स्वाभिमानिनी दादी के नक्श-ए-कदम पर ज्योतिरादित्य सिंधिया

माधवराव सिंधिया जिन हालातों में काँग्रेस में गए थे उस बात का उल्लेख स्वयं राजमाता सिंधिया ने एक टीवी साक्षात्कार के दौरान किया था। वह दौर गाय और बछड़ा निशान वाली काँग्रेस का था। उस जमाने के राजनीति और राजनैतिक षडयंत्रों को समझने वाले लोग इस बात की बाखूबी तसदीक कर सकते हैं। इन्दिरा लहर के बावजूद विजय राजे सिंधिया गवालियर इलाक़े की तीन लोकसभा सीट राजमाता और उनके पसंदीदा जनसंघ उम्मीदवारों ने जीतीं, इसमें भिंड से ख़ुद विजयाराजे जीतीं, गुना से माधवराव सिंधिया और ग्वालियर से अटल बिहारी वाजपेयी ने चुनाव जीते। आज 43 साल बाद इतिहास खुद को फिर से दोहराता जान पड़ता है। लेकिन इस बार सिंधिया घराना वह धोखा नहीं खाएगा जो राजमाता ने खाया था।

चंडीगढ़:

ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस से इस्तीफा देने के साथ ही मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार का गिरना भी तय हो गया है, क्योंकि कांग्रेस के 19 विधायक उनके साथ हैं. 43 साल पहले उनकी दादी राजमाता ने भी नाराज होकर इसी तरह मध्य प्रदेश में डीपी मिश्रा की सरकार गिराई थी.

ज्योतिरादित्य सिंधियाके कांग्रेस से इस्तीफे और 19 कांग्रेसी विधायकों के उनके साथ जाने के चलते ये तय हो गया है कि मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) में कमलनाथ की सरकार गिर जाएगी. खुद कांग्रेस भी इस बात को मान रही है. जिस तरह ज्योतिरादित्य के इस कदम से मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार गिरने जा रही है, कुछ वैसा ही काम 43 साल पहले उनकी दादी ने भी किया था. तब उनकी दादी राजमाता विजयराजे सिंधिया ने कांग्रेस की तत्कालीन डीपी मिश्रा सरकार को गिरवा दिया था.

तब राजमाता ने जनसंघ के विधायकों के समर्थन से स्व. गोविंद नारायण सिंह को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया था. यही वो मौका था जब मध्य प्रदेश में लोग ग्वालियर के सिंधिया राजघराने की ताकत का अहसास करने लगे थे. इसी घटना के बाद सिंधिया परिवार सही मायनों में सियासी में मजबूती से खुद का कद भी साबित करने लगा था.

दरअसल जब देश आजाद हुआ, तब तक ग्वालियर रियासत पर सिंधिया राजघराने का शासन था. राज्य की बागडोर महाराजा जिवाजीराव सिंधिया के कंधों पर थी. आजादी के कुछ समय बाद ग्वालियर रियासत का भी भारत में विलय हो गया. इसके बाद जिवाजी राव को भारत सरकार ने नए राज्य मध्य भारत का राज्य प्रमुख बनाया. वो इस राज्य के 1956 में मध्य प्रदेश में विलय किए जाने तक इसी पोजिशन पर रहे.

नेहरू के कहने पर कांग्रेस में आईं थीं राजमाता

1961 में जिवाजी राव के निधन के बाद राजमाता विजया राजे सिंधिया ने सिंधिया राजघराने की बागडोर संभाली. उस समय वो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कहने पर कांग्रेस में शामिल हुईं. लेकिन कुछ सालों बाद 1967 के चुनावों में ऐसी बातें हुईं, जब उनका कांग्रेस से मोहभंग होने लगा.

सीएम मिश्रा कराने लगे थे ताकत का अहसास

वो तब राज्य के मुख्यमंत्री डीपी मिश्रा से मुलाकात करने भोपाल गईं थीं. जो महारानी को कई बार ये अहसास दिलाते रहे थे कि अब ताकत उनके हाथों में है. जब वो मुलाकात के लिए गईं तो तत्कालीन मुख्यमंत्री मिश्रा ने उन्हें 10 से 15 मिनट तक इंतजार करा दिया. ये बात राजमाता के लिए किसी झटके से कम नहीं थी.

इस मुलाकात में उन्होंने छात्र आंदोलनकारियों पर पुलिस लाठीचार्ज पर नाराजगी जाहिर करते हुए वहां के एसपी को हटाने की मांग की. मुख्यमंत्री ने उनकी बात नहीं मानीं.

फिर राजमाता ने कांग्रेस को कह दिया अलविदा

इसी टकराव के बाद सिंधिया ने कांग्रेस को अलविदा कह दिया. वो जनसंघ के टिकट पर विधानसभा का चुनाव लड़ीं. साथ ही निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लोकसभा चुनाव भी लड़ीं. दोनों में विजयी रहीं. 1967 तक विधानसभा और लोकसभा चुनाव एक साथ होते रहे थे.

तब मध्य प्रदेश में गिरी थी कांग्रेस सरकार

मध्य प्रदेश विधानसभा में विजयाराजे सिंधिया के जाने से कांग्रेस की लिए मुश्किल हालात बन गए. कांग्रेस पार्टी के 36 विधायक विपक्षी खेमे में आ गए. जिससे कांग्रेस की डीपी मिश्रा सरकार गिर गई. पहली बार मध्य प्रदेश में ग़ैर कांग्रेसी सरकार बनी. इसका श्रेय राजमाता को दिया गया. राजमाता की पसंद के गोविंद नारायण सिंह राज्य के मुख्यमंत्री बने.

हालांकि ये गठबंधन भी स्थायी सरकार नहीं दे पाया. ये केवल 20 महीने में गिर गया. गोविंद नारायण सिंह फिर कांग्रेस में चले गए. लेकिन इस सारे उठापटक ने जनसंघ को मध्य प्रदेश में मजबूत बना दिया. साथ ही विजयाराजे सिंधिया खुद भी एक बड़ी सियासी ताकत के तौर पर स्थापित हो गईं.

इंदिरा लहर में भी ग्वालियर में जीती थीं

विजयाराजे सिंधिया की लोकप्रियता ग्वालियर में जबरदस्त थी. इसी का नतीजा था कि 1971 में जब देश में इंदिरा गांधी की लहर चल रही थी, तब भी ग्वालियर इलाक़े की तीन लोकसभा सीट राजमाता और उनके पसंदीदा जनसंघ उम्मीदवारों ने जीतीं. इसमें भिंड से ख़ुद विजयाराजे जीतीं, गुना से माधवराव सिंधिया और ग्वालियर से अटल बिहारी वाजपेयी ने चुनाव जीते. वैसे बाद में माधवराव सिंधिया जनसंघ से अलग होकर कांग्रेस में शामिल हो गए.

अब दादी के ही रास्ते पर चल पड़े ज्योतिरादित्य

इमरजेंसी के दौरान राजमाता सिंधिया जेल गई. हालांकि माधवराव सिंधिया फिर कांग्रेस के साथ ही रहे. उनके बेटे ज्योतिरादित्य भी करीब दो दशकों से कहीं ज्यादा समय से कांग्रेस के साथ थे लेकिन अब उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा देकर उसी राह पर चलने का फैसला किया है. जिस पर 43 पहले उनकी दादी ने चली थीं.

0 replies

Leave a Reply

Want to join the discussion?
Feel free to contribute!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *