सवर्णों को भी आरक्षण, सरकारी नौकरियों में रिजर्वेशन का दायरा 50% से बढ़कर 60% होगा

सरकार ने गरीब सवर्णों के लिए नौकरी और शिक्षा में 10 फीसदी आरक्षण के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने लोकसभा चुनाव से पहले मास्टरस्ट्रोक खेला है. मोदी सरकार ने फैसला लिया है कि वह सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण देगी. सोमवार को पीएम मोदी की अध्‍यक्षता में कैबिनेट की हुई बैठक में सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण देने के फैसले पर मुहर लगाई गई. कैबिनेट ने फैसला लिया है कि यह आरक्षण आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को दिया जाएगा. आरक्षण का लाभ सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में मिलेगा. 

बताया जा रहा है कि आरक्षण का फॉर्मूला 50%+10 % का होगा. सूत्रों का कहना है कि लोकसभा में मंगलवार को मोदी सरकार आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों को आरक्षण देने संबंधी बिल पेश कर सकती है. सूत्रों का यह भी कहना है कि सरकार संविधान में संशोधन के लिए बिल ला सकती है. इसके तहत आर्थिक आधार पर सभी धर्मों के सवर्णों को दिया जाएगा आरक्षण. इसके लिए संविधान के अनुच्‍छेद 15 और 16 में संशोधन होगा. केंद्र सरकार के इस फैसले पर वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री ने कहा कि इसे कहते हैं 56 इंच का सीना.

सरकार के इस बड़े फैसले का भारतीय जनता पार्टी ने स्वागत किया है. पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने कहा कि गरीब सवर्णों को आरक्षण मिलना चाहिए. पीएम मोदी की नीति है कि सबका साथ सबका विकास. सरकार ने सवर्णों को उनका हक दिया है. पीएम मोदी देश की जनता के लिए काम कर रहे हैं.

मालूम हो कि करीब दो महीने बाद लोकसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में सवर्णों को आरक्षण देने का फैसला बीजेपी के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है. हाल ही में संपन्न हुए मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में बीजेपी की हार हुई थी. इस हार के पीछे सवर्णों की नाराजगी को अहम वजह बताया जा रहा है.

पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में बीजेपी+ को 80 में से 73 सीटें मिली थीं. इस बार बीजेपी को चुनौती देने के लिए समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने हाथ मिला लिया है. इसके बाद माना जा रहा था कि बीजेपी इस गठबंधन से निपटने के लिए कोई बड़ा कदम उठा सकती है. सवर्णों को आरक्षण देने के फैसले को सरकार का मास्टस्ट्रोक माना जा रहा है.

दरअसल सियासी विश्‍लेषकों के मुताबिक सपा-बसपा ने यूपी में अपने चुनावी गठबंधन में कांग्रेस को रणनीति के तहत शामिल नहीं करने का फैसला किया है. उसके पीछे बड़ी वजह मानी जा रही है कि बीजेपी के सवर्ण तबके में बंटवारे के लिहाज से कांग्रेस और सपा-बसपा अलग-अलग चुनाव लड़ने जा रहे हैं ताकि सवर्णों का वोट बीजेपी और कांग्रेस में विभाजित हो जाए. लेकिन लंबे समय से गरीब सवर्णों के लिए आरक्षण की मांग के चलते इस घोषणा से बीजेपी को सियासी लाभ मिल सकता है.

डेरा प्रमुख की पेशी को लेकर प्रशासन ने किए पुख्ता प्रबंध-मुकुल कुमार

उपायुक्त ने अधिकारी व कर्मचारियों के अवकाश रद्द करने के निर्देश जारी। 

कानून एवं शांति व्यवस्था भंग करने वालों के खिलाफ होगी सख्त कार्यवाई। संदिग्ध व्यक्तियों पर रखी जाएगी पैनी नजर। 

पंचकूला 7 जनवरी:

उपायुक्त मुकुल कुमार ने जिला सचिवालय के सभागार में आयोजित बैठक में डेरा प्रमुख राम रहीम की 11 जनवरी को सीबीआई कोर्ट में  पेशी को लेकर जिला में कानून एवं व्यवस्था हर हालत में कायम रखने की दिशा में संबधित अधिकारियों के साथ सुरक्षा से जुडे़ महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की। 

उन्होंने बताया कि प्रशासन द्वारा पुख्ता प्रबंध किए गए हैं और सुरक्षा को लेकर 17 महत्वपूर्ण स्थानों का चयन कर वहां पर नाकों की व्यवस्था की गई है ताकि हर व्यक्ति एवं वाहन पर पैनी नजर रखी जा सके। उन्होंने बताया कि जिला प्रशासन ने 9 ड्यूटी मैजिस्ट्रेट लगाए गए है, जो कोर्ट काॅम्पलेक्स, लघु सचिवालय, पुराना पंचकूला, माजरी चैक, बेलाविस्टा चैका, नाका डीआई कट सेक्टर 1, नाका सूरज सिनेमा सेक्टर 1, नाक रैड बिशप सैक्टर 1 व नाका लघु सचिवालय सैक्टर 1 में पुलिस के अधिकारियों के साथ तैनात रहेंगें। कानून एवं शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए अतिरिक्त उपायुक्त पंचकूला को पूर्ण प्रभारी बनाया गया है। इसके साथ साथ उपमण्डल अधिकारी ना. पंचकूला व कालका भी अपने अपने क्षेत्रों में कानून एवं व्यवस्था बनाए रखने के लिए पूर्ण प्रभारी होगें।

 उपायुक्त  ने संबधित खण्ड विकास एवं पंचायत अधिकारियों को भी स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा कि अपने अपने क्षेत्र में संरपचों से तालमेल बनाए रखे और यह सुनिश्चित करें कि बाहर से आने वाले हर व्यक्ति की सूचना उनके पास हो। इसके साथ साथ उन्होंने उपमण्डल अधिकारी  ना. पंचकूला को भी उन्हें विभिन्न सैक्टरों की रैजिडेंट वैल्फेयर एसोसिएशनों के पदाधिकारियों से व्यक्तिगत स्तर पर सम्पर्क बनाए रखने के निर्देश दिए ताकि बाहर से आने वाले व्यक्तियों पर पूर्ण नजर रखी जा  सके।

 उपायुक्त ने जिला वासियों से भी विशेष तौर पर अपील करते हुए कहा कि वे सुरक्षा की दृष्टि के तहत जिला में कानून व्यवस्था बनाए रखने में अपना पूर्ण सहयोग दें। उन्होंने कहा कि यदि कहीं पर असामाजिक तत्वों की कोई संदिग्ध गतिविधियां संज्ञान में आएं तो उनकी सूचना तुरन्त जिला प्रशासन एवं पुलिस नियंत्रण कक्ष के दूरभाष न. 0172-2582100 पर दें। इसके साथ साथ मोबाईल नम्बर 8146630014 से निरंतर अंतिम दो डिजिट 15, 16, 17, व 8146630021 पर भी सूचना दे सकते है।

 उपायुक्त ने स्पष्ट शब्दों में निर्देश देते हुए कहा कि यदि कोई भी व्यक्ति कानून एवं शांति को भंग करने का प्रयास करेगा तो उनके साथ सख्ती से निपटा जाएगा। उन्होंने विशेषकर नाम चर्चा घर, रेलवे स्टेशन, बस स्टैण्ड व अन्य सार्वजनिक स्थानों आदि पर भी अधिकारियों को विशेष  निगरानी रखने के निर्देश दिए। उन्होंने बताया कि जिला में 4 कम्पनियां बाहर से बुलाकर तैनात कर दी गई है। इसके अलावा 3 उप पुलिस अधीक्षक की भी तैनाती की गई जो निरंतर चैकिंग एवं निगरानी कर रहे है। उन्होंने अधिकारियों को क्रेन एवं एम्बुलेंस, जेसीबी जैसी सभी आवश्यक मशीनरी के बारे में भी संबधित अधिकारियों से विस्तार से चर्चा की ताकि जरूरत पडने पर उन्हें प्रयोग में लाया जा सके। उन्होंने सभी अधिकारी एवं कर्मचारियों को भी इस दौरान अवकाश पर ना जाने के निर्देश जारी किए।

 बैठक में अतिरिक्त उपायुक्त जगदीप ढांडा, एसडीएम पंकज सेतिया, एसडीएम कालका रिचा राठी, जिला विकास एवं  पंचायत अधिकारी उत्तम ढालिया, जिला राजस्व अधिकारी धीरज चहल, इंसपैक्टर सिक्योरिटी महमूद खान सहित संबधित खण्ड विकास एवं पंचायत अधिकारियों सहित अन्य अधिकारी भी उपस्थित रहे। 

मध्यप्रदेश में भाजपा कांग्रेस के विधायकों की खरीद फरोख्त कर रही है: कांग्रेस

कांग्रेस ने मध्यप्रदेश में बीजेपी पर विधायकों की खरीद-फरोख्त के जरिए पाला बदलवाने की कोशिशें करने का आरोप लगाया है. जबकि, बीजेपी ने कांग्रेस के आरोप का खंडन किया है.

बीजेपी द्वारा कथित खरीद-फरोख्त करने के प्रयासों की खबरों के सवाल पर प्रदेश के युवा कल्याण और खेल मंत्री जीतू पटवारी ने पीटीआई-भाषा से कहा, ‘बीजेपी वालों का तो काम है विध्वंसकारी काम करने का, लेकिन पास नहीं होगें…उन्होंने (बीजेपी) कई विधायकों से संपर्क किया है. देर शाम को हमारी (विधायकों की) बैठक है, इसके बाद हम अगला निर्णय लेंगे.’

बीजेपी पर विधायकों को ‘प्रलोभन’ देने के आरोप पर पटवारी ने कहा कि जैसा सामने आ गया, वैसा प्रलोभन देते रहते हैं. उनका काम है वही. वे विध्वंसकारी राजनीति के आदी हैं.

इससे पहले, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने भी नई दिल्ली में एक समाचार चैनल से बातचीत में मध्यप्रदेश में बीजेपी पर खरीद फरोख्त की कोशिशें करने का आरोप लगाया.

हालांकि, बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने ऐसे आरोपों का खंडन करते हुए कहा, ‘यदि हमें सरकार बनाना होता तो हम विधानसभा चुनाव के नतीजों के दिन ही ऐसा करते.’ उन्होंने कहा कि दिग्विजय सिंह के बयान को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए.

प्रदेश में 15 साल के बीजेपी शासन के बाद मुख्यमंत्री कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी है. विधानसभा का पहला सत्र सोमवार से शुरु होने जा रहा है.

हालिया विधानसभा चुनावों में कांग्रेस कुल 230 सीटों में 114 सीटें हासिल कर प्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर सामने आई और कांग्रेस ने बीएसपी के दो, एसपी के एक और चार निर्दलीय विधायकों के समर्थन का दावा करते हुए प्रदेश में 15 साल बाद प्रदेश में सरकार बनाई है. विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 109 सीटें मिली.

प्रदेश की 15 वीं विधानसभा का पहला सत्र सोमवार को शुरु होकर मात्र पांच दिन चलेगा. इस दौरान विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव के रुप में कांग्रेस के लिए सदन में पहला शक्ति परीक्षण इसी सत्र में सामने आएगा.

बीजेपी के विधायक और प्रदेश के पूर्व मंत्री संजय पाठक ने भी बीजेपी पर खरीद फरोख्त के आरोप का खंडन करने हुए कहा कि अगर यह सब करना होता तो शिवराज सिंह इस्तीफा ही नहीं देते.

मध्यप्रदेश विधानसभा के सचिव ने बताया कि सोमवार से शुरु हो रहे सत्र में सात और आठ जनवरी को विधायकों को शपथ दिलाई जाएगी. विधानसभा अध्यक्ष का चुनाव आठ जनवरी को होगा तथा प्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल इसी दिन सदन को सम्बोधित करेंगी.

कांग्रेस ने विधानसभा अध्यक्ष पद के लिए गोटेगांव से विधायक नर्मदा प्रसाद प्रजापति को अपना उम्मीदवार घोषित किया है जबकि बीजेपी ने अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए अपनी रणनीति का खुलासा नहीं किया है.

इस बीच, बीजेपी के प्रवक्ता ने बताया कि बीजेपी विधायकों की बैठक सोमवार शाम को होगी. इस बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह और पार्टी के रार्ष्टीय उपाध्यक्ष तथा मध्यप्रदेश मामलों के प्रभारी विनय सहत्रबुद्धे भी शामिल होंगे.

Are you a Victim of NPD

Sarika Tiwari

Rashi is a manager with a HR company. Having superiority complex and considers her to above the rules sometimes.Her coworkers who once admired and respected her have come to realize that she isn’t the person they believed her to be. The drastic change in her personality has left many of them wondering, “What happened to the old Rashi?” Where’s the charming, fun loving, charismatic, and intelligent person they first met? She has been replaced with an egotistical, controlling, uncompassionate, and haughty person.

Rashi didn’t realize that she had a mental disorder until she experienced severe depression. While attending talk therapy, her psychiatrist diagnosed her with narcissistic personality disorder (NPD).

What’s NPD?

narcissistic personality disorder (NPD)

More prevalent in men and affecting up to 6.2% of the population, NPD is a personality disorder in which an individual literally believes the world revolves around them. A person with NPD has an inflated sense of their own importance, demonstrates a lack of ability to empathize with others, and a strong desire to keep the focus solely on themself at all times. They appear to be extremely confident in front of others, but in reality possess very low self-esteem.

A person with NPD comes across as conceited, boastful, and pretentious. This person usually monopolizes most conversations and acts in a condescending manner toward others who they perceive to be inferior. They can’t handle or accept any type of criticism. If they’re criticized, they retaliate by acting out with rage or contempt. This person is obsessed with having “the best” of all things, such as clothes, cars, houses, office space, and medical care. They’re very easily hurt and refuse to take responsibility for their flaws or failures.

The person with NPD wants others to believe that they possess natural leadership qualities that far exceed anyone else’s and they’re needed for others’ success. Due to an overwhelming sense of insecurity, the person is often threatened by others’ achievements. When in conversation, this person constantly interrupts, interjecting their own opinions and refusing to listen to or accept anyone else’s.

NPD causes the affected person to behave in socially distressing ways; therefore, they find it difficult to maintain long-lasting relationships with others. Relationships are often short-lived and rocky; the person with NPD doesn’t desire friendship or derive enjoyment from being with other people who may perceive them as aloof, odd, or strange. This makes it difficult for people to form positive relationships with an individual with NPD. Because they may have never experienced positive interaction with others, the person with NPD lacks important social skills that are needed to form comfortable, normal relationships with others. For this reason, attempting to form friendships becomes uncomfortable and awkward, resulting in isolation. Any time they feel the least bit ignored by a friend or coworker, they’ll sever ties with that person and cut him or her out of their life entirely.

Although the exact cause of NPD is unknown, many psychologists believe that it’s caused by a combination of genetic and social factors. Most research points to how children are raised affecting their chances of developing NPD. For example, if parents shower their child with endless praise and ego inflating, the child will have an increased risk of developing NPD. Interestingly enough, the opposite can also be true. Children who are abused or disregarded may develop NPD because they feel that no one else cares and they must look out for themselves.

NPD may also be linked to genetics or psychobiology. This involves the connection between the brain and behavior/thinking. Biologically, individuals with NPD are believed to have a smaller right supramarginal gyrus—the area of the brain responsible for empathy. Psychologically, they lack the ability to exhibit a self-image other than one of exaggerated positive qualities (idealization) and are unable to cope with negative qualities in themselves (devaluation). Individuals with NPD are often excessively emotionally sensitive.

insists on special favors and unquestioning compliance with their expectations

thinks about themself most of the time and talks about themself excessively

insists on being provided with constant attention

sense of entitlement

achievements and talents are exaggerated

lets others believe they’re special

lets their feelings of jealously toward others consume them and believes others envy them

arrogant personality

being preoccupied with fantasies about success, power, brilliance, or beauty

other people’s feelings and needs are ignored and go unrecognized

unrealistic goals

takes advantage of others to get what they want

manner is haughty in nature

exaggerated sense of self-importance.

In addition, the mnemonic RED FLAGS can be used to identify the warning signs of NPD:

relaxing around them is impossible

exaggerates personal achievements while minimizing others’

frequently complains that whatever others do, it isn’t “good enough”

lies and excuses abound

always assumes they’re more knowledgeable than others

goes into a rage or sulks when they don’t get their way

sees themselves as “perfect” and wants others to see them that way, too.

If you recognize these red flags, you may be in contact with someone with NPD. Working or living with a person with NPD can leave you feeling exhausted and drained, especially when you try to explain your feelings or points of view to them and they tell you to “shut up” or walk away and refuse to listen to you. You may even be shocked when you try to challenge their points of view, lies, or distortions and they respond with vitriolic theatrics and threats. Those who regularly interact with a person with NPD will exhaust themselves looking for a reason behind it all, when in reality the fault isn’t theirs.

Most individuals with NPD remain undiagnosed because they don’t feel that anything is “wrong” with them; therefore, they rarely seek psychiatric help. Often, the person with NPD seeks treatment for a coexisting psychiatric disorder such as depression.

The diagnosis of NPD is often made by performing a thorough psychological exam, evaluating the signs and symptoms, and performing a physical exam to ensure that the issue isn’t stemming from a physical cause such as traumatic brain injury. The psychological exam focuses on standardized questions pertaining to childhood, relationships, and goals to identify long-term patterns of thinking, feelings, and other behaviors demonstrating how the person with NPD interacts with other people.

Psychiatrists will utilize the Diagnostic and Statistical Manual of Mental Disorders (DSM) to help construct the diagnosis. According to the DSM-V, a diagnosis of NPD is determined by the presence of the following criteria:

Impairments in self-functioning (must include one or both):

—excessive reference to others for self-definition and self-esteem regulation; exaggerated self-appraisal may be inflated or deflated, or waver between extremes; emotional control mirrors fluctuations in self-esteem

—goal-setting is centered on gaining approval from others; personal standards are unreasonably high in order to see oneself as exceptional, or too low based on a sense of entitlement; often unaware of own motivations.

Impairments in interpersonal functioning (must include one or both):

—impaired ability to recognize or identify with the feelings and needs of others; excessively attuned to reactions of others, but only if perceived as relevant to self; over- or underestimate of own effect on others

—relationships mainly superficial and exist to serve self-esteem regulation; mutuality constrained by little genuine interest in others’ experiences and predominance of a need for personal gain.

Pathologic personality traits:

—grandiosity

—attention seeking.

In addition to the DSM-V, many professionals use the Narcissistic Personality Inventory to help diagnosis NPD. This 40-question test measures traits that may be indicative of NPD, such as how much attention and power someone craves. Statements include, “I like to be the center of attention,” “If I ruled the world, it would be a better place,” and “I will never be satisfied until I get all that I deserve.” The patient responds to these statements and the results are tallied. A score of above 20 is suggestive of NPD.

Tricky treatment

Treatment for NPD is centered on psychotherapy, also known as talk therapy. Psychotherapy helps the patient understand the cause of the disorder and focuses on learning how to establish healthy, meaningful relationships with others. It’s important to note that personality traits are extremely difficult to change; therefore, therapy may take several years.

Psychotherapy seeks to help the person with NPD in several ways, including:

understanding the causes of their emotions and what it is that drives them to compete in such a ruthless way

understanding why they distrust others so vehemently

accepting responsibility for their actions and learning to release their desire for unattainable goals and accept what’s attainable

recognizing and accepting their actual competency and potential so that they can tolerate criticisms and failures

maintaining real personal relationships, friendships, and collaboration with coworkers.

There are no medications specifically for the treatment of NPD. However, individuals with NPD often benefit from the use of psychiatric medications to help alleviate depression, anxiety, mood lability, and poor impulse control. Medications that may be prescribed include antidepressants (citalopram), antipsychotics (risperidone), and mood stabilizers (lamotrigine).

The person with NPD typically only seeks treatment when they become completely desperate. If there’s an event (a trigger) that threatens their status, such as a major defeat or rejection, they may be motivated to seek therapy. However, after they start feeling better or the threat is gone, they may forego therapy and resume their behaviour.

What can you do?

As a nurse, you’ll most likely come into contact with patients with NPD. These are often difficult patients who aren’t likely to be socially cooperative. You must use your therapeutic communication and self-awareness skills when interacting with patients with NPD. Understanding that the patient truly doesn’t see themself at fault may help you sympathize with their behavior.

Set goals for yourself to help you care for the patient. These goals should include:

  • developing a relationship with the patient based on empathy and trust while also maintaining appropriate boundaries
  • ensuring care responsibilities are appropriately addressed
  • encouraging effective and functional coping and problem-solving skills in a way that’s empowering to the patient
  • promoting the patient’s development of and engagement with their support network
  • ensuring collaboration and communication with other members of the interprofessional team for consistency in treatment and approach
  • supporting and promoting self-care activities for the patient’s family and caregivers.increase the ability to understand and regulate their feelings
  • learn to relate better to others
  • omit feelings of superiority and arrogance
  • vacate feelings of distrust and envy
  • elevate the ability to establish long-lasting relationships
  • understand the causes of the disorder and its impact on their self-esteem.

If the patient is unable to attain these goals or doesn’t adhere to the treatment plan, focus on the rewards of treatment. Teach the patient relaxation and stress management techniques, such as meditation. It’s important to keep an open mind and not give up.

Much needed help

Because the cause of NPD is unknown, there’s no proven way to prevent this condition. Unfortunately, individuals with NPD have a higher rate of substance abuse (alcohol/drugs), depression, and difficulty dealing with people in all life aspects. They may also express suicidal thoughts or behaviors at some point during their lifetime. Because the person with NPD believes “I’m okay and everybody else isn’t okay,” seeking treatment is rare. Some wait until things are so bad they need to be hospitalized. Although there’s no cure for NPD, psychotherapy can help. However, the patient must be willing to seek treatment and learn how to relate to others in a more positive way. This depends largely on their acceptance of constructive criticism and how much they’re willing to change.

Insists on special favors and unquestioning compliance with their expectations

Thinks about themself most of the time and talks about themself excessively

Insists on being provided with constant attention

Sense of entitlement

Achievements and talents are exaggerated

Lets others believe they’re special

Lets their feelings of jealously toward others consume them and believes others envy them

Arrogant personality

Being preoccupied with fantasies about success, power, brilliance, or beauty

Other people’s feelings and needs are ignored and go unrecognized

Unrealistic goals

Takes advantage of others to get what they want

Manner is haughty in nature

Exaggerated sense of self-importance

Relaxing around them is impossible

Exaggerates personal achievements while minimizing others’

Frequently complains that whatever others do, it isn’t “good enough”

Lies and excuses abound

Always assumes they’re more knowledgeable than others

Goes into a rage or sulks when they don’t get their way

Sees themself as “perfect” and wants others to see them that way, too

NPD derives its name from a Greek myth in which a handsome young man named Narcissus sees his own reflection in a pool of water and falls in love with it.

To remember the goals of treatment, think I LOVE U.

Increase the ability to understand and regulate their feelings

Learn to relate better to others

Omit feelings of superiority and arrogance

Vacate feelings of distrust and envy

Elevate the ability to establish long-lasting relationships

Understand the causes of the disorder and its impact on their self-esteem

70 सालों से लंबित मामला अब 10 जनवरी तक लंबित

सर्वोच्च न्यायालय ने मानी कपिल सिब्बल की अपील यह मामला कैसी भी तरह 2019 के चुनावों के नतीजों तक ताला जाएगा सबरीमाला 6 महीने और अर्बन नक्सलईट 2 महीने पर राम जन्मभूमि 70 साल बाद फिर से तारीख

नई दिल्‍ली: उच्चतम न्यायालय राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद में दायर अपीलों पर शुक्रवार को सुनवाई करेगा. यह मामला प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध है. इस पीठ द्वारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सितंबर, 2010 के फैसले के खिलाफ दायर 14 अपीलों पर सुनवाई के लिये तीन सदस्यीय न्यायाधीशों की पीठ गठित किये जाने की उम्मीद है.

1. हाई कोर्ट ने इस विवाद में दायर चार दीवानी वाद पर अपने फैसले में 2.77 एकड़ भूमि का सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला के बीच समान रूप से बंटवारा करने का आदेश दिया था.

2. शीर्ष अदालत ने पिछले साल 29 अक्टूबर को कहा था कि यह मामला जनवरी के प्रथम सप्ताह में उचित पीठ के समक्ष सूचीबद्ध होगा जो इसकी सुनवाई का कार्यक्रम निर्धारित करेगी.

3. बाद में अखिल भारत हिन्दू महासभा ने एक अर्जी दायर कर सुनवाई की तारीख पहले करने का अनुरोध किया था परंतु न्यायालय ने ऐसा करने से इंकार कर दिया था. न्यायालय ने कहा था कि 29 अक्टूबर को ही इस मामले की सुनवाई के बारे में आदेश पारित किया जा चुका है. हिन्दू महासभा इस मामले में मूल वादकारियों में से एक एम सिद्दीक के वारिसों द्वारा दायर अपील में एक प्रतिवादी है.

4. इससे पहले, 27 सितंबर, 2018 को तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने 2:1 के बहुमत से 1994 के एक फैसले में की गई टिप्पणी पांच न्यायाधीशों की पीठ के पास नये सिरे से विचार के लिये भेजने से इंकार कर दिया था. इस फैसले में टिप्पणी की गई थी कि मस्जिद इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है.

5. अयोध्या प्रकरण की सुनवाई के दौरान एक अपीलकर्ता के वकील ने 1994 के फैसले में की गयी इस टिप्पणी के मुद्दे को उठाया था. अनेक हिंदू संगठन विवादित स्थल पर राम मंदिर का यथाशीघ्र निर्माण करने के लिये अध्यादेश लाने की मांग कर रहे हैं. इस बीच, शीर्ष अदालत में शुक्रवार को होने वाली सुनवाई महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंगलवार को ही कहा था कि अयोध्या में राम मंदिर के मामले में न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही अध्यादेश लाने के बारे में निर्णय का सवाल उठेगा.

इससे पहले केन्द्रीय विधि एवं न्याय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने राम मंदिर केस की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट की मांग की है. उनका कहना है कि जब सबरीमाला मामले की सुनवाई 6 महीने में और अर्बन नक्सल का केस दो महीने में पूरा हो सकता है तो रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद केस 70 साल से क्यों अटका पड़ा है. उन्होंने इस मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट की तरह करने की अपील की.  विधि एवं न्याय मंत्री ने पिछले दिनों अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के 15वें राष्ट्रीय अधिवेशन के उद्घाटन अवसर पर कहा कि राम लला मामले में कोर्ट में सुनवाई क्यों नहीं हो रही इसका मेरे पास कोई उत्तर नहीं है. उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर सुप्रीम कोर्ट से अपील की कि इस मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट की तरह हो ताकि जल्द से जल्द इसपर फैसला आ सके.

Rahul calls media conferences ‘fun’ Media still ‘pliable’


According to Jaitley, Rahul “wants to rely on a tape that is false and fabricated. Let him authenticate it, place it on the table of the House and open himself for an action of priviledge.”


At the press conference, however, Rahul claimed the Speaker disallowed him from playing it, therefore the question of “authentication doesn’t arise”.


For all the access that media enjoys vis-à-vis Rahul, it has shown a strange reluctance so far to fact-check the Congress president’s claims and hold him accountable for his words. This trend was visible even on Wednesday when Rahul appeared for a news conference in the evening and repeated the same set of claims that had been rebutted by Union Finance Minister Arun Jaitley earlier that day in Parliament.

Congress president Rahul Gandhi never fails to mention how he, unlike Prime Minister Narendra Modi, is not “scared” of taking questions from the media in press conferences. Rahul has a point here. While Modi has appeared for media interviews but not a single press conference during his tenure as prime minister, Rahul ostensibly loves news conferences and claims that fielding questions from the media is “fun”: understandable when one is largely spared scrutiny and tough questions.

What’s more, Rahul’s comments to the media on the controversial audio tape — which the Congress party claims is the “recorded conversation” of Goa health minister Vishwajit Rane “revealing” details of “secret Rafale files stored in Goa chief minister Manohar Parrikar’s bedroom” — appeared inconsistent with facts and the turn of events that played out on the floor of the House.

The Congress president has asked four questions to Modi on the Rafale deal through Twitter. Here are five questions the media should have asked or Rahul during the press conference:

1. Why didn’t Rahul take up Arun Jaitley’s challenge on the audiotape if he is convinced that the clip is authentic?

During the press conference, Rahul said he had read “part of the transcript and the tape is authentic.” The Congress president had refused to certify the veracity of the tape in Parliament when his attempts to play it in Lok Sabha met with resistance from the treasury benches. Speaker Sumitra Mahajan urged Rahul to give it in writing that the clip is “authentic” before allowing it to be played inside Parliament in accordance with House rules. Faced with the challenge, Rahul backtracked. He also didn’t read the transcript after insisting on doing so. At the press conference, however, Rahul claimed the Speaker disallowed him from playing it, therefore the question of “authentication doesn’t arise”.

Rahul Gandhi: I asked the Lok Sabha Speaker can I play the tape, Speaker refused to allow me to play it, so there was no question of authenticity of the tape there. Congress has already played it. Also, there might be other tapes as well #RafaleDealpic.twitter.com/b91QeTgpZ0

— ANI (@ANI) January 2, 2019

According to Jaitley, Rahul “wants to rely on a tape that is false and fabricated. Let him authenticate it, place it on the table of the House and open himself for an action of priviledge.”

Jaitley said Rahul must take responsibility and face expulsion from the House under a privilege motion if the tape is found to be false. The finance minister dared the Congress president to place the document in Parliament if he is sure of its authenticity. Neither did Rahul take up Jaitley’s challenge, nor did he backtrack from his claim. Though the entire sequence was captured on camera and aired to millions on TV, the media didn’t pursue this line of questioning.

2. Where did Rahul get the figure of Rs 30,000 crore worth of offsets to Anil Ambani’s company?

Rahul Gandhi: Reality yahi hai ki 30,000 crore Anil Ambani ko diya gaya hai, aur Chowkidaar chor hai #RafaleDealpic.twitter.com/NqUCnnqzHN

— ANI (@ANI) January 2, 2019

The facts of Rafale have been discussed threadbare over countless forums. A Supreme Court bench, headed by Chief Justice Ranjan Gogoi dismissed PILs seeking a court-monitored probe, saying it has no objections to any part of the deal. On the offset clauses, the judgment stated: “We do not find any substantial material on record to show that this is a case of commercial favouritism to any party by the Indian Government.”

The offset clause — as laid out during the UPA rule on defence purchases from foreign companies — requires Dassault to make purchases in India for 50 percent of the contract value. Therefore, if the total value of the deal is worth Rs 58,000 crore, half of that amount comes to around Rs 29,000 crore.

Now, since Anil Ambani’s Reliance Defence is one among around 120 offset partners for the deal, their total business share won’t exceed 3 percent of the total Rs 29,000 crore Rafale offset contract. That means a sum less than Rs 1,000 crore. Jaitley told Parliament on Wednesday that it won’t be more than Rs 800 crore. Apart from the Supreme Court, which went over these details, media reports too have corroborated the government’s figures.

#Rafale offsets break-up for dummies: ⁦@RahulGandhi⁩. Note the figures. Memorise them. Write them down in a notebook 200 times. Will help. Infographic via ⁦@SandeepUnnithan⁩ ⁦@IndiaToday⁩ pic.twitter.com/i1WpnY8m7W

— Minhaz Merchant (@MinhazMerchant) January 2, 2019

If that is the case, how does Rahul justify his charge? It is strange that given the easy availability of these figures in public domain, the media didn’t hold the Congress president accountable for his words.

3. What is the basis of Rahul’s contention that the PM is a ‘thief’ when Supreme Court has given a clean chit to Rafale deal?

On three contentious issues raised by the Congress and made into subject of the petitions against the government, the Supreme Court cleared the deal. The CJI-headed Bench, also comprising justices SK Kaul and KM Joseph, found no occasion to doubt the decision-making process in the multi-billion dollar deal, observed that there was no substantial evidence of commercial favouritism to any private entity on the issue of offset partner and found no merit in claims that there was huge escalation of costs.

In conclusion, the judgment stated: “In view of our findings on all the three aspects, and having heard the matter in detail, we find no reason for any intervention by this court on the sensitive issue of purchase of 36 defence aircrafts by the Indian government. Perception of individuals cannot be the basis of a fishing and roving enquiry by this court, especially in such matters. We, thus, dismiss all the writ petitions, leaving it to the parties to bear their own costs.”

Given the finality of this judgment, it is unclear on what basis the Congress president is accusing the prime minister of dishonesty and stealing. If he has clinching proof of Modi’s wrongdoing, it is strange that this evidence (or evidences) have not been brought to the notice of the court or made available in public domain. Once again, the media has failed to highlight the anomaly between Rahul’s claims and facts.

4. How may a Joint Parliamentary Committee ‘reveal truth’ when Supreme Court judgment finds no reason for intervention or probe?

After shifting goalposts several times on Rafale deal, Congress and Opposition parties have finally settled on demanding for a Joint Parliamentary Committee (JPC) probe. The political ploy behind Congress’ demand is understandable and the party cannot be faulted for trying to pile on the pressure on the NDA. The legitimate question that should have been asked of Rahul Gandhi during the press conference, is that how will a JPC —  subject to political partisanship — conduct a “fair probe” into a deal that has been cleared by none less than the Supreme Court?

Even if we disregard Jaitley’s arguments — that JPC in Bofors sought to whitewash the scandal instead of finding the truth — the fact remains that the panel whose political neutrality is suspect may end up fanning the Rafale debate instead of bringing us any closer to resolution. Political gamesmanship is a poor basis for constitution of a JPC that will undermine the primacy and authority of the Supreme Court. It may be a slippery slope.

5. Why did Rahul Gandhi call a scribe a ‘pliable journalist’ during a press conference? Does it amount to intimidation of the press?

During Wednesday’s news conference, while referring to ANI editor Smita Prakash — who conducted the prime minister’s interview on Tuesday — Rahul used the words ‘pliable journalist’. He said: “You saw the prime minister’s interview yesterday… matlab pliable journalist, woh question bhi kar rahi thi, pradhan mantri ka answer bi de rahi thi, side mein(she was asking questions as well as providing answers on the side).” Earlier in the Parliament, Rahul called the interview “staged”.

The journalist called Rahul’s attempt to ridicule her work a “cheap shot”.

Dear Mr Rahul Gandhi, cheap shot at your press conference to attack me. I was asking questions not answering. You want to attack Mr Modi, go ahead but downright absurd to ridicule me. Not expected of a president of the oldest political party in the country.

Smita Prakash (@smitaprakash) January 2, 2019

Jaitley has criticised the Congress president for trying to “intimidate an independent editor” and called him the grandson of ‘Emergency dictator’ (a reference to Indira Gandhi) who “displayed his real DNA”. He also called for a response from the Editor’s Guild. The real problem, however, goes deeper. When political leaders, especially those occupying high positions in public office or party, openly display their disrespect for journalists, that has a deleterious effect on the moral of the media.

It also makes journalists vulnerable to attacks from party affiliates and trolls on social media. Rahul may have his opinions on the Modi interview, but his disparaging comments can be construed as an attack on the independence of the Fourth Estate. He, however, didn’t face any scrutiny from the media while making the comment.

राम मंदिर की याचिका पर सुनवाई आज

याचिका में अयोध्या मामले की सुनवाई एक तय समय में किए जाने की मांग की है और अगर तय समय में सुनवाई नहीं होती है तो कोर्ट अपने आदेश में कारण बताए कि एक तय समय में सुनवाई आख़िरकार क्यों नहीं हो सकती. आपको बता दें कि पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई जनवरी माह तक टाल दी थी.

नई दिल्ली : अयोध्या मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को अहम सुनवाई करेगा. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस संजय किशन कौल की पीठ सुबह 11 बजे के आसपास मामले की सुनवाई करेगी. माना जा रहा है कि आज होने वाली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट नई पीठ का गठन कर सकता है. साथ ही जल्द और रोजाना सुनवाई की मांग वाली अर्जी पर भी सुनवाई हो सकती है. इसके अलावा कोर्ट एक नई जनहित याचिका पर भी सुनवाई करेगा. यह जनहित याचिका हरीनाथ राम ने दायर की है.

याचिका में अयोध्या मामले की सुनवाई एक तय समय में किए जाने की मांग की है और अगर तय समय में सुनवाई नहीं होती है तो कोर्ट अपने आदेश में कारण बताए कि एक तय समय में सुनवाई आख़िरकार क्यों नहीं हो सकती. आपको बता दें कि पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई जनवरी माह तक टाल दी थी.

इससे पहले तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के साथ जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस अब्दुल नज़ीर मामले को सुन रहे थे. सुप्रीम कोर्ट से मुस्लिम पक्षों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा था. कोर्ट ने 1994 के इस्माइल फारुकी के फैसले में पुनर्विचार के लिए मामले को संविधान पीठभेजने से इंकार कर दिया था. मुस्लिम पक्षों ने नमाज के लिए मस्जिद को इस्लाम का जरूरी हिस्सा न बताने वाले इस्माइल फारुकी के फैसले पर पुनर्विचार की मांग की थी.

गौरतलब है कि राम मंदिर के लिए होने वाले आंदोलन के दौरान 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिरा दिया गया था. इस मामले में आपराधिक केस के साथ-साथ दीवानी मुकदमा भी चला था. टाइटल विवाद से संबंधित मामला सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है.

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 30 सितंबर 2010 को अयोध्या टाइटल विवाद में फैसला दिया था. फैसले में कहा गया था कि विवादित लैंड को 3 बराबर हिस्सों में बांटा जाए. जिस जगह रामलला की मूर्ति है, उसे रामलला विराजमान को दिया जाए. सीता रसोई और राम चबूतरा निर्मोही अखाड़े को दिया जाए, जबकि बाकी का एक तिहाई लैंड सुन्नी वक्फ बोर्ड को दी जाए. इसके बाद ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था.

अयोध्या की विवादित जमीन पर रामलला विराजमान और हिंदू महासभा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. वहीं, दूसरी तरफ सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने भी सुप्रीम कोर्ट में हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ अर्जी दाखिल कर दी थी. इसके बाद इस मामले में कई और पक्षकारों ने याचिकाएं लगाई थी. सुप्रीम कोर्ट ने 9 मई 2011 को इस मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाते हुए मामले की सुनवाई करने की बात कही थी. कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने के आदेश दिए थे. उसके बाद से ही यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.

कुछ भी खोकर गठबंधन नहीं होगा: अमित शाह

बीजेपी शायद ऐसा कोई दोस्त नहीं चाहती जो चुनावों में साथ रहते हुए माहौल बिगाड़ दे..
तीन राज्यों में मिली हार के बाद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने लोकसभा चुनाव को लेकर मीटिंग लेने का सिलसिला शुरू कर दिया है. दिल्ली के महाराष्ट्र सदन में हुई मीटिंग में उनके अलावा केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, रेल मंत्री पीयूष गोयल, केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर, गृहराज्यमंत्री हंसराज अहीर, रक्षा राज्यमंत्री डॉ. सुभाष भामरे मौजूद थे.

रामराजे शिंदे, नई दिल्ली : बीजेपी ने आने वाले लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए महाराष्ट्र के सांसदों की मीटिंग दिल्ली में बुलाई थी. इस मीटिंग में शिवसेना के साथ गठबंधन होगा या नहीं इस सवाल पर अमित शाह ने अपनी भूमिका स्पष्ट कर दी है. उन्होंने साफ कहा, कुछ भी खोकर गठबंधन नहीं होगा. यह बात अमित शाह ने महाराष्ट्र के सांसदों के सामने रख दी है.

दरअसल तीन राज्यों में हारने के बाद बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने लोकसभा चुनाव को लेकर मीटिंग लेने का सिलसिला शुरू कर दिया है. दिल्ली के नए महाराष्ट्र सदन में हुई मीटिंग में उनके अलावा केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, रेल मंत्री पीयूष गोयल, कॉमर्स मिनिस्टर प्रकाश जावडेकर, गृह राज्यमंत्री हंसराज अहिर, रक्षा राज्यमंत्री डॉ. सुभाष भामरे मौजूद थे.

हमारे सूत्र ने बताया कि इस मीटिंग में महाराष्ट्र के अहमदनगर के सांसद दिलीप गांधी ने शिवसेना के साथ गठबंधन होगा या नहीं यह सवाल पुछा. इस पर अमित शाह की ओर से कहा गया कि आप सभी अपने-अपने चुनाव क्षेत्र में काम करो. विधानसभा में शिवसेना के साथ हमारा गठबंधन टूट गया. तब हमने तैयारी की और सबसे ज्यादा सीटें लेकर सत्ता में आ गए. ऐसी ही तैयारी इस बार करनी है. शिवसेना के साथ चर्चा चल रही है, लेकिन कुछ खोकर गठबंधन नही करेंगे’ यह स्पष्ट कर दिया. इसका मतलब शिवसेना ने ज्यादा सीटें मांगी तो उनके दबाव के झुकेंगे नहीं. खुद के बलबूते चुनाव लड़ने की तैयारी करने के लिए अमित शाह ने सभी सांसदों को संकेत दे दिए हैं.

मंत्रिमंडल में मनमुताबिक जगह न मिलना अखरा था…
दरअसल मौजूदा स्थिति में शिवसेना के पास 18 सांसद हैं. बीजेपी के पास 23 सांसद हैं. रामविलास पासवान के पार्टी के सांसद कम होने के बावजूद अच्छी मिनिस्ट्री दी गई है. शिवसेना के सांसद ज्यादा होने के बावजूद केंद्र सरकार में सिर्फ एक ही मिनिस्ट्री है. यही बात शिवसेना को खल गई है. उसके साथ ही 2014 में विधानसभा चुनाव के वक्त बीजेपी ने गठबंधन तोड़ा, लेकिन ठीकरा शिवसेना के माथे पर फोड़ दिया. तभी से शिवसेना और बीजेपी के रिश्तों में खटास आ गई. लेकिन अब 3 राज्यों के नतीजों के बाद शिवसेना बीजेपी पर हावी होने का प्रयास कर रही है.

इसलिए बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने मीटिंग लेकर सभी सांसदों को प्रोग्राम दिया है. अपने चुनाव क्षेत्र के सभी कार्यकर्ताओं को भोजन पर बुलाकर उनकी समस्या क्या है यह जान लेने का आदेश अमित शाह ने दिया है. इसके लिए 25 जनवरी की डेडलाइन दी है. कार्यकर्ताओं की समस्या सुनकर उसपर काम करने का भी आदेश दिया गया है.

लोकसभा चुनाव को लेकर बीजेपी तैयारी तो कर रही है, लेकिन शिवसेना साथ में नही होने का नुकसान बीजेपी के सांसदों में होगा. इसलिए बीजेपी सांसदों में भी नाराजगी दिखाई दे रही है. अमित शाह के बयान के बाद शिवसेना दो कदम पीछे जाएगी क्या और गठबंधन होगा क्या यह देखना दिलचस्प रहेगा.

कर्जमाफ़ी के बहाने अब केंद्र पर ठीकरा फोड़ने की तैयारी

बीजेपी से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की सत्ता छीन लेने के बाद कांग्रेस अति उत्साह में है. दूसरी तरफ, राजस्थान में हार की समीक्षा के बाद बीजेपी अब नेता प्रतिपक्ष के मुद्दे में उलझी है. लेकिन जीत और हार की लाइन के आरपार दोनों तरफ से बयानों के तीर दे दना दन छोड़े जा रहे हैं. नई सरकार ये दिखाने की कोशिश कर रही है कि पिछली सरकार ने कुछ काम नहीं किया. पिछली सरकार के लोग ये बताने की कोशिश कर रहे हैं कि नए वाले काम छोड़कर सिर्फ ‘चाटुकारिता’ कर रहे हैं.

कांग्रेस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ये आरोप लगाती रही है कि वे 60 साल के कांग्रेस राज और विशेषकर पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के योगदान को जानबूझकर कमतर दिखाने की कोशिश करते हैं. लेकिन राजस्थान में सत्ता में आने के बाद यही खेल कांग्रेस भी करती नजर आ रही है.

गहलोत रो रहे खाली खजाने का रोना

किसान कर्ज़ माफ़ी पर सत्ता में पहुंची कांग्रेस ने शुरुआती 10 दिन में इसका ऐलान तो कर दिया. लेकिन अब इससे बचने के बहाने बनाने भी शुरू कर दिए गए हैं. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने एकबार फिर पूर्व सीएम वसुंधरा राजे पर राजस्थान की राजकोषीय स्थिति को बिगाड़ देने का आरोप लगाया है. गहलोत के मुताबिक 2013 में जब उन्होने सीएम ऑफिस छोड़ा था, तब राज्य पर 1.39 लाख करोड़ का कर्ज़ था. लेकिन 5 साल बाद जब लौटे हैं तो उन्हे ये कर्ज़ 3 लाख करोड़ रुपए का बताया गया है. उन्होने पूछा है कि 66 साल में जितना कर्ज़ नहीं हुआ, उससे ज्यादा 5 साल में ही कैसे हो गया. सितंबर, 2018 में 8 हजार करोड़ की किसान कर्ज़ माफी को भी उन्होने नई सरकार पर डाल देने का आरोप लगाया है.

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गहलोत पिछले 10 दिन में दसियों बार राजस्थान के खाली खजाने का रोना रो चुके हैं. शायद कोशिश हो कि आने वाले लोकसभा चुनाव तक अगर किसानों की कर्ज़ माफ़ी वास्तविक रूप में नहीं हो पाती है तो उनसे सवाल पूछने से पहले ही जनता के दिमाग में ये बात बैठ जाए कि सरकार तो खुद ही तंगहाली से जूझ रही है.

कर्ज माफ़ी की गेंद केंद्र पर डालने की कोशिश

खाली खजाने और सरकार पर भारी कर्ज़ की बार-बार दुहाई के साथ ही एक कोशिश और शुरू कर दी गई है. कोशिश है कि किसानों की कर्ज़ माफ़ी का मुद्दा केंद्र के पाले में डाल दिया जाए. अभी तक कर्ज माफी की सिर्फ घोषणा हुई है. उसका रोडमैप पेश नहीं किया गया है. अभी किसी को भी ये नहीं पता कि 2 लाख रुपए तक का कर्ज़ कैसे माफ होगा, किसका माफ होगा, कब तक माफ होगा और इसकी पूर्ति कहां से की जाएगी.

फिलहाल, सरकार इस मामले का खाका खींचने के लिए एक समिति बनाने की बात कह रही है. अब इस तरह के बयान सामने आ रहे हैं कि किसानों का कर्ज़ राज्य क्यों माफ करें. इसे केंद्र की मोदी सरकार को माफ करना चाहिए. गहलोत ने मीडिया से कहा कि यूपीए सरकार ने 72 हजार करोड़ का कर्ज माफ किया था. उसी तर्ज पर अब केंद्र सरकार को ही राज्यों के किसानों की कर्ज माफी को वहन करना चाहिए.

केंद्र पर दबाव बनाने के लिए अगले हफ्ते कांग्रेस एक किसान रैली का आयोजन भी कर रही है. किसानों को धन्यवाद के नाम पर बुलाई जा रही इस रैली की अध्यक्षता राहुल गांधी करेंगे. राहुल गांधी ने चुनाव जीतने के बाद मीडिया से बात करते हुए कहा भी था कि वे केंद्र सरकार पर पूरे देश के किसानों की कर्ज़ माफ़ी का दबाव बनाएंगे.

कांग्रेस पर काम नहीं चाटुकारिता के आरोप

पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया भी बयानों के तीर छोड़ने में गहलोत से पीछे नहीं हैं. राजे ने सोशल मीडिया पर ट्वीट के जरिए कांग्रेस पर सिर्फ गांधी परिवार की चाटुकारिता में ही बिजी रहने के आरोप लगाए हैं. राजे के मुताबिक उनके विधानसभा इलाके में एक किसान की ठंड से मौत हो गई. मेवाड़ में एक किसान ने सर्दी से फसल खराब हो जाने पर खुदकुशी कर ली. जबकि सैकड़ों किसानों ने खेतों में खड़ी प्याज की फसल पर इसलिए ट्रैक्टर चला दिया क्योंकि मौजूदा भाव पर उसे मंडी में ले जाने की लागत ही नहीं निकल सकती.

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वसुंधरा राजे ने आरोप लगाया है कि सरकार अचानक मिली सत्ता के मद में चूर है और कर्ज़ माफी के ऐलान के बाद किसानों के मुद्दे से आंखें मूंद ली हैं. वैसे, सरकार की मंशा पर अब बुद्धिजीवी लोग भी अंगुली उठाने लगे हैं. कर्ज़माफी के सीधे-सीधे मुद्दे को हल करने के बजाय समिति बनाने जैसे सरकारी कदम उसे उलझाते हुए से लग रहे हैं.

2013 में बीजेपी सरकार ने आते ही बॉर्डर इलाके में रॉबर्ट वाड्रा की खरीदी जमीनों की जांच की बात कही थी. 2013 में इस तरह के बयान भी आए थे कि गहलोत सरकार के आखिरी 6 महीनों के काम की समीक्षा की जाएगी. तब कांग्रेस ने इस पर बड़ा हंगामा किया था. लेकिन अब कांग्रेस सरकार ने बीजेपी के फैसलों की समीक्षा के लिए मंत्री समूह गठित कर दिया है. इस समूह में स्वायत्त शासन मंत्री शांति धारीवाल, ऊर्जा मंत्री बी डी कल्ला और खाद्य-आपूर्ति मंत्री रमेश मीणा शामिल हैं.

समस्या सुलझाने के बजाय बना दिए मंत्री समूह

यूपीए सरकार में दर्जनों मंत्री समूह (GoMs और EGoMs) बने हुए थे. 2014 में मोदी सरकार ने आते ही इन्हे खत्म कर दिया था. तर्क था कि ये काम को सुलझाने के बजाय उसकी गति को धीमा करते हैं. लेकिन पुराने ढर्रे पर चलते हुए गहलोत सरकार ने 3 मंत्री समूह (GoM) बना दिए हैं. कहा गया है कि ये मंत्री समूह कांग्रेस के चुनावी वादों को तेजी से पूरा करने के तरीकों पर सिफारिशें देंगे.

दिक्कत ये है कि एक-एक मंत्री कई-कई समूहों में शामिल है. क्या ये उसपर कार्यभार नहीं बढ़ाएगा. मंत्री के पास अपने विभाग का ही वर्कलोड कम नहीं होता. उस पर उसे एकाधिक मंत्री समूहों में शामिल करना काम के दबाव को कई गुना बढ़ा सकता है. इस तरह वास्तव में अपने पोर्टफोलियो के साथ एक मंत्री कितना न्याय कर पाएगा ?

ऊर्जा मंत्री बी.डी कल्ला, बीजेपी के फैसलों की समीक्षा करने वाले मंत्री समूह के अलावा उस समूह में भी शामिल हैं जिसे संविदाकर्मियों को नियमित करने पर राय देने के लिए बनाया गया है. इस समूह में कुल 5 मंत्री हैं. इसके अलावा, राज्यपाल के अभिभाषण के लिए भी 3 सदस्यीय मंत्री समूह बनाया गया है. इस समूह में शामिल रघु शर्मा दूसरे मंत्री समूह में भी हैं.

ऐसा लग रहा है कि किसानों का मुद्दा सिर्फ चुनाव जीतने के लिए ही बना है. विपक्ष में रहते कांग्रेस बीजेपी पर असंवेदना के आरोप लगाती थी. लेकिन अब सरकार बनने के बाद भी किसान वैसी ही समस्याएं झेल रहे हैं. फर्क बस ये आया है कि अब वही आरोप बीजेपी नेता लगा रहे हैं. गेहूं के किसानों को यूरिया नहीं मिल रहा है, प्याज के किसान फसल उखाड़ रहे हैं. मूंग के किसान हाईवे जाम कर रहे हैं और मूंगफली के किसान मंडियों के बाहर इंतजार में बैठे हैं. कुल मिलाकर सरकार बदलने के बावजूद किसान वैसे ही बेहाल हैं, जैसे पहले थे.

AJL Plot Allotment: CBI court grants bail to Bhupinder Singh Hooda and Motilal Vora


Bhupinder Singh Hooda (File Photo)

PANCHKULA: 

 CBI court on Thursday granted bail to former Haryana Chief Minister Bhupinder Singh Hooda and senior Congress leader Motilal Vora in AJL Land allotment case.

In the last hearing, the special  CBI Judge Jagdeep Singh had issued notice to former CM Haryana Hooda and Vora and had directed them to appear in person on January 3.

On Thursday, both Hooda and Vora had appeared in Panchkula CBI court. The court has now fixed February 6 as next date of hearing

On December 1 last year, the CBI had filed chargesheet against Hooda, Motilal Vora and Associated Journals Ltd (AJL), publisher of the National Herald newspaper, in special CBI court in Panchkula, for allegedly illegal re-allotment of land to AJL, in Panchkula in 2005.

The chargesheet was filed in the court of special CBI Judge Jagdeep Singh under sections 120 B and 420 of IPC and Sections 13 (I) (d) read with 13 (2) of prevention of corruption act.

As per the allegations, an industrial plot at Panchkula was illegally re-allotted to Associated Journal Ltd (AJL), which is reportedly controlled by senior congress leaders including Gandhi family through Young India Ltd. Founded by former prime minister, Jawahar Lal Nehru, AJL runs National Herald newspaper. The allegations are that by abusing his position and against the legal opinion of authorities and advice of Legal Remembrancer for re-advertising the said plot, the plot was re-allotted to AJL by the then CM cum Chairman Haryana Urban Development Authority (HUDA), Bhupinder Singh Hooda in 2005 at original rates plus interest. Allotment of plot caused loss to exchequer and wrongful enrichment to the company.

The CBI then filed an FIR under Sections 409, 420 and 120-B of the Indian Penal Code on the written requests of the Haryana government, the notification of the Union Government and on the complaint of vigilance bureau. The FIR was registered by the CBI on April 6, 2017.