टेररोर फंडिंग मामले में न्यायिक हिरासत 30 दिनों तक बढ़ी

नई दिल्लीः हाफिज़ सईद से जुड़े टेरर फंडिंग के मामले में गिरफ्तार मसरत आलम, आसिया अंद्राबी और शब्बीर शाह की NIA कोर्ट में आज पेशी हुई. अभी तक तीनों 10 दिनों की रिमांड पर थे. NIA ने आज कोर्ट से रिमांड बढ़ाने की मांग नहीं की. इसके बाद कोर्ट ने तीनों आरोपियों को 30 दिनों (12 जुलाई) के लिए न्यायिक हिरासत (जेल) भेज दिया है. पिछली सुनवाई के दौरान कोर्ट रूम में ही तीनों आरोपियों से एनआईए की टीम ने अलग-अलग पूछताछ की थी.

मसरत आलम को एक रैली के दौरान भारत विरोधी नारे और पाकिस्तानी झंडे लहराने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था.पिछली सुनवाई में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश राकेश सयाल ने तीनों को 10 दिनों की NIA हिरासत में भेज दिया था. मसरत आलम भट्ट को जम्मू एवं कश्मीर की एक जेल से दिल्ली लाया गया था. आतंकी फंडिंग के एक मामले में एजेंसी इन लोगों से पूछताछ करना चाहती थी. 

एजेंसी ने कश्मीर घाटी में हिंसा के बाद मई 2017 में मामला दर्ज किया था. अब तक एजेंसी ने अलगाववादी नेता आफताब हिलाली शाह ऊर्फ शाहिद-उल-इस्लाम, अयाज अकबर खांडे, फारूक अहमद डार ऊर्फ बिट्टा कराटे, नईम खान, अल्ताफ अहमद शाह, राजा मेहराजुद्दीन कलवल और बशीर अहमद भट्ट ऊर्फ पीर सैफुल्ला को गिरफ्तार किया है.

एससीओ सम्मेलन में प्रधान मंत्री मोदी ने इमरान को किया नज़रअंदाज़

एससीओ शिखर सम्मेलन में यदि कोई सबसे चर्चित चेहरा रहा तो वह हैं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान। उनके हाव भाव, आचरण और भारत को ले कर उनकी भाषा। प्रधान मंत्री मोदी ने इमरान खान पर इस तरह से मानसिक दबाव बनाया के उनके आचरण में बौखलाहट और ढिठाई साफ नज़र आने लग पड़ी। विश्व पटल पर इमरान का कुर्सी प्रेम भी ज़ाहिर हो गया। विश्व के नेताओं के स्वागत में जब सभी नेता गण और प्रतिनिधि मण्डल आदर देने को खड़े थे तब मियां इमरान अपनी कुर्सी पर पसरे हुए थे।

बिश्‍केक:

किर्गिस्‍तान की राजधानी में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ (SCO) शिखर सम्‍मेलन में हिस्‍सा लेने के लिए पहुंचे पीएम मोदी और पाकिस्‍तानी पीएम इमरान खान के बीच कोई मीटिंग नहीं हुई. सूत्रों के हवाले से बताया कि दोनों नेताओं के बीच दुआ-सलाम तक नहीं हुई.

पाक-भारत संबंध सबसे खराब दौर में: इमरान
इस बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा है कि भारत के साथ उनके देश के संबंध शायद अपने सबसे खराब दौर से गुजर रहे हैं. हालांकि, उन्होंने आशा जताई कि उनके भारतीय समकक्ष नरेंद्र मोदी कश्मीर सहित सभी मतभेदों को हल करने के लिए अपने ‘प्रचंड जनादेश’ का उपयोग करेंगे.

बिश्केक के लिए रवाना होने से पहले रूसी समाचार एजेंसी स्पुतनिक को दिए एक ‘इंटरव्यू’ में खान ने कहा कि एससीओ सम्मेलन ने उन्हें दोनों पड़ोसी देशों के बीच संबंधों को बेहतर बनाने के लिए भारतीय नेतृत्व के साथ बात करने का अवसर दिया है. खान ने कहा कि एससीओ सम्मेलन ने पाकिस्तान को भारत सहित अन्य देशों के साथ अपना संबंध विकसित करने के लिए एक नया मंच दिया है. उन्होंने कहा कि इस वक्त भारत के साथ हमारे द्विपक्षीय संबंध शायद अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं.

Sources: There was no meeting between Prime Minister Narendra Modi and Pakistan PM Imran Khan. No exchange of pleasantries between the two leaders. #SCOSummit (file pics) pic.twitter.com/wMvoy19LgY2,2619:49 PM – Jun 13, 2019Twitter Ads info and privacy371 people are talking about this

इमरान खान ने कहा कि पाकिस्तान किसी भी तरह की मध्यस्थता के लिए तैयार है और अपने सभी पड़ोसियों, खासतौर पर भारत के साथ शांति की उम्मीद करता है. उन्होंने कहा कि तीन छोटे युद्धों ने दोनों देशों को इस कदर नुकसान पहुंचाया कि वे अभी भी गरीबी के भंवर जाल में फंसे हुए हैं. गौरतलब है कि भारतीय विदेश मंत्रालय ने पिछले हफ्ते कहा था कि एससीओ सम्मेलन से इतर मोदी और उनके पाकिस्तानी समकक्ष खान के बीच किसी द्विपक्षीय बैठक की योजना नहीं है.

वहीं, खान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दो बार पत्र लिख कर सभी मुद्दों पर वार्ता बहाल करने की अपील की है.

पीएम मोदी और शी चिनफिंग की मुलाकात
पीएम मोदी ने बृहस्पतिवार को यहां चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के साथ अपनी वार्ता के दौरान सीमा पार से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के मुद्दे को उठाया और कहा कि भारत वार्ता बहाली के लिए आतंक मुक्त माहौल बनाने के मकसद से पाक द्वारा ठोस कार्रवाई किए जाने की उम्मीद करता है.

इमरान खान ने कहा कि मुख्य जोर शांति बहाल करने और वार्ता के जरिए मतभेदों को दूर करने पर होना चाहिए. उन्होंने कहा, ‘‘भारत के साथ हमारा मुख्य मतभेद कश्मीर (मुद्दा) है. और यदि दोनों देश फैसला करते हैं तो यह मुद्दा हल हो सकता है. लेकिन दुर्भाग्य से हमें (इस सिलसिले में) भारत की ओर से ज्यादा सफलता नहीं मिली है.

खान ने कहा, ‘‘लेकिन हम आशा करते हैं कि मौजूदा प्रधानमंत्री (मोदी) के पास प्रचंड जनादेश है, हम आशा करते हैं कि वह बेहतर संबंध विकसित करने और उपमहाद्वीप में शांति कायम करने में इसका उपयोग करेंगे.’’ उन्होंने कहा कि उनका मानना है कि पैसों का इस्तेमाल लोगों को गरीबी से बाहर निकालने में किया जाना चाहिए. उन्होंने चीन का उदाहरण देते हुए यह बात कही जिसने अपने लाखों लोगों को गरीबी के भंवर जाल से बाहर निकाला है.

खान ने कहा, ‘‘हम आशा करते हैं कि भारत के साथ हमारा तनाव घटेगा, इसलिए हमें हथियार नहीं खरीदना है क्योंकि हम मानव विकास पर धन खर्च करना चाहते हैं. लेकिन हां, हम रूस से हथियार खरीदने पर विचार कर रहे हैं और मैं जानता हूं कि हमारी सेना रूसी सेना के साथ संपर्क में है.’’ उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान रूस के साथ पिछले कुछ बरसों से संयुक्त सैन्य अभ्यास करता आ रहा है. इसके अलावा वह रूस से रक्षा खरीद भी कर रहा है जिसने नयी दिल्ली को कुछ चिंतित किया है.

एलओसी पर बस रहे लोगों को मिलेगा आरक्षण लाभ

बँटवारे के बाद से भारत -पाक सीमा पर रह रहे भारतियों के लिए के राहत भरा पैगाम मोदी सरकार ने भेजा है। प्रधानमंत्री मोदी ने भारत-पाकिस्तान सीमा से सटे गांवों के लोगों की जुझारू जिंदगी को देखते हुए उन्हे आरक्षण का लाभ देने को मंजूरी दे दी। जो लोग बिना किसी कारण हर समय पाक द्वारा अघोषित युद्ध झेलते रहते हैं अपनी मिट्टी से जुड़ाव के कारण वह कहीं और जा कर नहीं बसते, सर्वोपरि वह भारतीय सुरक्षा के आँख कान बने रहते हैं उनके लिए बँटवारे के 70 साल बाद ही सही किसी ने तो सुध ली।

नई दिल्ली: जम्मू कश्मीर में भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को वास्तविक नियंत्रण रेखा (एएलओसी) के पास रहने वालों की तरह सीधी भर्ती, पदोन्नति तथा पेशेवर पाठ्यक्रमों के लिए प्रवेश में आरक्षण का लाभ मिलेगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में यह फैसला किया गया. एक आधिकारिक बयान के मुताबिक मंत्रिमंडल ने जम्मू और कश्मीर आरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2019 को मंजूरी दे दी. 

बयान में कहा गया कि जन कल्याणकारी पहलों तथा विशेष रूप से विकास के अंतिम पायदान पर खड़े लोगों को ध्यान में रखते हुए तथा प्रधानमंत्री मोदी के वायदों को पूरा करने के लिए केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने आज जम्मू और कश्मीर आरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2019 को अपनी स्वीकृति दे दी. संसद के अगले सत्र में दोनों सदनों में इस आशय का प्रस्ताव लाया जाएगा. बयान में कहा गया, ‘‘मंत्रिमंडल का यह निर्णय सबका साथ, सबका विकास तथा सबका विश्वास के प्रति समर्पित जन कल्याणकारी सरकार के प्रधानमंत्री मोदी के विजन को दिखाता है.’’ 

इस कदम से जम्मू-कश्मीर में अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे क्षेत्रों में रहने वाले व्यक्तियों को राहत मिलेगी. अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे क्षेत्रों में रहने वाले लोग सीधी भर्ती, पदोन्नति तथा विभिन्न पेशेवर पाठ्यक्रमों के लिए प्रवेश में लाभ उठा सकते हैं. यह विधेयक जम्मू और कश्मीर आरक्षण अधिनियम, 2004 में संशोधन द्वारा जम्मू और कश्मीर आरक्षण (संशोधन) अध्यादेश, 2019 का स्थान लेगा और यह अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे क्षेत्रों में रहने वाले व्यक्तियों को वास्तविक नियंत्रण रेखा (एएलओसी) से लगे क्षेत्रों में रह रहे लोगों के समान आरक्षण के दायरे में लाएगा.

जम्मू कश्मीर में अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे क्षेत्रों में रह रहे लोगों को जम्मू और कश्मीर आरक्षण अधिनियम, 2004 तथा वास्तविक नियंत्रण रेखा से लगे क्षेत्रों के निवासियों सहित विभिन्न श्रेणियों के लिए प्रत्यक्ष भर्ती, पदोन्नति तथा विभिन्न पेशेवर पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए आरक्षण का प्रावधान करने वाले नियम, 2005 में शामिल नहीं किया गया था. इसलिए लंबे समय से उन्हें इसके लाभ नहीं मिल रहे थे. 

सीमा पार से लगातार तनाव, अंतरराष्ट्रीय सीमा के आसपास रह रहे लोगों के सामाजिक, आर्थिक तथा शैक्षणिक पिछड़ापन तथा सीमा पार से होने वाली गोलीबारी के कारण यहां के निवासी सुरक्षित स्थानों पर जाने के लिए बाध्य होते रहे और इससे उनकी शिक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, क्योंकि शैक्षणिक संस्थान लंबे समय तक बंद रहे.

इसलिए उचित रूप से यह महसूस किया गया कि वास्तविक नियंत्रण रेखा से लगे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की तरह ही अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए आरक्षण के लाभ का विस्तार किया जाए. राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्य विधानसभा की शक्तियां संसद में निहित होती हैं. इसलिए जम्मू और कश्मीर आरक्षण (संशोधन) अध्यादेश, 2019 के स्थान पर विधेयक लाने का निर्णय लिया गया है, जो संसद के दोनों सदनों में पेश किया जाएगा.

मंत्रिपरिषद से मोदी की बैठक में लिए महत्वपूर्ण निर्णय

नई दिल्ली: 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बुधवार को मंत्रिपरिषद की बैठक में सभी से कहा कि वे समय पर दफ्तर पहुंचे, घर से काम करने से बचें और लोगों के लिए उदाहरण पेश करें. बैठक के बाद सूत्रों ने बताया कि नयी सरकार के मंत्रिपरिषद की पहली बैठक में प्रधानमंत्री ने वरिष्ठ मंत्रियों से कहा कि वे नए मंत्रियों को साथ लेकर चलें. राज्य मंत्रियों को बड़ी भूमिका देने की बात करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि कैबिनेट मंत्रियों को उनके साथ महत्वपूर्ण फाइलें साझा करनी चाहिए. इससे उत्पादकता बढ़ेगी.

सूत्रों के अनुसार पीएम मोदी ने कहा कि फाइलों को तेजी से निपटाने के लिए कैबिनेट मंत्री और उनके सहायक मंत्री साथ बैठकर प्रस्तावों को मंजूरी दे सकते हैं. समय पर दफ्तर पहुंचने पर जोर देते हुए पीएम मोदी ने कहा कि सभी मंत्री वक्त पर दफ्तर पहुंचें और कुछ मिनट का वक्त निकालकर अधिकारियों के साथ मंत्रालय के कामकाज की जानकारी लें. उन्होंने कहा कि मंत्रियों को दफ्तर आना चाहिए और घर से काम करने से बचना चाहिए. साथ ही उन्हें पार्टी सांसदों और जनता से भी मिलते रहना चाहिए.

उन्होंने कहा कि वे लोग अपने-अपने राज्य के सांसदों के साथ मुलाकात के जरिए यह सिलसिला शुरू कर सकते हैं. उन्होंने इसपर भी जोर दिया कि एक मंत्री और सांसद में बहुत फर्क नहीं है. पीएम मोदी ने प्रत्येक मंत्रालय की पंचवर्षीय योजना पर भी बात की. बैठक के दौरान कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने सोमवार से शुरू हो रहे संसद सत्र के अधिकतम उपयोग पर प्रस्तुतिकरण दिया. तोमर पिछली सरकार में संसदीय कार्य मंत्री थे. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने केन्द्रीय बजट पर सलाह के लिए प्रजेंटेशन दिया. बजट पांच जुलाई को पेश होना है.

सूत्रों ने बताया कि रेल मंत्री पीयूष गोयल ने केन्द्र सरकार के प्रत्येक मंत्रालय के लिए पंचवर्षीय दृष्टिपत्र पर प्रजेंटेशन दिया. पीएम मोदी की पिछली सरकार में भी मंत्रिपरिषद की बैठकें लगातार होती रहती थीं. वह सभी मंत्रियों को सरकार की कल्याणकारी योजनाओं और उनके बारे में जनता को जागरूक करने के तरीके समझाते थे.

धारा 370 पर गठबंधन में रह कर विरोध करेंगे : जेडीयू

धारा 370 भारतीय संवधान पर एक ऐसा दाग है जिसे सीधे सीधे राष्ट्रपति द्वारा जारी अध्यादेश से लागू किया गया। आज यही भारतीय अखंडता पर कुठाराघात करता है और हम चुप छाप टुकड़े टुकड़े गैंग को देखते सुनते पालते पोसते हैं। और समग्र सच जान कर भी चुनिन्दा भारतीय राजनेता राष्ट्र की कीमत पर इसे ज़िंदा रहना चाहते हैं। NDA गठबंधन में भी कुछ ऐसे नेता हैं। भाजपा धारा 370 को हटाने की कोशिश करती है, तो जेडीयू गठबंधन में रहकर अपना विरोध दर्ज करायेगी.dh

पटनाः जेडीयू धारा 370, राम मंदिर और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों पर पुराने रुख पर कायम है. लेकिन भाजपा धारा 370 को हटाने की कोशिश करती है, तो पार्टी गठबंधन खत्‍म नहीं करेगी, बल्‍कि साथ में रहकर अपना विरोध दर्ज करायेगी. यह कहना है पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव केसी त्यागी का है. जो जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद पत्रकारों से बात कर रहे थे.

जेडीयू के राष्ट्रीय महासचिव ने कहा कि धारा 370 पर करार तभी हुआ था, जब राजा हरि सिंह ने भारत सरकार के साथ पैक्ट किया था, इसको नरम करने की कोशिश भाजपा से ज्यादा कांग्रेस की ओर से की गयी है. हम इसके लिए कांग्रेस को ज्यादा कसूरवार मानते हैं, जब कांग्रेस की ओर से इसकी कोशिश की गयी थी, तो लोक नायक जय प्रकाश नारायण ने इसका विरोध किया था. हम उनके वंशज हैं और समाजवादी विचारधारा को आगे बढ़ा रहे हैं. 

उन्होंने कहा कि ऐसे ही राम मंदिर के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत ने कोर्ट के फैसले की बात कही है, ऐसे में गुंजाइश कहां बचती है. जेडीयू महासचिव ने राम मंदिर मुद्दे को लटकाने के लिए कांग्रेस पर आरोप लगाया और कहा कि जब प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के नेतृत्व में सरकार चल रही थी, तो पूरा मसौदा तैयार हो गया था. पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के पास चंद्रशेखर जी ने पूरे मसौदे को भेजा था, तो उसे लागू करने के लिए तीन-चार दिन रुक जाने की बात राजीव गांधी ने कही थी, लेकिन उसके बाद दो-तीन में चंद्रशेखर की सरकार ही गिर गयी.

केसी त्यागी ने कहा कि हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने साफ कहा है कि हम अपने रुख पर कायम हैं. उससे किसी तरह का समझौता नहीं करेंगे. उन्होंने कहा कि बिहार में एनडीए के बीच सब कुछ ठीक नहीं होने का प्रचार किया जा रहा है, इसके पीछे कथित महागठबंधन के नेता है, लेकिन हम पूरी तरह के कहना चाहते हैं कि जेडीयू एनडीए के साथ है और 2020 में बिहार में होनेवाले विधानसभा के चुनाव में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृ्त्व में चुनाव लड़ेगा. इसमें किसी तरह का कंफ्यूजन नहीं है. इसके साथ ही ये भी तय है कि पार्टी अब केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल नहीं होगी, क्योंकि हमारा दल संख्या के आधार पर ही भागीदारी चाहता था, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. इसलिए पार्टी ने सरकार से बाहर रहने का फैसला लिया है. 

जेडीयू महासचिव ने कहा कि हम सरकार में शामिल हुये बिना पहले भी एनडीए में रहे हैं. 2017 में जब जेडीयू महागठबंधन से अलग होकर एनडीए में आयी थी, तो उसके केंद्र में कोई पद नहीं लिया था, जबकि इसके इतर बिहार में संख्या के आधार पर जेडीयू ने सहयोगियों को सरकार में भागीदार बनाया था. लोजपा का कोई विधायक नहीं था, इसलिए उनके प्रदेश अध्यक्ष पशुपति कुमार पारस को एमएलसी बना कर मंत्री बनाया गया था. जेडीयू इसी तरह से गठबंधन धर्म का पालन करती है. जेडीयू महासचिव ने कहा कि नागालैंड में भले ही हमारा एक विधायक है, लेकिन उसके सहयोग से वहां पर भाजपा की सरकार चल रही है. जेडीयू से समर्थन के लिए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को फोन किया था, तब हमारे दल ने समर्थन देने के फैसला लिया था, जो अब भी जारी है. 

जेडीयू महासचिव ने कहा कि पार्टी 2020 तक राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता चाहती है, इसका लक्ष्य निर्धारित किया गया है. इसके लिए हमारा दल आनेवाले चार राज्यों दिल्ली, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर और झारखंड में अकेले चुनाव लड़ेगी. अगर चुनाव के समय किसी दल से ऑफर मिलता है, तो हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष गठबंधन का फैसला लेंगे, लेकिन पार्टी पूरी मजबूती के साथ इन राज्यों में चुनाव लड़ेगी. राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौरान पार्टी के संबंधित राज्यों के प्रदेश अध्यक्षों से राय ली गयी है. 

आसिया अंद्राबी ने भारत में तबाही मचाने के लिए पाकिस्तान की मदद कबूली

कश्मीर यूनिवर्सिटी से विज्ञान में स्नातक अंद्राबी चार साल पहले पाकिस्तानी झंडा फहराने और पाकिस्तानी राष्ट्रगान गाने के कारण सुर्खियों में आई थी.  काश्मीर को सुलगाने में और वहाँ धार्मि सौहार्द बिगाड़ने में जितना हाथ काश्मीर के अलगाव वादी नेताओं का है उतना ही हाथ वहाँ के राजनेताओं और आम जनता का है। घाटी में आए दिन पत्थरबाजी, यवाओं का आतंकी कैंपों में जाना और अभिभावकों/ राजनेताओं का दलील देना कि घाटी में अवसरों कि कमी है, गले नहीं उतरता। 3.5 साल तक महबूबा मुफ़्ती कि सरकार थी उन्होने घाटी में रोजगार ए अवसरों के लिए क्या किया? बच्चों को पढ़ाने के लिए क्या किया? आज जब उनकी सरकार नहीं है तो उन्हे केंद्र सरकार धार्मिक सौहार्द बिगाड़ती नज़र आ रही है। महबूबा ओमर दोनों ही आज छती पीट पीट कर धार्मिक सौहार्द कि बात कर रहे हैं। जबकि उनकी रहनुमाई में आसिया अंद्राबी जैसे लोगों ने घाटी के अमन चैन को लील लिया है।

नई दिल्ली: कश्मीरी अलगाववादी नेता आसिया अंद्राबी ने खुलासा किया है कि वह पाकिस्तानी सेना के एक अधिकारी के जरिये लश्कर-ए-तैयबा के सरगना हाफिज सईद के करीब आई. अधिकारी दुख्तारन-ए-मिल्लत नेता अंद्राबी का रिश्तेदार था. अंद्राबी के साथ ही दो अलगाववादी नेताओं से इन दिनों राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) पूछताछ कर रही है. कश्मीर यूनिवर्सिटी से विज्ञान में स्नातक अंद्राबी चार साल पहले पाकिस्तानी झंडा फहराने और पाकिस्तानी राष्ट्रगान गाने के कारण सुर्खियों में आई थी. अंद्राबी के इस कृत्य के पीछे हाफिज सईद को माना जाता है.

एनआईए सूत्र ने कहा कि अंद्राबी का भतीजा पाकिस्तान सेना में कैप्टन रैंक का अधिकारी है. उसका एक अन्य करीबी रिश्तेदार पाकिस्तान सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई के संपर्क में है. अंद्राबी के रिश्तेदार दुबई और सऊदी अरब में भी हैं जहां से वह फंड प्राप्त करती है और भारत के खिलाफ गतिविधियों में इस्तेमाल करती है.

एनआईए ने अंद्राबी के खिलाफ एक केस दर्ज किया है जिसके तहत जमात-उद-दावा के अमीर और लश्कर के मास्टरमाइंड सईद बड़े पैमाने पर अंद्राबी को फंड मुहैया कराते थे. यह धन पत्थरबाजों और हुर्रियत के समर्थकों में बांटे गए थे जिन्होंने श्रीनगर और घाटी के अन्य हिस्सों में सरकार के खिलाफ व्यापक प्रदर्शन किए. सूत्रों ने कहा कि अंद्राबी के अलावा मसरत आलम और शब्बीर शाह से भी एनआईए ने पूछताछ की.

तीनों अलगाववादी नेता अभी तिहाड़ जेल में बंद हैं. इस केस के निगरानी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल कर रहे हैं जो घाटी में आंतकवादी घटनाओं पर केंद्र की रणनीति अमलीजामा पहना रहे हैं. 

भविष्य मे वकीलों से नही होगा दुर्व्यवहार – पुलिस कमिश्नर

जयपुर महानगर के पुलिस थाना अशोक नगर मे रिपोर्ट दर्ज कराने गये वकील के साथ किये दुर्वयव्हार को लेकर राजस्थान उच्च न्यायालय मे दायर याचिका पर जयपुर पलिस कमिश्नर आनन्द श्री वास्तव को दोपहर एक बजे न्यायालय मे तलब किया !

न्यायालय के आदेश पर पुलिस कमिश्नर मंगलवार को न्यायालय मे उपस्थित हुये तथा न्यायलय को बताया कि उक्त घटना मे संलिप्त पुलिस कर्मियो को अशोक नगर थाना से हटा दिया है तथा न्यायलय को आश्वासन दिया कि भविष्य मे वकिलो के साथ ऐसा व्यवहार नही होगा! जिस पर अदालत ने कहा कि वो आगामी 7 जून तक बताये कि थानो मे वकीलो की आवाजाही पर उनकी क्या गाइडलाइन है, वकील आफिसर आफ द कोर्ट है।

यह अन्तरिम आदेश अवकाशकालीन न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा ने वकील भारत यादव की याचिका पर दिये!

प्रार्थी पक्ष की ओर से अदालत मे मे दायर याचिका मे कहा गया कि प्रार्थी वकील दो अन्य लोगो के साथ पुलिस थाना अशोक नगर मे कोई मामला दर्ज कराने गये तो वहां उपस्थित ए एस आई मदनलाल ने उसके साथ दुर्व्यवहार किया गालिया दीं तथा मारपीट की उसके बाद मदनलाल के कहने पर उप निरिक्षक बग्गा राम ने भी उसके साथ धक्का मुक्की की तथा फर्जी मुकदमा बनाकर जेल मे बन्द कर दिया !

याचिका पर सुनवाई के दौरान दोपहर एक बजे पुलिस कमिश्नर को हाजिर होने को कहा तथा न्यायालय के आदेश की पालना मे पुलिस कमिश्नर दोपहर एक बजे न्यायालय के समक्ष उपस्थित हुये! !

न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा ने कमिश्नर को हिदायत देते हुये कहा कि पुलिस और वकील एक ही सिस्टम का हिस्सा है और वकील आफिसर आफ द कोर्ट है ऐसे मे पुलिस का ऐसा बर्ताव वकीलो के साथ सही नही ! तथा आगामी पेशी 7 जून को पुलिस थाने मे वकीलो की आवाजाहि की गाइड लाइन बताये जिससे भविष्य मे ऐसी घटनाएं वकीलो के साथ न हो ! इस पर पुलिस कमिश्नर ने कहा कि दोषी पुलिसकर्मियो को उक्त थाने से हटा दिया गया है और अदालत को आश्वस्त किया कि भविष्य मे ऐसी घटना नही होगी!

प्रार्थी पक्ष वकील भारत यादव की तरफ से डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष डा. सुनील शर्मा, महासचिव गजराज सिंह राजावत, महेन्द्र शाण्डिल्य,दिनेश पाठक, अखिलेश पारीक व अन्य वकीलो ने पैरवी की तथा सरकार की ओर से राजकीय अधिवक्ता राजेन्द्र यादव,लक्ष्मण मीणा,शेरसिंह महला ने पैरवी की

लद्दाख, जम्मू और कश्मीर का परिसीमन कब और क्यों?

Map of Ladakh, J&K

दूसरे कार्यकाल में मोदी सरकार का सबसे ज़्यादा Focus देश की एकता, अखंडता और सुरक्षा पर है. नए गृहमंत्री अमित शाह पिछले 4 दिनों में जम्मू और कश्मीर पर तीन बैठकें कर चुके हैं. आज भी अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर की स्थिति पर एक बैठक की और सूत्रों से हमें ये जानकारी मिल रही है कि सरकार, जम्मू और कश्मीर में परिसीमन किए जाने पर विचार कर रही है.

परिसीमन क्या होता है? ये हम आपको आगे विस्तार से बताएंगे. लेकिन आसान भाषा में आप ये समझ लीजिए कि अगर जम्मू-कश्मीर में परिसीमन हुआ तो राज्य के तीन क्षेत्रों… जम्मू, कश्मीर और लद्दाख में विधानसभा सीटों की संख्या में बदलाव होगा. अगर परिसीमन हुआ तो जम्मू और कश्मीर के विधानसभा क्षेत्रों का नक्शा पूरी तरह बदल जाएगा. जम्मू और कश्मीर की राजनीति में आज तक कश्मीर का ही पलड़ा भारी रहा है, क्योंकि विधानसभा में कश्मीर की विधानसभा सीटें, जम्मू के मुकाबले ज्यादा हैं. अगर परिसीमन होता है और जम्मू की विधानसभा सीटें बढ़ती है, तो अलगाववादी मानसिकता के नेताओँ की स्थिति कमज़ोर होगी और राष्ट्रवादी शक्तियां मजबूत होंगी.

Political Map of Jamnmu

आज हम कश्मीर पर मोदी सरकार की इस नई योजना का DNA टेस्ट करेंगे. हम कश्मीर पर इस नए Action Plan के सामने आने वाली चुनौतियों और रुकावटों का भी विश्लेषण करेंगे. परिसीमन का मतलब होता है… किसी राज्य के निर्वाचन क्षेत्र की सीमा का निर्धारण करने की प्रक्रिया. संविधान में हर 10 वर्ष में परिसीमन करने का प्रावधान है. लेकिन सरकारें ज़रूरत के हिसाब से परिसीमन करती हैं. जम्मू-कश्मीर की विधानसभा में कुल 87 सीटों पर चुनाव होता है. 87 सीटों में से कश्मीर में 46, जम्मू में 37 और लद्दाख में 4 विधानसभा सीटें हैं. परिसीमन में सीटों में बदलाव में आबादी और वोटरों की संख्या का भी ध्यान रखा जाता है.

ऐसा माना जा रहा है कि अगर परिसीमन किया जाता है तो जम्मू की सीटें बढ़ जाएंगी और कश्मीर की सीटें कम हो जाएंगी, क्योंकि 2002 के विधानसभा चुनाव में जम्मू के मतदाताओं की संख्या कश्मीर के मतदाताओं की संख्या से करीब 2 लाख ज्यादा थी. जम्मू 31 लाख रजिस्टर्ड वोटर थे. कश्मीर और लद्दाख को मिलाकर सिर्फ 29 लाख वोटर थे.

कश्मीर के हिस्से में ज्यादा विधानसभा सीटें क्यों हैं? ये समझने के लिए आपको जम्मू और कश्मीर के इतिहास को समझना होगा. वर्ष 1947 में जम्मू और कश्मीर की रियासत का भारत में विलय हुआ. तब जम्मू और कश्मीर में महाराज हरि सिंह का शासन था. वर्ष 1947 तक शेख अब्दुल्ला कश्मीरियों के सार्वमान्य नेता के तौर पर लोकप्रिय हो चुके थे.

जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह, शेख अब्दुल्ला को पसंद नहीं करते थे. लेकिन शेख अब्दुल्ला को पंडित नेहरू का आशीर्वाद प्राप्त था. पंडित नेहरू की सलाह पर ही महाराजा हरि सिंह ने शेख अब्दुल्ला को जम्मू और कश्मीर का प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया. वर्ष 1948 में शेख अब्दुल्ला के प्रधानमंत्री नियुक्त होने के बाद महाराजा हरि सिंह की शक्तियां तकरीबन खत्म हो गई थीं.

इसके बाद शेख अब्दुल्ला ने राज्य में अपनी मनमानी शुरू कर दी. वर्ष 1951 में जब जम्मू कश्मीर के विधानसभा के गठन की प्रक्रिया शुरू हुई. तब शेख अब्दुल्ला ने जम्मू को 30 विधानसभा सीटें, कश्मीर को 43 विधानसभा सीटें और लद्दाख को 2 विधानसभा सीटें आवंटित कर दीं.

वर्ष 1995 तक जम्मू और कश्मीर में यही स्थिति रही. वर्ष 1993 में जम्मू और कश्मीर में परिसीमन के लिए एक आयोग बनाया गया था. 1995 में परिसीमन आयोग की रिपोर्ट को लागू किया गया. पहले जम्मू कश्मीर की विधानसभा में कुल 75 सीटें थीं. लेकिन परिसीमन के बाद जम्मू कश्मीर की विधानसभा में 12 सीटें बढ़ा दी गईं. अब विधानसभा में कुल 87 सीटें थीं. इनमें से कश्मीर में 46, जम्मू में 37 और लद्दाख में 4 विधानसभा सीटें हैं. इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी जम्मू और लद्दाख से हुए इस अन्याय को ख़त्म करने की कोशिश नहीं हुई.

यही वजह है कि जम्मू-कश्मीर की विधानसभा में हमेशा नेशनल कॉन्फ्रेंस और PDP जैसी कश्मीर केंद्रित पार्टियों का वर्चस्व रहता है. ये पार्टियां, संविधान के अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35 A को हटाने का विरोध करती हैं. यही वजह है कि कश्मीर से अलगाववादी मानसिकता खत्म नहीं हो रही है.

जम्मू कश्मीर की विधानसभा का राजनीतिक गणित इस तरह का है कि हर परिस्थिति में कश्मीर केंद्रित पार्टियों का ही वर्चस्व रहता है. अगर जम्मू और लद्दाख की 37 और 4 सीटों को जोड़ दिया जाए, तब भी सिर्फ 41 सीटें होती हैं. ये कश्मीर की 46 विधानसभा सीटों से 5 कम है. यही वजह है कि जम्मू कश्मीर की राजनीति में हमेशा मुख्यमंत्री कश्मीर से ही चुनकर आता है.

जम्मू कश्मीर में बहुमत की सरकार बनाने के लिए किसी भी पार्टी को 44 सीटों की ज़रूरत होती है. कश्मीर में मुसलमानों की आबादी करीब 98 प्रतिशत है. सांप्रदायिक राजनीति करने में माहिर जम्मू और कश्मीर के क्षेत्रीय दल बहुत आसानी से कश्मीर की 46 सीटों को जीत कर बहुमत के आंकड़े को हासिल कर लेते हैं.

बीते 30 वर्षों से जम्मू और कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस या PDP के बग़ैर किसी भी दल की सरकार नहीं बन पायी. इन दोनों पार्टियों में कोई आंतरिक लोकतंत्र नहीं है. नेशनल कॉन्फ्रेंस पर अब्दुल्ला परिवार का राज है और PDP मुफ्ती परिवार की सियासी संपत्ति की तरह हैं. ये दोनों ही परिवार कश्मीर से आते हैं. आज से कुछ साल पहले जम्मू कश्मीर की राजनीतिक स्थिति ये थी कि वहां या तो मुफ्ती मोहम्मद सईद मुख्यमंत्री बनते थे या फिर फारुख अब्दुल्ला और मौजूदा राजनीतिक स्थिति ये है कि जम्मू कश्मीर में या तो महबूबा मुफ्ती मुख्यमंत्री बनेंगी या फिर उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बनेंगे.

इन राजनीतिक परिस्थितियों में सबसे ज़्यादा अन्याय जम्मू और लद्दाख के साथ हो रहा है. कश्मीर केंद्रित पार्टियों की सरकार में जम्मू और लद्दाख के साथ सौतेला व्यवहार होता रहा है. मोदी सरकार ने इस समस्या को जड़ से ख़त्म करने का फ़ैसला किया है. लेकिन ये इतना आसान नहीं है, क्योंकि नेशनल कॉन्फ्रेंस और PDP इसका विरोधी करेंगी. महबूबा मुफ्ती ने एक Tweet करके इसका विरोध किया है. उन्होंने लिखा है कि  भारत सरकार की परिसीमन की योजना के बारे में सुनकर वो परेशान हैं. ज़बरदस्ती परिसीमन सांप्रदायिक आधार पर राज्य के भावनात्मक बंटवारे की कोशिश है.

फारुक अब्दुल्ला ने भी हमेशा परिसीमन को टालने की कोशिश की है. नए सिरे से परिसीमन में सबसे बड़ी रूकावट उन्होंने ही पैदा की थी. वर्ष 2002 में नेशनल कॉन्फ्रेंस की सरकार ने परिसीमन को 2026 तक रोक दिया था. इसके लिए अब्दुल्ला सरकार ने Jammu and Kashmir Representation of the People Act 1957 और जम्मू कश्मीर के संविधान के Section 47(3) में बदलाव किया था.

Section 47(3) में हुए बदलाव के मुताबिक वर्ष 2026 के बाद जब तक जनसंख्या के सही आंकड़े सामने नहीं आते हैं तब तक विधानसभा की सीटों में बदलाव करना ज़रूरी नहीं है. वर्ष 2026 के बाद जनगणना के आंकड़े वर्ष 2031 में आएंगे. इसलिए अगर देखा जाए तो अब जम्मू कश्मीर में परिसीमन 2031 तक टल चुका है. फारुख अब्दुल्ला सरकार के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका दायर की गई थी. लेकिन 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया था. यानी सरकार के सामने राजनीतिक चुनौती के साथ साथ कानूनी चुनौती भी है.

अगर देखा जाए तो परिसीमन की सबसे बड़ी रुकावट फारुख अब्दुल्ला की सरकार का फैसला है. उनके बेटे उमर अब्दुल्ला ने आज फेसबुक पर एक पोस्ट लिखकर अपने पिता के फैसले का बचाव किया है. उमर अब्दुल्ला ने लिखा है कि वर्ष 2001 में भारत के संविधान के आर्टिकल 82 और 170 में संशोधन किया गया था. जिसके मुताबिक लोकसभा और विधानसभा की सीटों पर परिसीमन को 2026 के बाद पहली जनगणना तक टाल दिया गया.

उमर अब्दुल्ला ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा है कि इसी संविधान संधोशन के आधार पर जम्मू और कश्मीर में भी परिसीमन को 2026 के बाद तक टाल दिया गया. उमर अब्दुल्ला, भारतीय संविधान के मुताबिक फैसले लेने का दावा कर रहे हैं. लेकिन, असलियत ये है कि कश्मीर समस्या की एक बड़ी वजह अब्दुल्ला परिवार की राजनीति है. ये परिवार राज्य में अपनी मनमानी करता रहा और उस समय की केंद्र की सरकारों ने उन्हें रोकने की कोई कोशिश नहीं की. आज हमने इस पर एक रिपोर्ट बनाई है. ये रिपोर्ट कश्मीर समस्या के बारे में आपकी जानकारी को बढ़ाएगी.

Separatist leaders of Kashmir (neither Jammu nor Ladakh)

अलगाववाद और आतंकवाद के ख़िलाफ़ मोदी सरकार की नीति Zero Tolerance की है. इसीलिए एक तरफ़ तो सरकार ने कश्मीर समस्या के समाधान के लिए आक्रामक रवैया अपनाया है और दूसरी तरफ National Investigation Agency भी लगातार अलगाववादी नेताओं पर शिकंजा कस रही है. Terror Funding Case में आरोपी अलगाववादी नेता.. आसिया आंद्राबी, शब्बीर शाह और मसरत आलम को आज दिल्ली की एक स्पेशल कोर्ट में पेश किया गया था. अदालत ने इन अलगाववादी नेताओं को 10 दिन के लिए NIA की हिरासत में भेज दिया है.

NIA ने 2018 में आतंकवादी हाफिज सईद, सैयद सलाउद्दीन और कई कश्मीरी अलगाववादियों पर फंड मुहैया कराने के मामले में FIR दर्ज की थी. जम्मू-कश्मीर को नक़्शे को देखा जाये तो यहां का 61 प्रतिशत भूभाग लद्दाख़ है. जहां आतंकवाद का कोई असर नहीं है. वहीं 22 प्रतिशत जम्मू में आतंकवाद ख़त्म हुए लंबा वक़्त बीत चुका है. लेकिन कश्मीर घाटी…जो राज्य का क़रीब 17 प्रतिशत हिस्सा है…वहीं पर अलगाववादी और आतंकवादी सक्रिय हैं. कश्मीर घाटी में 10 ज़िले हैं…जहां आतंकवादी घटनाएं होती हैं। इनमें से भी दक्षिण कश्मीर के 4 ज़िले शोपियां, पुलवामा, कुलगाम और अनंतनाग ही आतंकवाद के गढ़ माने जाते हैं.

Curtsy ‘DNA’ Sudhir Choudhry

जम्मू और लादाख के लोग 370 और 35 ए से आज़ादी चाहते हैं: भाजपा

तकरीबन हर चुनावी घोषणा पत्र में भाजपा अनुछेद 370 और 35ए हटाने की बात करती है, इस बार भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी चुनावों से पहले इन धाराओं को हटाने की आपनी प्रतिबद्धता दोहराई। पार्टी ने यह भी कहा कि विधानसभा चुनावों के बाद अपने दम पर राज्य में सरकार बनाने का नेशनल कांफ्रेंस का दावा ‘खोखला’ है

जम्मू: बीजेपी की जम्मू-कश्मीर इकाई ने शनिवार को दावा किया कि जम्मू और लद्दाख क्षेत्रों के लोग पार्टी को वोट देकर जल्द से जल्द संविधान के अनुच्छेद 370 और 35ए को हटवाना चाहते हैं.  पार्टी ने यह भी कहा कि विधानसभा चुनावों के बाद अपने दम पर राज्य में सरकार बनाने का नेशनल कांफ्रेंस का दावा ‘खोखला’ है.

बीजेपी ने हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में राज्य की उधमपुर, जम्मू और लद्दाख सीट पर जीत दर्ज की है जबकि कश्मीर घाटी की सभी तीन सीटों श्रीनगर, बारामूला और अनंतनाग सीटों पर नेशनल कांफ्रेंस को जीत मिली थी.  नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने शुक्रवार को कहा था कि प्रधानमंत्री विशाल बहुमत के बावजूद अनुच्छेद 35ए और 370 नहीं हटा सकते. 

इसपर बीजेपी की राज्य इकाई के प्रवक्ता ब्रिगेडियर (सेवानिवृत) अनिल गुप्ता ने कहा, ‘अब्दुल्ला और नेशनल कांफ्रेंस के नेतृत्व के पास अनुच्छेद 35ए और 370 को लेकर बड़े-बड़े दावे करने के लिये जम्मू और लद्दाख का जनादेश नहीं है क्योंकि इन दोनों क्षेत्रों के लोग इन अनुच्छेदों को जल्द से जल्द हटवाना चाहते हैं.’

‘कश्मीर के लिए अनुच्छेद 370 सबसे बड़ा अवरोधक’
इससे पहले बुधवार (22 मई) को भाजपा के महासचिव राम माधव ने कहा था कि कश्मीर को बाकी देश के साथ भावनात्मक तौर पर जोड़ने की राह में अनुच्छेद 370 सबसे बड़ा अवरोधक है. 

उन्होंने कहा था कि कश्मीर मुद्दे को अलग-थलग विषय के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. उन्होंने कहा, ‘कश्मीर में स्थिति को संभालने की प्रक्रिया में जम्मू और लद्दाख बलि के बकरे बन गए हैं.’

माधव ने कहा कि घाटी के उन लोगों की हिफाजत होनी चाहिए जो भारत समर्थक भावनाएं रखते हैं. उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 के कारण नहीं, जम्मू-कश्मीर के भारत के साथ आने के पत्र (इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन) पर दस्तखत के दिन ही कश्मीर भारत का अखंड हिस्सा बन गया.

माधव ने कहा कि कश्मीर के भारत से जुड़ने की वजह अनुच्छेद 370 नहीं है. कश्मीर के कुछ नेता देश में इस तरह की भ्रांति फैला रहे हैं. बाकी देश के साथ कश्मीर के भावनात्मक जुड़ाव में अनुच्छेद 370 सबसे बड़ा बाधक है. 

सेक्टर-14 में रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया

पुरनूर, पंचकूला, 24 मई:

जिला रेडक्राॅस सोसायटी द्वारा आज राजकीय ओद्योगिक प्रशिक्षण संस्थाओं सेक्टर-14 में रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया। आईटीआई और कांवड संघ के सहयोग से आयोजित इस शिविर में 35 स्वैच्छिक रक्तदाताओं ने रक्तदान किया।

  जिला रेडक्राॅस सोसायटी के सचिव अनिल जोशी ने बताया कि इस शिविर में रक्त संग्रह के लिये राजकीय सामान्य अस्पताल सेक्टर-6 के चिकित्सकों की टीम को तैनात किया गया। श्री जोशी ने रक्तदाताओं को बैज लगाकर प्रोत्साहित किया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक स्वस्थ व्यक्ति को वर्ष में कम से कम एक बार रक्तदान अवश्य करना चाहिए। उन्होेंने कहा कि रक्तदान से व्यक्ति के शरीर पर किसी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता बल्कि दान में दिया गया रक्त 48 घंटे की अवधि में बिना किसी अतिरिक्त खुराक  के स्वयं पूरा हो जाता है। उन्होंने कहा कि रक्तदान करना जरूरी है क्योंकि घायल लोगों व मरीजों को समय पर रक्त उपलब्ध करवाकर अमूल्य जीवन बचाया जा सकता हैं।