एक घंटे की क्लास नहीं बल्कि 23 घंटे का रियाज़ काम आता है: प्रोफ॰ अरविंद शर्मा

फोटो और कवरेज राकेश शाह

संगीत के महत्व और उसकी अलग अलग विधाओं के बारे में बताया. संगीतमय परिवार में जन्मे, उनके पिताजी ने लाहौर 1901 में गंधर्व महाविद्यालय की स्थापना की और बहुत से दिग्गज़ों को संगीत के गुर सिखाए . विभाजन तक उनके पिताजी वहीं रहे.

संगीत को नाद ब्रह्म मानने वाले अरविंद जी ने वर्तमान दौर के संगीत के बाज़ारीकरण और बिना रागों पर बनाये जा रहे संगीत पर चिन्ता जताई. संगीत तीसरी पीढ़ी तक पहुंच गया है और खुद के दोनों पुत्र भी संगीत भी है .

वर्तमान सेंगीत शिक्षा पर बोलते हुए कहा कि संगीत कालांतर के साथ dilute होता जा रहा है जिसका उद्देश्य केवल डिग्री पाना ही हो गया है. एक ही तरह का संगीत सुनाई दे रहा है.

संगीत की पढ़ाई को पढ़ाई नहीं माना जाता. ज्यादा मेहनत के कारण शास्त्रीय संगीत को कम दर्शकों का साथ मिलता है जिसका कारण हम सब भी है.

रागों पर बोलते हुए कहा कि संगीत लोक परंपरा से दूर होते जा रहे है . हमारे पुराने गाने राग पर आधारित होते थे. पुराने गाने इसलिए चलते थे क्योंकि वे परंपरा से जुड़े होते थे. हम उन्हें भूल कर बिना सोचे समझे ग्लोबलाइज़ेशन की ओर जा रहे है जिससे हम अपनी संस्कृति से दूर होती का रहे है.

भरत के नाट्यशास्त्र की अहमियत बताते हुए कहा कि हमारे पास ऐसे अनमोल ग्रंथ भारत में ही मौजूद है. हमारा देश का संगीत मैलोडी पर आधारित है पर पाश्चात्य संगीत हार्मोनी पर.  बिना सोचे समझे नकल करने के कारण पारंपरिक संगीत प्रभावित हो रहा है.

लोगों में संयम व धैर्य की कमी और चैनलों की भेड चाल ने मौजूदा संगीत को प्रभावित किया है. विद्या को दान के रूप में ग्रहण किया जाता था लेकिन अब बाज़ारीकरण हो गया है. साथ ही टोकने वाले ज़हीन लोग भी कम हो रहे है.

सुर की पीड़ को तीर की पीड़ से बड़ा बताते हुए कहा कि संगीत में भाव, स्वर और राग का समन्वय आवश्यक है तभी यादगार संगीत बनता है. युवाओं से आवाहन किया कि इस परंपरा को वही बचा सकती है.

फ्यूज़न को ऐतिहासिक परंपरा बताते हुए कहा कि सबका स्वागत करना हिंदुस्तान की परंपरा रही है.

हर गीत के पीछे भाव होता है और उस भाव के लिए खुद की समझ को बढ़ाना और भावनाओं से ओत प्रोत होना भी आवश्यक है.मौके पर उन्होंने अलग अलग रागों को गाकर उनपर आधारित गानों का भी विवरण दिया.

संगीत सीखा रहे गुरुओं से गुज़ारिश की अपने प्रोफेशन के प्रति ईमानदार रहे और पूरे अनुशासन और बिना पक्षपात किये अपने छात्रों को पढ़ाये फिर चाहें उसे डाँटना ही क्यों न पड़े. शिक्षा की असली शुरुआत कक्षा के बाहर होती है. ज़रूरी ये नहीं की एक घंटे क्लास में क्या किया पर आवश्यक यह है की बाद के 23 घंटे क्या किया.   

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