स्त्री : पूजनीय बनाम सम्मानित

कार्येषु दासी, करणेषु मंत्री, भोज्येषु माता, शयनेषु रम्भा ।
धर्मानुकूला क्षमया धरित्री, भार्या च षाड्गुण्यवतीह दुर्लभा ॥

क्यों हम नारी के बारे में बात करते हैं तो हिंदू समाज की सभी देवियों को याद करते हैं ।हम चाहते हैं की खाना बनाने में वो माँ अन्नपूर्णा हो , सुंदरता उर्वशी के जैसी हो ,उसके अंदर प्रेम राधा जैसा हो ,धार्मिक मीरा जैसी हो ,बहु. लक्ष्मी जैसी हो ,पत्नी सीता जैसी हो ,ममता यशोधा जैसी ,धैर्य धरती माँ जैसा हो ,शीतलता गंगा की हो तो बुद्धि और बोली सरस्वती की हो और कभी उसका रौद्र रूप हो तो दुर्गा का हो । क्यों हम उसको एक सामान्य इंसान नहीं रहने देते । बल्कि उसमें देवी को देखना चाहतें हैं । हमने एक आदर्श नारी कि परिभाषा ही इतनी कठिन बनायी है कि शायद ही कोई नारी उस मापदंड में खरी उतर पायी है ।

रमन विज, नयी दिल्ली :

वरदान ? कभी देखो उस स्त्री की आँखों में जो मिट्टी की नहीं सजीव हैं ।गौर से देखो , घबराकर निगाहें मत फेरों कि उस सजीव स्त्री के साथ बलात्कार हुआ है ! देखो उसको भी जिसके साथ भयानक घरेलू हिंसा हुयी है और वहाँ तक भी जाओ जहां कोई मंडप या पंडाल नहीं सरे राह स्त्री का अपमान हो रहा है , उसके अधिकारों पर डाका डाला जा रहा है ।
वह माँ बनी , यह सम्मान का विषय नहीं , यह तो निखालिस प्राकृतिक विधान है ।हाँ अगर माँ न बन पायी तो इस बात को सामाजिक कलंक से जोड़ दिया , यह कोई भी स्त्री बर्दाश्त क्यों करे ? मगर यह समाज इसी मुद्दे पर स्त्री को कलंकित करता रहता है ।यदि उसका पति मर जाता है तो समाज में स्त्री की स्थिति ही बदल जाती है ।उसे फिर देवी की तरह सजने नहीं दिया जाता , लोग उस पर अपने रूप को उजाड़ने की अनिवार्यता लागू कर देते हैं ।

तब ठीक है आप उस स्त्री को ही स्वीकार करोगे जो तुम्हारे नियंत्रण में रहे ।इसलिये ही शक्तिशालिनी, दुर्जन संहारिणी और अष्टभुजा वाली स्त्री की ताक़त को पहचान कर उससे दूर दूर ही रहे ।पहचान नहीं दी , पूजा उपासना के बहाने उसको मिट्टी की मूर्ति बना दिया ।जब न तब पंडाल सजाते रहे ।हाथ जोड़कर मौन व्रती तुम उस मूर्ति से कौन से वरदान माँगते हो ?

देवी है कि स्त्री है , स्त्री है कि देवी ?
इन दिनों को नवरात्रि कहा जाता है ।इन दिनों लोग व्रत रख कर देवी की मूर्ति के सामने मन्दिर में या पंडाल में हाथ जोड़कर खड़े दिखाई देते हैं । ये सब देवी के भक्तों में शुमार हैं , उसी देवी के जो स्त्री के रूप में मूर्तिमान है ।स्त्री रूप की आराधना करने वालों तुम ही तो हो जो अपने घर की स्त्री सताने में कोर कसर नहीं छोड़ते । तुम ही हो जो स्त्री के यौनांगों से जोड़कर साथी पुरुष को गालियाँ देते हो ।तुम्हारी मान्यता के अनुसार मनुष्य जीवन में स्त्री दोयम दर्जे पर है ।परिवार और समाज की मान्यताऐं तुमने बनाई हैं जिन पर स्त्री को आँखें बन्द कर के चलने का नियम जारी है ।गौर से देखा जाये तो चारों ओर से स्त्री की गतिशीलता पर शिकंजा है।

अब सवाल यह है कि आप किस स्त्री रूपा देवी की पूजा अर्चना में उपवास किये खड़े रहते हैं ? यदि देवी माता स्त्री जैसी स्त्री है तो उसका नौ दिन ही पूजा पाठ क्यों हो ,ताजिन्दगी  सम्मान क्यों नहीं ? मालुम हो कि आप किसी देवी देवता के वरदान से पैदा नहीं हुये और न हो सकते थे , यह तो प्राकृतिक चक्र के वैज्ञानिक संयोग का परिणाम है जिसके आधार माता पिता हैं ।स्त्री को देवी बनाकर स्त्री से अलग कर दिया ! आख़िर ऐसा क्यों करना पड़ा ? इसलिये कि स्त्री के लिये अपमान ,हिंसा और उत्पीडन के रास्ते खुले रखने थे जो उसे दासता की ओर लेजा सकें ।
पूछने का मन करता है कि ये क़ायदे इसलिये तो नहीं कि ऐसी नृशंसताऐं ही आपको शासक बनाती हैं ।इसमें सन्देह नहीं कि यह विभाजन पितृसत्ता का सुनहरा जाल है ।