राहुल गांधी के मामले में अब क्या  होगा सांसदी दोबारा बहाल होगी या जेल जाएंगे?

                      कानूनी जानकार और सुप्रीम कोर्ट के ऐडवोकेट विकास सिंह बताते हैं कि निचली अदालत के फैसले को जब हाई कोर्ट या फिर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाती है तो उस दौरान अगर हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट निचली अदालत के दोष सिद्धि पर रोक लगा देता है तो फिर उसी आदेश में अयोग्य करार दिए जाने पर भी रोक का आदेश पारित करना होगा। इस तरह अपील पेंडिंग रहने के दौरान अयोग्यता पर रोक लग जाएगी और सदस्यता बहाल हो सकती है। राहुल गांधी के वकील ने उनकी सजा को निलंबित करने की मांग की थी। इस पर कोर्ट का कहना है कि दूसरे पक्ष को सुने बिना ऐसा आदेश पारित नहीं किया जा सकता। इस मामले में शिकायतकर्ता को 10 अप्रैल तक जवाब देने के लिए नोटिस जारी किया गया है। राहुल गांधी को 15 हजार के बॉन्ड पर जमानत दी गई है. सजा पर कोर्ट ने स्टे देते हुए राहुल गांधी को जमानत दी है। साथ ही इस मामले में जो शिकायतकर्ता हैं उन्हें भी अदालत ने नोटिस जारी किया है। मामले पर अगली सुनवाई 13 अप्रैल को होगी।

Rahul Gandhi Bail: राहुल गांधी को मिली जमानत, मानहानि केस में अब 13 अप्रैल  को अगली होगी सुनवाई | rahul gandhi bail: rahul gandhi ko mili jamanat,  manhani case mein ab 13
राहुल गांधी को मिली राहत
  • राहुल ने अपनी स्पीच में जिनका नाम लिया, उनमें पूर्णेश मोदी का नाम नहीं तो मानहानि कैसी?
  • कर्नाटक के कोलार में स्पीच दी, केस सूरत में क्यों दर्ज हुआ?
  •  क्या राजनीतिक बयानबाजी को अपराध के दायरे में लाया जा सकता है?
  • पहली बार के अपराध में अधिकतम सजा मिल जाना
  • यदि बड़ी कोर्ट एक दिन की सजा भी कम कर देती है तो राहुल की संसद सदस्यता बहाल हो जाएगी।

सारिका तिवारी, डेमोक्रेटिक फ्रन्ट, चंडीगढ़ – 04 अप्रैल :

                      सुप्रीम कोर्ट के सीनियर ऐडवोकेट एमएल लाहौटी बताते हैं कि इस मामले में निचली अदालत ने राहुल को जब दोषी करार दिया और दो साल कैद की सजा सुनाई तो उसी फैसले में निचली अदालत ने सजा के अमल पर एक महीने के लिए रोक लगा दी और जमानत दे दी। इस फैसले की भावना यह है कि इस दौरान राहुल चाहें तो अपील दाखिल कर सकते हैं। ऐसे में राहुल गांधी को अपील दाखिल करने के लिए कुछ वक्त देना चाहिए था। कानूनी तौर पर जो लिली थॉमस का जजमेंट है, उसके हिसाब से राहुल गांधी को अयोग्य करार दिए जाने के फैसले में कोई खामी नहीं है, लेकिन लोकतांत्रिक सिस्टम में इस मामले में उदारता रखनी चाहिए और इस तरह की परिपाटी शुरू नहीं करनी चाहिए।

                      कांग्रेस नेता राहुल गांधी की सांसदी दोबारा बहाल होगी या जेल जाएंगे? इसकी सुनवाई के लिए सूरत की सेशन कोर्ट ने 13 अप्रैल की तारीख मुकर्रर की है। कोर्ट ने फौरी राहत देते हुए राहुल गांधी को रेगुलर जमानत दे दी है। राहुल गांधी के मानहानि मामले में अब क्या होगा, ये कोर्ट में उनकी दलीलों पर निर्भर करता है।

सबसे पहले जानते हैं कि राहुल ने 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान कर्नाटक के कोलार की एक रैली में क्या शब्द इस्तेमाल किए थे-

‘…नीरव मोदी, मेहुल चोकसी, विजय माल्या, अनिल अंबानी और नरेंद्र मोदी। चोरों का ग्रुप है। आपके जेबों से पैसे लेते हैं… किसानों, छोटे दुकानदारों से पैसा छीनते हैं। और उन्हीं 15 लोगों को पैसा देते हैं। आपको लाइन में खड़ा करवाते हैं। बैंक में पैसा डलवाते हैं और ये पैसा नीरव मोदी लेकर चला जाता है। 35,000 करोड़ रुपए। मेहुल चोकसी, ललित मोदी… अच्छा एक छोटा सा सवाल है। इन सब चोरों के नाम मोदी-मोदी-मोदी कैसे हैं? नीरव मोदी, ललित मोदी, नरेंद्र मोदी और अभी ढूंढेंगे तो और मोदी निकलेंगे।…’

यहां पर राहुल के खिलाफ मानहानि का केस न तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, न ही नीरव मोदी, न ही ललित मोदी ने किया है। राहुल के खिलाफ मानहानि का केस सूरत से BJP विधायक पूर्णेश मोदी ने किया है।

1                       सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील विराग गुप्ता कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2022 में मनोज तिवारी के खिलाफ आपराधिक मानहानि के मामले को खारिज करते हुए कहा था कि धारा 499 के तहत आरोप लगाने के लिए पीड़ित व्यक्ति की स्पष्ट और सीधी मानहानि होनी चहिए।

राहुल की स्पीच में नीरव, ललित और नरेंद्र मोदी के नाम थे, इसलिए विधायक पूर्णेश मोदी की मानहानि होने और उनके दायर मुकदमे की वैधता पर भी सवाल हैं।

मानहानि के मामले में किसी खास व्यक्ति के सम्मान को ठेस पहुंचाने का आरोप स्पष्ट होना चाहिए। आमतौर पर की गई टिप्पणी या बड़े दायरे को समेटने वाली टिप्पणी को इसमें शामिल नहीं किया जा सकता।

राहुल का ये बयान ठीक वैसा ही जैसा लोग आम बोलचाल में बोल देते हैं कि नेता तो भ्रष्ट होते हैं। ऐसे में अगर कोई नेता देश की किसी कोर्ट में जाकर मुकदमा कर दे कि इससे मेरी मानहानि हुई है, तो इसे मानहानि नहीं कहा जा सकता।

राहुल गांधी की तरफ से कोर्ट में ये सबसे मजबूत दलील दी जा सकती है।

2                       विराग गुप्ता कहते हैं कि CrPC की धारा 202 के तहत आपराधिक मामलों में मजिस्ट्रेट का क्षेत्राधिकार तय होता है। राहुल ने मोदी सरनेम वाली स्पीच कर्नाटक के कोलार में दी। सवाल यह है कि यह मामला फिर सूरत की सीजेएम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में कहां से आ गया?

सुप्रीम कोर्ट ने सुब्रमण्यम स्वामी वर्सेज यूनियन ऑफ इंडिया मामले में आपराधिक मानहानि की संवैधानिक वैधता कायम रखते हुए कहा था कि निचली अदालत के जजों पर सभी पहलुओं से शिकायत की जांच करने का उत्तरदायित्व है।

ओबीसी की सेंट्रल लिस्ट में बिहार और गुजरात में मोदी नाम की कोई जाति नोटिफाई नही है। इसलिए राहुल के बयान को ओबीसी के खिलाफ मानना भी मुश्किल है।

करोड़ों मुकदमों का बोझ बढ़ने के साथ फास्ट ट्रैक कोर्ट के मुकदमों की संख्या में पिछले तीन सालों में 40% वृद्धि हुई है।

ऐसे में राहुल मामले में नए मजिस्ट्रेट द्वारा एक महीने में मुकदमे तेज स्पीड से सुनवाई और फैसला करने पर भी बड़े सवाल हैं।

यानी अगर इस कसौटी पर केस परखा गया तो राहुल को राहत मिलने की उम्मीद है।

वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश पाठक ने कहा, ” राहुल गांधी के उस बयान में कहां गया कि सारे चोर मोदी क्यों है इसलिए यह पूरे मोदी समुदाय के खिलाफ मानहानि का मामला है जिसमें पूर्णेश मोदी भी जिससे किसी की मानहानि होती हो वह बयान सामाजिक हो या राजनीतिक हो आपराधिक माना जाएगा शामिल है पूर्णेश मोदी ने उक्त बयान को सूरत में सुना था देखा था इसलिए उसका जो जूरिडिक्शन सूरत बनता है पहले अपराध में अधिकतम सजा देना गलत है हालांकि सूरत न्यायालय ने इस बारे में विस्तृत विवरण देते हुए और कहा है कि मैं जीवन सजा देना इसलिए आवश्यक है कि भविष्य में ऐसी गलतियां ना हो कोई भी न्यायालय 1 दिन की भी सजा कम कर देता है तो सदस्यता बहाली के लिए लोक सभा के सचिव को निवेदन करना होगा तथा लोकसभा अध्यक्ष इस निर्णय को लेने में सक्षम है यह पूरी कार्रवाई उपचुनाव होने से पूर्व होना आवश्यक है अगर लोकसभा अध्यक्ष इंकार कर देता है तो सुप्रीम कोर्ट में उक्त आदेश को चुनौती दी जा सकती है क्योंकि अभी न्यायालय उन्हें सजा को सस्पेंड किया है सजा को सस्पेंड करना या रोक लगाने पर सदस्यता बहाली नहीं हो सकती जब तक कि उसका फाइनल आदेश ना जाए की सजा 2 साल से कम हो गई है या बरी हो गया”

3                       विराग कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने 1965 के कुलतार सिंह मामले में कहा था कि राजनीतिक बयानबाजी के मामलों को अपराध के दायरे में लाने से बचना चाहिए।

168 पेज के गुजराती में दिए फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का जिक्र तो है, लेकिन फिर भी राहुल गांधी के मामले को अपराध के दायरे में लाया गया।

मानहानि के मामले में आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए, जैसा कि इस केस में हुआ है, बदनीयती और द्वेष की भावना सिद्ध करना जरूरी है।

कांग्रेस प्रवक्ता और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी कहते हैं कि राहुल गांधी का कर्नाटक के कोलार में दिया भाषण जनहित के बारे में था, राजनीति के बारे में था, महंगाई-बेरोजगारी के बारे में था।

लिहाजा, इस भाषण के किसी वाक्य को अगर आपत्तिजनक माना गया है, (जिसे हम ऊपरी अदालत में चुनौती देंगे) तो भी ये नहीं कह सकते कि उसके पीछे कोई द्वेष की भावना या बदनीयती शामिल है। लिहाजा, ये आपराधिक मामला नहीं बन सकता।

4                       राहुल के खिलाफ आपराधिक मानहानि के 10 और मामले चल रहे हैं। हालांकि, किसी और मामले में उन्हें अभी तक सजा नहीं हुई है।

इसलिए पहले अपराध में अधिकतम 2 साल की सजा दिए जाने पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। ऐसे में यदि बड़ी कोर्ट एक दिन की सजा भी कम कर देती है तो राहुल की संसद सदस्यता बहाल हो जाएगी।