गुरू पूर्णिमा व्यास पूजा पर्व

भारतीय संस्‍कृति में गुरु का बहुत महत्‍व है और आषाढ़ महीने की पूर्णिमा को गुरु के लिए ही समर्पित किया गया है। इस पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरुओं की पूजा-सम्‍मान किया जाता है और उनका आशीर्वाद लिया जाता है। दुनिया में मां के बाद गुरु को ही सबसे ऊंचा स्‍थान दिया गया है। इस बार 23 जुलाई को गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाएगा। महाभारत के रचयिता महर्षि व्‍यास का जन्‍म भी आषाढ़ महीने की पूर्णिमा के दिन ही हुआ था इसलिए इसे व्‍यास पूर्णिमा भी कहते हैं। महर्षि वेद व्‍यास ने ही मानव जाति को वेदों का ज्ञान दिया है और उन्‍हें आदिगुरु माना जाता है। 

धर्म/संस्कृति डेस्क, चंडीगढ़:

हिन्दू धर्म में गुरु पूर्णिमा का विशेष दिन माना जाता है। देश भर में 24 जुलाई 2021 दिन शनिवार को आषाढ़-गुरु पूर्णिमा मनाई जाएगी। इस दिन अगर आप गंगा स्नान के बाद दान पूण्य का कार्य करते हैं तो यह आपके जीवन में शुभ फलदायी माना जाता है। इस तिथि को लेकर ऐसा माना जाता है कि इसी दिन आषाढ़ पूर्णिमा पर ही वेदों के रचयिता महर्षि वेदव्यास जी का जन्म हुआ था। इन के जन्म दिन के उपलक्ष्य पर ही सदियों से गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु पूजन की परंपरा चली आ रही है। इस वजह से इस दिन को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है।

Guru Purnima 2021: हिन्दू धर्म में गुरु पूर्णिमा का विशेष दिन माना जाता है। देश भर में 24 जुलाई 2021 दिन शनिवार को आषाढ़-गुरु पूर्णिमा मनाई जाएगी। इस दिन अगर आप गंगा स्नान के बाद दान पूण्य का कार्य करते हैं तो यह आपके जीवन में शुभ फलदायी माना जाता है। इस तिथि को लेकर ऐसा माना जाता है कि इसी दिन आषाढ़ पूर्णिमा पर ही वेदों के रचयिता महर्षि वेदव्यास जी का जन्म हुआ था। इन के जन्म दिन के उपलक्ष्य पर ही सदियों से गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु पूजन की परंपरा चली आ रही है। इस वजह से इस दिन को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है।

हिन्दू धर्म में कुल पुराणों की संख्या 18 है और इन सभी पुराणों के रचियता महर्षि वेदव्यास को ही माना जाता है। गुरु पूर्णिमा के दिन जो भी व्यक्ति विधि विधान के साथ पूजा-अर्चना करता है तो उसे शुभ फल की प्राप्ति होती है। इस खास दिन प्रीति और आयुष्मान योग में किए गए कार्यों में सफलता हासिल होती है। चलिए जानते हैं 24 जुलाई को गुरु पूर्णिमा का शुभ मुहूर्त और उस दिन पड़ने वाले योग के बारे में.

पूर्णिमा तिथि 23 जुलाई 2021 दिन शुक्रवार की सुबह 10ः43 बजे से प्रारंभ होकर 24 जुलाई 2021 दिन शनिवार की सुबह 08ः06 बजे तक रहेगी। इस तिथि पर अगर बनने वाले योग के बारे में बात करें तो इस साल गुरु पूर्णिमा पर विष्कुंभ योग बन रहा है, जो सुबह 06ः12 बजे तक रहेगा। इसके बाद 25 जुलाई की सुबह 03ः16 बजे तक प्रीति योग रहेगा और तत्पश्चात आयुष्मान योग लगेगा। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार इस बार प्रीति योग और आयुष्मान योग का एक साथ बनना शुभ माना जा रहा है। प्रीति और आयुष्मान योग में किए गए कार्य सफल होते हैं। विष्कुंभ योग को वैदिक ज्योतिष में शुभ योगों में नहीं गिना जाता है। इसलिए यह अशुभ होता है।

गुरु पूर्णिमा पर ऐसे करें पूजा

Guru Purnima 2021: गुरु पूर्णिमा के दिन बन रहे ये खास योग, जानें शुभ मुहूर्त और तारीख
Guru Purnima 2021 सनातन धर्म में पूर्णिमा तिथि के दिन गंगा स्नान व दान बेहद शुभ फलकारी माना जाता है।

अगर आप गूरू पूर्णिमा पर विधि विधान के साथ पूजा कर लाभ अर्जित करना चाहते हैं तो इसके लिए आपके पास पान के पत्ते, पानी वाले नारियल, मोदक, कर्पूर, लौंग, इलायची होना चाहिए इनके साथ पूजन करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। ऐसी पूजा करने से सौ वाजस्नीय यज्ञ के समान फल मिलता है।

हिन्दू धर्म में पूर्णिमा का विशेष दिन माना जाता है ऐसा कहा जाता है कि अगर आप इस दिन गंगा में स्नान करते हैं तो इससे आप स्वस्थ्य और आयुवर्द्धक होते हैं। त्वचा रोग और दमा में बहुत लाभ मिलता है। इसलिए ऐसे मौके का लाभ उठाएं। इसके अलावा अगर कोविड-19 का संक्रमण देखें तो आप इसका लाभ घर में भी उठा सकते हैं। इसके लिए आप अपने नहाने युक्त जल में थोड़ा सा गंगा जल मिला लें। यह भी उतना ही फलदायी है जितना की गंगा जी में स्नान करना।

याज्ञवल्य ऋषि के वरदान से वृक्षराज को जीवनदान मिला था। इसलिए गुरु पूर्णिमा पर बरगद की भी पूजा की जाती है। इसके अलावा अगर आप गुरु पूर्णिमा की रात खीर बनाकर दान करते हैं तो इससे मानसिक शांति मिलती है। चंद्र ग्रह का प्रभाव भी दूर होकर लाभप्रद होता है।

16 July से स्कूल खोलने पर पुनर्विचार करे सरकार : चंद्रमोहन

पंचकूला 14 जुलाई:

हरियाणा के पूर्व उपमुख्यमंत्री चंद्रमोहन ने हरियाणा सरकार के 16 जुलाई से स्कूल खोलने के निर्णय पर पुनर्विचार करने की मांग की है ताकि देश के उज्जवल भविष्य विधार्थियों के अमूल्य जीवन को बचाया जा सके।

     ‌                         ‌       चन्द्र मोहन ने कहा कि कोरोना की पहली और दूसरी लहर का प्रकोप अभी पूरी तरह से समाप्त नहीं हुआ है। इसके साथ ही देश के प्रबुद्ध वैज्ञानिकों, डॉक्टरों और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी कोरोना की तीसरी लहर की आंशका व्यक्त की है। इंग्लैंड में तीसरी लहर पहले ही आ चुकी है।  उनका मानना है कि तीसरी लहर बच्चों के लिए विशेष रूप से घातक सिद्ध हो सकती है।  इस आशंका को ध्यान में रखते हुए ही सरकार को इस प्रकार का खतरा मोल लेने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए।  

     ‌                                उन्होंने शिक्षा मंत्री कंवर पाल गुज्जर से अनुरोध किया है कि बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए ही इस फैसले पर पुनर्विचार किया जाएl उन्होंने कहा कि वह स्कूल खुलने के विरोधी नहीं हैं अपितु चिंता उन नौनिहाल बच्चों की है, जिन्होंने अभी अपने जीवन की शुरुआत करनी है। उन्होंने कहा कि कोरोना की  विभीषिका ने किस प्रकार से हरियाणा प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोल कर रख दी गई,उसकी स्मृतियां अभी लोगों के दिमाग से ओझल नहीं हुई है।

           ‌                         चन्द्र मोहन ने शिक्षा मंत्री को सुझाव दिया कि वह स्कूल खोलने की बजाय बच्चों को शत् प्रतिशत  टीका लगाने की व्यवस्था करने पर जोर दे ताकि बच्चों का जीवन सुरक्षित हो सके। इस लिए उनका सुझाव है कि इन होनहार बच्चों के भविष्य को सुखद और सुरक्षित बनाने के लिए सम्पूर्ण टीकाकरण के बाद ही स्कूल खोलने का निर्णय ले। यह ही प्रदेश और बच्चों के भविष्य के लिए लाभकारी सिद्ध होगा।

         ‌                              प्रदेश में कोविड रोधी टीकाकरण अभियान का उल्लेख करते हुए उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री श्री अनिल विज को याद दिलाया कि उन्होंने जुलाई में 25 लाख टीके लगाए जाने का लक्ष्य निर्धारित किया था, परसों सोमवार को 45000 लोगों को टीका लग पाया और यही गति रही तो जुलाई में केवल मात्र 10 से 11 लाख लोगों को ही वैक्सीन लग पाएगी। कोरोना की पहली और दूसरी डोज  लगभग 18 लाख से अधिक लोगों को लगी है , इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि 16 जनवरी से शुरू हुए इस  टीकाकरण अभियान के अन्तर्गत 6 महीने के दौरान  1 करोड़ 56 हजार लोगों को टीका लग चुका है।  लगभग 2 करोड़ 50  लाख की आबादी वाले प्रदेश में अब तक 18 लाख 33 हजार लोगों को ही दोनों डोज लग पाई है। 8 जुलाई को हरियाणा सरकार को 1 लाख 50 हजार टीके केन्द्र सरकार से उपलब्ध हुए हैं इससे भी अधिक दिन काम नहीं चलेगा। इसकी गति और अधिक तेज किए जाने की जरूरत है ताकि इस बीमारी का मुकाबला दक्षता के साथ किया जा सके।

               ‌                     चन्द्र मोहन ने सुझाव दिया कि  शिक्षा मंत्री और स्वास्थ्य मंत्री को आपसी तादात्म्य और समन्वय बनाकर कर ही स्कूल खोलने जैसे महत्वपूर्ण निर्णय लेने चाहिेए। सभी बच्चों का अभी तक टीकाकरण पूरा नहीं हुआ है और अगर कोई अनहोनी हो गई तो इसका सारा दायित्व हरियाणा सरकार का होगा और ऐसी परिस्थिति में जबाब देही केवल मात्र सरकार की होगी।   

Sector-1 College organises online poem recitation competition

Panchkula, July 9,2021:
An Online Poetry Recitation Competition was organised by the Department of English of Government PG College, Sector-1. The session was inaugurated by Principal, Dr. Archana Mishra. She said that such events should be organised in these critical times to engage students in creative activities. She congratulated the students and teachers for their efforts. Head of the Department of English Vineeta Gupta shared valuable suggestions on poetry. Dr. Anita Hooda, Dr. Renuka Dhyani and Ms. Gurpreet Kaur judged the competition.

The competition inspired the young poets to come forward and exhibit their talents. The students came up with Poems on different themes and recited them with great fondness and zeal. Kritika, Divyaansh and Manisha bagged the first, second and third positions consecutively. Deepak Sharma technically assisted the faculty members for the successful organization of the competition. Dr. Archana, Ms. Harpreet Kaur, Mrs. Veena Jangra and Dr. Mallika were also present for the encouragement of students.

माधोक के विद्यार्थी परिषद ने किया 73वें वर्ष में प्रवेश

‘पुरनूर’ कोरल, चंडीगढ़ :

आज से ठीक 72 वर्ष पहले यानि 9 जुलाई 1949 को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ता प्रो बलराज मधोक ने स्थापना की।
संघ परिवार के सदस्यों मे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को अग्रज की संज्ञा दी जाए तो गलत न होगा। इसके बाद ही शिक्षा परिषद , जनसंघ और अन्य संस्थान अस्तित्व में आये । भारतीय जनता पार्टी का सृजन तो आपातकाल के बाद किया गया।

दृढ़ निश्चयी , अनुशासित, राष्ट्रवाद के पुरोधा, विचारक आदि नाना प्रकार के गुणों से प्रोत मधोक को भले ही उतना महत्व न दिया जाता हो लेकिन तथा कथित राष्टवादी और हिन्दूवादी संगठनों द्वारा उठाये जा रहे मुद्दे असल मे उन्हीं की देन हैं।

भारत पर गौहत्या पर प्रतिबंध लगाने की माँग करने वाले बलराज मधोक पहले शख़्स थे. उन्होंने पूरे भारत में घूम कर गौ हत्या विरोध का माहौल बनाने की कोशिश की थी। वो पहले नेता थे जिन्होंने 1968 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद हिंदुओं के हवाले करने की माँग उठाई थी, उसके बदले में उन्होंने हिंदुओं द्वारा मुसलमानों के लिए उसके बदले एक भव्य मस्जिद बनाने की पेशकश की ।

“मुसलमानों को भारत की मुख्यधारा में लाने की ज़रूरत है.

उदारवादी बलराज मधोक ने कहा था, “मुसलमानों को भारत की मुख्यधारा में लाने की ज़रूरत है. उसके लिए दो क़दम ज़रूरी है. पहला क़दम ये है कि उनके दिमाग से निकालो कि मुसलमान बनने के कारण तुम्हारी संस्कृति बदल गई. संस्कृति तुम्हारी वही है जो भारत की है. भाषा तुम्हारी वही है जो तुम्हारे माँ बाप की थी। उर्दू हिंदी का एक स्टाइल है, मैं भी उसे पसंद करता हूँ, क्योंकि मेरी शिक्षा भी उर्दू मे हुई है. लेकिन उर्दू मेरी भाषा नहीं है, मेरी भाषा पंजाबी है”।

भारत विभाजन के विरोधी मधोक ने 1947 में हुए भारत विभाजन को कभी स्वीकार नहीं किया और जीवनभर हर मंच पर उसका विरोध करते रहे और अखंड भारत का सपना देखते रहे।

सांझा संस्कृति की बात भारत विभाजन के साथ ही समाप्त हो गयी थी।

मधोक का कहना था, “दुर्भाग्य ये हुआ कि उस समय हमने विभाजन तो स्वीकार कर लिया लेकिन उससे निकलने वाले परिणामों को अनदेखा कर दिया. विभाजन ने दो बातें साफ़ कर दीं, ये जो साझा संस्कृति को जो बात थी वो ख़त्म हो गई। हर मुल्क की साझा संस्कृति होती है लेकिन कोई इसे साझा नहीं कहता। “गंगा के अंदर अनेक नदियाँ मिलती हैं , लेकिन मिलने के बाद गंगा जल हो जाता है. ये गंगा – जमुनी की बात ग़लत है। जब जमुना गंगा मे मिल जाती है तो कोई गंगा के पानी को गंगा -जमुनी पानी नहीं कहता, वह गंगाजल कहलाता है।”

भले ही अपनी बेबाकी की वजह से संघ के राजनीतिक पटल पर अड़ियल कार्यकर्ता के रूप में दिखे और छद्दम संघियों की राजनीति का शिकार हुए लेकिन प्रो बलराज मधोक के योगदान अविस्मरणीय हैं।

स्वतंत्र भारत के इतिहास का काला अध्याय ‘आपातकाल’

46 साल पहले भारत ने आपातकाल का अनुभव किया भारतीय इतिहास का काला अध्याय राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता से निपटने के बजाय भारत पर इमरजेंसी ठोक देना और लोकतांत्रिक शक्तियों का दमन करना ज्यादा आसान लगा। ऐसा भी नहीं था कि 25 जून की रात अचानक से आपातकाल की घोषणा कर दी गई थी। इसके पीछे एक बड़ी रणनीति थी. देश की जनता पर आपातकाल थोपने का मकसद सत्ता में बने रहना का तो था ही इससे भी अधिक खतरनाक मंशा तत्कालीन हुकुमत की थी। हमें उस पक्ष पर भी  चर्चा करनी चाहिए, जिसके कारण देश के लोकतंत्र को एक परिवार ने बंदी बना लिया। दरअसल लोकतंत्र की हत्या करके ही जो चुनाव जीता हो उसे लोकतंत्र का भान कैसे रह जाएगा ? लोकतंत्र की उच्च मर्यादा की उम्मीद उनसे नहीं की सकती, जो जनमत की बजाय धनमत और शक्ति का दुरुपयोग करके सत्ता पर काबिज होने की चेष्टा करें।

सारिका तिवारी,(inputs by) पुरनूर – चंडीगढ़ 26 जून:

देश में आपातकाल की नींव इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले से पड़ गई थी जिसमें अदालत ने राजनारायण के पक्ष और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ अपना फैसला सुनाया था। अदालत के फैसले से पहले 12 जून 1975 की सुबह इंदिरा गांधी अपने असिस्टेंट से पूछती हैं। आज तो रायबरेली चुनाव को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आना है। इस पर वहां मौजूद इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी कहते हैं, “आप बेफिक्र रहिए।” संजय का तर्क था कि इंदिरा की सांसदी को चुनौती देने वाले संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राजनारायण के वकील भूषण नहीं थे। जबकि इंदिरा के वकील एसी खरे ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि फैसला उनके ही पक्ष में आएगा। कांग्रेसी खेमा पूरी तरह से आश्वस्त था, लेकिन उस दिन जो हुआ वो इतिहास बन गया। जस्टिस जगमोहन सिन्हा ने इंदिरा के खिलाफ अपना फैसला सुना दिया। जज ने इंदिरा गांधी को चुनावों में धांधली करने का दोषी पाया और रायबरेली से सांसद के रूप में चुनाव को अवैध घोषित कर दिया। साथ ही इंदिरा के अगले 6 साल तक चुनाव लड़ने पर भी रोक लगा दी गई। हाईकोर्ट से मिले इंदिरा को झटके के बाद कांग्रेसी खेमा स्तब्ध रह गया तो राज नारायण के समर्थक दोपहर में दिवाली मनाने लगे।

पार्टी की अस्थिरता को दरकिनार कर स्वयं का वर्चस्व की रक्षा हेतु उस समय की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को संविधान की धारा 352 के तहत राष्ट्र आपात काल घोषित करना पड़ा। कहीं नौकरशाही और सरकार के बीच का संघर्ष, कभी विधान पालिका और न्यायपालिका के बीच विवाद, केशवानंद भारती और गोरखनाथ केस इन विवादों के साक्ष्य हैं। इससे पहले के चुनाव देखें तो कांग्रेस लगातार आज ही की तरह अपने ही अंतर कलह की वजह से सीटे गवाती रही। कई हिस्सों में बटी कांग्रेस का कांग्रेस (आर) इंदिरा के हिस्से आया जब इंदिरा गांधी ने कम्युनिस्ट पार्टी से मिलकर सरकार बनाई पार्टी का यह हाल हो गया था कि सिंडिकेट के दिग्गज भी अपनी सीटें ना बचा पाए। इंदिरा गांधी के कट्टर विरोधी मोरारजी देसाई ने पार्टी छोड़ी और इंदिरा को कमजोर करने में जुट गए। दूसरी और नीलम संजीवा रेड्डी, कामराज, निजा लिंगप्पा पूरी तरह से इंदिरा विरोधी थे। निजालिंगप्पा ने इंदिरा को पार्टी तक से निकाल दिया था।

इमरजेंसी के जो बड़े कारण बने वह है महंगाई, इंदिरा की कई मनमानियां, विद्यार्थियों का असंतोष, जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में रेलवे की हड़ताल, जयप्रकाश नारायण का ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा।

सुब्रह्मण्यम स्वामी, ‘जिंदा या मुर्दा’

इमरजेंसी के दौरान इंदिरा ने बहुत मनमानियां की निरंकुश ढंग से अपने विरोधियों को कुचला, जॉर्ज फर्नांडिस तो कई साल जेल में ही रहे। उन्होंने तो चुनाव भी जेल से लड़ा सुब्रह्मण्यम स्वामी के ‘जिंदा या मुर्दा’ के वारंट जारी किए गए अखबारों पर अंकुश लगाया गया कि वह जनता की बात जनता तक ना पहुंचा पाएँ। लेकिन कुछ अखबारों ने पोस्ट खाली छोड़ कर सरकार का विरोध भी किया।

इस सब में संजय गांधी अपने मित्रों के साथ पूरी तरह से सक्रिय होकर उतरे मनमानीयों के लिए। कुछ नवनियुक्त पुलिस अधिकारी जिनमें किरण बेदी, गौतम कौल और बराड़ आदि भी शामिल थे, इन्होंने एक बार इन पर लाठीचार्ज भी किया जिसका खामियाजा इन्हे आपातकाल के हटने के बाद भी कई वर्षों तक भुगतना पड़ा। पड़ा। कई वर्षों तनख्वाह के बिना नौकरी की।

इमरजेंसी की मियाद खत्म होने संविधान में संशोधन किया गया संविधान की प्रस्तावना में सेक्यूलर शब्द शामिल किए गए सबसे बड़ी बात इस संशोधन में यह की गई के न्यायपालिका संसद द्वारा पारित किसि भी कानून को गलत नहीं ठहरा सकती।

आपातकाल की काली रात 19 महीने लंबी थी और इस लंबे वक्त तक देश का लोकतंत्र कोमा में रहा। जनता के अधिकार, लिखने बोलने की आजादी सब आपातकाल की जंजीरों में जकड़ी हुई थी। आपातकाल के दौरान इंदिरा के बेटे संजय गांधी की हनक थी। जबरन नसबंदी जैसे तानाशाही फैसलों ने जनता को परेशान कर दिया था। जनवरी के महीने में आपातकाल हटाने के फैसले के साथ-साथ राजराजनीतिक बंदियों को रिहा करने के आदेश दिए गए और आम चुनाव की घोषणा की गई। इंदिरा को लगने लगा था कि वो प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाएंगी, लेकिन जनता ने कुछ और ही सोच रखा था। 1977 के आम चुनाव में कांग्रेस की बुरी तरह हार हुई। इंदिरा गांधी.. संजय गांधी समेत तमाम नेता हारे और हार गई तानाशाही…
यह थी 1975 की इमरजेंसी और उसके परिणाम

विदेश में अध्ययन हेतु भारतीय छात्रों को टीकाकरण सम्बन्धी समस्याओं का हो तुरंत समाधान: अभाविप

अभाविप ने केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री को सौंपा ज्ञापन

पंचकुला, हरियाणा – 16 जून :

अभाविप ने केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री को भारतीय छात्रों, जिन्हें को वैक्सिन का टीका लगाया गया है और 18 वर्ष से कम आयु के छात्र जो टीकाकरण की आयु सीमा में नहीं आते हैं, उनके विदेशी विश्वविद्यालयों में प्रवेश के संबंध में एक ज्ञापन सौंपा तथा सरकार से विदेश में पढ़ने की योजना बना रहे छात्रों की समस्याओं को तुरंत हल करने का अनुरोध भी किया।
अभाविप ने अपने ज्ञापन से माननीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन का ध्यान विदेशी विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए संघर्ष कर रहे भारतीय छात्रों की ओर आकर्षित किया। अभाविप ने अपने ज्ञापन में बताया कि, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय देशों सहित कई देश को वैक्सीन का टीका लगवाने वाले भारतीय छात्रों को ‘अवांछित’ या टिकरहित मान रहे हैं। इस तरह के व्यवहार से भारतीय छात्रों को गंभीर असुविधा और शैक्षणिक नुकसान होने का अनुमान है। यह ध्यान रखना प्रासंगिक है कि भारत बायोटेक द्वारा आईसीएमआर और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के सहयोग से किए गए रोग विषयक परीक्षणों में कोवैक्सीन वायरस के विरुद्ध 78% प्रभावी साबित हुई है। व्हाइट हाउस के मुख्य चिकित्सा सलाहकार डॉ. एंथनी फौसी सहित दुनिया भर के शीर्ष वायरोलोजिस्ट ने माना है कि भारत की कोवैक्सिन कोरोना वायरस के 617 प्रकारों के विरुद्ध प्रभावी है।

इसके अलावा, कई उच्च माध्यमिक छात्र विदेशी विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए आवेदन करते हैं तथा 18 वर्ष से कम आयु के छात्र जिन्होंने अमेरिकी या ब्रिटिश विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए सैट पास किया है, अभी तक टीकाकरण नीति के अन्तर्गत नहीं आते हैं, ऐसे में बाहर के विश्विद्यालयों के ऐसे रवैये से उनके शैक्षणिक नुकसान होने का खतरा है।

एबीवीपी हरियाणा के प्रदेश मंत्री श्री सुमित जागलान ने कहा कि, “अनिश्चितता और स्थिति की गंभीरता को देखते हुए, अभाविप ने आज केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री से अनुरोध किया कि वे विदेश में पढ़ने के इच्छुक छात्रों के सामने आने वाली समस्याओं को देखें और तुरंत उनका समाधान करें। हमने माननीय स्वास्थ्य मंत्री से जल्द से जल्द इस संबंध में एक बयान जारी करने का भी अनुरोध किया है, ताकि छात्रों और उनके परिजनों की चिंताओं को दूर किया जा सके। हमने सरकार से डब्ल्यूएचओ और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ गतिरोध को समाप्त करने का प्रयास करने का भी अनुरोध किया है।”

Age Relaxation Demanded in Defense Recruitment by ABVP

Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad Haryana unit wrote a letter to the Defense Minister for providing additional relaxation in the age of the candidates for recruitment in the army.

 7 June 2021 :

           Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad demands to provide one year relaxation in the age of the candidates who are recruited in Haryana Army.  It is known that while public life was disturbed due to Corona-borne circumstances, on the other hand the recruitment process could not be conducted at regular intervals.  Due to Covid-19, the candidates trapped in the restricted areas missed the recruitment examinations.  Due to being deprived of such an unexpected examination, the dream of hard working students joining the army and serving Mother India is not being fulfilled.  To do justice to the examinees, they should get one extra attempt.

          State Co-Minister of ABVP Haryana, Mr. Sunny Nara said that, “The passion to protect the country by joining the army resides in the youth of India since childhood.  In the last years, due to Corona, regular examinations could not be conducted and the candidates also could not appear in the examination due to health problems.  Keeping this in mind, an opportunity should be given to the examinees.

         ABVP Haryana State Minister Sumit Jaglan said that, “Keeping in mind the interest of the students who have been deprived of the examination, ABVP demands from the Honorable Defense Minister that one year should be given to the candidates for all types of recruitment processes in the Indian Army.  age relaxation should be provided, so that the candidates who missed their last chance due to corona situation can participate enthusiastically in their last attempt.

तकनीकी शिक्षा को 8 भारतीय भाषाओं में पढ़ाए जाने का निर्णय महत्वपूर्ण तथा स्वागत योग्य: अभाविप

सोमवार 31. 05. 2021

             अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, तकनीकी शिक्षा को अगले अकादमिक सत्र से 8 भारतीय भाषाओं में पढ़ाए जाने का अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद के निर्णय को महत्वपूर्ण मानती है तथा इसका अभिनंदन करती है। अभाविप ने 2016 में शिक्षा मंत्री (तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री) को दिए ज्ञापन में यह माँग की थी जो आज साकार हो रही है।

      अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद का यह निर्णय विशेषतः ग्रामीण तथा जनजातीय क्षेत्रों के युवाओं के लिये महत्वपूर्ण तथा लाभप्रद सिद्ध होगा तथा ग्रामीण और पिछड़े इलाकों के छात्रों के सपनों को साकार करने में सहायक होगा।

      तकनीकी शिक्षा की उपलब्धता भारतीय भाषाओं में न होने के कारण पिछड़े, ग्रामीण तथा जनजातीय क्षेत्रों के छात्र इससे वंचित रह जाते थे। तकनीकी शिक्षा की पढ़ाई मुख्यतः अंग्रेजी भाषा में होने के कारण अंग्रेजी में किंचित असहज अनुभव करने वाले छात्र मानसिक दबाव में शिक्षा ग्रहण करते थे तथा इसी असहजता के कारण तकनीकी शिक्षा से दूर हो जाते थे। अखिल भारतीय तकनीकी संस्थान के इस निर्णय से अब लाखों छात्र तकनीकी शिक्षा को ग्रहण कर पाएंगे तथा देश व समाज के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा पाएंगे।

        अभाविप के प्रदेश मंत्री सुमित जागलान जी ने कहा की, “अभाविप की लम्बे समय से माँग कर रही है की मातृ भाषा में शिक्षा मिले। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी भारतीय भाषाओं में शिक्षा की उपलब्धता पर जोर दिया है। ए.आई.सी.टी.ई. पाठ्यक्रम को जल्द से जल्द सभी भाषाओं में उपलब्ध करवाये, जिससे यह निर्णय जल्द से जल्द लागू हो।”

Shorter Duration On The Cards For 12th Board Exams

Medhavi  Sharma  – 29  MAY, 2021 :

Central Board of Secondary Education is likely to announce the class 12 Board Exam 2021 dates for the awaited exams by 1st June, 2021 . Two possible option were contemplated to hold the board examination,  one of them being, to conduct exams for a few major subjects and  awarding marks for the rest on the basis of that. Another alternative  which was discussed was to hold exams at self-centres, meaning the  respective schools with exam pattern changing to objective type of  questions. Education Ministry had also asked the states to provide their specific feedbacks on the proposal by 25 May. However different states have  distinct situations, Most of the states are in favour of conducting the  exams in July-August, in a shorter format, only four states including  Maharashtra, Delhi, Goa and Andaman & Nicobar are disinclined towards  carrying out examination and have exacted to vaccinate students and  teachers before holding the exams.  

Mr. Rajeev Karkra

While the public is having equivocal and muddled opinions on this  decision.  Teachers have hailed the option for objective type of  examinations considering the future of the students in view. “Totally  advocating the decision of conducting class 12th Board exams, else the  equilibrium between the professional lives will be disturbed” Says Mr. Rajneesh Kumar, a teacher of Saupin’s School ,Chandigarh.  Students need to buckle up, begin to clarify their doubts and brush up  their concepts, “Exams should certainly happen, else it will take a toll on a  child’s future” was remarked by Mr. Rajeev Karkra, a commerce teacher. 

Ms. Indu  Jaspal

While most of the teachers acclaim the decision, a few of them having  distinct opinions, state that objective type of examination is not worth  taking the risk, “Objective type of exams are of little significance, as it neither solves the purpose of evaluating true knowledge of a student, nor  establishes the ground for a successful professional career” says Ms. Indu  Jaspal, a government English teacher.  

Ms. Anita Sharma

Jumbled school of thoughts were observed from the parents too, few are  not happy and in favour of the thought for conducting the exams,  considering the safety of their children. “Not denying the fact, that 12th board exams are of utmost importance for a student, but also keeping in  mind the unforeseeable and unprecedented times we are currently living  in, it is very difficult for us as parents to put lives of our children in  jeopardy” exclaims Ms. Anita Sharma

Ms. Jaswinder Kaur

Safety and lives of children and teachers are of paramount importance  considering the view of conducting exams in such an unreal situation.  “We don’t want to risk lives of our children, the world seems staggering  right now, exams can wait” exclaims Ms. Paramjeet Kaur.  Pondering on the professional lives of children, few parents extoll the  decision, “I am in utter support for the exams being held, keeping in mind  the future of my child” says Ms. Jaswinder Kaur.  

Shivom Saini

While the students have different concerns, as many of them commented  that before contemplation of board exams, there is a dire need for  physical classes to resume for being assessed and doubt solving. “We  have not had practical classes in the year- in such a situation, conducting  board exams seems superfluous” says Shivom Saini, a medical student. 

Arshjot Singh

Class 12th Board Exams are being postponed from quite a while now, few  students are now desperate to vent out their learnings, “ My future  seems under the cloud and very blurry right now, I’m not sure what the  final decision is going to be, but I’m prepared for the exams and in total  favour of them” was stated by Arshjot Singh, a commerce student.  

Navdeep Chauhan

Navdeep Chauhan pursuing humanities, takes due account on the present  Covid situation and remarks that, “offline exams should not be  conducted, because the situation of COVID-19 in our country is  worsening. Even objective type of exams will lead to huge gatherings, which can cause a massive spread of the virulent virus” 

With different opinions, there is a baffling wave amongst those who may  get affected by this decision, however there is no official confirmation  from the ministry of education as of yet.

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने परीक्षा, प्रवेश एवं सत्र के सन्दर्भ में शिक्षा मंत्री को भेजा ज्ञापन

हरयाणा – 26-5-2021

  • छात्रों की सुरक्षा एवं भविष्य का विचार कर हो 12वीं की परीक्षा का निर्णय: अभाविप
  • परीक्षा, प्रवेश एवं सत्र के सन्दर्भ में शिक्षा मंत्री को भेजा ज्ञापन

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का मानना है कि कोरोना परिस्थिति के कारण टाली गयी 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं के आयोजन पर केंद्र एवं राज्य सरकार विद्यार्थियों के सुरक्षा एवं भविष्य को ध्यान रख कर निर्णय करे। परिस्थिति को ध्यान रखते हुये सरकार नवीन प्रयोगों जैसे कम समयावधि की परीक्षा, प्रमुख विषयों की परीक्षा, ओपन बुक परीक्षा आदि के माध्यम से परीक्षा का आयोजन शारीरिक दूरी का पालन कर आगामी जुलाई-अगस्त में हो सकता है, इसी दिशा में कुछ राज्य सरकारों ने भी निर्णय किये हैं।
अभाविप का मत है कि केंद्र एवं राज्य सरकारें जल्दबाज़ी ना दिखाते हुये विद्यार्थियों के भविष्य को ध्यान में रख कर निर्णय करे। जिस तरह से कोरोना के मामले कम हो रहे हैं ऐसी स्थिति में निकट माह जुलाई/अगस्त में शारीरिक दूरी का पालन पर कम समयकाल में परीक्षाओं का आयोजन हो सकता है।
महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में विगत वर्ष की भाँति पाठ्यक्रम को कम करके अंतिम वर्ष के विद्यार्थियों का मूल्यांकन करना, प्रमुख विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में आयोजित होने वाली एक दिवसीय प्रवेश परीक्षाओं को परीक्षा केंद्र की संख्या बढ़ाकर जुलाई/अगस्त माह में आयोजित करना, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालयों परिसरों में टीकाकरण केंद्रो को बढ़ाना, मेडिकल एवं चिकित्सा पाठ्यक्रमों में सीटें बढ़ाना, आगामी सत्र सितम्बर/अक्तूबर माह से प्रारंभ करना आदि सुझावों को शिक्षा मंत्री को भेजे पत्र में सम्मिलित किया है।
एबीवीपी के प्रांत मंत्री सुमित जागलान ने कहा कि, “राज्य के अधिकतर विश्वविद्यालयों में स्नातक कक्षाओं में प्रवेश मेरिट लिस्ट के आधार पर होता है, ऐसे में 12वीं कक्षा के विद्यार्थियों का मूल्यांकन महत्वपूर्ण है। केंद्र एवं राज्य सरकारों को विद्यार्थियों की सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं शैक्षणिक भविष्य को ध्यान रख कर न्यायोचित निर्णय करना चाहिये जिससे भविष्य में किसी प्रकार की समस्या का सामना विद्यार्थियों को ना करना पड़े।”