इमरान खान को एफ़एटीएफ़ से बचने की उम्मीद बाकी

एफएटीएफ (FATF) ने पिछले साल पाकिस्तान को उन देशों की ग्रे सूची में रखा था जो आतंकियों की फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग से निपटने के लिए कमजोर थे. अगर तीन देश इस ब्लैकलिस्टिंग प्रपोसल के खिलाफ आवाज उठाते हैं तो ये खारिज हो जाएगा. चीन पाकिस्तान का साथ दे सकता है. वह यह भी कोशिश कर रहे हैं कि अमेरिका खुले तौर पर भारत का साथ न दे और पाकिस्तान के खिलाफ न हो. वर्तमान में इमरान खान की इस लॉबिंग का मकसद है कि वह ज्यादा से ज्यादा देशों का समर्थन अपने पक्ष में जुटा सकें.

नयी दिल्ली:

फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (Financial Action Task Force) द्वारा होने वाली ब्लैकलिस्टिंग से बचने के लिए आर्थिक तंगी से जूझ रहे पाकिस्तान (Pakistan) के प्रधानमंत्री इमरान खान (Imran Khan) संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) से इतर दूसरे देशों के प्रमुखों की लॉबिंग कर रहे हैं. भारत सरकार के सूत्रों ने सीएनएन-न्यूज 18 को बताया कि इमरान खान समर्थन हासिल करने के लिए अब तक दो दर्जन देशों के प्रमुखों से मिल चुके हैं.

एफएटीएफ (FATF) ने पिछले साल पाकिस्तान को उन देशों की ग्रे सूची में रखा था जो आतंकियों की फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग से निपटने के लिए कमजोर थे. पेरिस (Paris) स्थित निकाय ने कहा था कि जब तक पाकिस्तान अक्टूबर तक अपनी प्रतिबद्धता को पूरा नहीं करता, वह ब्लैक लिस्टेड हो सकता है. अगले महीने 13 से 18 तारीख तक संगठन की विस्तृत बैठक होगी.

इसलिए हुआ था एफएटीएफ का गठन

एफएटीएफ का गठन 1989 में पेरिस में हुई जी7 समिट में किया गया था. इसका गठन मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों पर नजर रखने, लेजिस्टेटिव पर नजर रखने, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वित्तीय और कानून प्रवर्तन गतिविधियों की निगरानी करने, अनुपालन पर रिपोर्टिंग करने और मनी लॉन्ड्रिंग से निपटने लगाए गए मानकों के लिए था.

11 सितंबर, 2001 को संयुक्त राज्य अमेरिका में अल-कायदा (Al-Queda) के हमलों के बाद आतंकी मनी लॉन्ड्रिंग को शामिल करने के लिए इसके जनादेश का विस्तार किया गया था. एफएटीएफ प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों का कहना है कि टास्क फोर्स की निर्धारित प्रक्रियाओं के खिलाफ पैरवी को तवज्जो दी जाती है.

कूटनीति पर निर्भर है पाकिस्तान

सूत्रों ने कहा कि पिछले महीने बैंकॉक (Bangkok) में हुई बैठक में वॉचडॉग एशिया / पैसिफिक ग्रुप (एपीजी) पाकिस्तान विश्व स्तर पर नामित आतंकवादियों और आतंकवादियों के खिलाफ अभियोग या प्रदर्शनकारी कार्रवाई दिखाने में विफल रहा और इसलिए वह खुद को ब्लैकलिस्ट करने से बचाने के लिए अब कूटनीति पर निर्भर है.

भारत सरकार के अधिकारियों का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने यूएनजीए के इतर हुए लीडर्स डायलॉग ऑन स्ट्रैटेजिक रिसपॉन्सेस टू टेरररिस्ट एंड वॉयलेंट एक्सट्रीमिस्ट नैरेटिव्स में एफएटीएफ के राजनीतिकरण को लेकर सवाल उठाए थे जिसका अर्थ पाकिस्तान के कदमों को भी उजागर करना था.

विदेश मंत्रालय में सचिव (पश्चिम) अनमूला गीतेश सरमा ने कहा कि- “पीएम मोदी ने बहुपक्षीय स्तर पर आतंकवाद विरोधी सहयोग को संस्थागत बनाने का सुझाव दिया. उन्होंने कहा कि आतंकवादियों को धन और हथियार मिलने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. इस उद्देश्य को साकार करने के लिए, हमें संयुक्त राष्ट्र की सूची और एफएटीएफ जैसे तंत्रों के राजनीतिकरण से बचने की जरूरत है.”

एफएटीएफ की सूची में ब्लैकलिस्ट होने के बाद पाकिस्तान के लिए बड़ा झटका साबित हो सकती है क्योंकि पाकिस्तान में अभी दोहरे अंकों में महंगाई है, साथ ही ब्याज की दरें भी काफी ऊंची हैं साथ ही पाकिस्तान के लोग बेरोजगारी का सामना कर रहे हैं. खान ने इससे पहले एफएटीएफ में भारत के प्रयासों को पाकिस्तान के खिलाफ चाल बताया था. इमरान ने कहा था कि हमने पाया है कि भारत हमें FATF पर ब्लैकलिस्ट करने पर जोर दे रहा है और हमने महसूस किया कि वह एजेंडा के तहत ऐसा कर रहे हैं.

आपको बता दें वॉचडॉग ने उन देशों को ब्लैक लिस्ट किया है जो मनी लॉन्ड्रिंग और टेरर फंडिंग के खिलाफ वैश्विक लड़ाई की अवहेलना करते हैं. वह ऐसे देशों को गैर-सहकारी देश या क्षेत्र (एनसीसीटी) कहता है.

एफएटीएफ प्रक्रिया से जुड़े भारतीय सरकारी अधिकारियों ने कहा कि 38 सदस्यीय संगठन सर्वसम्मति के सिद्धांत पर काम करता है और ऐसा न होने पर इस प्रस्ताव को अस्वीकार किया जा सकता है. वर्तमान में चीन इसका प्रमुख है और भारत द्वारा पाकिस्तान को टेरर फंडिग के लिए ब्लैक लिस्ट की कोशिश के खिलाफ वह पाकिस्तान का समर्थन कर सकता है.
एक अधिकारी ने बताया कि अगर तीन देश इस ब्लैकलिस्टिंग प्रपोसल के खिलाफ आवाज उठाते हैं तो ये खारिज हो जाएगा. चीन पाकिस्तान का साथ दे सकता है. वह यह भी कोशिश कर रहे हैं कि अमेरिका खुले तौर पर भारत का साथ न दे और पाकिस्तान के खिलाफ न हो. वर्तमान में इमरान खान की इस लॉबिंग का मकसद है कि वह ज्यादा से ज्यादा देशों का समर्थन अपने पक्ष में जुटा सकें.



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