कॉंग्रेस शासित प्रदेश केंद्र के कृषि बिलों को निष्क्रिय करने हेतु अपने बिल लाएँ : सोनिया गांधी

कॉंग्रेस कृषि बिलों को लेकर आर पार की लड़ाई को उतर चुकी है। देश में जहां भी भाजपा की सरकारें हैं वहाँ तो प्रदर्शन हो ही रहे हैं कॉंग्रेस अपनी पार्टी द्वारा शासित प्रदेशों में भी हर प्रकार से धरणे प्रदर्शन कर रही है यह, कवायद उप्चुनावों तक ही रहती है या फिर आगे भी जाएगी यह देखना होगा। दूसरी ओर ऐसा लगता है कि भाजपा ने अपने हाथों ही से किसान बिल ला कर सत्ता की चाबी कॉंग्रेस के हाथ में दे दी। अब उपचुनावों के नतीजे ही भाजपा के आगे की राह तय करेंगे जो कि आसान नहीं जान पड़ती। सनद रहे कि देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने रविवार को कृषि और किसानों से जुड़े बिलों को मंजूरी दे दी है। मगर, विपक्ष अब भी कृषि विधेयकों को वापस लेने की मांग पर डटा हुआ हैं। इस बीच कांग्रेस ने कांगेस शासित प्रदेशों में कृषि संबंधी कानूनों को अप्रभावी बनाने के लिए एक रणनीति पर विचार किया है। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने कांग्रेस शासित राज्यों की सरकारों से कहा है कि वे अपने यहां अनुच्छेद 254(2) के तहत बिल पास करने पर विचार करें जो केंद्र सरकार द्वारा पारित कृषि विधेयकों को निष्क्रिय करता हो।

चंडीगढ़ (ब्यूरो):

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पार्टी शासित राज्यों को इस कानून को निष्प्रभावी बनाने के लिए कानूनी उपाय ढूंढने के लिए कहा है। वहीं केरल से कांग्रेस के एक सांसद ने नये किसान कानून के तमाम प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुये सोमवार को उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की है। कांग्रेस के तमाम बड़े नेता इसे लेकर केंद्र पर निशाना साध रहे हैं।

देश के अलग अलग हिस्सों में कृषि कानूनों के खिलाफ कांग्रेस कार्यकर्ता जहां प्रदर्शन कर रहे हैं वहीं पार्टी के बड़े नेता मुखर हैं। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने इसे किसानों के लिए मौत का फरमान बताया है। वहीं पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने ऐलान किया कि हम केंद्र सरकार के नए कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएंगे। कृषि एक राज्य का विषय है। कृषि बिल हमें बिना पूछे पारित कर दिया गया है। यह पूरी तरह असंवैधानिक है।

उधर, कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने भी मोदी सरकार को आड़े हाथों लिया है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि कृषि कानून को लेकर जब आप अपनी मंत्री को नहीं समझा पाए तो किसानों को क्या समझाएंगे। सचिन पायलट ने सवालिया लहजे में कहा, इस कानून की मांग किसने की थी? या तो किसान कहते कि हमारी ये मांग है तो आप उसकी मांग को पूरा करते। जब आप अकाली दल की कैबिनेट मंत्री को समझा नहीं पाए। आप किसानों को क्या समझा पाएंगे।

‘कृषि कानूनों को निष्प्रभावी बनाने के लिए खोजें उपाय’

एक तरफ जहां विरोध प्रदर्शन जारी है वहीं कानूनी तोड़ ढूंढने की कवायद भी जारी है। सोनिया गांधी ने कांग्रेस शासित प्रदेशों की सरकारों से कहा कि वे केंद्र सरकार के ‘कृषि विरोधी’ कानून को निष्प्रभावी करने के लिए अपने यहां कानून पारित करने की संभावना पर विचार करें। पार्टी के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल की ओर से जारी बयान के अनुसार, सोनिया ने कांग्रेस शासित प्रदेशों को नसीहत दी है कि वे संविधान के अनुच्छेद 254 (ए) के तहत कानून पारित करने के संदर्भ में गौर करें।

यह भी पढ़ें: कृषि विधेयक : सत्तापक्ष की इसे ‘आज़ादी का तोहफा’ तो विपक्ष इसे क्यों ‘मौत का फरमान’ कह रहा है?

वेणुगोपाल ने कहा कि यह अनुच्छेद इन ‘कृषि विरोधी एवं राज्यों के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करने वाले’ केंद्रीय कानूनों को निष्प्रभावी करने के लिए राज्य विधानसभाओं को कानून पारित करने का हक देता है।

वेणुगोपाल ने दावा किया, ‘‘राज्य के इस कदम से कृषि संबंधी तीन कानूनों के अस्वीकार्य एवं किसान विरोधी प्रावधानों को दरकिनार किया जा सकेगा। इन प्रावधानों में न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी को समाप्त करने और कृषि उपज विपणन समितियों (एपीएमसी) को बाधित करने का प्रावधान शामिल है। उन्होंने कहा, ‘‘कांग्रेस शासित प्रदेशों की ओर से कानून पास करने के बाद वहां किसानों को उस घोर अन्याय से मुक्ति मिलेगी जो मोदी सरकार और बीजेपी ने उनके साथ किया है।” गौरतलब है कि वर्तमान में पंजाब, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और पुडुचेरी में कांग्रेस की सरकारें हैं। जबकि महाराष्ट्र और झारखंड में वह गठबंधन सरकार का हिस्सा है।

यह भी पढ़ें: पाकिस्तान का बार्डर खोलने की धमकी दे रहे हैं जाखड़

केरल से कांग्रेस के सांसद ने नये किसान कानून को न्यायालय में दी चुनौती

वहीं केरल से कांग्रेस के सांसद ने नये किसान कानून के तमाम प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुये सोमवार को उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की। त्रिशूर संसदीय क्षेत्र से सांसद टीएन प्रथपन ने याचिका में आरोप लगाया है कि कृषक (सशक् तिकरण व संरक्षण) कीमत आश् वासन और कृषि सेवा पर करार , कानून, 2020, संविधान के अनुच्छेद 14 (समता) 15 (भेदभाव निषेध) और अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन करता है।

याचिका में इस कानून को निरस्त करने का अनुरोध करते हुये कहा गया है कि यह असंवैधानिक, गैरकानूनी और शून्य है। इस कानून को रविवार को ही राष्ट्रपति ने अपनी संस्तुति प्रदान की है। प्रतापन ने अधिवक्ता जेम्स पी थॉमस के माध्यम से दायर याचिका में कहा है कि भारतीय कृषि का स्वरूप टुकड़ों वाला है जिसमें छोटी छोटी जोत वाले किसान है। यही नहीं, भारतीय कृषि की कुछ अपनी अंतर्निहित कमजोरियां हैं जिन पर किसी का वश नहीं है। इन कमजोरियों में भारतीय खेती का मौसम पर निर्भर रहना, उत्पादन को लेकर अनिश्चित्ता और बाजार की अस्थिरता है। इन समस्याओं की वजह से खेती निवेश और उपज के प्रबंधन दोनों ही मामलों में बहुत ही जोखिम भरी है। याचिका में कहा गया है कि भारतीय किसान की खेती मौसम पर निर्भर रहती है और वह अपनी आमदनी बढ़ाने के लिये अपनी उपज के मुद्रीकरण के बारे में नहीं सोच सकता है। इसमें कहा गया है कि इसकी बजाये, कृषि उपज विपणन समिति प्रणाली को सुदृढ़ करने और न्यूनतम समर्थन मूल्य के प्रबंधन को प्रभावी तरीके से लागू किया जाना चाहिए।

बता दें कि हाल ही में संपन्न मानसून सत्र में संसद ने कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्द्धन और सुविधा) विधेयक-2020 और कृषक (सशक्तीकरण एवं संरक्षण) कीमत आश्वासन समझौता और कृषि सेवा पर करार विधेयक-2020 को मंजूरी दी। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने रविवार को इन विधेयकों को स्वीकृति प्रदान कर दी, जिसके बाद ये कानून बन गए।

सरकार का दावा है कि नये कानून में कृषि करारों पर राष्ट्रीय फ्रेमवर्क का प्रावधान किया गया है। इसके माध्यम से कृषि उत् पादों की बिक्री, फार्म सेवाओं, कृषि का कारोबार करने वाली फर्म, प्रोसेसर्स, थोक विक्रेताओं, बड़े खुदरा विक्रेताओं और निर्यातकों के साथ किसानों को जुड़ने के लिए सशक्त करता है। यही नहीं, यह कानून करार करने वाले किसानों को गुणवत्ता वाले बीज की आपूर्ति सुनिश्चित करना, तकनीकी सहायता और फसल स्वास्थ्य की निगरानी, ऋण की सुविधा और फसल बीमा की सुविधा सुनिश्चित करता है।

0 replies

Leave a Reply

Want to join the discussion?
Feel free to contribute!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *