी भी परंपरागत नियम का पालन नहीं किया है। (आप सबको याद दिला दें कि सबरी माला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर कोई निषेध नहीं है, बस एक खास उम्र कि महिलाओं के मंदिर प्रवेश पर पाबंदी है वही महिला जब उस आयु को पार कर लेती है तो वह उस मंदिर में प्रवेश पा सकती है।)      करीब रात एक(1:00am) बजे पुलिस महिलाओं के साथ एंबुलेंस के जरिए मंदिर में प्रवेश करती है। पुलिस कहती है कि यह महिलाएं नहीं किन्नर हैं। मंदिर प्रशासन को गुमराह करने की कोशिश होती है। जबर्दस्ती उन्हे अंदर भेजा जाता है और पूजा कारवाई जाती है। मंदिर प्रशासन इस पर सख्त एतराज करता है, बाद में प्रशासन मंदिर के द्वार बंद कर देता है। इसके बाद मंदिर और देवता का शुद्धिकरण किया जाता है और कपाट पुन: खोल दिये जाते हैं। लेकिन फर्जी महिलाओं के मंदिर प्रवेश पर भक्तों का गुस्सा अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है।

प्रो॰ संदीप कुमार जो कि “साउथ इंडिया स्टडीज़” के जानकार माने जाते हैं का कहना है कि हिन्दू धर्म को तोड़ने व इसका सत्यानाश करने के लिए यह कमयूनिस्ट सरकार कि सोची समझी साजिश है। केरल के सांसद और वरिष्ठ नेता श्री वी मुरलीधरन जी का कहना है:

              “केरल कि वामपंथी सरकार जिसकी धर्म (हिन्दू) और मंदिर (सबरीमाला) में कोई आस्था नहीं है, वह सबरीमाला मंदिर कि परम्पराओं एवं आस्था को तोड़ने का प्रयास कर रही है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर  और इसके आधार पर बहाना बना कर 2 महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करवाया और पूजा पाठ करवाया, इसका पता चलते ही भारतीय जन मानस में आक्रोश की लहर दौड़ गयी। इससे बचने के लिए वामपंथियों द्वारा भाजपा और आरएसएस के दफ्तरों में बमों से हमले किए गये, भाजपा कार्यकर्ताओं और नेताओं के घरों में आगजनी के साथ साथ बंब भी फेंके गये।“

इन सब घटनाओं के मद्देनजर कुछ सवाल उठते हैं जैसे:

  • क्या केरल की वामपंथी सरकार को हिंदुओं की धार्मिक आस्था एवं आज़ादी से कोई लेना देना नहीं?
  • क्या केरल में हिंदुओं की आस्था सुरक्षित नहीं?
  • क्या केरल वामपंथी पत्थरबाज़ों का अड्डा बन गया है?
  • क्या केरल में भी काश्मीर की तर्ज़ पर पत्थरबाज़ों का जन्म हो गया है?
  • क्या वामपंथी सरकार के चलते केरल इस्लामिक स्टेट बनने को अग्रसर है?
  • क्या काशमीर की ही तरह हिंदुओं को केरल से भी पालायन करना होगा?
Sabrimal Temple

केरल में अत्याचार हो रहे हैं और सरकार दमन के लिए नए हथकंडे अपना रही है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा की सभी आयु वर्ग की महिलाएं मंदिर जा सकतीं हैं, यह तो नहीं कहा कि हिन्दू धर्म में आस्था ण रखने वाली मुस्लिम महिलाओं को जबर्दस्ती मंदिर में भेजो? बाहर सड़कों पर हिन्दू धर्म की महिलाएँ अपनी आस्था को लेकर प्रदर्शन कर रहीं हैं, उनका मानना है की उन्हे मंदिर में प्रवेश नहीं चाहिए, वह भगवान अय्याप्पा स्वामी की भक्ति ही में खुश हैं, वह दर्शनभिलाषी नहीं, उनकी स्नेह भाजन हैं। उन्हे भगवान अय्याप्पा की मर्ज़ी के खिलाफ उनके दर्शन नहीं चाहिए। लाखों की संख्या में महिलाए हाथों में पूजा की थाली ले कर दीप प्रज्ज्वलित कर कन्याकुमारी तक पांकती बद्ध हो कर सड़कों पर प्रदर्शन कर रहीं हैं, लेकिन जबर्दस्ती अनास्थावान स्त्रियॉं को लेकर उन्हें मंदिर पहुंचाने की ज़िद! केरल सरकार की शह पर वहाँ हिंसा में उतारू लोगों का उद्दंडता से भर नंगा नाच हो रहा है।

केरल राज्य से हिंसा की वारदातों की खबरें आ रहीं हैं। मंदिर परिसर में पत्थर बाज़ी से 55 वर्ष के मंदिर कमेटी के भक्त की मौत हो जाती है, केरल सरकार उसे हृदयाघात (Cardiac Arrest/ Attack) बता रही है। जबकि डॉ। की रिपोर्ट बता रही है की मौत गंभीर चोट लगने से हुई है। पूरे केरल में वामपंथी काश्मीरी पत्थरबाज़ों की तरह भगवान अय्यापा के भक्तों पर पर पत्थरबाजी कर रहे हैं। करीब 1400 भक्त गंभीर रूप से घायल हो चुके हैं। केरल में पीएफ़आई पहिले से ही सक्रिय है। अगर पीएफ़आई इसमें शामिल है तो केरल को काश्मीर बनने से कोई नहीं रोक सकता। अगर सरकार ही षड्यंत्र करवाने पर उतारू हो जाये तो कौन बचाएगा? सरकार हिंदुओं को कानून हाथ में लेने के लिए मजबूर कर रही है। पुलिस गुंडों की तरह व्यवहार कर रही है। एक विडियो में दिख रहा है की कैसे पुलिस एक बाइक सवार को बाइक से उतार कर पीट रही है। बाइक सवार कसूर इत्न था की उसके हाथ में भगवा झण्डा था।  यदि यह अधिकार भी किसी व्यक्ति को नहीं है, तो क्या यह राज्य भारतवर्ष का हिस्सा हो सकता है? यह अपने आप में  बहुत बड़ा प्रश्न है।

तमिलनाडू में जल्लीकुट्टू पर केंद्र सरकार को अध्यादेश लाना पड़ा तो सबरीमाल पर भी केंद्र सरकार को चाहिए कि जल्दी ही अध्यादेश लाये।

In Kerala, Congress is the protector of a Hindu tradition, elsewhere in India, the party is the champion of women’s rights. This affliction has a name: ‘intellectual bankruptcy’.

What Congress wants to do is this: It wants to defeat BJP as well as CPM in Kerala by taking the stand that menstruating women must not enter Sabarimala temple. It wants to defeat BJP in the rest of India with the position that all women can enter Swami Ayyappa’s shrine that bars entry to the women between age of 10 and 50 years.

You can’t dance at two weddings.

That’s what a popular German saying means in English. But that’s what Congress matriarch Sonia Gandhi wants to do — or wants her party to do — on the Sabarimala fracas.

Sonia Gandhi is no longer the Congress president but only the chairperson of UPA. But this apparently didn’t stop her from issuing a diktat to Congress MPs telling them not to wear black arm bands to protest against entry of women into Sabarimala temple on Wednesday. Doesn’t Congress stand for gender equality, she chided them. The genuflecting loyalty and unquestioning obedience that are part of the Congress culture ensured that the attempt to support the Sabarimala protestors in Parliament was quickly abandoned.

But at the same time, Sonia had no problem letting the party continue its protests in Kerala against the temple entry of women to suit the state’s “local politics”. So Congress dances to the tune of Hindus who are angry with the violation of a tradition in Kerala, and also to the tune of those singing the song of gender justice in the rest of India.

Sonia Gandhi

Ideology? Take this new definition: For Congress, ideology is region-specific and vote-sensitive and, like cuisine and ingredients, it can change from place to place, perhaps even from time to time. But never mind if Congress ends up not having an opinion on gender justice. The only opinion Congress has is that it must defeat BJP in the upcoming Lok Sabha election, even if the party has no clue as to how it must go about achieving it.

What Congress wants to do is this: It wants to defeat BJP as well as CPM in Kerala by taking the stand that menstruating women must not enter Sabarimala temple. It wants to defeat BJP in the rest of India with the position that all women can enter Swami Ayyappa’s shrine that bars entry to the women between age of 10 and 50 years. In Kerala, Congress is the protector of a Hindu tradition. Elsewhere in India, the party is the champion of women’s rights.

Ideological perversion

What kind of women’s rights Congress is fighting for is another thing. In all of India minus Kerala, Congress supports those who suffer from an ideological perversion, which equates a Hindu tradition confined to one single temple among a million across the country with gender discrimination, which means fighting for a right that women devotees do not want, and which only ends up ensuring that Leftist and supposedly atheist women get the chance to visit a god they do not believe in.

Besides this ideological distortion, the Janus-faced and double-tongued strategy of Congress suffers from two fundamental flaws. The first one is that in the age of internet and rambunctious television which live-telecasts even the sneezing of a politician in Pathanamthitta to helpless audiences in Guwahati, what Congress does elsewhere is not a secret in Kerala. Hindu voters in Kerala whom Congress is trying to woo can’t be unaware of the party’s contradictory stand on the issue outside the state.

This strategy, if it’s one, has a second shortcoming, which is that the party may politically end up achieving in Kerala the opposite of what it’s trying to do. Fighting for the same Hindu votes that BJP is eyeing, Congress can only lose the race to the benefit of CPM, its primary enemy in Kerala.

This trend was confirmed during November’s local body by-elections in Kerala.

In other words, if BJP and Congress scramble for Kerala’s Hindu votes, this is what could happen in the ensuing division of votes: BJP will gain, but not substantially enough to get seats for itself. Congress will lose, significantly enough to help CPM.

The “tough” stand that the CPM-led Left Democratic Front (LDF) government has taken on Sabarimala may have more to do with a diabolical electoral strategy aimed at indirectly marginalising Congress than any great zeal to fight for women. For CPM, self-preservation comes gift-wrapped in ideology.

Sonia’s directive to partymen on Sabarimala is in tune with Rahul’s own view, expressed earlier, that all women should be able to enter the Kerala shrine. Rahul, however, had said it was his “personal view”, while Sonia’s order amounted to an official action.

But what Sonia did runs contrary to Rahul’s attempts to style himself as a born-again Hindu. In one stroke, she undermined what Rahul had been trying to do by hopping from temple to temple during Assembly elections in various states beginning with Gujarat in December 2017, by undertaking a “religious and spiritual” trek to Kailash Mansarovar last year and by resorting to other ‘soft-Hindutva’ tactics.

After appeasing minorities for long for electoral profit but actually doing nothing for their welfare, Congress is now molly-coddling Hindus, with the preposterous belief that two wrongs will make a right. But after the random victories it scored in last month’s state Assembly elections, the party is evidently too euphoric to even think of possible consequences of its ham-handed electoral strategies that reek of fake secularism and copy-cat Hindutva.

The head-nodding and tail-wagging in Congress that follow every word uttered by Sonia and Rahul is not surprising. But what is surprising is the knee-jerk manner in which Left-leaning and dynasty-loving intellectuals turn their hostility to Narendra Modi, however justified it may be on some counts, into an unquestioning acceptance of whatever Congress does or says. This affliction has a name: intellectual bankruptcy.