शहीद मेजर अनुज राजपूत का राजकीय सम्मान के साथ सेक्टर-20 स्थित श्मशानघाट में किया गया अंतिम संस्कार

– ज्ञानचंद गुप्ता ने शहीद मेजर अनुज राजपूत को पुष्पचक्र अर्पित कर दी श्रद्धांजलि
– पंचकूला के साथ साथ देश ने एक होनहार व बहादुर बेटा खो दिया -गुप्ता
– अनुज ने देश की रक्षा के लिये अपने प्राण न्यौछावर कर दिये हमें ऐेेसे वीर सपूत पर गर्व है-गुप्ता

पंचकूला, 22 सितम्बर:

कल जम्मू-कश्मीर के उद्यमपुर जिले में चौपर क्रैश में शहीद हुये मेजर अनुज राजपूत का आज राजकीय सम्मान के साथ सेक्टर-20 स्थित श्मशानघाट में अंतिम संस्कार किया गया।

हरियाणा विधानसभा अध्यक्ष ज्ञानचंद गुप्ता ने शहीद मेजर अनुज राजपूत को पुष्पचक्र अर्पित कर श्रद्धांजलि दी व शहीद के पिता केएस आर्य व माता श्रीमती उषा देवी का ढांढस बधाया। जिला प्रशासन की ओर से उपायुक्त विनय प्रताप सिंह ने शहीद को श्रद्धासुमन अर्पित किये।

इससे पूर्व 27 वर्षीय शहीद मेजर अनुज राजपूत का पार्थिव शरीर सेक्टर-20 लाया गया जहां सेकड़ों लोगों ने शहीद मेजर को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

सेक्टर-20 निवासी मेजर अनुज राजपूत आर्मी एवियेशन काॅर्पस में युवा पायलट थे और अपने माता-पिता की एकलौती संतान थे। मेजर अनुज एक होनहार व बहादुर युवा थे और हाल ही में मेजर के रैंक पर प्रमोट हुये थे।

शहीद मेजर अनुज राजपूत को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुये श्री गुप्ता ने कहा कि आज पंचकूला के साथ साथ देश ने एक होनहार व बहादुर बेटा खो दिया है। उन्होंने कहा कि शहीद मेजर  अनुज का पालन पोषण व पढ़ाई पंचकूला मेें ही हुई। मात्र 27 वर्ष की अल्पायु में ही वह मातृभूमि की रक्षा के लिये शहीद हो गये। श्री गुप्ता ने कहा कि ऐसे बहादुर युवाओं पर हमें गर्व हैं। उन्होंने कहा कि धन्य है ऐसे माता-पिता जिन्होंने अनुज जैसे वीर सपूत को जन्म दिया। गुप्ता ने कहा कि वे प्रभु से प्रार्थना करते है कि दिवंगत आत्मा को अपने चरणों में स्थान दें व परिवारजनों को इस दुख को सहने की शक्ति दें।

इस दुख की घड़ी में स्थानीय लोगों के साथ साथ सेना व पुलिस के अधिकारियों व अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने शहीद मेजर अनुज राजपूत को श्रद्धांजलि अर्पित की।


Chandigarh September 22, 2021

Webinar on “AFGHANISTAN: THE TALIBAN TAKEOVER, REGIONAL POWERS AND IMPLICATIONS FOR INDIA” by Dr. Shalini Chawla at the Department of Defence and National Security Studies.

The Department of Defence and National Security Studies, Panjab University, Chandigarh organized a special webinar on the topic “AFGHANISTAN: THE TALIBAN TAKEOVER, REGIONAL POWERS AND IMPLICATIONS FOR INDIA” by Dr. Shalini Chawla, a distinguished fellow and heads Pakistan and Afghanistan studies at the Centre for Air Power Studies (CAPS), New Delhi. She was a research scholar at the Institute for Defence Studies and Analyses, 1999-2002. She worked as a free-lance defence analyst from 2003-2005 in Colombo, Sri Lanka. She joined CAPS in 2006 and focus of her studies is Pakistan and Afghanistan.

Through this lecture, Dr. Chawla mainly wanted to draw attention to the challenges that India is going to face due to the Afghan crisis. She said that the agreement reached between the United States and the Taliban organization has many flaws and there is no concept of peace in it. The withdrawal of US troops from Afghanistan has posed many challenges and opportunities for regional powers such as Pakistan, Iran, China, Russia, and India. Talking about the implications for India, she said that at present the situation in the case of India is very unfavorable and it may face many more challenges in the near future. New Delhi does not recognize the Taliban as a governing authority in Afghanistan. As a friendly neighbor, India has always been concerned about peace and security in and around Afghanistan. That is why the Government of India supports all peace initiatives and engages with many stakeholders, including regional countries.

She further said that India is historically linked to Afghanistan, and it is its gateway to Central Asia. It has always wanted to protect the Afghan territory from Pakistan so that they cannot use it for any anti-India activities. But after the Taliban occupation of Afghanistan, India is now concerned about its commitment to the Afghan people. She is also apprehensive about the China-Pakistan alliance in Afghanistan. It fears that the soil of Afghanistan may be used by Pakistan for its anti-India terrorist activities.

She further said that regional powers like Pakistan and China are supporting the Taliban government for their strategic interests. Pakistan has already said that they will support an independent, democratic and sovereign Afghanistan, which they mean by a Taliban government ruling the Afghan people. Dr. Chawla stressed that Pakistani leaders always think that the Taliban will help them in the acquisition of Kashmir from India. That’s why they are providing the Taliban with equipment training and money to the best of their ability. Another hidden aim of Pakistan is that it wants to form a pro-Pakistan government in Afghanistan, which will help them resolve the border issues with Afghanistan and it will prevent the Pashtuns from demanding a separate Pashtunistan. She further said that since Pakistan’s own economy is in trouble, it is difficult to say how long Pakistan will support the Taliban with money and equipment. She said Pakistan would face international repercussions for its actions in Afghanistan.

While explaining China’s position in Afghanistan, Dr. Shalini highlighted that China always acts according to its security and strategic interests. Diplomatically, China has said that it is always ready to develop friendly and cooperative relations with Afghanistan and play a constructive role in Afghanistan’s peace and reconstruction. But its main objectives are: defending its borders and controlling the spread of extremism in Xinjiang, exploration of minerals in Afghanistan, and controlling regional expansionism. Apart from these, China’s main multilateral approach is to build three main alliances: Afghanistan-China-Pakistan, Afghanistan-Pakistan-Iran-China, and third is China-Pakistan-Afghanistan-Nepal. Like India, China also sees Afghanistan as a route to Central Asia. Dr. Chawla also focused on Russian and Iranian interests in the Afghan region. She said that with the Taliban’s takeover of Afghanistan, Russia is also concerned about its border security and influence in the region. Keeping its security interests in mind, Russia hosted a peace conference between the Afghan government and the Taliban in March 2021. But later when the Taliban controlled Afghan territory, Russian leaders also became concerned about the security challenges they would face in Central Asia and the Afghan region. Talking about Iranian interest in Afghanistan, Dr. Shalini said that Iran is portraying diplomatically that it is very concerned for the peace and security of Afghanistan but in reality, it is more concerned about the security of Afghan Shias. Decades of conflict have driven hundreds of thousands of Afghan refugees into Iran. Iran expects peace and stability there from the Taliban regime in Afghanistan and is looking for friendly relations with Afghanistan. Concluding her lecture, Dr. Chawla said that everything looks very pessimistic right now. Every state is looking after Afghanistan and acting according to its interest. Presently, the situation for India is not in its favor and the Pakistan-Afghanistan alliance is a big challenge, but India is still committed to help the Afghan people.

The lecture was attended by members of various faculty members, serving and retired armed officers pursuing various courses in the department, research scholars and students. The lecture was followed by a question answer session with the audience.

देश दहलाने के पाक के मंसूबे का पर्दाफाश, दाउद इब्रहीम का नाम फिर आया सामने

दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल ने एक बड़े आतंकी मॉड्यूल को ध्वस्त कर दिया है। प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बताया कि आतंकियों के टारगेट पर आने वाला त्योहार नवरात्र, दशहरा और दीपावली था। उन्होंने बताया कि अंडरवर्ल्ड से आतंकियों की फंडिंग हुई है। स्पेशल सेल ने ऑपरेशन में 6 आतंकियों को गिरफ्तार कर लिया है। दिल्ली पुलिस ने अपना यह ऑपरेशन दिल्ली, महाराष्ट्र व उत्तर प्रदेश में चला इन्हें गिरफ्तार किया है। इस संबंध में उनको 15 अगस्त से पहले इनपुट मिले थे। इसी के बाद पुलिस ने अपनी पड़ताल शुरू की। काफी समय से पुलिस इस मॉड्यूल पर अपनी नजर बनाए हुए थी, मगर जब सूचना कन्फर्म हो गई तब इन लोगों को पकड़ा गया। अब आगे इनके पूछताछ चल रही है।

नयी दिल्ली(ब्यूरो) :

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने पाकिस्तान समर्थित एक आतंकी मॉड्यूल का भंडाफोड़ करते हुए पाक प्रशिक्षित दो आतंकवादियों सहित कुल छह लोगों को गिरफ्तार किया है। स्पेशल सेल के डीसीपी प्रमोद कुशवाहा ने मंगलवार को बताया कि स्पेशल सेल ने कई राज्यों में चले इस ऑपरेशन में विस्फोटक और हथियार बरामद किए गए हैं। इन सभी छह लोगों को दिल्ली, यूपी और महाराष्ट्र से पकड़ा गया है। गिरफ्तार आतंकियों में दो की शिनाख्त ओसामा और जीशान के रूप में हुई है। दिल्ली पुलिस ने बताया कि इन दोनों आतंकियों की ट्रेनिंग पाकिस्तान में हुई थी। इन आतंकियों के अंडरवर्ल्ड से भी संबंध बताए जा रहे हैं।

इस गिरफ्तारी के बाद दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल क स्पेशल सीपी नीरज ठाकुर ने बताया कि आशंका है कि इस ग्रुप में 14-15 लोग शामिल हैं और यह भी हो सकता है कि उन्हें भी यहीं ट्रेनिंग मिली हो। ऐसा लगता है कि यह ऑपरेशन को बॉर्डर के आसपास से ही ऑपरेट किया जा रहा था। दिल्ली पुलिस की तरफ से जानकारी दी गई है कि इन्होंने 2 टीमें बनाई थी। एक टीम को दाउद इब्राहिम का भाई अनीष इब्राहिम को-ऑर्डिनेट कर रहा था। इस काम था कि बॉर्डर से हथियार जुटाकर पूरे भारत में हथियार पहुंचाए। दूसरी टीम के पास हवाला के जरिए फंड जुटाने का काम था। 

जानकारी के अनुसार, इन आतंकियों की गिरफ्तारी के लिए मल्टी स्टेट ऑपरेशन चलाया गया था। पाकिस्तान में ट्रेनिंग लेने वाले दोनों आतंकियों में एक का नाम ओसामा और दूसरे का जीशान कमर है। इसके अलावा पकड़े गए 4 अन्य आरोपियों का नाम मोहम्मद अबु बकर, जान मोहम्मद शेख, मोहम्मद आमिर जावेद और मूलचंद लाला है।

दिल्ली पुलिस का कहना है कि ये सभी देश में आतंकी घटनाओं को अंजाम देने के लिए साजिश रच रहे थे। साथ ही कई नामचीन हस्तियों को निशाना बनाने वाले थे, और देश का माहौल बिगाड़ना चाहते थे। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पकड़े गए आतंकियों में से एक का काम आने वाले फेस्टिवल सीजन में IED प्लांट करना था। नवरात्रि और रामलीला के दौरान भीड़ भरे इलाके इनके निशाने पर थे। आतंकियों से भारी मात्रा में विस्फोटक, हथियार और हाई क्वालिटी पिस्टल बरामद किए गए हैं।

सिद्धू के सलहकार मल्विंदर के बोलों पर गहराई चुप्पी

नवजोत सिंह सिद्धू का पाकिस्तान प्रेम कोई अनहोनी बात नहीं है। सिद्धू हर वह काम करते रहे हैं जिससे भारत के अन्तर्मन को ठेस लगे। ‘इमरान मेरा यार’, ‘मैं तो अपने कैप्टन के हम से पाकिस्तान गया था’ इत्यादि कम नहीं थे कि पाकिस्तान में जा कर जन॰ बाजवा से गलबहियाँ डाल फोटो खिंचवाई और तो और सिद्धू किराजस्थान में चुनाव प्रचार की सभाओं में अतिउत्साहित लोगों ने मंच पर से या दर्शक दीर्घा से पाकिस्तान ज़िन्दाबाद के नारे भी लगाए। पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष नवजोत सिद्धू के सलाहकार मालविंदर सिंह माली‌ अपने फेसबुक पेज पर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का एक स्केच पोस्ट कर विवादों में घिर गए हैं। माली ने 1989 में पब्लिश ‘जन तक पैगाम’ नाम की पंजाबी मैगजीन का कवर सोशल मीडिया में शेयर किया है। इसमें दिख रहा है कि इंदिरा गांधी इंसानी खोपड़ियों के ढेर पर खड़ी हैं और उनके हाथ में मौजूद बंदूक पर भी एक खोपड़ी लटक रही है। सिद्धू के उपरोक्त पाकिस्तान प्रेम के चलते उनके सलाहकार का यह व्यवहार आश्चर्यजनक नहीं है। दखना यह है कि नेहरू – इन्दिरा के नाम की मलाई खाने वाला कॉंग्रेस का प्रथम परिवार अब सिद्धू पर क्या कार्यवाई करता है ?

सारिका तिवारी, चंडीगढ़:

पंजाब में कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू अपने सलाहकारों के कारण विवाद में आ गए हैं। हाल ही में पंजाब में कॉन्ग्रेस ने अपनी कलह सुलझाई है, लेकिन मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह और सिद्धू के बीच का मनमुटाव ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहा। इसी बीच सिद्धू के सलाहकारों की हरकतों पर कैप्टेन ने नसीहत भी दी है। इसके साथ ही पंजाब कॉन्ग्रेस में फिर से खींचतान शुरू हो गई है।

सिद्धू के सलाहकार मलविंदर सिंह माली की दो अलग-अलग फेसबुक पोस्ट पर विवाद हुआ था। उन्होंने न सिर्फ जम्मू कश्मीर, बल्कि कॉन्ग्रेस की दिवंगत नेता व पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी पर भी विवादित पोस्ट कर डाला। जहाँ एक तरफ कश्मीर को उन्होंने अलग देश बता डाला तो वहीं इंदिरा गांधी का एक आपत्तिजनक स्केच सोशल मीडिया पर शेयर किया। इससे नाराज़ कैप्टेन ने सिद्धू को सलाह दी है।

मुख्यमंत्री अमरिंदर ने कहा कि डॉक्टर प्यारे लाल गर्ग और मलविंदर सिंह माली सिर्फ प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी के अध्यक्ष को सलाह देने तक ही खुद को सीमित रखें तो बेहतर है। उन्होंने कहा कि ये संवेदनशील मुद्दे हैं, इसीलिए इन पर वो अधूरा ज्ञान रख कर न बोलें। उन्होंने कहा कि जिस चीज के बारे में जानकारी न हो, उस पर नहीं बोलना चाहिए। कैप्टेन ने माली के बयान को देशविरोधी बताते हुए कहा कि इससे माहौल खराब हो सकता है।

उन्होंने इसे देश विरोधी काम बताया। हालाँकि, इतना विवाद होने के बावजूद भी माली ने अपना बयान वापस नहीं लिया है। सीएम कैप्टेन अमरिंदर सिंह ने कहा, “सिद्धू के सलाहकार वास्तविकता से कोसों दूर हैं। उन्हें जमीनी हकीकत नहीं पता है। ये हर किसी को पता है कि पाकिस्तान हमारे के लिए असल खतरा है। वहाँ से लगातार हथियार लाए जाते हैं, पंजाब में ड्रग्स की सप्लाई की जाती है। इसका इस्तेमाल पंजाब को अस्थिरता की ओर धकेलने के लिए होता है।

मुख्यमंत्री ने याद दिलाया कि कैसे हमारे सैनिक भी बॉर्डर पर शहीद हो रहे हैं। उन्होंने 80 के दशक का दौर भी याद दिलाया, जब कई लोगों को आतंकवाद के कारण अपनी जान गँवानी पड़ी थी। माली ने फेसबुक के अपने कवर पेज पर 1990 के आसपास प्रकाशित होने वाली एक मैगजीन ‘जनतक पैगाम’ के मुख्य पृष्ठ का फोटो लगाया है। इसमें इंदिरा गाँधी को हाथ में बंदूक लिए दिखाया गया है, जिसके एक सिरे पर खोपड़ी लटक रही है।

इस कार्टून में इंदिरा गांधी के पीछे भी खोपडियों का ढेर लगा हुआ है और इस पेज पर पंजाबी में लिखा है, “हर जबर दी इही कहाणी, करना जबर ते मुँह दी खाणी’, अर्थात ‘हर जुल्म करने वाले की यही कहानी है अंत में उसे मुँह की खानी पड़ती है।’ एक तरह से उन्होंने सिख दंगों के लिए कॉन्ग्रेस को जिम्मेदार ठहराते हुए और स्वर्ण मंदिर में हुए ऑपरेशन ब्लू स्टार के लिए इंदिरा गाँधी का ये स्केच शेयर किया है।

जिन अल्पसंख्यकों के प्रत्यार्पण पर शेरगिल और उनकी पार्टी ने रोड़े अटकाए आज पंजाब चुनावों के चलते उनही अल्पसंख्यकों को भारत लाने की गुहार लगा रहे हैं, क्या वाकई?

राजनीति जो न करवा दे वह कम है। राजनीति से दोगलापन कभी दूर हो पाएगा क्या? कभी CAB(Citizens Amendment Bill) को ‘Communal Atom Bomb’ बताने वाले कॉंग्रेस प्रवक्ता जयवीर शेरगिल आज अफगानिस्तान में फंसे सिखों को न केवल सुरक्षित भारत लाना चाहते हाँ अपितु उनके नागरिक सम्मान के लिए भी चिंतित हैं। यह वही शेरगिल हैं जिनहोने CAA के खिलाफ राजनैतिक पूर्वाग्रहों से ग्रसित हो देश के सभी मीडिया चैनलों की बहस में आ कर बहुत ही आक्रामक ढंग से अपनी राजनैतिक विचारधारा का पक्ष रखते थे। उस समय इन्हें सीएए भाजपा का सांप्रदायिक हथियार दीख पड़ रहा था। सूत्रों की मानें तो 2019 के चुनावों से पहले सीएए को आआपा, कॉंग्रेस समेत विपक्ष ने एक राजनैतिक हथियार के रूप में प्रयोग कर शाहीन बाग ओर हिन्दू विरोधी दिल्ली दंगे करवाए। जिस समय सीएए पेश होना था तब शेरगिल और उनके साथी सीएए में मुसलमानों को शामिल न किए जाने पर भाजपा पर मुस्लिम विरोधी होने का आरोप लगाते थे। आज जब अफगानिस्तान में मुस्लिम आतंकवादी गुट तालिबन का हमला हुआ है तब से वहाँ का जन जीवन बहुत ही दयनीय अवस्था में पहुँच रहा है। वहाँ दूसरे धर्मों के लोगों की तो क्या ही कहें स्वयं मुसलिम समुदाय की स्थिति शोचनीय है। लेकिन आज शेरगिल पंजाब चुनावों के मद्देनजर सिखों के प्रत्यार्पण की ग़ार लगा रहे हैं अपरोक्ष रूप से उसी CAB के तहत जो कभी बक़ौल शेरगिल ए ‘Communal Atom Bomb’ था।

नयी दिल्ली(ब्यूरो):

कॉन्ग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता जयवीर शेरगिल ने खुद को ‘सिख समुदाय का एक जिम्मेदार भारतीय नागरिक’ बताते हुए अफगानिस्तान से 650 सिखों व 50 हिन्दुओं को सुरक्षित निकाले जाने के लिए केंद्रीय विदेश मंत्रालय को पत्र लिखा है। ये अलग बात है कि वो अपनी पार्टी के अध्यक्ष सोनिया गाँधी को पत्र लिख कर कभी ये नहीं कह पाएँ कि वो नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का समर्थन करें।

CAA क्या है? इसके तहत दिसंबर 2014 से पहले भारत आए पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के सिखों, हिन्दुओं, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के प्रताड़ित लोगों को नागरिकता देने का प्रावधान है। ये तीनों ही इस्लामी देश हैं, जो अल्पसंख्यकों के साथ क्रूरता के लिए कुख्यात हैं। पाकिस्तान में हिन्दू व सिख महिलाएँ सुरक्षित नहीं। बांग्लादेश में आए दिन मंदिर तोड़े जाते हैं। अफगानिस्तान में अल्पसंख्यकों को समूह में ही मार गिराया जाता रहा है।

ऐसे में जयवीर के भीतर का सिख तब नहीं जागा, जब भारत सरकार CAA लेकर आई थी। उनके अंदर का सिख तब क्या ‘गैर-जिम्मेदार’ हो गया था? अब खुद को भारतीय नागरिक बता कर केंद्रीय विदेश मंत्रालय से 650 सिखों के लिए स्पेशल वीजा की व्यवस्था की गुहार लगा रहे जयवीर शेरगिल की माँग एकदम उचित है, लेकिन वो और उनकी पार्टी ही इसके मार्ग में अक्सर रोड़े अटकाती रही है।

आइए, थोड़ा पीछे चलते हैं। 16 दिसंबर, 2019 को। शाहीन बाग़ के उपद्रवियों का उत्पात चरम पर था। देश भर में कई शाहीन बाग़ बना कर भड़काऊ भाषणबाजी हो रही थी। दिल्ली दंगों की स्क्रिप्ट रची ही जा रही थी। कॉन्ग्रेस माहौल का मजा लूट रही थी। उस दिन 10:03 में जयवीर शेरगिल का ट्वीट आता है – ‘CAB = Communal Atom Bomb’, जिसका अर्थ है – ‘नागरिकता संशोधन विधेयक = सांप्रदायिक परमाणु बम।’

बता दें कि CAA ही जब कानून न होकर बिल हुआ करता था तो इसे CAB कहते थे, क्योंकि तब ये संसद के दोनों सदनों में पास नहीं हुआ था। इसलिए, इस CAA और CAB को एक ही समझा जाए। यानी, जब केंद्र सरकार प्रताड़ित अल्पसंख्यकों के लिए संरक्षण की व्यवस्था कर रही थी, तब यही जयवीर शेरगिल अपनी पार्टी के सुर में सुर मिला कर इसका तगड़ा विरोध करने में लगे थे। अब उनके अंदर का सिख जाग गया है।

वो ‘सिख समुदाय का एक जिम्मेदार भारतीय नागरिक’ तब कहलाते, जब वो कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी को पत्र लिख कर कहते कि चूँकि ये मामला प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को अधिकार देने से जुड़ा है, दलितों को धर्मांतरण व महिलाओं को क्रूरता से बचाने से जुड़ा है, इसीलिए वो इसका विरोध न करें। लेकिन अफ़सोस, इस्लामी मुल्कों से प्रताड़ना सह कर आए इन्हीं सिखों व हिन्दुओं के लिए तब उनकी आवाज़ नहीं निकली।

निकली भी तो विरोध में। पंजाब के जालंधर से आने वाले जयवीर शेरगिल तब मीडिया के माध्यम से CAA के खिलाफ प्रोपेगंडा फैलाने में लगे थे। तब उन्होंने ‘द हिन्दू’ में एक लेख लिखा था, जिसका शीर्षक ही था – ‘बिना सोचे-समझे लिया गया निर्णय’। उनका कहना था कि केंद्र सरकार के इस निर्णय से उत्तर-पूर्व में अशांति या गई है। उन्होंने CAA को भारत की विदेश नीति की भारी गलतियों में से एक करार दिया था।

उन्होंने CAA को एक ‘संकीर्ण निर्णय’ बताते हुए लिखा था कि इसकी वजह से भारत को दुनिया भर में संदेह की दृष्टि से देखा जाएगा। भारत सरकार को इसे लेकर काफी सफाई देनी पड़ेगी। उन्होंने भारत की ‘विविधता और समावेशी’ चरित्र की बात करते हुए कहा था कि ऐसे निर्णयों से निवेशकों का विश्वास देश में डिगेगा। उन्होंने इसे ‘चुने हुए देशों के शरणार्थियों के लिए मजहब आधारित कानून’ करार दिया था।

अब? अब अचानक ही उन्हें पता चल है कि भारत का हिन्दू या सिख होने के कारण अफगानिस्तान जैसे मुल्कों में तालिबान जैसे इस्लामी आतंकी संगठन उन्हें निशाना बनाते हैं? उन्होंने अपने पत्र में 2018 की एक घटना का जिक्र किया है। तब जलालाबाद में हुए आत्मघाती आतंकी हमले में 19 हिन्दुओं व सिखों को मार डाला गया था। ये सब राष्ट्रपति अशरफ गनी से मिलने जा रहे थे। मृतकों में अवतार सिंह खालसा चुनावी उम्मीदवार भी थे।

पंजाब चुनाव या सिखों की चिंता।

इसका सीधा मतलब है कि अफगानिस्तान में अल्पसंख्यकों के साथ क्रूर बर्ताव व उनके नरसंहार की घटनाओं से जयवीर शेरगिल अनजान नहीं थे, लेकिन फिर भी उन्होंने तब अपनी पार्टी के स्टैन्ड को आगे बढ़ाना उचित समझा। आज जब अफगानिस्तान में 650 सिख फँसे हुए हैं तो उन्हें ये घटनाएँ याद आ रही हैं। उनकी नौकरी जाने व आय की चिंता हो रही है। सिख समाज के लिए उनका प्रेम उमड़ आया है।

ये कैसा दोहरा रवैया है कि एक तरफ वो केंद्रीय विदेश मंत्रालय को पत्र लिख कर कहते हैं कि भारतीय मूल के अल्पसंख्यक तालिबानी आतंकियों के लिए आसान निशाना होते हैं, जबकि दूसरी तरफ वो इन्हीं अल्पसंख्यकों के लिए लाए गए कानून का बढ़-चढ़ कर विरोध करते हैं? 2018 की घटना का जिक्र बताता है कि इसके बावजूद उन्होंने 2019-20 में CAA का विरोध किया और इन्हीं अल्पसंख्यकों को अधिकारी मिलने की राह में रोड़े अटकाए।

उनके पास अब भी समय है। ‘सिख समुदाय से तालुक रखने वाले एक जिम्मेदार भारतीय नागरिक’ होने के नाते वो राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी को पत्र लिख कर कह सकते हैं कि वो NRC की राह में रोड़े अटकाने बंद करें। वरना अगर असम में जब नॉन-मुस्लिमों के साथ अत्याचार की खबरें आएँगी और उनमें सिख भी होंगे, तब फिर वो केन्द्रीय गृह मंत्रालय को पत्र लिख कर कहेंगे कि अवैध घुसपैठियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।

राहुल गाँधी असम में NRC विरोधी गमछा पहन कर जाते हैं, ‘No CAA’ वाला रूमाल दिखाते हैं और रैली में कहते हैं कि अगर उनकी सरकार आई तो वो CAA को लागू ही नहीं होने देंगे। इस पर जयवीर शेरगिल चूँ तक नहीं करते। उनके ही पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी कहा था कि वो किसी भी कीमत पर पंजाब में CAA को लागू नहीं करने देंगे। पार्टी में, अपने आसपास चल रहे इन बयानों से शेरगिल अनजान थे, ये पचने वाली बात नहीं है।

बताते चलें कि जयवीर शेरगिल ने इस पत्र में ध्यान दिलाया है कि अमेरिका की सेना की वापसी के बाद तालिबान बंदूक की नोंक पर अफगानिस्तान को अपने कब्जे में लेने के लिए युद्ध कर रहा है। एक बार फिर से अफगानिस्तान के आतंकी चंगुल में जाने की आशंका है। उन्होंने अफगानिस्तान में हुई हालिया हिंसा की भीषण घटनाओं की तरफ ध्यान आकृष्ट कराते हुए कहा कि ये मानवता के लिए संकट पैदा करने वाली समस्या है।

शहीदों के नाम पर होंगे केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और काश्मीर के सरकारी विद्यालयों के नाम

केंद्र सरकार ने शुक्रवार को जहां राजीव गांधी खेल रत्न को मेजर ध्यानचंद खेल रत्न कर दिया है तो वहीं जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने एक बड़ा फैसला लिया है। जम्मू-कश्मीर प्रशासन की ओर से एक आदेश जारी किया गया है। जिसमें ऐतिहासिक पहल करते हुए केंद्र शासित प्रदेश के स्कूलों का नाम अब शहीद सेना, सीआरपीएफ और पुलिस के जवान के नाम पर किया जाएगा।

  • शुक्रवार को दो बड़े फैसले लिए गए
  • राजीव गांधी खेल रत्न नाम बदने के बाद जम्मू कश्मीर में बड़ा फैसला लिया गया
  • जम्मू संभाग में स्कूलों को अंतिम रूप देने के लिए पत्र भी जारी कर दिया गया है

जम्मू कश्मीर(ब्यूरो) :

राज्य से अनुच्छेद 370 हटाने के बाद जम्मू-कश्मीर सरकार एक के बाद एक कदम उठा रही है। इसी क्रम में जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने एक ऐतिहासिक पहल करते हुए केंद्र शासित प्रदेश के स्कूलों का नाम सेना, पुलिस और सीआरपीएफ के शहीद जवानों के नाम पर रखने का फैसला किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस संबंध में प्रशासनिक पत्र जारी किया गया है, जिसमें वीरगति प्राप्त करने वाले जवानों के नाम पर रखे जा सकने वाले सरकारी स्कूलों की सूची को अंतिम रूप देने के लिए जिला स्तर पर एक समिति गठित करने की बात कही गई है।

इसके बाद सत्यापन किया जाएगा और विवरण तैयार किया जाएगा। आधिकारिक नोटिस के अनुसार, जिला स्तर पर सूची को अंतिम रूप देने के लिए समिति में एसएसपी, एडीसी, डीपीओ या एसी पंचायत और सेना के प्रतिनिधियों को शामिल किया जा सकता है।

इसके अलावा सभी उपायुक्तों को इस सूची को 5 अगस्त 2021 तक जम्मू संभागीय आयुक्त कार्यालय को भेजने के लिए कहा गया था। सूत्रों के अनुसार, कुछ जिलों ने पहले ही उन स्कूलों की सूची जमा कर दिए हैं, जिनका नाम देश की रक्षा में अपने प्राणों को बलि देने वाले बलिदानियों को नाम पर रखे जाने हैं।

इस मामले में सरकारी अधिसूचना पिछले सप्ताह जारी की गई थी। इसमें जम्मू, कठुआ, डोडा, पुंछ, रामबन, सांबा, किश्तवाड़, राजौरी, उधमपुर और रियासी के उपायुक्तों को अपने-अपने जिलों के गाँवों/नगरपालिका वार्डों में सरकारी स्कूलों की पहचान करने का निर्देश दिया गया था। इस साल (2021) के शुरुआत में पंजाब सरकार ने भी 17 सरकारी स्कूलों का नाम स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर रखा था। जम्मू-कश्मीर के पूर्व डिप्टी सीएम कविंदर गुप्ता ने प्रशासन के इस फैसले का स्वागत किया है।

राज्य सरकार के इस फैसले को लेकर वरिष्ठ पत्रकार आदित्य राज कौल ने ट्वीट कर इस घोषणा के पूर्ण होने की उम्मीद जताई। उन्होंने लिखा कि कुछ साल पहले कश्मीर में सड़कों का नाम शहीदों के नाम पर रखने का एलान हुआ था, लेकिन अभी तक उसका इंतजार किया जा रहा है।

चीन के बाद अब तुर्की आया पाकिस्तान की मदद को

1947 के भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद तुर्की का झुकाव पाकिस्तान की ओर ज्यादा हो गया था। इस्लाम के नाम पर उदय हुए पाकिस्तान ने तुर्की के साथ दोस्ती में अपना उज्ज्वल भविष्य देखा। तुर्की में रह रहे कुर्द, अल्बानियाई और अरब जैसे तुर्को के बीच पाकिस्तान की स्वीकार्यता में इस्लाम में बड़ी भूमिका अदा की। मुस्तफा कमाल पाशा की धर्मनिरपेक्ष सोच के बावजूद पाकिस्तान और तुर्की के संबंध धार्मिक आधार पर ही मजबूत हुए। 1970 के दशक में नेकमेटिन एर्बाकन के नेतृत्व में इस्लामी दलों के उदय ने तुर्की की राजनीति में इस्लाम की भूमिका को और मजबूत किया। इस तरह के राजनीतिक अनुभवों ने तुर्की की विदेश नीति को भी प्रभावित किया और पाकिस्तान के साथ तुर्की की नजदीकी का समर्थन किया। साल 1954 में पाकिस्तान और तुर्की ने शाश्वत मित्रता की संधि पर हस्ताक्षर किए। पाकिस्‍तान अब कश्‍मीर और अफगानिस्‍तान के मुद्दे पर तुर्की के साथ द्विपक्षीय संबंध मजबूत करना चाहता है। … इसके अलावा तुर्की और पाकिस्‍तान संयुक्‍त रक्षा प्रॉजेक्‍ट, अफगानिस्‍तान पर सहयोग और पाकिस्‍तान में तुर्की के निवेश पर चर्चा कर रहे हैं। अभी इन दिनों तुर्की की सेना प्रमुख भी पाकिस्‍तान के दौरे पर आए हैं।

अंतर्राष्ट्रीय डेस्क, डेमोक्रेटिक फ्रंट॰कॉम :

तुर्की और पाकिस्तान जहां मिलकर भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घेरने की लगातार कोशिश में लगे हुए हैं। वहीं तुर्की पाकिस्तान को हथियारों से लेकर पाक अधिकृत कश्मीर पाक अधिकृत कश्मीर में दखलअंदाजी देना शुरु कर चुका है। एक मीडिया के पास मौजूद एक्सलूसिव दस्तावेजों से तुर्की के एक बड़े प्लान का खुलासा हुआ है।

रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि चीन के बाद अब तुर्की पाक अधिकृत कश्मीर में बड़े पैमाने पर इंवेस्टमेंट कर रहा है जिससे भारत की चिंता बढ़ गई है। देखा जाये तो भारत PoK को अपना हिस्सा मानता है और ऐसे में पाकिस्तान समेत दुनिया के किसी भी देश की PoK में दखलंदाजी का भारत विरोध करता रहा है।

पाकिस्तान बड़ी तादाद में मानवरहित टोही और अटैक विमान की खरीद पर जोर दे रहा है। इसके लिए न सिर्फ वो रूस की तरफ झोली फैला रहा है बल्कि तुर्की और चीन जैसे ऑल वेदर फ्रेंड की भी मदद ले रहा है।

पाकिस्तान को भारत के साथ हर युद्ध में उसे शर्मनाक हार मिली। कश्मीर में आंतकियों के जरिये प्रॉक्सी वॉर में भी उसे मुंह की खानी पड़ रही है। यही कारण है कि भारतीय इलाकों में ताक-झांक करने और बिना किसी नुकसान के भारत में भविष्य की लड़ाइयों में जीत हासिल करने के लिए पाकिस्तान रणनीति बदल रहा है। पाकिस्तान बड़ी तादाद में मानवरहित टोही और अटैक विमान की खरीद पर जोर दे रहा है। इसके लिए न सिर्फ वो रूस की तरफ झोली फैला रहा है बल्कि तुर्की और चीन जैसे ऑल वेदर फ्रेंड की भी मदद ले रहा है। खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान तुर्की से कॉमिकाज़े ड्रोन खरीदने की तैयारी में है। इसे सुसाइड ड्रोन भी कहा जाता है।

इस ड्रोन की रेज 10 किलोमीटर तक है और ये एक बार में 6 रॉकेट अपने साथ ले जा सकता है। एक ग्राउंड स्टेशन के रिमोट में एक साथ 10 ड्रोन को संचालित कर सकता है। वहीं चीन से भी आर्म्ड ड्रोन का सौदा हो चुका है। पाकिस्तान चीन से विंग लूंग-II के दो अतिरिक्त सिस्टम भी ले रहा है जो कि इसी साल पाकिस्तानी वायुसेना को मिल जाएंगे।

ममता ने शुरू किया इस्लामिक शहर बसाने का प्रोजेक्ट और अरेंगी मुगलिस्तान का समर्थन : जेनेट लेवी

जेनेट लेवी ने अपने लेख में लिखा है कि “बंटवारे के वक्त भारत के हिस्से वाले पश्चिमी बंगाल में मुसलमानों की आबादी 12 फीसदी से कुछ ज्यादा थी, जबकि पाकिस्तान के हिस्से में गए पूर्वी बंगाल में हिंदुओं की आबादी 30 फीसदी थी. आज पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की जनसंख्या बढ़कर 27 फीसदी हो चुकी है. कुछ जिलों में तो ये 63 फीसदी तक हो गई है. वहीँ दूसरी ओर बांग्लादेश में हिंदू 30 फीसदी से घटकर केवल 8 फीसदी ही बचे हैं.”

जेनेट लेवी के americanthinker.com में प्राषित लेख से साभार

अमेरिका से आयी बंगाल के बारे में ऐसी खौफनाक रिपोर्ट, जिसने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया है। कभी भारतीय संस्कृति का प्रतीक माने जाने वाले बंगाल की दशा आज क्या हो चुकी है, ये बात तो किसी से छिपी नहीं है. हिन्दुओं के खिलाफ साम्प्रदायिक दंगे तो पिछले काफी वक़्त से होना शुरू हो चुके हैं और अब तो हालात ये हो चुके हैं कि त्यौहार मनाने तक पर रोक लगाई जानी शुरू हो गयी है।  बंगाल पर मशहूर अमेरिकी पत्रकार जेनेट लेवी ने अब जो लेख लिखा है और उसमे जो खुलासे किये हैं, उन्हें देख आपके पैरों तले जमीन खिसक जायेगी।

जेनेट लेवी का दावा – बंगाल जल्द बनेगा एक अलग इस्लामिक देश

जेनेट लेवी ने अपने ताजा लेख में दावा किया है कि कश्मीर के बाद बंगाल में जल्द ही गृहयुद्ध शुरू होने वाला है, जिसमे बड़े पैमाने पर हिन्दुओं का कत्लेआम करके मुगलिस्तान नाम से एक अलग देश की मांग की जायेगी। यानी भारत का एक और विभाजन होगा और वो भी तलवार के दम पर और बंगाल की वोटबैंक की भूखी ममता बनर्जी की सहमति से होगा सब कुछ।

जेनेट लेवी ने अपने लेख में इस दावे के पक्ष में कई तथ्य पेश किए हैं। उन्होंने लिखा है कि “बंटवारे के वक्त भारत के हिस्से वाले पश्चिमी बंगाल में मुसलमानों की आबादी 12 फीसदी से कुछ ज्यादा थी, जबकि पाकिस्तान के हिस्से में गए पूर्वी बंगाल में हिंदुओं की आबादी 30 फीसदी थी। आज पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की जनसंख्या बढ़कर 27 फीसदी हो चुकी है। कुछ जिलों में तो ये 63 फीसदी तक हो गई है। वहीँ दूसरी ओर बांग्लादेश में हिंदू 30 फीसदी से घटकर केवल 8 फीसदी ही बचे हैं।”

आप यहाँ जेनेट का पूरा लेख खुद भी पढ़ सकते हैं। http://www.americanthinker.com/articles/2015/02/the_muslim_takeover_of_west_bengal.html

बढ़ती हुई मुस्लिम आबादी को ठहराया जिम्मेदार

 बता दें कि जेनेट ने ये लेख अमेरिकन थिंकर’ मैगजीन में लिखा है. ये लेख एक चेतावनी के तौर पर उन देशों के लिए लिखा गया है, जो मुस्लिम शरणार्थियों के लिए अपने दरवाजे खोल रहे हैं। जेनेट लेवी ने बेहद सनसनीखेज दावा करते हुए लिखा है कि किसी भी समाज में मुस्लिमों की 27 फीसदी आबादी काफी है कि वो उस जगह को अलग इस्लामी देश बनाने की मांग शुरू कर दें।

उन्होंने दावा किया है कि मुस्लिम संगठित होकर रहते हैं और 27 फीसदी आबादी होते ही इस्लामिक क़ानून शरिया की मांग करते हुए अलग देश बनाने तक की मांग करने लगते हैं। पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए उन्होंने लिखा है कि ममता बनर्जी के लगातार हर चुनाव जीतने का कारण वहां के मुस्लिम ही हैं। बदले में ममता मुस्लिमों को खुश करने वाली नीतियां बनाती है।

सऊदी से आने वाले पैसे से चल रहा जिहादी खेल?

जल्द ही बंगाल में एक अलग इस्लामिक देश बनाने की मांग उठने जा रही है और इसमें कोई संदेह नहीं कि सत्ता की भूखी ममता इसे मान भी जाए। उन्होंने अपने इस दावे के लिए तथ्य पेश करते हुए लिखा कि ममता ने सऊदी अरब से फंड पाने वाले 10 हजार से ज्यादा मदरसों को मान्यता देकर वहां की डिग्री को सरकारी नौकरी के काबिल बना दिया है। सऊदी से पैसा आता है और उन मदरसों में वहाबी कट्टरता की शिक्षा दी जाती है।

ममता ने शुरू किया इस्लामिक शहर बसाने का प्रोजेक्ट?

गैर मजहबी लोगों से नफरत करना सिखाया जाता है। उन्होंने लिखा कि ममता ने मस्जिदों के इमामों के लिए तरह-तरह के वजीफे भी घोषित किए हैं, मगर हिन्दुओं के लिए ऐसे कोई वजीफे नहीं घोषित किये गए। इसके अलावा उन्होंने लिखा कि ममता ने तो बंगाल में बाकायदा एक इस्लामिक शहर बसाने का प्रोजेक्ट भी शुरू किया है।

पूरे बंगाल में मुस्लिम मेडिकल, टेक्निकल और नर्सिंग स्कूल खोले जा रहे हैं, जिनमें मुस्लिम छात्रों को सस्ती शिक्षा मिलेगी। इसके अलावा कई ऐसे अस्पताल बन रहे हैं, जिनमें सिर्फ मुसलमानों का इलाज होगा। मुसलमान नौजवानों को मुफ्त साइकिल से लेकर लैपटॉप तक बांटने की स्कीमें चल रही हैं। इस बात का पूरा ख्याल रखा जा रहा है कि लैपटॉप केवल मुस्लिम लड़कों को ही मिले, मुस्लिम लड़कियों को नहीं।

जेनेट ने मुस्लिमों को आतंकवाद का दोषी ठहराया

जेनेट लेवी ने लिखा है कि बंगाल में बेहद गरीबी में जी रहे लाखों हिंदू परिवारों को ऐसी किसी योजना का फायदा नहीं दिया जाता। जेनेट लेवी ने दुनिया भर की ऐसी कई मिसालें दी हैं, जहां मुस्लिम आबादी बढ़ने के साथ ही आतंकवाद, धार्मिक कट्टरता और अपराध के मामले बढ़ने लगे।

आबादी बढ़ने के साथ ऐसी जगहों पर पहले अलग शरिया क़ानून की मांग की जाती है और फिर आखिर में ये अलग देश की मांग तक पहुंच जाती है। जेनेट ने अपने लेख में इस समस्या के लिए इस्लाम को ही जिम्मेदार ठहरा दिया है। उन्होंने लिखा है कि कुरान में यह संदेश खुलकर दिया गया है कि दुनिया भर में इस्लामिक राज स्थापित हो।

तस्लीमा नसरीन का उदाहरण किया पेश

जेनेट ने लिखा है कि हर जगह इस्लाम जबरन धर्म-परिवर्तन या गैर-मुसलमानों की हत्याएं करवाकर फैला है। अपने लेख में बंगाल के हालातों के बारे में उन्होंने लिखा है. बंगाल में हुए दंगों का जिक्र करते हुए उन्होंने लिखा है कि 2007 में कोलकाता में बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन के खिलाफ दंगे भड़क उठे थे। ये पहली कोशिश थी जिसमे बंगाल में मुस्लिम संगठनों ने इस्लामी ईशनिंदा (ब्लासफैमी) कानून की मांग शुरू कर दी थी।

भारत की धर्म निरपेक्षता पर उठाये सवाल

1993 में तस्लीमा नसरीन ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों और उनको जबरन मुसलमान बनाने के मुद्दे पर किताब लज्जा’ लिखी थी। किताब लिखने के बाद उन्हें कट्टरपंथियों के डर से बांग्लादेश छोड़ना पड़ा था। वो कोलकाता में ये सोच कर बस गयी थी कि वहां वो सुरक्षित रहेंगी क्योंकि भारत तो एक धर्मनिरपेक्ष देश है और वहां विचारों को रखने की स्वतंत्रता भी है।

मगर हैरानी की बात है कि धर्म निरपेक्ष देश भारत में भी मुस्लिमों ने तस्लीमा नसरीन को नफरत की नजर से देखा। भारत में उनका गला काटने तक के फतवे जारी किए गए। देश के अलग-अलग शहरों में कई बार उन पर हमले भी हुए। मगर वोटबैंक के भूखी वामपंथी और तृणमूल की सरकारों ने कभी उनका साथ नहीं दिया। क्योंकि ऐसा करने पर मुस्लिम नाराज हो जाते और वोटबैंक चला जाता।

बंगाल में हो रही है ‘मुगलिस्तान’ देश की मांग

जेनेट लेवी ने आगे लिखा है कि 2013 में पहली बार बंगाल के कुछ कट्टरपंथी मौलानाओं ने अलग मुगलिस्तान’ की मांग शुरू कर दी। इसी साल बंगाल में हुए दंगों में सैकड़ों हिंदुओं के घर और दुकानें लूट लिए गए और कई मंदिरों को भी तोड़ दिया गया। इन दंगों में सरकार द्वारा पुलिस को आदेश दिये गए कि वो दंगाइयों के खिलाफ कुछ ना करें।

हिन्दुओं का बहिष्कार किया जाता है?

ममता को डर था कि मुसलमानों को रोका गया तो वो नाराज हो जाएंगे और वोट नहीं देंगे। लेख में बताया गया है कि केवल दंगे ही नहीं बल्कि हिन्दुओं को भगाने के लिए जिन जिलों में मुसलमानों की संख्या ज्यादा है, वहां के मुसलमान हिंदू कारोबारियों का बायकॉट करते हैं। मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तरी दिनाजपुर जिलों में मुसलमान हिंदुओं की दुकानों से सामान तक नहीं खरीदते।

यही वजह है कि वहां से बड़ी संख्या में हिंदुओं का पलायन होना शुरू हो चुका है। कश्मीरी पंडितों की ही तरह यहाँ भी हिन्दुओं को अपने घरों और कारोबार छोड़कर दूसरी जगहों पर जाना पड़ रहा है। ये वो जिले हैं जहां हिंदू अल्पसंख्यक हो चुके हैं।

आतंक समर्थकों को संसद भेज रही ममता

इसके आगे जेनेट ने लिखा है कि ममता ने अब बाकायदा आतंकवाद समर्थकों को संसद में भेजना तक शुरू कर दिया है। जून 2014 में ममता बनर्जी ने अहमद हसन इमरान नाम के एक कुख्यात जिहादी को अपनी पार्टी के टिकट पर राज्यसभा सांसद बनाकर भेजा। हसन इमरान प्रतिबंधित आतंकी संगठन सिमी का सह-संस्थापक रहा है।

हसन इमरान पर आरोप है कि उसने शारदा चिटफंड घोटाले का पैसा बांग्लादेश के जिहादी संगठन जमात-ए-इस्लामी तक पहुंचाया, ताकि वो बांग्लादेश में दंगे भड़का सके। हसन इमरान के खिलाफ एनआईए और सीबीआई की जांच भी चल रही है।

लोकल इंटेलिजेंस यूनिट (एलआईयू) की रिपोर्ट के मुताबिक कई दंगों और आतंकवादियों को शरण देने में हसन का हाथ रहा है। उसके पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से रिश्ते होने के आरोप लगते रहे हैं। जेनेट के मुताबिक़ बंगाल का भारत से विभाजन करने की मांग अब जल्द ही उठने लगेगी। इस लेख के जरिये जेनेट ने उन पश्चिमी देशों को चेतावनी दी है, जो मुस्लिम शरणार्थियों को अपने यहाँ बसा रहे हैं, कि जल्द ही उन्हें भी इसी सब का सामना करना पडेगा।

बंगाल में चुनाव के बाद,जनवरी 1990 की याद ताजा हो गईं,जब 6 लाख कश्मीरी पंडितों को मस्जिदों से चेतावनी दी गई कि यदि आप जीवित रहना चाहते हैं तो अपने परिवार की महिलाओं को (बेटियों, बहनों, पत्नियों) को छोड़कर कश्मीर से भाग जाओ, तब देश में वी पी सिंह की सरकार बनी थी, उनके गृह मंत्री मुफ्ती मुहम्मद सईद थे, और कश्मीर में कांग्रेस के समर्थन से फारुख अब्दुल्ला की सरकार थी। मुस्लिमो ने उनकी संपत्ति हड़प ली और महिलाओं का लगातार बलात्कार होता रहा, और कत्लेआम  होता रहा, किसी मीडिया ने कोई News नहीं दिखाई, फलस्वरूप कश्मीर से हिंदू समाज को अपनी संपत्ति और महिलाओं को छोड़कर भागना पड़ा, वही स्थिति आज बंगाल में होने जा रही है, भाजपा के नेता भी लगभग नपुंसक हो गये हैं, सारी शक्ति हाथ में होते हुए भी लगभग असहाय हो रहे हैं। हिंदुओं के ऊपर होते हुए अत्याचार  देख कर सभी तथाकथित सेकुलर नेता चुप है। यही नेता किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति के साथ उनकी ही गलती से कोई खंरोच भी आती तो छाती पीटते हुए सारे देश की नाक में दम कर देते हैं, और UNO तक शिकायत करके देश की छवि बिगाड़ने में भी संकोच नहीं करते। पूरा अंतरराष्ट्रीय मीडिया भारत के विरुद्ध दुष्प्रचार में एकजुट हो जाता है।  

हिंदू समाज को इतना ज्ञान होना चाहिए कि भारत का जन्म 1947 में नहीं हुआ था बल्कि भारत 5000 वर्ष पुरानी हमारी संस्कृति है, हम पूरे विश्व को अपना परिवार मानते हैं जिसमें पशु पक्षी वृक्ष सभी प्राणी शामिल हैं व धरती को अपनी माता मानते हैं। लगभग आधे से अधिक विश्व पर हमारा शासन था। लेकिन अपनी उदारता के कारण हम अपनी जमीन पर दूसरों को बसाते गये और खुद बेघर होते गए। हिंदू घटता गया तो देश बंटता गया। यदि हमें सुरक्षित रहना है तो हनुमान जी की तरह अपनी शक्ति को पहचाना होगा। हमें मंदिरों में केवल मनोकामनाएं पूर्ती के लिए ही नहीं जाना बल्कि हमें अपने देवी-देवताओं से सीखना भी है,वो एक हाथ में माला रखते थे वे दूसरे हाथ में भाला भी रखते थे, हमें शास्त्र के साथ साथ शस्त्र का भी ज्ञान होना चाहिए।  हिंदू समाज को अपनी आत्मरक्षा के बारे में सोचना चाहिए। केवल सरकार व पुलिस के ऊपर ही निर्भर नहीं रहना चाहिए।

हिंदू समाज अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए मंदिर के अलावा कहीं भी जा सकता है चाहे वो धरती के नीचे गड़े हुए मुर्दे ही क्यों न हो, वहां भी बढ़े शान से चादर चढ़ाकर आता है जबकि अन्य कोई भी समाज ऐसा नहीं करता। हमें अपने भविष्य को बचाना है या अपने अस्तित्व को समाप्त करना है ॽ

रौशनी एक्ट, जिसने जम्मू – काश्मीर में सरकार द्वारा प्रायोजित भ्रष्टाचार का अंधेरा फैला दिया

वर्ष 2001 में फारूक अब्दुल्ला जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री थे। तब विधानसभा में रोशनी एक्ट पास हुआ था। इसका मकसद ये था कि जिनके पास निश्चित समय के लिए सरकारी जमीन लीज पर है या कोई चालीस वर्ष से सरकारी जमीन पर रह रहा है तो ये जमीन हमेशा के लिए उन्हें दे दी जाए। यानी उन्हें जमीन का मालिक बना दिया जाए. इसके बदले में सरकार बाजार मूल्य पर पैसा लेगी. इस तरह से जो पैसा सरकारी खजाने में आएगा उससे जम्मू-कश्मीर में घर-घर बिजली की योजना चलाई जाएगी. यानी घर घर रोशनी पहुंचाई जाएगी। इसलिए इसे रोशनी एक्ट नाम दिया गया. इस एक्ट के ज़रिए करीब 25 हज़ार करोड़ रुपये हासिल करने का लक्ष्य रखा गया था।

जम्मू/काश्मीर संवाददाता, डेमोक्रेटिकफ्रंट॰कॉम :

जम्मू-कश्मीर के सबसे बड़े 25 हजार करोड़ के रोशनी भूमि घोटाले में किस तरह बंदरबांट हुई थी इसका पर्दाफाश अब होने लगा है। हाई कोर्ट के आदेश में सोमवार को उन नेताओं की पहली सूची सार्वजनिक हुई है, जिन्होंने सरकार की संपत्ति को अपनी और परिवार की संपत्ति में बदल दिया था। जांच में पीडीपी सरकार में वित्त मंत्री रहे डा. हसीब द्राबू समेत कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस के पूर्व मंत्रियों, नौकरशाहों, व्यापारियों और इनके रिश्तेदार भी शामिल हैं। इन्होंने गरीबों के घर रोशन करने के नाम पर बनाए गए कानून की आड़ लेकर करोड़ों की सरकारी जमीन हड़प ली। बताया जाता है कि अभी तीन से चार और सूची आएंगी। जाहिर है कि कई और नाम सामने आएंगे। यह एक ऐस घोटाला था जिस पर मीडिया की कभी नज़र ही नहीं पड़ी और अगर पड़ी भी तो बंदरबाँट के चलते इसके बारे में आपको विस्तार से कुछ बताया नहीं गयायह रौशनी एक्ट के नाम से कुख्यात है।

आज एक ट्वीट के सामने आने से इस मामले की पूरी जानकारी एक बार फिर सामने आ गयी।

हाई कोर्ट ने नौ अक्टूबर को अपने आदेश में तमाम आवंटनों को रद करते हुए सीबीआइ को घोटाले की जांच सौंपी थी। इसके बाद सीबीआइ ने घोटाले की परतें उघेडऩा शुरू कर दिया है। जांच में सार्वजनिक हुई पहली सूची में पीडीपी नेता रहे हसीब द्राबू और उनके परिजनों का नाम है। पूर्व गृहमंत्री सज्जाद किचलू, पूर्व मंत्री अब्दुल मजीद वानी, असलम गोनी, नेशनल कांफ्रेंस के नेता व पूर्व मंत्री सईद आखून और जेके बैंक के पूर्व चेयरमैन एमवाई खान नाम प्रमुख हैं।

इसे रोशनी घोटाला क्यों कहते हैं?

वर्ष 2001 में फारूक अब्दुल्ला जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री थे। तब विधानसभा में रोशनी एक्ट पास हुआ था। इसका मकसद ये था कि जिनके पास निश्चित समय के लिए सरकारी जमीन लीज पर है या कोई चालीस वर्ष से सरकारी जमीन पर रह रहा है तो ये जमीन हमेशा के लिए उन्हें दे दी जाए। यानी उन्हें जमीन का मालिक बना दिया जाए। इसके बदले में सरकार बाजार मूल्य पर पैसा लेगी. इस तरह से जो पैसा सरकारी खजाने में आएगा उससे जम्मू-कश्मीर में घर-घर बिजली की योजना चलाई जाएगी। यानी घर घर रोशनी पहुंचाई जाएगी. इसलिए इसे रोशनी एक्ट नाम दिया गया। इस एक्ट के ज़रिए करीब 25 हज़ार करोड़ रुपये हासिल करने का लक्ष्य रखा गया था।

यानी सरकारी जमीन बेच कर बिजली के लिए पैसे का इंतजाम होना था. लेकिन रोशनी एक्ट घोटाले में कैसे बदल गया ये आपको जानना चाहिए.

सूत्रों द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार जम्मू के सुंजवान में फारूक अब्दुल्ला का बंगला है। वर्ष 1998 में फारूक अब्दुल्ला ने इस बंगले को बनाने के लिए करीब 16 हजार स्क्वायर फीट जमीन खरीदी थी। उन पर आरोप है कि उन्होंने इसके आस पास की 38 हजार स्क्वायर फीट जंगल की जमीन पर भी कब्जा कर लिया। जिस पर ये आलीशान बंगला बनाया गया। हालांकि जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने अपनी वेबसाइट पर इस प्लॉट की जानकारी नहीं दी है।

ऐसा ही कुछ श्रीनगर में भी हुआ। श्रीनगर में फारुक अब्दुल्ला की पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस का दफ्तर है, जिसमें नवा-ए-सुबह नामक एक ट्रस्ट का ऑफिस भी है।

वर्ष 2001 में जमीन की कीमत डेढ़ करोड़ रुपए थी। लेकिन मात्र 58 लाख रुपए जमा कर जमीन हमेशा के लिए नवा-ए-सुबह ट्रस्ट के नाम करवा दी गई। ऐसा करने में रोशनी एक्ट का इस्तेमाल किया गया। आतनवाद से ग्रसित होने ए बावजूदआज इस जमीन की कीमत करीब 25 करोड़ रुपए है।

हालांकि नेशनल कॉन्फ्रेंस का कहना है कि उन्हें जो कीमत सरकारी विभाग ने वर्ष 2001 में बताई, वही जमा करके इस जमीन का मालिकाना हक हासिल किया गया था।

वैसे नेशनल कॉन्फ्रेंस का कहना है कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया है. सब कानून (शायद इसी रौशनी एक्ट)के मुताबिक हुआ है।

घोटाला हुआ कैसे?

जमीन के मार्केट रेट और सरकार को दिए गए पैसे के अंतर में ही रोशनी घोटाला छिपा है। आरोप है कि सरकार मे बैठे लोगों ने एक्ट बनाया- फिर महंगी जमीनों के सरकारी रेट बेहद कम करवा दिए और जमीनें कम कीमत पर खरीद लीं। जिससे सरकार को घाटा हुआ और घोटालेबाजों को फायदा।

रोशनी एक्ट के नाम पर कानूनी तरीके से गैरकानूनी काम किया गया। हाई कोर्ट ने रोशनी एक्ट को असंवैधानिक बताया है। सीबीआई जांच के आदेश दिए हैं। अब बड़े बड़े लोगों के नाम सामने आ रहे हैं।

इन दिनों गुपकार गैंग जिस तरह से अनुच्छेद 370 की वापसी के लिए सक्रिय है, उससे साफ है कि ये लोग अपने वही दिन वापस चाहते हैं जिससे ये सरकारी जमीनों पर कब्जा कर सकें, राज्य के संसाधनों को लूट सकें। सरकारी बंगलों और सिक्योरिटी का इस्तेमाल कर सकें। लेकिन अनुच्छेद 370 हटने के बाद शायद उनकी कोई चाल कामयाब नहीं हो पा रही है।

रोशनी घोटाले में जम्मू-कश्मीर प्रशासन जैसे जैसे नाम सार्वजनिक कर रहा है वैसे वैसे नेशनल कॉफ्रेंस, पीडीपी, और कांग्रेस के नेताओं और उनके रिश्तेदारों के नाम सामने आने लगे हैं। कई सरकारी अधिकारी, व्यापारी और कारोबारियों के नाम भी इस लिस्ट में शामिल हैं।

राजनीतिक दलों ने इस संगठित लूट की ज़मीन कैसे तैयार की ?

वर्ष 2001 में जब रोशनी एक्ट बना। तब जमीन पर कब्जे का कट ऑफ ईयर 1990 रखा गया था।

वर्ष 2005 में मुफ्ती मोहम्मद सईद की सरकार ने इस समय सीमा को बढ़ाकर वर्ष 2004 कर दिया। मतलब वर्ष 1990 से 2004 के बीच जिन लोगों ने सरकारी ज़मीन लीज़ पर ली उन्हें भी मालिक बनने का मौका मिल गया। नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी के बाद कांग्रेस को भी तब मौका मिला जब गुलाम नबी आज़ाद वर्ष 2005 में जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री बने।

वर्ष 2007 में गुलाम नबी आज़ाद ने जमीन पर कब्जे की सीमा बढ़ाकर वर्ष 2007 कर दी।

मतलब जो भी सरकार में आया उसने अपने फायदे के लिए या अपने लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए एक्ट में संशोधन किया।

वर्ष 2013-14 में CAG की रिपोर्ट में ये खुलासा हुआ था कि जम्मू कश्मीर सरकार ने इससे कमाई का 25 हजार करोड़ रुपए का जो लक्ष्य रखा था, उससे सरकार को सिर्फ 76 करोड़ रुपये की कमाई हुई और जम्मू कश्मीर में में रौशनी फैलाने के नाम पर भ्रष्टाचार का अंधेरा फैला दिया गया। अब आपको इस घोटाले से जुड़ी लगभग हर बात समझ आ गई होगी।

भास्कर बहाना है, मीडिया निशाना है

केंद्र में किसान आंदोलन का कोई उचित समाधान ना दे पाने से इस मोर्चे पर मुंह की खाये केंद्र सरकार, बंगाल से भी मुंह की खा कर लौटी मोदी – शाह की जोड़ी उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ पर पिल पड़ी और वहाँ भी कुछ हाथ नहीं लगा तो तिलमिलाई सरकार अपनी साख बचाने का प्रयास कर ही रही थी कि मानसून सत्र के एन पहले फोन टेपिंग का मामला सुर्खियों में आ गया। अब मोदी शाह आकंठ गुस्से मेन डूब गए और फिर जो लावा फूटा तो वह सबसे आसान शिकार मीडिया पर।

  • दैनिक भास्कर समूहों के सभी ऑफिसों पर पड़ रहे हैं आयकर विभाग के छापे
  • भोपाल स्थित ऑफिस पर सुबह से ही जारी है छापेमारी
  • अखबार मालिक के घर पर भी की जा रही है छापेमारी
  • न्यूज एजेंसी एएनआई के मुताबिक कर चोरी के मामले में जारी है छापेमारी

चंडीगढ़/नयी दिल्ली:

कुछ बोल के लब आज़ाद हैं तेरे

अभी अभी भारत समाचार चैनल लखनऊ में रेड।

आयकर विभाग ने कर चोरी के आरोपों में मीडिया समूह दैनिक भास्कर और भारत समाचार के विभिन्न शहरों में स्थित परिसरों पर गुरुवार को छापे मारे। आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि छापेमारी भास्कर समूह के  भोपाल, जयपुर, अहमदाबाद और कुछ अन्य स्थानों पर की गयी है। वहीं भारत समाचार के प्रमोटर्स और एडिटर-इन-चीफ के ठिकानों पर भी आयकर विभाग की तरफ से कार्रवाई की गयी है।

हालांकि अभी तक विभाग या उसके नीति निर्माण निकाय से किसी तरह की आधिकारिक जानकारी नहीं मिली है लेकिन आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक यह कार्रवाई विभिन्न राज्यों में संचालित हिंदी मीडिया समूह के प्रमुखों के खिलाफ चल रही है। कांग्रेस नेता एवं मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने ट्विटर पर कहा कि आयकर विभाग के अधिकारी समूह के करीब छह परिसरों पर “मौजूद हैं”। इनमें राज्य की राजधानी भोपाल में प्रेस कॉम्प्लेक्स में उसका कार्यालय भी शामिल है। बताते चलें कि कोरोना संकट के दौरान दैनिक भास्कर की तरफ से कई ग्राउंड रिपोर्ट किए गए थे।

बताते चलें कि आयकर विभाग की तरफ से यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई है जब संसद का मॉनसून सत्र चल रहा है। विपक्षी दल पेगासस जासूसी मामले को लेकर सरकार पर लगातार हमलावर रहे हैं। मंगलवार को कांग्रेस तथा अन्य विपक्षी पार्टियों ने संसद के दोनों सदनों में यह मुद्दा उठाते हुए कार्यवाही बाधित कर दिया था। विपक्षी सदस्यों ने पत्रकारों, नेताओं, मंत्रियों, न्यायाधीशों और अन्य लोगों की इजराइली पेगासस स्पाईवेयर से जासूसी कराए जाने के आरोपों पर दोनों सदनों में जमकर विरोध जताया था।