21 अक्तूबर: अखिल भारतीय जनसंघ स्थापना दिवस

कोरल ‘पुरनूर’, चंडीगढ़ – 21 अक्तूबर:

21 अक्टूबर 1951 को नई दिल्ली में महान् बलिदानी डॉ0 श्यामाप्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता तथा पंडित मौलीचन्द्र शर्मा, वैध गुरूदत्त, लाला योधरज, प्रो0 बलराज मधोक आदि देशभक्तों की सहभागिता में स्थापित भारतीय जनसंघ स्वतंत्र भारत का पहला राष्ट्रवादी-यथार्थवादी राजनीतिक दल हैं जिसने संसद के अन्दर और बाहर नेहरूवाद का विकल्प और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का संखनाद किया। भारत में अभारतीय शासन के विकल्प के रूप में भारतीय राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक नीतियों की आधुनिक सन्दर्भों में व्याख्या और अनुप्रयोग के आग्रही एवं देश की एकता-अखण्डता के विश्वनीय वाहक के रूप में जनसंघ का उदय हुआ था।

भारत का जनसंघ का इतिहास :

अखिल भारतीय जनसंघ भारत का एक पुराना राजनैतिक दल है जिससे 1980 में भारतीय जनता पार्टी बनी। इस दल का आरम्भ श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में की गयी थी। इस पार्टी का चुनाव चिह्न दीपक था। इसने 1952 के संसदीय चुनाव में 3 सीटें प्राप्त की थी जिसमे डाक्टर मुखर्जी स्वयं भी शामिल थे।

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लागू आपातकाल (1975-1976) के बाद जनसंघ सहित भारत के प्रमुख राजनैतिक दलों का विलय कर के एक नए दल जनता पार्टी का गठन किया गया। आपातकाल से पहले बिहार विधानसभा के भारतीय जनसंघ के विधायक दल के नेता लालमुनि चौबे ने जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में बिहार विधानसभा से अपना त्यागपत्र दे दिया। जनता पार्टी 1980 में टूट गयी और जनसंघ की विचारधारा के नेताओं नें भारतीय जनता पार्टी का गठन किया। इसके पश्चात प्रोफेसर बलराज मधोक ने भारतीय जनसंघ का नाम अखिल भारतीय जनसंघ करके चुनाव आयोग में रजिस्टर कराया और भारतीय राजनीति में अखिल भारतीय जनसंघ के नाम से संसदीय चुनाव प्रणाली में भाग लिया।

‘अखिल भारतीय जनसंघ’ के संस्थापक प्रो.बलराज मधोक ने देश में प्रखर राष्ट्रवादी और हिन्दुत्ववादी राजनीति की नींव रखी। भारतीय जनसंघ के साथ ही उन्होंने 1951 में आरएसएस की स्टूडेंट ब्रांच अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की स्थापना की। इसके साथ ही उनका राजनीतिक सफर शुरू हुआ और इस दौरान लंबे समय तक लखनऊ उनकी राजनीतिक कर्मभूमि रहा। जनसंघ का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने लखनऊ में पहली राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक रखी। उसके बाद जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी से अलग होकर उन्होंने 1989 में यहीं से चुनाव भी लड़ा। लखनऊ में उनके साथ काम करने वाले ऐसे ही कुछ नेताओं और बुद्धिजीवियों को उनकी बेवाकी और स्पष्ट राजनीतिक सोच के संस्मरण अब भी याद हैं।

भारतीय जनसंघ के संस्थापक प्रो.मधोक के लाल कृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी से राजनीतिक मतभेद रहे। आडवाणी जब राष्ट्रीय अध्यक्ष बने तो 1973 में उन्हें भारतीय जनसंघ से निकाल दिया गया। बाद में भारतीय जनता पार्टी बनी तो उसमें शामिल हुए, हालांकि उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने ‘अखिल भारतीय जनसंघ’ पार्टी बनाई लेकिन वह सफलता नहीं हो सकी। उसके बाद बीजेपी ने 1989 में जनता दल के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। लखनऊ से जनता दल के मांधाता सिंह को संयुक्त प्रत्याशी बनाया गया। मधोक मांधाता सिंह के खिलाफ निर्दलीय लड़े। उन्हें हिंदूवादियों का समर्थन मिला और माना जा रहा था कि वह जीत जाएंगे। इसी दौरान अटल बिहारी वाजपेयी ने एक लाइन का बयान दिया-‘मधोक हमारे प्रत्याशी नहीं हैं।’ और पूरा चुनावी रुख पलट गया, मधोक हार गए।
पूर्व सांसद लालजी टंडन बताते हैं कि जनसंघ की स्थापना के समय से आखिरी समय तक मेरा उनसे जुड़ाव रहा। वह जीवन भर मूल्यों पर आधारित राजनीति करते रहे। वह जब भी लखनऊ आते, मेरी मुलाकात होती थी। उनकी अध्यक्षता में राष्ट्रीय कार्यसमिति यहां चौक स्थित धर्मशाला में हुई। तब मैं उनके काफी करीब रहा। कश्मीर को बचाने में उनका खासा योगदान है। मैं अटलजी और मधोकजी के बीच कुछ दूरियां रहीं लेकिन मैं दोनों के काफी करीब रहा। एक बार यह स्थिति आ गई कि उन्हें जनसंघ से अलग होना पड़ा लेकिन उसके बाद भी वह लिखकर अपने राष्ट्रवादी विचार रखते रहे। जिन विषयों पर आज के नेता संकोच करते हैं, उन पर भी उन्होंने प्रखर विचार रखे। वह राजनीतिक तौर पर भले ही अलग रहे हों लेकिन वह कभी मूल विचारधारा से नहीं हटे।

राष्ट्रधर्म के संपादक आनंद मिश्र अभय बताते हैं कि मधोक जी से मेरा संपर्क 1997 में हुआ जब मकर संक्रांति पर ‘सनातन भारत’ विशेषांक निकाला। राष्ट्रधर्म में उनका लेख छापा तो उनके करीबी महेश चंद्र भगत ने सराहा। भगत जी ने ही मेरे बारे में उनको बताया। मधोक जी जब लखनऊ आए तो मुझे मिलने बुलाया और प्रेस कॉन्फ्रेंस में साथ ही बैठा लिया। इसी दौरान वह बोल गए कि अटल जी अब तक के सबसे खराब प्रधानमंत्री हैं। मुझसे रहा नहीं गया और मैंने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में उनसे बेहतर नेता और कौन है? इस पर उन्होंने कहा कि यह बीजेपी का सिरदर्द है। मैंने कहा, यह बीजेपी का सिरदर्द है तो आप क्यों इसे अपना बना रहे हैं? … और प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म हो गई। यह उनकी सहजता ही थी कि इसके बाद भी उन्होंने बुरा नहीं माना। बाद में मैंने उनसे कहा कि आपने इतिहास पढ़ा है, पढ़ रहे हैं, गढ़ रहे हैं और इतिहास को जी रहे हैं। क्यों नहीं आप संस्मरण लिखते। उसके बाद ही उन्होंने संस्मरणों पर आधारित पुस्तक लिखी। कश्मीर समस्या के समाधान पर उन्होंने एक लेख भी भेजा जो उनकी राष्ट्रवादी विचारधारा के विपरीत था। मैंने वह लेख छापा नहीं और उनसे आग्रह किया कि इसे कहीं और भी न भेजें। इससे आपकी छवि धूमिल होगी। मेरी यह बात उन्होंने मानी भी और अपनी विचारधारा के अनुसार ही लिखते रहे।

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