देवबंद से जैश ए मोहम्मद के 2 आतंकी गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश एटीएस ने जैश ए मोहम्मद के दो आतंकी पकड़े हैं. डीजीपी ओपी सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि रात में यूपी एटीएस को संदिग्ध आतंकियों की जानकारी मिली थी. कुछ कश्मीरी देवबंद में बगैर एडमिशन के रह रहे हैं. रात में यूपी एटीएस के आईजी ने देवबंद में ऑपरेशन चलाया. एटीएस ने शाहनवाज़ और आकिब अहमद मलिक को गिरफ्तार किया. दोनों को रिमांड पर लेकर विस्तृत पूछताछ की जाएगी.

डीजीपी ओपी सिंह ने बताया कि गिरफ्तार किया गया जैश का आतंकी शाहनवाज कुलगाम और आकिब पुलवामा का रहने वाला है. शाहनवाज़ जैश ए मोहम्मद का सक्रिय आतंकी है. दोनों लोग जैश ए मोहम्मद के लिए भर्ती का काम करते हैं. ओपी सिंह ने बताया कि आरोपियों के पास से 32 बोर की 2 पिस्टल और 30 जिंदा कारतूस मिले हैं. दोनों के मोबाइल से जेहादी चैट्स मिले हैं. शाहनवाज़ ग्रेनेड्स का एक्सपर्ट है.

इससे पहले यूपी एटीएस ने एक दुकानदार सहित लगभग 10 से 12 छात्रों को हिरासत में लिया था. जिनमें 2 कश्मीर के छात्र, 5 ओडिशा और अन्य अलग-अलग जगह थे. यह छापेमारी देर रात करीब 2 बजे की गई थी.

बता दें कि पुलवामा में हुए आतंकी हमले के बाद खुफिया एजेंसियों की ओर से आतंकी हमले की संभावना जताई गई थी. हाल ही में कानपुर ट्रेन धमाका भी हुआ. साथ ही महाराष्‍ट्र के रायगढ़ में भी बस में आईईडी बम मिलने से हड़कंप मच गया. हालांकि आशंकाओं को लेकर सक्रिय हुई एजेंसियां संदिग्‍धों पर कड़ी नजर रख रही हैं. वहीं पुलिस भी सतर्कता बरत रही है.

सुरजेवाला ने पुलवामा के बहाने प्रधान मंत्री पर किया तीखा हमला

कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि जिस वक्त देश शहीदों के शव के टुकड़े चुन रहा था. उस वक्त पीएम मोदी अपने नाम के नारे लगवा रहे थे.

जिन में मिली बहुत बुरी हार के बाद राजनाइटिक परिदृश्य से गायब हुए रणदीप सुरजेवाला को पुलवामा अटैक के बाद एक बार फिर से अखबारी सुर्खियों में आने का मौका मिल गया है। कांग्रेस ने गुरुवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके भारतीय जनता पार्टी पर पुलवामा हमले को लेकर राजनीति करने का आरोप लगाया है. कांग्रेस ने कहा कि ‘पीएम मोदी और अमित शाह बस इसका राजनीतिक फायदा उठा रहे हैं. उन्होंने राष्ट्रीय शोक की घोषणा भी नहीं की.’

कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि जिस वक्त देश शहीदों के शव के टुकड़े चुन रहा था. उस वक्त पीएम मोदी अपने नाम के नारे लगवा रहे थे और अमित शाह रैली में कांग्रेस पर हमला कर रहे थे.

सुरजेवाला ने कहा, ‘जब देश दोपहर में हुए पुलवामा अटैक पर शहीदों की जान जाने पर रो रहा था, तब पीएम मोदी शाम तक जिम कॉर्बेट पार्क में शाम तक फोटो शूट कराते रहे. पूरी दुनिया में कोई ऐसा पीएम है क्या? मेरे पास इस आचरण के लिए कोई शब्द नहीं बचे हैं.’

सुरजेवाला ने कहा कि हमले के बाद मोदी और शाह ने राष्ट्रीय शोक की भी घोषणा नहीं की, ताकि उनकी रैलियां और राजनीतिक कार्यक्रम रुक न जाएं.

कांग्रेस ने पीएम मोदी के दक्षिण कोरिया के दौरे पर भी सवाल उठाए. साथ ही सुरजेवाला ने ये भी कहा कि पीएम मोदी शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए उनके परिवार वालों को इंतजार करवा रहे थे.

सुरजेवाला ने कश्मीर में बढ़ी अस्थिरता पर तो सवाल उठाया ही, पुलवामा अटैक पर सरकार के सामने सवाल रखे. उन्होंने कहा कि आतंकियों को इतनी बड़ी मात्रा में आरडीएक्स और रॉकेट लॉन्चर कैसे मिले? उन्होंने सवाल किया कि जब सीआरपीएफ जवानों की तैनाती में देरी हुई थी, तो उन्हें एयरलिफ्ट क्यों नहीं किया गया? जैश-ए-मुहम्मद की ओर से चलाए गए धमकी भरे वीडियो को नजरअंदाज क्यों किया गया?

नामवर सिंह नहीं रहे

नई दिल्ली: हिंदी के जानेमाने साहित्यकार और आलोचक नामवर सिंह का 92 साल की उम्र में निधन हो गया है. वे पिछले एक महीने से दिल्ली के एम्स अस्पताल में ट्रॉमा सेंटर में भर्ती थे. पिछले महीने अचानक उनकी तबियत नासाज उस समय हो गई जब वह अपने घर में गिर गए. उसके बाद से लगातार उनका स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा था.  

उन्हें आलोचना और साक्षात्कार विधा को नई ऊंचाई देने का श्रेय जाता है. कविता के नए प्रतिमान के लिए 1971 में नामवर सिंह को साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया था.

आपको बता दें नामवर सिंह हिंदी के जाने माने साहित्यकार हैं. उनका जन्म 28 जुलाई 1927 को वाराणसी के जीयनपुर जिसका नाम अब चंदौली है, में हुआ था. नामवर सिंह ने देश के कई प्रतिष्ठ‍ित विश्वविद्यालयों में पढ़ाया है. उनकी छायावाद, नामवर सिंह और समीक्षा, आलोचना और विचारधारा जैसी किताबें आज भी काफी चर्चित हैं. 
उन्होंने साहित्य में काशी विश्वविद्यालय से एमए और पीएचडी की डिग्री हासिल करने के बाद कई साल तक प्रोफेसर की नौकरी की. अब लंबे अरसे से वह हिंदी के सबसे गंभीर आलोचक, समीक्षक और साक्षात्कार विधा में पारंगत लेखक के रूप में जाने जाते हैं.

बीएचयू के साथ ही उन्होंने सागर, जोधपुर विश्वविद्यालय, आगरा विश्वविद्यालय में अध्यापन किया था. फिर वो दिल्ली के जेएनयू में आ गए और वहीं से रिटायर हुए. नामवर सिंह उर्दू के भी बड़े जानकार थे.

अध्यापन और लेखन के अलावा उन्होंने राजनीति में भी हाथ आजमाया था. साल 1959 में वे सक्रिय राजनीति में उतरे और उन्होंने इस साल चकिया-चंदौली सीट से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के बैनर तले लोकसभा चुनाव लड़ा था. हालांकि इस चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था.

आलोचना: बकलम खुद, हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योग, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ, छायावाद, पृथ्वीराज रासो की भाषा, इतिहास और आलोचना, दूसरी परंपरा की खोज, वाद विवाद संवाद.

साक्षात्कार: कहना न होगा

सम्पादित किताबें: कहानी: नई कहानी, कविता के नये प्रतिमान, दूसरी परम्परा की खोज, वाद विवाद सम्वाद, कहना न होगा. चिंतामणि भाग-3, रामचन्द्र शुक्ल संचयन, हजारीप्रसाद द्विवेदी:संकलित निबन्ध, आज की हिन्दी कहानी, आधुनिक अध्यापन रूसी कविताएं, नवजागरण के अग्रदूत: बालकृष्ण भट्ट.

शिवाजी भोंसले उर्फ़ छत्रपति शिवाजी महाराज

संकलन: राजविरेन्द्र वशिष्ठ

छत्रपति शिवाजी भोसले

शिवाजी भोंसले उर्फ़ छत्रपति शिवाजी महाराज एक भारतीय शासक और मराठा साम्राज्य के संस्थापक थे। शिवाजी ने आदिलशाही सल्तनत की अधीनता स्वीकार ना करते हुए उनसे कई लड़ाईयां की थी। शिवाजी को हिन्दूओं का नायक भी माना जाता है। शिवाजी महाराज एक बहादुर, बुद्धिमान और निडर शासक थे। धार्मिक कार्य में उनकी काफी रूचि थी। रामायण और महाभारत का अभ्यास वह बड़े ध्यान से करते थे। वर्ष 1674 में शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ और उन्हें छत्रपति का ख़िताब मिला।

माँ जीजाबाई की गोद में बालक शिवा

शिवाजी महाराज का जन्म 19 फ़रवरी 1630 में शिवनेरी दुर्ग में हुआ था। इनके पिता का नाम शाहजी भोसलें और माता का नाम जीजाबाई था। शिवनेरी दुर्ग पुणे के पास है। उनकी माता ने उनका नाम भगवान शिवाय के नाम पर शिवाजी रखा। उनकी माता भगवान शिवाय से स्वस्थ सन्तान के लिए प्रार्थना किया करती थी। शिवाजी के पिताजी शाहजी भोंसले एक मराठा सेनापति थे, जो कि डेक्कन सल्तनत के लिए कार्य किया करते थे। शिवाजी के जन्म के समय डेक्कन की सत्ता तीन इस्लामिक सल्तनतों बीजापुर, अहमदनगर और गोलकोंडा में थी। शिवाजी अपनी माँ जीजाबाई के प्रति बेहद समर्पित थे। उनकी माँ बहुत ही धार्मिक थी। उनकी माता शिवाजी को बचपन से ही युद्ध की कहानियां तथा उस युग की घटनाओं के बारे में बताती रहती थीं, खासकर उनकी माँ उन्हें रामायण और महाभारत की प्रमुख कहानियाँ सुनाती थीं। जिन्हें सुनकर शिवाजी के ऊपर बहुत ही गहरा असर पड़ा था। इन दो ग्रंथो की वजह से वो जीवनपर्यन्त हिन्दू महत्वो का बचाव करते रहे। इसी दौरान शाहजी ने दूसरा विवाह किया और अपनी दुसरी पत्नी तुकाबाई के साथ कर्नाटक में आदिलशाह की तरफ से सैन्य अभियानो के लिए चले गए। उन्होंने शिवाजी और जीजाबाई को दादोजी कोंणदेव के पास छोड़ दिया। दादोजी ने शिवाजी को बुनियादी लड़ाई तकनीकों के बारे में जैसे कि- घुड़सवारी, तलवारबाजी और निशानेबाजी सिखाई।

कोंडना पर हमला

शिवाजी महाराज ने वर्ष 1645 में, आदिलशाह सेना को बिना सूचित किए कोंड़ना किला पर हमला कर दिया। इसके बाद आदिलशाह सेना ने शिवाजी के पिता शाहजी को गिरफ्तार कर लिया। आदिलशाह सेना ने यह मांग रखी कि वह उनके पिता को तब रिहा करेगा जब वह कोंड़ना का किला छोड़ देंगे। उनके पिता की रिहाई के बाद 1645 में शाहजी की मृत्यु हो गई। पिता की मृत्यु के बाद शिवाजी ने फिर से आक्रमण करना शुरू कर दिया।

वर्ष 1659 में, आदिलशाह ने अपने सबसे बहादुर सेनापति अफज़ल खान को शिवाजी को मारने के लिए भेजा। शिवाजी और अफज़ल खान 10 नवम्बर 1659 को प्रतापगढ़ के किले के पास एक झोपड़ी में मिले। दोनों के बीच एक शर्त रखी गई कि वह दोनों अपने साथ केवल एक ही तलवार लाए गए। शिवाजी को अफज़ल खान पर भरोसा नही था और इसलिए शिवाजी ने अपने कपड़ो के नीचे कवच डाला और अपनी दाई भुजा पर बाघ नख (Tiger’s Claw) रखा और अफज़ल खान से मिलने चले गए। अफज़ल खान ने शिवाजी के ऊपर वार किया लेकिन अपने कवच की वजह से वह बच गए, और फिर शिवाजी ने अपने बाघ नख (Tiger’s Claw) से अफज़ल खान पर हमला कर दिया। हमला इतना घातक था कि अफज़ल खान बुरी तरह से घायल हो गया, और उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद शिवाजी के सैनिकों ने बीजापुर पर आक्रमण कर दिया।

शिवाजी ने 10 नवम्बर 1659 को प्रतापगढ़ के युद्ध में बीजापुर की सेना को हरा दिया। शिवाजी की सेना ने लगातार आक्रमण करना शुरू कर दिया। शिवाजी की सेना ने बीजापुर के 3000 सैनिक मार दिए, और अफज़ल खान के दो पुत्रों को गिरफ्तार कर लिया। शिवाजी ने बड़ी संख्या में हथियारों ,घोड़ों,और दुसरे सैन्य सामानों को अपने अधीन कर लिया। इससे शिवाजी की सेना और ज्यादा मजबूत हो गई, और मुगल बादशाह औरंगजेब ने इसे मुगल साम्राज्य का सबसे बड़ा खतरा समझा।

मुगलों के शासक औरंगजेब का ध्यान उत्तर भारत के बाद दक्षिण भारत की तरफ गया। उसे शिवाजी के बारे में पहले से ही मालूम था। औरंगजेब ने दक्षिण भारत में अपने मामा शाइस्ता खान को सूबेदार बना दिया था। शाइस्ता खान अपने 150,000 सैनिकों को लेकर पुणे पहुँच गया और उसने वहां लूटपाट शुरू कर दी। शिवाजी ने अपने 350 मावलो के साथ उनपर हमला कर दिया था, तब शाइस्ता खान अपनी जान बचाकर भाग खड़ा हुआ और शाइस्ता खान को इस हमले में अपनी 3 उँगलियाँ गंवानी पड़ी। इस हमले में शिवाजी महाराज ने शाइस्ता खान के पुत्र और उनके 40 सैनिकों का वध कर दिया। शाइस्ता खान ने पुणे से बाहर मुगल सेना के पास जा कर शरण ली और औरंगजेब ने शर्मिंदगी के मारे शाइस्ता खान को दक्षिण भारत से हटाकर बंगाल का सूबेदार बना दिया।

सूरत की लूट जहां शिवाजी को 132 लाख की संपत्ति हासिल हुई

इस जीत के बाद शिवाजी की शक्ति और ज्यादा मजबूत हो गई थी। लेकिन कुछ समय बाद शाइस्ता खान ने अपने 15,000 सैनिकों के साथ मिलकर  शिवाजी के कई क्षेत्रो को जला कर तबाह कर दिया, बाद में शिवाजी ने इस तबाही का बदला लेने के लिए मुगलों के क्षेत्रों में जाकर लूटपाट शुरू कर दी। सूरत उस समय हिन्दू मुसलमानों का हज पर जाने का एक प्रवेश द्वार था। शिवाजी ने 4 हजार सैनिकों के साथ सूरत के व्यापारियों को लूटने का आदेश दिया, लेकिन शिवाजी ने किसी भी आम आदमी को अपनी लूट का शिकार नहीं बनाया।

शिवाजी महाराज को आगरा बुलाया गया जहां उन्हें लागा कि उनको उचित सम्मान नहीं दिया गया है। इसके खिलाफ उन्होंने अपना रोष दरबार पर निकाला और औरंगजेब पर छल का आरोप लगाया। औरंगजेब ने शिवाजी को कैद कर लिया और शिवाजी पर 500 सैनिकों का पहरा लगा दिया। हालांकि उनके आग्रह करने पर उनकी स्वास्थ्य की दुआ करने वाले आगरा के संत, फकीरों और मन्दिरों में प्रतिदिन मिठाइयाँ और उपहार भेजने की अनुमति दे दी गई थी। कुछ दिनों तक यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहा। एक दिन शिवाजी ने संभाजी को मिठाइयों की टोकरी में बैठकर और खुद मिठाई की टोकरी उठाने वाले मजदूर बनकर वहा से भाग गए। इसके बाद शिवाजी ने खुद को और संभाजी को मुगलों से बचाने के लिए संभाजी की मौत की अफवाह फैला दी। इसके बाद संभाजी को मथुरा में एक ब्राह्मण के यहाँ छोड़ कर शिवाजी महाराज बनारस चले गए। औरंगजेब ने जयसिंह पर शक करके उसकी हत्या विष देकर करवा डाली। जसवंत सिंह ( शिवाजी का मित्र) के द्वारा पहल करने के बाद सन् 1668 में शिवाजी ने मुगलों के साथ दूसरी बार सन्धि की। औरंगजेब ने शिवाजी को राजा की मान्यता दी। शिवाजी के पुत्र संभाजी को 5000 की मनसबदारी मिली और शिवाजी को पूना, चाकन और सूपा का जिला लौटा दिया गया, लेकिन, सिंहगढ़ और पुरन्दर पर मुग़लों का अधिपत्य बना रहा। सन् 1670 में सूरत नगर को दूसरी बार शिवाजी ने लूटा, नगर से 132 लाख की सम्पत्ति शिवाजी के हाथ लगी और लौटते वक्त शिवाजी ने एक बार फिर मुगल सेना को सूरत में हराया।

सन 1674 तक शिवाजी के सम्राज्य का अच्छा खासा विस्तार हो चूका था। पश्चिमी महाराष्ट्र में स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के बाद शिवाजी ने अपना राज्याभिषेक करना चाहा, परन्तु ब्राहमणों ने उनका घोर विरोध किया। क्योंकि शिवाजी क्षत्रिय नहीं थे उन्होंने कहा की क्षत्रियता का प्रमाण लाओ तभी वह राज्याभिषेक करेगा। बालाजी राव जी ने शिवाजी का सम्बन्ध मेवाड़ के सिसोदिया वंश से समबंद्ध के प्रमाण भेजे जिससे संतुष्ट होकर वह रायगढ़ आया और उन्होंने राज्याभिषेक किया। राज्याभिषेक के बाद भी पुणे के ब्राह्मणों ने शिवाजी को राजा मानने से इनकार कर दिया। इसके बाद शिवाजी ने अष्टप्रधान मंडल की स्थापना कि। विभिन्न राज्यों के दूतों, प्रतिनिधियों के अलावा विदेशी व्यापारियों को भी इस समारोह में आमंत्रित किया गया। इस समारोह में लगभग रायगढ़ के 5000 लोग इकट्ठा हुए थे। शिवाजी को छत्रपति का खिताब दिया गया। उनके राज्याभिषेक के 12 दिन बाद ही उनकी माता का देहांत हो गया। इस कारण फिर से 4 अक्टूबर 1674 को दूसरी बार उनका राज्याभिषेक हुआ। दो बार हुए इस समारोह में लगभग 50 लाख रुपये खर्च हुए। इस समारोह में हिन्दू स्वराज की स्थापना का उद्घोष किया गया था।

शिवाजी के परिवार में संस्कृत का ज्ञान अच्छा था और संस्कृत भाषा को बढ़ावा दिया गया था। शिवाजी ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अपने किलों के नाम संस्कृत में रखे जैसे कि- सिंधुदुर्ग, प्रचंडगढ़, तथा सुवर्णदुर्ग। उनके राजपुरोहित केशव पंडित स्वंय एक संस्कृत के कवि तथा शास्त्री थे। उन्होंने दरबार के कई पुराने कायदों को पुनर्जीवित किया एवं शासकिय कार्यों में मराठी तथा संस्कृत भाषा के प्रयोग को बढ़ावा दिया।

शिवाजी एक कट्टर हिन्दू थे, वह सभी धर्मों का सम्मान करते थे। उनके राज्य में मुसलमानों को धार्मिक स्वतंत्रता थी। शिवाजी ने कई मस्जिदों के निर्माण के लिए दान भी दिए था। हिन्दू पण्डितों की तरह मुसलमान सन्तों और फ़कीरों को बराबर का सम्मान प्राप्त था। उनकी सेना में कई मुस्लिम सैनिक भी थे। शिवाजी हिन्दू संकृति का प्रचार किया करते थे। वह अक्सर दशहरा पर अपने अभियानों का आरम्भ किया करते थे।

शिवाजी, भारतीय नौसेना के पितामह

शिवाजी ने काफी कुशलता से अपनी सेना को खड़ा किया था। उनके पास एक विशाल नौसेना (Navy) भी थी। जिसके प्रमुख मयंक भंडारी थे। शिवाजी ने अनुशासित सेना तथा सुस्थापित प्रशासनिक संगठनों की मदद से एक निपुण तथा प्रगतिशील सभ्य शासन स्थापित किया। उन्होंने सैन्य रणनीति में नवीन तरीके अपनाएं जिसमें दुश्मनों पर अचानक आक्रमण करना जैसे तरीके शामिल थे।

अष्टप्रधान

शिवाजी को एक सम्राट के रूप में जाना जाता है। उनको बचपन में कुछ खास शिक्षा नहीं मिली थी, लेकिन वह फिर भी भारतीय इतिहास और राजनीति से अच्छी तरह से परिचत थे। शिवाजी ने प्रशासकीय कार्यों में मदद के लिए आठ मंत्रियों का एक मंडल तैयार किया था, जिसे अष्टप्रधान कहा जाता था। इसमें मंत्रियों प्रधान को पेशवा कहते थे, राजा के बाद सबसे ज्यादा महत्व पेशवा का होता था। अमात्य वित्त मंत्री और राजस्व के कार्यों को देखता था, और मंत्री राजा के दैनिक कार्यों का लेखा जोखा रखता था। सचिव दफ्तरी काम किया करता था। सुमन्त विदेश मंत्री होता था जो सारे बाहर के काम किया करता था। सेनापति सेना का प्रधान होता था। पण्डितराव दान और धार्मिक कार्य किया करता था। न्यायाधीश कानूनी मामलों की देखरेख करता था।

शिवाजी और अष्टप्रधान

मराठा साम्राज्य उस समय तीन या चार विभागों में बटा हुआ था। प्रत्येक प्रान्त में एक सूबेदार था जिसे प्रान्तपति कहा जाता था। हरेक सूबेदार के पास एक अष्टप्रधान समिति होती थी। न्यायव्यवस्था प्राचीन प्रणाली पर आधारित थी। शुक्राचार्य, कौटिल्य और हिन्दू धर्मशास्त्रों को आधार मानकर निर्णय दिया जाता था। गाँव के पटेल फौजदारी मुकदमों की जाँच करते थे। राज्य की आय का साधन भूमिकर था, सरदेशमुखी से भी राजस्व वसूला जाता था। पड़ोसी राज्यों की सुरक्षा की गारंटी के लिए वसूले जाने वाला सरदेशमुखी कर था। शिवाजी अपने आपको मराठों का सरदेशमुख कहा करते थे और इसी हैसियत से सरदेशमुखी कर वसूला जाता था।

शिवाजी महाराज ने अपने पिता से स्वराज की शिक्षा हासिल की, जब बीजापुर के सुल्तान ने उनके पिता को गिरफ्तार कर लिया था तो शिवाजी ने एक आदर्श पुत्र की तरह अपने पिता को बीजापुर के सुल्तान से सन्धि कर के छुड़वा लिया। अपने पिता की मृत्यु के बाद ही शिवाजी ने अपना राज-तिलक करवाया। सभी प्रजा शिवजी का सम्मान करती थी और यही कारण है कि शिवाजी के शासनकाल के दौरान कोई आन्तरिक विद्रोह जैसी घटना नहीं हुई थी। वह एक महान सेना नायक के साथ-साथ एक अच्छे कूटनीतिज्ञ भी थे। वह अपने शत्रु को आसानी से मात दे देते थे।

शिवाजी के सिक्के

एक स्वतंत्र शासक की तरह उन्होंने अपने नाम का सिक्का चलवाया। जिसे “शिवराई” कहते थे, और यह सिक्का संस्कृत भाषा में था।

3 अप्रैल, 1680 में लगातार तीन सप्ताह तक बीमार रहने के बाद यह वीर हिन्दू सम्राट सदा के लिए इतिहासों में अमर हो गया, और उस समय उनकी आयु 50 वर्ष थी। शिवाजी महाराज एक वीर पुरुष थे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन मराठा, हिन्दू साम्राज्य के लिए समर्पित कर दिया। मराठा इतिहास में सबसे पहला नाम शिवाजी का ही आता है। आज महाराष्ट्र में ही नहीं पूरे देश में वीर शिवाजी महाराज की जयंती बड़े ही धूम-धाम के साथ मनाई जाती है।

पाकिस्तान की कायरना हरकत की जितनी निंदा हो, कम है-अंजलि बंसल

सेक्टर 16 से यवनिका पार्क तक निकाला कैंडल मार्च

पंचकूला।

हरियाणा प्रदेश महिला कांग्रेस की महासचिव अंजलि डीके बंसल ने कहा है कि कल कश्मीर के पुलवामा में पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा अनेकों जांबाज सैनिकों को जिस तरह से घात लगाकर कायराना तरीके से शहीद किया गया, उसकी जितनी भी निंदा की जाए कम है। अंजलि बंसल ने कहा कि पूरा देश शोकाकुल है और अपने शहीद जवानों के प्रति कृतज्ञतापूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है। अग्रवाल विकास ट्रस्ट व भगवान परशुराम ब्राह्मण कल्याण संघ हरियाणा पंचकूला के विभिन्न सामाजिक संगठनों के तत्वाधान में भगवान अग्रसेन चौंक से कैंडल मार्च करते हुए यवनिका पार्क पहुंचकर देश के अमर शहीदों को मौन श्रद्धांजलि अर्पित की गई। अंजलि बंसल ने कहा कि जम्मू कश्मीर के पुलवामा में आतंकवादी हमले में शहीद हुए जवानों की शहादत को लेकर कांग्रेसियों में जबरदस्त आक्रोश है। महिला कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने ‘पाकिस्तान मुर्दाबादÓ के नारे लगाकर पाकिस्तान का पुतला फूंककर अपना रोष व्यक्त किया। केंद्र सरकार से इस कृत्य के लिए पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देने की मांग की। महिला कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने हमले में शहीद जवानों की आत्मा की शांति के लिए मौन रखकर परमात्मा से उनके परिजनों को यह दु:ख सहने के लिए शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की। इस अवसर पर एडवोकेट पूजा बंसल, विकास अग्रवाल विक्की, अनीता गोयल, चांद, दलबीर वाल्मिकी, कृष्ण गोयल, इंद्रा गुप्ता, अग्रवाल विकास ट्रस्ट के प्रधान सत्यनारायण गुप्ता, नरेंद्र जैन, कृष्ण अग्रवाल, वीरेंद्र गुप्ता, भगवान परशुराम ब्राहमण कल्याण संघा के प्रधान जितेंद्र शर्मा, महासचिव हेमंत शर्मा, विकास कुमार, विक्रांत मोहन, पवन गुप्ता, कृष्ण नन्हा, महिला अग्रवाल विकास ट्रस्ट की प्रधान इंद्रा गुप्ता, उषा गुप्ता, अनीता अग्रवाल, कृष्णा, किरण गुप्ता, निशा जैन, कोमल अग्रवाल, राहुल गर्ग, सुशील पवार, एचएसवीपी गुरचरण सिंह सहित अन्य उपस्थित थे।

न भूलेंगे, न माफ करेंगे: सीआरपीएफ़

नई दिल्‍ली : जम्‍मू-कश्‍मीर में पुलवामा में हुए आतंकी हमले में अपने 44 जवानों को खोने वाले केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) में आतंकियों और उसके पनहगारों के प्रति कितनी नाराजगी है, इसका अंदाजा शुक्रवार को उसकी तरफ से आई प्रतिक्रिया से साफ जाहिर हो गया. बल ने एक ट्वीट करते हुए कहा कि ‘न भूलेंगे और ना ही माफ करेंगे’. 

बल ने ट्विटर पर अपने आधिकारिक अकाउंट पर ट्वीट करते हुए कहा कि ‘हम न भूलेंगे, ना ही माफ करेंगे. हम पुलवामा हमले में शहीद हुए अपने जवानों को सलाम करते हैं और शहीद भाईयों के परिवार के साथ खड़े हैं. इस जघन्य हमले का बदला लिया जाएगा’.

दरअसल, जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर हुए हमले के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच एक बार फिर से तनाव की स्थिति पैदा हो गई है. इस हमले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में हुई सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी की बैठक में कहा गया कि भारत, पाकिस्तान के मंसूबों को कभी भी कामयाब होने नहीं देगा. 

पीएम ने कहा कि ‘पुलवामा में वीर शहीद हुए जवानों की शहादत का बदला लेने के लिए सुरक्षाबलों को पूरी आजादी दे दी गई है. हमले से पूरे देश में आक्रोश है, इस समय लोगों का खून खौल रहा है, लेकिन देश की जनता को सेना के शौर्य पर पूरा भरोसा है’.

प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि ‘गुनहगारों को उनके किए की सजा अवश्य मिलेगी. भारत आतंक के खिलाफ अपनी लड़ाई को और भी तेज करेगा. मैं आतंकी संगठनों को और उनके सरपरस्तों को कहना चाहता हूं कि वो बहुत बड़ी गलती कर गए हैं’.

गौरतलब है कि जम्मू कश्मीर के पुलवामा जिले में गुरुवार को जैश-ए-मोहम्मद के एक आतंकवादी ने विस्फोटकों से लदे वाहन से सीआरपीएफ जवानों को ले जा रही बस को टक्कर मार दी, जिसमें कम से कम 44 जवान (रॉयटर्स के अनुसार)  शहीद हो गए.

केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के 2500 से अधिक कर्मी 78 वाहनों के काफिले में जा रहे थे. इनमें से अधिकतर अपनी छुट्टियां बिताने के बाद अपने काम पर वापस लौट रहे थे. जम्मू कश्मीर राजमार्ग पर अवंतिपोरा इलाके में इस काफिले पर घात लगाकर हमला किया गया. श्रीनगर से लगभग 20 किलोमीटर दूर पुलवामा के इस हमले की जिम्मेदारी पाकिस्तान आधारित आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने ली है.

कंठ में कोई गीला गोला सा अटक रहा है बार बार, ईश्वर तू ही कुछ कर’: डॉ. कुमार विश्वास

नई दिल्लीः पुलवामा आतंकी हमले को लेकर पूरे देश में गुस्सा है. दुनियाभर के नेताओं और नामचीन हस्तियों ने इस हमले की निंदा करते हुए शहीद परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की है. भारत में भी तमाम राजनीतिक दलों के नेताओं, बॉलीवुड हस्तियों और खिलाड़ियों ने हमले की निंदा करते हुए आतंक के खिलाफ सख्त कदम उठाने की मांग की है. मशहूर कवि डॉ कुमार विश्वास ने पुलवामा हमले में शहीद जवानों के परिवारों के साथ संवेदना व्यक्त करते हुए मार्मिक पंक्तियां लिखी हैं. कुमार विश्वास की इन लाइनों के पढ़ आपका भी गला रुंध जाएगा.

इसके साथ ही कुमार विश्वास ने अपने ऑफिशियल ट्विटर अकाउंट की प्रोफाइल पिक भी बदल दी है. उनकी नई तस्वीर में एक सैनिक सो रहे नागरिक की रक्षा करते हुए दिखाया गया. सैनिक की पीठ पर कई वार हो रहे हैं.

डॉ. कुमार विश्वास ने ट्वीट में लिखा, ‘ग़ुस्सा,बेबसी और आंसू हावी हैं नींद पर, कैसी बीत रही होगी उन परिवारों पर ये रात?, हर तरफ़ दुनिया सोई है पर मेरी नींद मर सी गई हैं !, आंखों में किरचें चुभ रही हैं. हम ही शायद पागल हैं जो संवेदना को इतने गहरे ले बैठते हैं. कंठ में कोई गीला गोला सा अटक रहा है बार बार, ईश्वर तू ही कुछ कर’

In Parliament, Mulayam says he wishes to see Modi as PM again

Modi acknowledged SP patriarch’s praise with folded hands and later made a mention of Mr. Yadav’s “blessings” in his speech.
He clearly let the world know that he does not like Akhilesh backing the prime ministerial candidature of Mayawati or Mamata Banerjee or Rahul Gandhi. He would rather see Modi return as prime minister.

On the final day of the 16th Lok Sabha’s last session of Parliament, Samajwadi Party patron Mulayam Singh Yadav sprang a surprise, showering praise on Prime Minister Narendra Modi and appreciating his efforts to try and take everyone along and all sections of the House along.

Then came what many in the Opposition benches would call a surprise of surprises — his parting wish of the 16th Lok Sabha was that in the 17th Lok Sabha, he would like to see Modi return as prime minister. Pradhan Mantri ko badhaai dena chahta hoon ki pradhan mantri ne sabko saath lekar chalne ki koshish ki hai. Main aap ka aadar garta hoon aapka samman karta hoon. Main kehna chahta hun ki saare sadasya phir se jeet kar aayen, aur aap, Pradhan Mantriji, dobara pradhan mantri banein.” (I want to congratulate the prime minister for trying to take everyone along. I respect you, I honour you. I want to see all present members of the House get elected as MPs and you, Mr Prime Minister, become prime minister again). Mulayan then gestured towards Modi with folded hands.

Modi laughed and responded with folded hands. A surprised Sonia Gandhi first laughed and then was seen talking to NCP leader Supriya Sule. Mulayam went on thanking Modi for his leadership. The former Uttar Pradesh chief minister’s words were music to the ears of the Treasury benches. This came at a time when the BJP’s biggest challenge in the upcoming Lok Sabha election is to come from Uttar Pradesh.

The newly-formed Samajwadi Party-BSP alliance is arithmetically very strong and has the potential to adversely impact the BJP’s prospects in the state where it had won 73 (including two by its ally, Apna Dal). The BJP could use Mulayam’s statement as its key electoral issue in Uttar Pradesh to say there can’t be a greater endorsement for Modi’s work as prime minister and his re-election than somebody like Mulayam’s rich praise.

The significance of Mulayam’s statement lay in the fact that he is considered to the original ‘dharti-putra‘ — a self-made, rooted-to-ground and wily politician from the politically-critical Hindi heartland state. His line of politics is otherwise diametrically opposed to that of Modi and the BJP’s Hindutva politics. Although he is not in the best of health, his son Akhilesh Yadav has snatched the reins of authority in his own party, but the Samajwadi Party patriarch’s wish is still a command for a section of party followers, at least among the older generations of Yadavs. “Netaji”, as he is fondly called, is still admired by old-time Samajawdis in Uttar Pradesh.

Mulayam Singh

By saying what he said in his last speech in the 16th Lok Sabha (nobody is quite sure whether he will fight the coming election), which could well be his last speech on the floor of the House, it becomes hugely significant for a vast mass of Samajwadi Party cadres. He has clearly indicated that he is not happy with the way son Akhilesh has yielded space to Mayawati’s BSP, bending to terms dictated by Mayawati. He clearly let the world know that he does not like Akhilesh backing the prime ministerial candidature of Mayawati or Mamata Banerjee or Rahul Gandhi. He would rather see Modi return as prime minister.

When Akhilesh Yadav had sidelined Mulayam in the run up to the Uttar Pradesh Assembly election and struck an alliance with Rahul, giving the Congress 100 seats, it was said that Mulayam was not happy with the decision, but he didn’t say son in public. The 2017 Assembly election spelled doom for the Samajwadi Party. Mulayam perhaps foresees a similar situation for his party in the next parliamentary election, a party he built with decades of hard work.

Outside of the House, Rahul Gandhi, at a press conference, disagreed with Mulayam’s remarks. The BJP is already going gaga over this. It has got the ammunition its so desperately required to puncture the Samajwadi Party-BSP alliance. The BJP and RSS with its huge organisational machinery will do everything in its power to swing it in its favour.

When Modi’s turn came to speak, to make concluding remarks of his present tenure on floor of the House in Lok Sabha, he ended his speech by “specially thanking” Mulayam. Modi called his tenure as the “beginning of his first innings”.

The other loaded message that he gave was giving credit to a “full majority government” and in turn, to 125 crore Indians for voting overwhelmingly in 2014. He obviously hopes that people will repose the same trust in him in the coming election. Dalit icon BR Ambedkar and Mahatma Gandhi came in for repeated reference in his speech, so was the crackdown on black money and corruption.

His sarcasm was reserved for Rahul Gandhi, albeit without mentioning the Congress president’s name — that the five-year tenure of the Lok Sabha is over, but “no earthquake” was felt (Rahul had famously said that there would be an earthquake if he was allowed to speak) inside the House, but some tried to fly paper airplanes (senior Congress leaders had done that while protesting against Rafale deal). Then he referred to Rahul’s hug and wink, stating that he learned the difference between gale lagna and gale padna.

अखिलेश के सचिव को आयोजन में शामिल न होने की बात बता दी गयी थी: विश्वविद्यालय कुलसचिव

अखिलेश यादव का इलाहाबाद जाने का निर्णय पूर्णतया राजनीति से प्रेरित जान पड़ता है। अखिलेश के सचिव गंगा राम को लिखे गए पत्र के अनुसार विषविद्यालय अपने पूर्व के कटु अनुभवों के आधार पर यह निर्णय ले रहा है। इसके उपरांत भी अखिलेश उस कार्यक्र्म में जाने की जिद करते हैं और साथ ही साथ माया, ममता और नायडू के बयान का समय भी इसको प्रायोजित ही लगता है।

लखनऊ: सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मंगलवार को उन्हें इलाहाबाद जाने से रोकने को लेकर केंद्र तथा प्रदेश की बीजेपी सरकारों पर जमकर निशाना साधा. उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र की मिली-भगत के कारण ही लखनऊ हवाईअड्डे पर पुलिस और खुफिया विभाग के अफसरों ने उन्हें विमान पर चढ़ने से रोक दिया.

अखिलेश ने इस घटना के बाद आरोप लगाया कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में सपा समर्थित प्रत्याशी के हाथों अपने उम्मीदवार की हार से तिलमिलायी प्रदेश की बीजेपी सरकार ने मुझे छात्रसंघ कार्यक्रम में शामिल होने से रोक दिया. प्रदेश सरकार मुझे हवाई अड्डे पर नहीं रोक सकती थी, यह काम केंद्र सरकार का है. मुझे लगता है कि दिल्ली (केंद्र) की सरकार भी इसमें मिली हुई है. उन्होंने आरोप लगाया कि रात में स्थानीय अभिसूचना इकाई और पुलिस के कुछ अफसरों ने उनके घर की रेकी (टोह) की. मंगलवार सुबह साढ़े छह बजे तीन अधिकारी उनके घर के पास बैठा दिये गये.

वहीं, विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार ने इस मामले पर कहा कि अखिलेश यादव के निजी सचिव को सोमवार को ही पत्र लिखकर सूचना दे दी गई थी. सामने आए पत्र के अनुसार, इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने वार्षिक समारोह आदि कार्यक्रमों में नेताओं को आमंत्रित नहीं करने की बात कही है.

अखिलेश ने कहा कि स्थानीय पुलिस हवाई अड्डा परिसर में नहीं जा सकती क्योंकि उसकी सुरक्षा और प्रबंध किसी दूसरे बल के पास है. इसके बावजूद अफसर वहां पहुंचे और मुझे हवाई जहाज में चढ़ने से रोक दिया. मुझे रोकने वाले अफसर के पास कोई लिखित आदेश भी नहीं था. सपा अध्यक्ष ने कहा, ‘मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कह रहे हैं कि मैं अराजकता और हिंसा फैलाने जा रहा था. मैं सन्यासी योगी से पूछना चाहता हूं कि अगर मेरे राजनीतिक जीवन में मेरे ऊपर एक भी धारा लगी हो तो बताएं.’ 

लोकतन्त्र खतरे में आ ही गया, माया, ममता और नायडू ने अखिलेश को रोके जाने की की भर्त्स्ना

प्रधान मंत्री और भाजपा अध्यक्ष सहित उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री को अपने प्रदेश में प्रवेश न देने वाली ममता को अखिलेश को प्रयागराज जाने से रोकने पर लोकतन्त्र खतरे में दिखाई पड़ रहा है।असल में यदि अखिलेश अपनी छवि के अनुसार एएमयू जा रहे होते तो शायद उन्हे न रोका जाता, परंतु जिस पिता को यह फख्र है की उसने 300 करी सेवक मरवाये थे, उसके पुत्र को कारसेवकों के बीच जाने से वाकयी अराजक तत्त्वों का सामना करना पड़ सकता था। शायद ममता और चंद्रबाबू नायडू की यही मंशा थी। जानते तो अखिलेश भी थे की हिन्दू समागमों में उनकी समाजवादी वाली छवि प्रशासन के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है, अत: यह उनकी तरफ से भी एक राजनैतिक चाल हो सकती है।

समाजवादी पार्टी (SP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को लखनऊ एयरपोर्ट पर अचानक ही प्रशासन द्वारा प्रयागराज जाने से रोक लिए जाने की खबर सामने आने के बाद सभी राजनीतिक दल इसके विरोध में उतर आए हैं. अखिलेश यादव छात्र संघ के कार्यक्रम में शामिल होने के लिए प्रयागराज जा रहे थे. एयरपोर्ट पहुंचने के बाद उन्हें रोक दिया गया.

इसके विरोध में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और चंद्रबाबू नायडू सामने आए हैं. ममता बनर्जी ने यूपी सरकार के इस फैसले की कड़ी निंदा की और कहा- ‘अगर योगी राज में एक पूर्व मुख्यमंत्री को किसी कॉलेज के प्रोग्राम में हिस्सा लेने से रोक दिया जाता है तो वहां ‘रुकावट’ है. ‘रुकावट के लिए खेद है’… आज देश में ऐसी हालत हो गई है कि लोगों को एक जगह से दूसरी जगह जाने की इजाजत नहीं है.’

ममता बनर्जी ने गुजरात में जिग्नेश मेवानी को भी रोके जाने की बात उठाई. उन्होंने कहा- ‘गुजरात में एक यूनीवर्सिटी के कार्यक्रम में भाग लेने से जिग्नेश मेवानी को भी रोका गया था. उसे बीजेपी के गुंडों द्वारा डराया गया था और वो हमें सीखाते हैं. नफरत की राजनीति वो करते हैं. देश में इसके पहले कभी भी ऐसा नहीं हुआ था. ये दुखद है. मैं इसकी भर्त्सना करती हूं.’

वहीं आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने भी इस घटना की घोर निंदा की और कहा: ‘समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव के खिलाफ लखनऊ के अधिकारियों के व्यवहार की मैं कड़ी निंदा करता हूं. ये अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ भाजपा की असहिष्णुता का एक और उदाहरण है. वास्तव में लोकतंत्र खतरे में है.’

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव को लखनऊ एयरपोर्ट पर रोक लिया गया था. वो इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने जा रहे थे. यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने अखिलेश यादव को रोके जाने पर कहा है कि उनके इलाहाबाद यूनिवर्सिटी जाने से अराजकता का माहौल पैदा हो सकता है. इस पर अखिलेश यादव ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी. उन्होंने कहा ‘घबराई हुई सरकार है ये यूपी की. नौजवान इंतजार कर रहा है कि उसे कब मौका मिलेगा. अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरी जी ने भी अपने यहां भोजन रखा था. ये यूपी के सीएम कैसे साधु-संत हैं. जो दूसरे साधु-संतों से नहीं मिलने देना चाहते. उनसे क्या सीखोगे- ठोको नीति, रोको नीति.’